मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 51, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 51
| * अध्याय ९ * | ४१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषभोऽथ ऋषाद्याश्च वारिमूला दिवौकसः।<br>चाक्षुषस्यान्तरे प्रोक्ता देवानां पञ्चयोनयः॥ २४<br>रुरुप्रभृतयस्तद्वच्चाक्षुषस्य सुता दश।<br>प्रोक्ताः स्वायम्भुवे वंशे ये मया पूर्वमेव तु॥ २५<br>अन्तरं चाक्षुषं चैतन्मया ते परिकीर्तितम्।<br>सप्तमं तत् प्रवक्ष्यामि यद् वैवस्वतमुच्यते॥ २६<br>अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च कश्यपो गौतमस्तथा।<br>भरद्वाजस्तथा योगी विश्वामित्रः प्रतापवान्॥ २७<br>जमदग्निश्च सप्तैते साम्प्रतं ये महर्षयः।<br>कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमं पदम्॥ २८<br>साध्या विश्वे च रुद्राश्च मरुतो वसवोऽश्विनौ।<br>आदित्याश्च सुरास्तद्वत् सप्त देवगणाः स्मृताः॥ २९<br>इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चास्य दश पुत्राः स्मृता भुवि।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु सप्त सप्त महर्षयः॥ ३०<br>कृत्वा धर्मव्यवस्थानं प्रयान्ति परमं पदम्। | इसी प्रकार उस मन्वन्तरमें लेखा, ऋषभ, ऋषाद्य, वारिमूल और दिवौकस नामसे देवताओंकी पाँच योनियाँ बतलायी गयी हैं। पहले स्वायम्भुव मनुके वंश-वर्णनमें मैंने जैसा तुमसे कहा है, (कि स्वायम्भुव मनुके दस पुत्र थे) वैसे ही चाक्षुष मनुके भी रुरु आदि दस पुत्र थे। इस प्रकार मैंने तुम्हें चाक्षुष-मन्वन्तरका परिचय दे दिया। अब उस सातवें मन्वन्तरका वर्णन करता हूँ, जो (वर्तमानमें) वैवस्वत नामसे विख्यात है। इस मन्वन्तरमें अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, योगी, भरद्वाज, प्रतापी, विश्वामित्र और जमदग्नि—ये सात महर्षि इस समय भी वर्तमान हैं। ये सप्तर्षि धर्मकी व्यवस्था करके अन्तमें परमपदको प्राप्त करते हैं। वैवस्वत-मन्वन्तरमें साध्य, विश्वेदेव, रुद्र, मरुत्, वसु, अश्विनीकुमार और आदित्य—ये सात देवगण कहे जाते हैं। वैवस्वत मनुके भी इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए, जो भूमण्डलमें प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार सभी मन्वन्तरोंमें सात-सात महर्षि होते हैं, जो धर्मकी व्यवस्था करके अन्तमें परमपदको चले जाते हैं॥ २४—३० १/२॥ |
| सावर्ण्यस्य प्रवक्ष्यामि मनोर्भावि तथान्तरम्॥ ३१<br>अश्वत्थामा शरद्वांश्च कौशिको गालवस्तथा।<br>शतानन्दः काश्यपश्च रामश्च ऋषयः स्मृताः॥ ३२<br>धृतिर्वरीयान् यवसः सुवर्णो वृष्टिरेव च।<br>चरिष्णुरीड्यः सुमतिर्वसुः शुक्रश्च वीर्यवान्॥ ३३<br>भविष्या दश सावार्णेर्मनोः पुत्राः प्रकीर्तिताः।<br>रौच्यादयस्तथान्येऽपि मनवः सम्प्रकीर्तिताः॥ ३४<br>रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम भविष्यति।<br>मनुर्भूतिसुतस्तद्वद् भौत्यो नाम भविष्यति॥ ३५<br>ततस्तु मेरुसावर्णिर्ब्रह्मसूनुर्मनुः स्मृतः।<br>ऋतश्च ऋतधामा च विष्वक्सेनो मनुस्तथा॥ ३६<br>अतीतानागताश्चैते मनवः परिकीर्तिताः।<br>षडूर्नं युगसाहस्रमेभिर्व्याप्तं नराधिप॥ ३७<br>स्वे स्वेऽन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्य सचराचरम्।<br>कल्पक्षये विनिर्वृत्ते मुच्यन्ते ब्रह्मणा सह॥ ३८<br>एते युगसहस्रान्ते विनश्यन्ति पुनः पुनः।<br>ब्रह्माद्या विष्णुसायुज्यं याता यास्यन्ति वै द्विजाः॥ ३९ | राजर्षे ! अब मैं भावी सावणि-मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। इस मन्वन्तरमें अश्वत्थामा, शरद्वान्, कौशिक, गालव, शतानन्द, काश्यप और राम (परशुराम)—ये सात ऋषि बतलाये गये हैं। सावणि मनुके धृति, वरीयान्, यवस, सुवर्ण, वृष्टि, चरिष्णु, ईड्य, सुमति, वसु और पराक्रमी शुक्र—ये दस पुत्र होंगे, ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार भविष्यमें होनेवाले रौच्य आदि अन्यान्य मन्वन्तरोंका भी वर्णन किया गया है। उस समय प्रजापति रुचिका पुत्र रौच्य मनुके नामसे विख्यात होगा तथा उसी तरह भूतिका पुत्र भौत्य मनुके नामसे पुकारा जायगा। उसके बाद ब्रह्माके पुत्र मेरुसावर्णि मनु नामसे प्रसिद्ध होंगे। इनके अतिरिक्त ऋत, ऋतधामा* और विष्वक्सेन नामक तीन मनु और उत्पन्न होंगे। नरेश्वर ! इस प्रकार मैंने तुम्हें अतीत तथा भविष्यमें होनेवाले मनुओंका वृत्तान्त बतला दिया। यह भूमण्डल नौ सौ चौरानबे (९९४) (प्रायः एक सहस्र युगोंतक इन मनुओंस व्यास रहता है (अर्थात् इन १४ मनुओमें प्रत्येक मनुका कार्यकाल ७१ दिव्य (चतुर्) युगोंतक रहता है)। इस प्रकार वे सभी अपने-अपने कार्यकालमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न करके कल्पान्तके समय ब्रह्माके साथ मुक्त हो जाते हैं। द्विजवरो ! इस तरह ये सभी मनु एक सहस्र युगके अन्तमें बारम्बार उत्पन्न होकर विनष्ट होते रहते हैं और ब्रह्मा आदि देवगण विष्णु-सायुज्यको प्राप्त हो जाते हैं तथा भविष्यमें भी इसी प्रकार प्राप्त करते रहेंगे॥ ३१—३९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकीर्तनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकीर्तन नामक नवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९॥
* पद्मादिपुराणोंमें ये ऋभु और वीतधामा नामसे निर्दिष्ट हैं।