मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ११ * | ४७ |
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| तस्मात् प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रहभागहम्।<br>अपनेष्यामि ते तेजो यन्त्रे कृत्वा दिवाकर॥ २७<br>रूपं तव करिष्यामि लोकानन्दकरं प्रभो।<br>तथेत्युक्तः स रविणा भ्रमौ कृत्वा दिवाकरम्॥ २८<br>पृथक् चकार तत्तेजश्चक्रं विष्णोरकल्पयत्।<br>त्रिशूलं चापि रुद्रस्य वज्रमिन्द्रस्य चाधिकम्॥ २९<br>दैत्यदानवसंहर्तुः सहस्रकिरणात्मकम्।<br>रूपं चाप्रतिमं चक्रे त्वष्टा पद्भ्यामृते महत्॥ ३०<br>न शशाकाथ तद् द्रष्टुं पादरूपं रवेः पुनः।<br>अर्चास्वपि ततः पादौ न कश्चित् कारयेत् क्वचित्॥ ३१<br>यः करोति स पापिष्ठां गतिमाप्नोति निन्दिताम्।<br>कुष्ठरोगमवाप्नोति लोकेऽस्मिन् दुःखसंयुतः॥ ३२<br>तस्माच्च धर्मकामार्थी चित्रेष्वायतनेषु च।<br>न क्वचित् कारयेत् पादौ देवदेवस्य धीमतः॥ ३३ | इसलिये 'दिवाकर! यदि मैं आपका अनुग्रह-भाजन हूँ तो आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये (और मेरी एक प्रार्थना स्वीकार कीजिये)। प्रभो! मैं आपके इस असह्य तेजको (खरादनेवाले) यन्त्रपर चढ़ाकर कुछ कम कर दूँगा। इस प्रकार आपके रूपको लोगोंके लिये आनन्ददायक बना दूँगा।' सूर्यद्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर लिये जानेपर त्वष्टाने सूर्यको अपने (खराद) यन्त्रपर बैठाकर उनके कुछ तेजको छाँटकर अलग कर दिया। उस छाँटे हुए तेजसे उन्होंने विष्णुके सुदर्शनचक्रका, भगवान् रुद्रके त्रिशूलका और दैत्यों एवं दानवोंका संहार करनेवाले इन्द्रके वज्रका निर्माण किया। इस प्रकार त्वष्टाने पैरोंके अतिरिक्त सूर्यके सहस्र किरणोंवाले रूपको अनुपम सौन्दर्यशाली बना दिया। उस समय वे सूर्यके पैरोंके तेजको देखनेमें समर्थ न हो सके (इसलिये वह तेज ज्यों-का-त्यों बना ही रह गया)। अतः अर्चा-विग्रहोंमें भी कोई सूर्यके चरणोंका निर्माण नहीं (करता-) कराता। यदि कोई वैसा करता है तो उसे (मरनेपर) अत्यन्त निन्दित पापिष्ठ गति प्राप्त होती है तथा इस लोकमें वह दुःख भोगता हुआ कुष्ठरोगी हो जाता है। इसलिये धर्मात्मा मनुष्यको चित्रों एवं मन्दिरोंमें कहीं भी बुद्धिमान् देवदेवेश्वर सूर्यके पैरोंको नहीं (बनाना-) बनवाना चाहिये॥ १८-३३॥ |
| ततः स भगवान् गत्वा भूर्लोकंममराधिपः।<br>कामयामास कामार्तो मुख एव दिवाकरः॥ ३४<br>अश्वरूपेण महता तेजसा च समावृतः।<br>संज्ञा च मनसा क्षोभमगमद् भयविह्वला॥ ३५<br>नासापुटाभ्यामुत्सृष्टं परोऽयमिति शङ्कया।<br>तद्रेतस्तत्ततो जातावश्विनाविति निश्चितम्॥ ३६<br>दस्रौ सुतत्वात् संजातौ नासत्यौ नासिकाग्रतः।<br>ज्ञात्वा चिराच्च तं देवं सन्तोषमगमत् परम्।<br>विमानेनागमत् स्वर्गं पत्या सह मुदान्विता॥ ३७<br>सावर्णिऽपि मनुर्मेरावद्याप्यास्ते तपोधनः।<br>शनिस्तपोबलादाप ग्रहसाम्यं ततः पुनः॥ ३८<br>यमुना तपती चैव पुनर्नद्यौ बभूवतुः।<br>विष्टिर्घोरात्मिका तद्वत् कालत्वेन व्यवस्थिता॥ ३९<br>मनोर्वैवस्वतस्यासन् दश पुत्रा महाबलाः।<br>इलस्तु प्रथमस्तेषां पुत्रेष्ट्यां समजायत॥ ४० | त्वष्टाद्वारा संज्ञाका पता बतला दिये जानेपर वे देवेश्वर भगवान् सूर्य भूलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उनके द्वारा संज्ञासे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्ति हुई—यह एकदम तथ्य बात है। संज्ञाकी नासिकाके अग्रभागसे उत्पन्न होनेके कारण वे दोनों नासत्य और दस्र नामसे भी विख्यात हुए। कुछ दिनोंके पश्चात् अश्वरूपधारी सूर्यदेवको पहचानकर त्वाष्ट्री (संज्ञा) परम सन्तुष्ट हुई और हर्षपूर्ण चित्तसे पतिके साथ विमानपर बैठकर स्वर्गलोक (आकाश)-को चली गयी। (छायाकी संतानोंमें) तपोधन सावर्ण मनु आज भी सुमेरुगिरिपर विराजमान हैं। शनिने अपनी तपस्याके प्रभावसे ग्रहोंकी समता प्राप्त की। बहुत दिनोंके बाद यमुना और तपती—ये दोनों कन्याएँ नदीरूपमें परिणत हो गयीं। उसी प्रकार भयंकर रूपवाली तीसरी कन्या विष्टि (भद्रा) काल (करण)-रूपमें अवस्थित हुई। वैवस्वत मनुके दस महाबली पुत्र उत्पन्न हुए थे। उनमें इल ज्येष्ठ थे, जो पुत्रेष्टि-यज्ञके फलस्वरूप पैदा हुए थे। |