भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ११ *४९
विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलुपुस्तकः।<br>वेणुदण्डकृतावेशः पवित्रकखनित्रकः॥ ५५<br><br>द्विज्यरूपः शिखी ब्रह्म निगदन् कर्णकुण्डलः।<br>वटुभिश्चान्वितो युक्तैः समित्पुष्पकुशोदकैः॥ ५६<br><br>किलान्विषन् वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम्।<br>बहिर्वनस्यान्तरितः किल पादपमण्डले॥ ५७उस समय बुधने एक विशिष्ट वेष-भूषावाले दण्डीका रूप धारण कर लिया। उनके हाथोंमें कमण्डलु और पुस्तक शोभा पा रहे थे। उन्होंने बाँसके डंडेमें अनेकों पवित्र वस्तुओंको बाँध रखा था। वे ब्रह्मचारी-वेषमें लम्बी-मोटी शिखा धारण किये हुए थे। समिधा, पुष्प, कुश और जल लिये हुए वटुकोंके साथ वे वेदका पाठ कर रहे थे। वे अपनेको ऐसा प्रकट कर रहे थे मानो उस वनमें किसी वस्तुकी खोज कर रहे हों। इस प्रकार उस वनके बहिर्भागमें वृक्षसमूहोंके झुरमुटमें बैठकर वे उस इलाको बुलाने लगे।
ससम्भ्रममकस्मात् तां सोपालम्भमिवावदत्।<br>त्यक्त्वाग्निहोत्रशुश्रूषां क्व गता मन्दिरान्मम॥ ५८<br><br>इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम्।<br>एहोहि पृथुसुश्रोणि सम्भ्रान्ता केन हेतुना॥ ५९<br><br>इयं सायंतनी वेला विहारस्येह वर्तते।<br>कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलङ्कुरु गृहं मम॥ ६०<br><br>सा त्वब्रवीद् विस्मृताहं सर्वमेतत् तपोधन।<br>आत्मानं त्वां च भर्तारं कुलं च वद मेऽनघ॥ ६१इलाके निकट आनेपर वे अकस्मात् चकपकाये हुएकी भाँति उलाहना देते हुए उससे बोले—'सुन्दरि! अग्निहोत्र आदि सेवा-शुश्रूषाका परित्याग करके तुम मेरे घरसे कहाँ चली आयी हो?'<br>यह सुनकर इलाने कहा—'तपोधन! मैं अपनेको, आपको, पतिको और कुलको—इन सभीको भूल गयी हूँ, अतः निष्पाप! आप अपने और मेरे कुलका परिचय दीजिये।'
बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि।<br>अहं च कामुको नाम बहुविद्यो बुधः स्मृतः॥ ६२<br><br>तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः।<br>इति सा तस्य वचनात् प्रविष्टा बुधमन्दिरम्॥ ६३इलाके इस प्रकार पूछनेपर बुधने उस सुन्दरीसे कहा—'वरवर्णिनि! तुम इला हो और मैं बहुत-सी विद्याओंका ज्ञाता बुध नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं तेजस्वी कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और मेरे पिता ब्राह्मणोंके अधिपति हैं।' बुधके इस कथनपर विश्वास करके इला बुधके उस भवनमें प्रविष्ट हुई, जिसमें रत्नोंके खम्भे लगे थे तथा जिसका निर्माण दिव्य मायाके द्वारा हुआ था।
रत्नस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमायाविनिर्मितम्।<br>इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता॥ ६४<br><br>अहो वृत्तमहो रूपमहो धनमहो कुलम्।<br>मम चास्य च मे भर्तुरहो लावण्यमुत्तमम्॥ ६५<br><br>रेमे च सा तेन सममतिकालमिला ततः।<br>सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा॥ ६६उस भवनमें पहुँचकर इला अपनेको कृतार्थ मानने लगी। (वह कहने लगी—) 'कैसा सुन्दर चरित्र है! कैसा अद्भुत रूप है! कितना प्रचुर धन है! कैसा ऊँचा कुल है तथा मेरा और मेरे पतिदेवका कैसा अनुपम सौन्दर्य है!' तदनन्तर वह इला बुधके साथ बहुत समयतक उस सम्पूर्ण भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न घरमें उसी प्रकार सुखसे रहने लगी, जैसे इन्द्रभवनमें हो॥ ४८—६६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे इलाबुधसङ्गमो नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इला-बुध-सम्बन्ध नामक ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११॥