मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४८ | * मत्स्यपुराण * |
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| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ट एव च।<br>नरिष्यन्तः करूषश्च शर्यातिश्च महाबलः।<br>पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः॥ ४१<br>अभिषिच्य मनुः पुत्रमिलं ज्येष्ठं स धार्मिकः।<br>जगाम तपसे भूयः स महेन्द्रवनालयम्॥ ४२<br>अथ दिग्विजयसिद्धयर्थमिलः प्रायान्महीमिमाम्।<br>भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभृतः सम्प्रधर्षयन्॥ ४३<br>जगामोपवनं शम्भोरश्वाकृष्टः प्रतापवान्।<br>कल्पद्रुमलताकीर्णं नाम्ना शरवणं महत्॥ ४४<br>रमते यत्र देवेशः शम्भुः सोमार्धशेखरः।<br>उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः॥ ४५<br>पुन्नाम सत्त्वं यत्किञ्चिदागमिष्यति ते वने।<br>स्त्रीत्वमेष्यति तत् सर्वं दशयोजनमण्डले॥ ४६<br>अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा।<br>स्त्रीत्वमाप विशन्नेव वडवात्वं ह्यस्तदा॥ ४७ | शेष नौ पुत्रोंके नाम हैं—इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, धृष्ट नरिष्यन्त, करूष, शर्याति, पृषध्र और नाभाग। ये सब-के-सब महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं दिव्य पुरुष थे। वृद्धावस्था आनेपर परम धर्मात्मा महाराज मनु अपने ज्येष्ठ पुत्र इलको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं तपस्या करनेके लिये महेन्द्रपर्वतके वनमें चले गये। तदनन्तर नये भूपाल इल दिग्विजय करनेकी इच्छासे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगे। वे भूपालोंको पराजित करते हुए सभी द्वीपोंमें घूम रहे थे। इसी बीच प्रतापी इल घोड़ा दौड़ाते हुए शिवजीके उपवनके निकट जा पहुँचे। यह महान् उपवन कल्पद्रुम और लताओंसे भरा हुआ 'शरवण' नामसे प्रसिद्ध था। उस उपवनमें चन्द्रार्धको ललाटमें धारण करनेवाले देवेश्वर शम्भु उमाके साथ क्रीडा करते हैं। उन्होंने इस शरवणके विषयमें पहले ही उमाके साथ यह समय (शर्त) निर्धारित कर दिया था कि 'तुम्हारे इस दस योजन विस्तारवाले वनमें जो कोई भी पुरुषवाचक जीव प्रवेश करेगा, वह स्त्रीत्वको प्राप्त हो जायगा।' राजा इलको पहलेसे इस 'समय' (शर्त)के विषयमें जानकारी नहीं थी, अतः वे स्वच्छन्दगतिसे शरवणमें प्रविष्ट हुए। प्रवेश करते ही वे स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये। उसी समय वह घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें परिवर्तित हो गया। इलके शरीरसे सारा पुरुषत्व नष्ट हो गया। इस प्रकार स्त्री-रूप हो जानेपर राजाको परम विस्मय हुआ॥ ३४—४७ १/२॥ |
| पुरुषत्वं हृतं सर्वं स्त्रीरूपे विस्मितो नृपः।<br>इलेति साभवन्नारी पीनोन्नतघनस्तनी॥ ४८<br>उन्नतश्रोणिजघना पद्मपत्रायतेक्षणा।<br>पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा॥ ४९<br>मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभाषिणी॥ ५०<br>श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी।<br>कार्मुकभ्रूयुगोपेता तनुताम्रनखाङ्कुरा॥ ५१<br>भ्रमन्ती च वने तस्मिंश्चिन्तयामास भामिनी।<br>को मे पिताथवा भ्राता का मे माता भवेदिह॥ ५२<br>कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद वत्स्यामि भूतले।<br>चिन्तयन्तीति ददृशे सोमपुत्रेण साङ्गना॥ ५३<br>इलारूपसमाक्षिप्तमनसा वरवर्णिनीम्।<br>बुधस्तदासये यत्नमकरोत् कामपीडितः॥ ५४ | वह नारी इला नामसे प्रख्यात हुई। उसका रूप बड़ा सुन्दर था। उसके नेत्र कमलदलके समान बड़े-बड़े थे। उसके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश थी। उसका शरीर हलका था। उसके नेत्र चकित-से दीख रहे थे। उसके बाहुमूल उन्नत और भुजाएँ लम्बी थीं तथा बाल नीले एवं घुँघराले थे। उसके शरीरके रोएँ सूक्ष्म और दाँत अत्यन्त मनोहर थे। वह मृदु और गम्भीर स्वरसे बोलनेवाली थी। उसके शरीरका रंग श्याम-गौरमिश्रित था। वह हंस और हस्तीकी-सी चालसे चल रही थी। उसकी दोनों भौंहें धनुषके आकारके सदृश थीं। वह छोटे एवं ताँबेके समान लाल नखाङ्कुरोंसे विभूषित थी। इस प्रकार वह सुन्दरी 'नारी' उस वनमें भ्रमण करती हुई सोचने लगी कि 'इस घोर वनमें कौन मेरा पिता अथवा भाई है तथा कौन मेरी माता है। मैं किस पतिके हाथमें समर्पित की गयी हूँ अर्थात् कौन मेरा पति है! इस भूतलपर मुझे कितने दिनोंतक रहना पड़ेगा!' इस प्रकार वह चिन्तन कर ही रही थी कि इसी बीच सोम-पुत्र बुधने उसे देख लिया और वे उसे प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करने लगे। |