मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४६ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निवेदयामास पितुर्यमः शापादमर्शितः।<br>निष्कारणमहं शप्तो मात्रा देव सकोपया॥ १३<br><br>बालभावान्मया किंचिदुद्यतश्चरणः सकृत्।<br>मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद् विभो॥ १४<br><br>प्रायो न माता सास्माकं शापेनाहं यतो हतः।<br>देवोऽप्याह यमं भूयः किं करोमि महामते॥ १५<br><br>मौर्ख्यात् कस्य न दुःखं स्यादथवा कर्मसंततिः।<br>अनिवार्या भवस्यापि का कथान्येषु जन्तुषु॥ १६<br><br>कृकवाकुर्मया दत्तो यः कृमीन् भक्षयिष्यति।<br>क्लेदं च रुधिरं चैव वत्सायमपनेष्यति॥ १७ | रुधिर टपकता रहेगा।' इस शापको सुनकर अमर्षसे भरे हुए यम पिताके पास जाकर निवेदन करते हुए बोले—'देव! क्रुद्ध हुई माताने मुझे अकारण ही शाप दे दिया है। विभो! बालचापुल्यके कारण मैंने एक बार अपना दाहिना पैर कुछ ऊपर उठा दिया था, (इस तुच्छ अपराधपर) भाई मनुके मना करनेपर भी उसने मुझे ऐसा शाप दे दिया है। चूँकि इसने हमपर शापद्वारा प्रहार किया है, इसलिये यह हम लोगोंकी माता नहीं प्रतीत होती (अपितु बनावटी माता है)।' यह सुनकर विवस्वान्देवने पुनः यमसे कहा—'महाबुद्धे! मैं क्या करूँ? अपनी मूर्खताके कारण किसको दुःख नहीं भोगना पड़ता। अथवा (जन्मान्तरीय शुभाशुभ) कर्मपरम्पराका फलभोग अनिवार्य है। यह नियम तो शिवजीपर भी लागू है, फिर अन्य प्राणियोंके लिये तो कहना ही क्या है। इसलिये बेटा! मैं तुम्हें यह एक मुर्गा (या मोर) दे रहा हूँ, जो पैरमें पड़े हुए कीड़ोंको खा जायगा और उससे निकलते हुए मज्जा (पीब) एवं खूनको भी दूर कर देगा'॥ २—१७॥ |
| एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्रं महायशाः।<br>गोकर्णतीर्थे वैराग्यात् फलपत्रानिलाशनः॥ १८<br><br>आराधयन् महादेवं यावद् वर्षायुतायुतम्।<br>वरं प्रदान्महादेवः संतुष्टः शूलभृत् तदा॥ १९<br><br>वव्रे स लोकपालत्वं पितृलोके नृपालयम्।<br>धर्माधर्मात्मकस्यापि जगतस्तु परीक्षणम्॥ २०<br><br>एवं स लोकपालत्वमगमच्छूलपाणिनः।<br>पितॄणां चाधिपत्यं च धर्माधर्मस्य चानघ॥ २१ | पिताद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महायशस्वी यमके मनमें विराग उत्पन्न हो गया। वे गोकर्णतीर्थमें जाकर फल, पत्ता और वायुका आहार करते हुए कठोर तपस्यामें संलग्न हो गये। इस प्रकार वे बीस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करते रहे। कुछ समयके पश्चात् त्रिशूलधारी महादेव उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर प्रकट हुए। तब यमने उनसे वररूपमें लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और जगत्के धर्म-अधर्मका निर्णायक पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। महादेवजीने उन्हें सभी वरदान दे दिये। निष्पाप शौनक! इस प्रकार यमको शूलपाणि भगवान् शंकरसे लोकपालत्व, पितरोंका आधिपत्य और धर्माधर्मके निर्णायक पदकी प्राप्ति हुई है। |
| विवस्वानथ तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्मचेष्टितम्।<br>त्वष्टुः समीपमगमदाचचक्षे च रोषवान्॥ २२<br><br>तमुवाच ततस्त्वष्टा सांत्वपूर्वं द्विजोत्तमाः।<br>तवासहन्ती भगवन् महस्तीव्रं तमोनुदम्॥ २३<br><br>वडवारूपमास्थाय मत्सकाशमिहागता।<br>निवारिता मया सा तु त्वया चैव दिवाकर॥ २४<br><br>यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता।<br>तस्मान्मदीयं भवनं प्रवेष्टुं न त्वमर्हसि॥ २५<br><br>एवमुक्ता जगामाथ मरुदेशमनिन्दिता।<br>वडवारूपमास्थाय भूतले सम्प्रतिष्ठिता॥ २६ | इधर विवस्वान् संज्ञाकी उस कर्मचेष्टाको जानकर त्वष्टा (विश्वकर्मा)के निकट गये और क्रुद्ध होकर उनसे सारा वृत्तान्त कह सुनाये। द्विजवरो! तब त्वष्टाने सान्त्वनापूर्वक विवस्वान्से कहा—'भगवन्! अन्धकारका विनाश करनेवाले आपके प्रचण्ड तेजको न सहन करनेके कारण संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके यहाँ मेरे समीप अवश्य आयी थी, परंतु दिवाकर! मैंने उसे यह कहते हुए (घरमें घुसनेसे) मना कर दिया—'चूँकि तू अपने पतिदेवकी जानकारीके बिना छिपकर यहाँ मेरे पास आयी है, इसलिये मेरे भवनमें प्रवेश नहीं कर सकती।' इस प्रकार मेरे निषेध करनेपर आपके और मेरे—दोनों स्थानोंसे निराश होकर वह अनिन्दिता संज्ञा मरुदेशको चली गयी और वहाँ उसी घोड़ी-रूपसे ही भूतलपर स्थित है। |