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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
४८* मत्स्यपुराण *
Sanskrit ShlokaHindi Translation
इक्ष्वाकुः कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ट एव च।<br>नरिष्यन्तः करूषश्च शर्यातिश्च महाबलः।<br>पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुषाः॥ ४१<br>अभिषिच्य मनुः पुत्रमिलं ज्येष्ठं स धार्मिकः।<br>जगाम तपसे भूयः स महेन्द्रवनालयम्॥ ४२<br>अथ दिग्विजयसिद्धयर्थमिलः प्रायान्महीमिमाम्।<br>भ्रमन् द्वीपानि सर्वाणि क्ष्माभृतः सम्प्रधर्षयन्॥ ४३<br>जगामोपवनं शम्भोरश्वाकृष्टः प्रतापवान्।<br>कल्पद्रुमलताकीर्णं नाम्ना शरवणं महत्॥ ४४<br>रमते यत्र देवेशः शम्भुः सोमार्धशेखरः।<br>उमया समयस्तत्र पुरा शरवणे कृतः॥ ४५<br>पुन्नाम सत्त्वं यत्किञ्चिदागमिष्यति ते वने।<br>स्त्रीत्वमेष्यति तत् सर्वं दशयोजनमण्डले॥ ४६<br>अज्ञातसमयो राजा इलः शरवणे पुरा।<br>स्त्रीत्वमाप विशन्नेव वडवात्वं ह्यस्तदा॥ ४७शेष नौ पुत्रोंके नाम हैं—इक्ष्वाकु, कुशनाभ, अरिष्ट, धृष्ट नरिष्यन्त, करूष, शर्याति, पृषध्र और नाभाग। ये सब-के-सब महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं दिव्य पुरुष थे। वृद्धावस्था आनेपर परम धर्मात्मा महाराज मनु अपने ज्येष्ठ पुत्र इलको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं तपस्या करनेके लिये महेन्द्रपर्वतके वनमें चले गये। तदनन्तर नये भूपाल इल दिग्विजय करनेकी इच्छासे इस पृथ्वीपर विचरण करने लगे। वे भूपालोंको पराजित करते हुए सभी द्वीपोंमें घूम रहे थे। इसी बीच प्रतापी इल घोड़ा दौड़ाते हुए शिवजीके उपवनके निकट जा पहुँचे। यह महान् उपवन कल्पद्रुम और लताओंसे भरा हुआ 'शरवण' नामसे प्रसिद्ध था। उस उपवनमें चन्द्रार्धको ललाटमें धारण करनेवाले देवेश्वर शम्भु उमाके साथ क्रीडा करते हैं। उन्होंने इस शरवणके विषयमें पहले ही उमाके साथ यह समय (शर्त) निर्धारित कर दिया था कि 'तुम्हारे इस दस योजन विस्तारवाले वनमें जो कोई भी पुरुषवाचक जीव प्रवेश करेगा, वह स्त्रीत्वको प्राप्त हो जायगा।' राजा इलको पहलेसे इस 'समय' (शर्त)के विषयमें जानकारी नहीं थी, अतः वे स्वच्छन्दगतिसे शरवणमें प्रविष्ट हुए। प्रवेश करते ही वे स्त्रीत्वको प्राप्त हो गये। उसी समय वह घोड़ा भी घोड़ीके रूपमें परिवर्तित हो गया। इलके शरीरसे सारा पुरुषत्व नष्ट हो गया। इस प्रकार स्त्री-रूप हो जानेपर राजाको परम विस्मय हुआ॥ ३४—४७ १/२॥
पुरुषत्वं हृतं सर्वं स्त्रीरूपे विस्मितो नृपः।<br>इलेति साभवन्नारी पीनोन्नतघनस्तनी॥ ४८<br>उन्नतश्रोणिजघना पद्मपत्रायतेक्षणा।<br>पूर्णेन्दुवदना तन्वी विलासोल्लासितेक्षणा॥ ४९<br>मूलोन्नतायतभुजा नीलकुञ्चितमूर्धजा।<br>तनुलोमा सुदशना मृदुगम्भीरभाषिणी॥ ५०<br>श्यामगौरेण वर्णेन हंसवारणगामिनी।<br>कार्मुकभ्रूयुगोपेता तनुताम्रनखाङ्कुरा॥ ५१<br>भ्रमन्ती च वने तस्मिंश्चिन्तयामास भामिनी।<br>को मे पिताथवा भ्राता का मे माता भवेदिह॥ ५२<br>कस्य भर्तुरहं दत्ता कियद वत्स्यामि भूतले।<br>चिन्तयन्तीति ददृशे सोमपुत्रेण साङ्गना॥ ५३<br>इलारूपसमाक्षिप्तमनसा वरवर्णिनीम्।<br>बुधस्तदासये यत्नमकरोत् कामपीडितः॥ ५४वह नारी इला नामसे प्रख्यात हुई। उसका रूप बड़ा सुन्दर था। उसके नेत्र कमलदलके समान बड़े-बड़े थे। उसके मुखकी कान्ति पूर्णिमाके चन्द्रमाके सदृश थी। उसका शरीर हलका था। उसके नेत्र चकित-से दीख रहे थे। उसके बाहुमूल उन्नत और भुजाएँ लम्बी थीं तथा बाल नीले एवं घुँघराले थे। उसके शरीरके रोएँ सूक्ष्म और दाँत अत्यन्त मनोहर थे। वह मृदु और गम्भीर स्वरसे बोलनेवाली थी। उसके शरीरका रंग श्याम-गौरमिश्रित था। वह हंस और हस्तीकी-सी चालसे चल रही थी। उसकी दोनों भौंहें धनुषके आकारके सदृश थीं। वह छोटे एवं ताँबेके समान लाल नखाङ्कुरोंसे विभूषित थी। इस प्रकार वह सुन्दरी 'नारी' उस वनमें भ्रमण करती हुई सोचने लगी कि 'इस घोर वनमें कौन मेरा पिता अथवा भाई है तथा कौन मेरी माता है। मैं किस पतिके हाथमें समर्पित की गयी हूँ अर्थात् कौन मेरा पति है! इस भूतलपर मुझे कितने दिनोंतक रहना पड़ेगा!' इस प्रकार वह चिन्तन कर ही रही थी कि इसी बीच सोम-पुत्र बुधने उसे देख लिया और वे उसे प्राप्त करनेके लिये प्रयत्न करने लगे।
* अध्याय ११ *४९
विशिष्टाकारवान् दण्डी सकमण्डलुपुस्तकः।<br>वेणुदण्डकृतावेशः पवित्रकखनित्रकः॥ ५५<br><br>द्विज्यरूपः शिखी ब्रह्म निगदन् कर्णकुण्डलः।<br>वटुभिश्चान्वितो युक्तैः समित्पुष्पकुशोदकैः॥ ५६<br><br>किलान्विषन् वने तस्मिन्नाजुहाव स तामिलाम्।<br>बहिर्वनस्यान्तरितः किल पादपमण्डले॥ ५७उस समय बुधने एक विशिष्ट वेष-भूषावाले दण्डीका रूप धारण कर लिया। उनके हाथोंमें कमण्डलु और पुस्तक शोभा पा रहे थे। उन्होंने बाँसके डंडेमें अनेकों पवित्र वस्तुओंको बाँध रखा था। वे ब्रह्मचारी-वेषमें लम्बी-मोटी शिखा धारण किये हुए थे। समिधा, पुष्प, कुश और जल लिये हुए वटुकोंके साथ वे वेदका पाठ कर रहे थे। वे अपनेको ऐसा प्रकट कर रहे थे मानो उस वनमें किसी वस्तुकी खोज कर रहे हों। इस प्रकार उस वनके बहिर्भागमें वृक्षसमूहोंके झुरमुटमें बैठकर वे उस इलाको बुलाने लगे।
ससम्भ्रममकस्मात् तां सोपालम्भमिवावदत्।<br>त्यक्त्वाग्निहोत्रशुश्रूषां क्व गता मन्दिरान्मम॥ ५८<br><br>इयं विहारवेला ते ह्यतिक्रामति साम्प्रतम्।<br>एहोहि पृथुसुश्रोणि सम्भ्रान्ता केन हेतुना॥ ५९<br><br>इयं सायंतनी वेला विहारस्येह वर्तते।<br>कृत्वोपलेपनं पुष्पैरलङ्कुरु गृहं मम॥ ६०<br><br>सा त्वब्रवीद् विस्मृताहं सर्वमेतत् तपोधन।<br>आत्मानं त्वां च भर्तारं कुलं च वद मेऽनघ॥ ६१इलाके निकट आनेपर वे अकस्मात् चकपकाये हुएकी भाँति उलाहना देते हुए उससे बोले—'सुन्दरि! अग्निहोत्र आदि सेवा-शुश्रूषाका परित्याग करके तुम मेरे घरसे कहाँ चली आयी हो?'<br>यह सुनकर इलाने कहा—'तपोधन! मैं अपनेको, आपको, पतिको और कुलको—इन सभीको भूल गयी हूँ, अतः निष्पाप! आप अपने और मेरे कुलका परिचय दीजिये।'
बुधः प्रोवाच तां तन्वीमिला त्वं वरवर्णिनि।<br>अहं च कामुको नाम बहुविद्यो बुधः स्मृतः॥ ६२<br><br>तेजस्विनः कुले जातः पिता मे ब्राह्मणाधिपः।<br>इति सा तस्य वचनात् प्रविष्टा बुधमन्दिरम्॥ ६३इलाके इस प्रकार पूछनेपर बुधने उस सुन्दरीसे कहा—'वरवर्णिनि! तुम इला हो और मैं बहुत-सी विद्याओंका ज्ञाता बुध नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं तेजस्वी कुलमें उत्पन्न हुआ हूँ और मेरे पिता ब्राह्मणोंके अधिपति हैं।' बुधके इस कथनपर विश्वास करके इला बुधके उस भवनमें प्रविष्ट हुई, जिसमें रत्नोंके खम्भे लगे थे तथा जिसका निर्माण दिव्य मायाके द्वारा हुआ था।
रत्नस्तम्भसमायुक्तं दिव्यमायाविनिर्मितम्।<br>इला कृतार्थमात्मानं मेने तद्भवनस्थिता॥ ६४<br><br>अहो वृत्तमहो रूपमहो धनमहो कुलम्।<br>मम चास्य च मे भर्तुरहो लावण्यमुत्तमम्॥ ६५<br><br>रेमे च सा तेन सममतिकालमिला ततः।<br>सर्वभोगमये गेहे यथेन्द्रभवने तथा॥ ६६उस भवनमें पहुँचकर इला अपनेको कृतार्थ मानने लगी। (वह कहने लगी—) 'कैसा सुन्दर चरित्र है! कैसा अद्भुत रूप है! कितना प्रचुर धन है! कैसा ऊँचा कुल है तथा मेरा और मेरे पतिदेवका कैसा अनुपम सौन्दर्य है!' तदनन्तर वह इला बुधके साथ बहुत समयतक उस सम्पूर्ण भोग-सामग्रियोंसे सम्पन्न घरमें उसी प्रकार सुखसे रहने लगी, जैसे इन्द्रभवनमें हो॥ ४८—६६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे इलाबुधसङ्गमो नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इला-बुध-सम्बन्ध नामक ग्यारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११॥

१४- अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार

५० * मत्स्यपुराण *


बारहवाँ अध्याय

इलाका वृत्तान्त तथा इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन

सूत उवाच
अथान्विषन्तो राजानं भ्रातरस्तस्य मानवाः।<br>इक्ष्वाकुप्रमुखा जग्मुस्तदा शरवणान्तिकम्॥ १<br><br>ततस्ते ददृशुः सर्वे वडवामग्रतः स्थिताम्।<br>रत्नपर्याणकिरणदीप्तकायामनुत्तमाम् ॥ २<br><br>पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मयमागताः।<br>अयं चन्द्रप्रभो नाम वाजी तस्य महात्मनः॥ ३<br><br>अगमद् वडवारूपमुत्तमं केन हेतुना।<br>ततस्तु मैत्रावरुणिं पप्रच्छुस्ते पुरोधसम्॥ ४<br><br>किमित्येतदभूच्चित्रं वद योगविदां वर।<br>वसिष्ठश्चाब्रवीत् सर्वं दृष्ट्वा तद् ध्यानचक्षुषा॥ ५<br><br>समयः शम्भुदयिताकृतः शरवणे पुरा।<br>यः पुमान् प्रविशेदत्र स नारीत्वमवाप्स्यति॥ ६<br><br>अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद् राज्ञा सहैव तु।<br>पुनः पुरुषतामेति यथासौ धनदोपमः॥ ७<br><br>तथैव यत्नः कर्तव्यश्चाराध्यैव पिनाकिनम्।<br>ततस्ते मानवा जग्मुर्यत्र देवो महेश्वरः॥ ८<br><br>तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>तावूचतुरलङ्घ्योऽयं समयः किंतु साम्प्रतम्॥ ९<br><br>इक्ष्वाकोरश्वमेधेन यत् फलं स्यात् तदावयोः।<br>दत्त्वा किम्पुरुषो वीरः स भविष्यत्यसंशयम्॥ १०<br><br>तथेत्युक्तास्ततस्ते तु जग्मुर्वैवस्वतात्मजाः।<br>इक्ष्वाकोश्चाश्वमेधेन चेलः किम्पुरुषोऽभवत्॥ ११**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (बहुत दिनोंतक राजा इलके राजधानी न लौटनेपर सशङ्कित होकर) उनके छोटे भाई मनु-पुत्र इक्ष्वाकु आदि राजा इल (सुद्युम्न)-का अन्वेषण करते हुए उसी शरवणके निकट जा पहुँचे। वहाँ उन सभीने मार्गके अग्रभागमें खड़ी हुई एक अनुपम घोड़ीको देखा, जिसका शरीर रत्ननिर्मित जीनकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा था। तत्पश्चात् जीनको पहचानकर वे सभी बन्धु आश्चर्यचकित हो गये (और परस्पर कहने लगे—) 'अरे! यह तो हमारे भाई महात्मा राजा इलका चन्द्रप्रभ नामक घोड़ा है! किस कारण यह सुन्दर घोड़ीके रूपमें परिणत हो गया!' तब वे सभी लौटकर अपने कुल-पुरोहित महर्षि वसिष्ठके पास जाकर पूछने लगे—'योगवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! ऐसी आश्चर्यजनक घटना क्यों घटित हुई? इसका रहस्य हमें बताइये।' तब महर्षि वसिष्ठ ध्यानदृष्टिद्वारा सारा वृत्तान्त जानकर इक्ष्वाकु आदिसे बोले—'राजपुत्रो! पूर्वकालमें शम्भु-पत्नी उमाने इस शरवणके विषयमें ऐसा समय (शर्त) निर्धारित कर रखा है कि 'जो पुरुष इस शरवणमें प्रवेश करेगा, वह स्त्री-रूपमें परिवर्तित हो जायगा।' इसी कारण राजा इलके साथ-ही-साथ यह घोड़ा भी स्त्रीत्वको प्राप्त हो गया है। अब जिस प्रकार राजा इल कुबेरकी भाँति पुनः पुरुषत्वको प्राप्त कर सकें, तुमलोगोंको पिनाकधारी शंकरकी आराधना करके वैसा ही प्रयत्न करना चाहिये।' महर्षि वसिष्ठकी आज्ञा पाकर वे सभी मनु-पुत्र वहाँ गये, जहाँ देवाधिदेव महेश्वर विराजमान थे। वहाँ उन्होंने विभिन्न स्तोत्रोंद्वारा पार्वती और परमेश्वरका स्तवन किया। (उस स्तवनसे प्रसन्न होकर) पार्वती और परमेश्वरने कहा—'राजकुमारो! यद्यपि मेरे इस नियम (शर्त) का उल्लङ्घन नहीं किया जा सकता, तथापि इस समय उसके निवारणके लिये मैं एक उपाय बतला रहा हूँ। यदि इक्ष्वाकुद्वारा किये गये अश्वमेध-यज्ञका जो कुछ फल हो, वह सारा-का-सारा हम दोनोंको समर्पित कर दिया जाय तो राजा इल निःसंदेह किम्पुरुष (किन्नर) हो जायेंगे।' यह सुनकर 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा'—यों कहकर वैवस्वत मनुके वे सभी पुत्र राजधानीको लौट आये। घर आकर इक्ष्वाकुने अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया और उसका पुण्य-फल पार्वती-परमेश्वरको अर्पित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इल किम्पुरुष हो गये।

* अध्याय १२ * ५१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मासमेकं पुमान् वीरः स्त्री च मासम्भूत् पुनः ।<br>बुधस्य भवने तिष्ठन्त्रिली गर्भधरोऽभवत् ॥ १२ ॥<br>अजीजनत् पुत्रमेकमनेकगुणसंयुतम् ।<br>बुधश्रोत्पाद्य तं पुत्रं स्वर्लोकमगमत् ततः ॥ १३ ॥वहाँ वे वीरवर एक मास पुरुषरूपमें रहकर पुनः एक मास स्त्री हो जाते थे। बुधके भवनमें स्त्रीरूपसे रहते समय इलने गर्भ धारण कर लिया था। उस गर्भसे अनेक गुणोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस पुत्रको उत्पन्नकर बुध भूलोकसे पुनः स्वर्गलोकको चले गये॥ १—१३ ॥
इलस्य नाम्ना तद् वर्षमिलावृतमभूत्तदा ।<br>सोमार्कवंशयोरादाविलोऽभून्मनुनन्दनः ॥ १४ ॥<br>एवं पुरूरवाः पुंसोरभवद् वंशवर्धनः ।<br>इक्ष्वाकुरर्कवंशस्य तथैवोक्तस्तपोधनाः ॥ १५ ॥<br>इलः किम्पुरुषत्वे च सुद्युम्न इति चोच्यते ।<br>पुनः पुत्रत्रयमभूत् सुद्युम्नस्यापराजितम् ॥ १६ ॥<br>उत्कलो वै गयस्तद्वद्धरिताश्वश्च वीर्यवान् ।<br>उत्कलस्योत्कला नाम गयस्य तु गया मता ॥ १७ ॥<br>हरिताश्वस्य दिक्पूर्वा विश्रुता कुरुभिः सह ।<br>प्रतिष्ठानेऽभिषिच्याथ स पुरूरवसं सुतम् ॥ १८ ॥<br>जगामेलावृतं भोक्तुं वर्षं दिव्यफलाशनम् ।<br>इक्ष्वाकुर्ज्येष्ठदायादो मध्यदेशमवाप्तवान् ॥ १९ ॥<br>नरिष्यन्तस्य पुत्रोऽभूच्छुचो नाम महाबलः ।<br>नाभागस्याम्बरीषस्तु धृष्टस्य च सुतत्रयम् ॥ २० ॥<br>धृष्टकेतुश्चित्रनाथो रणधृष्टश्च वीर्यवान् ।<br>आनर्त्तो नाम शर्यातेः सुकन्या चैव दारिका ॥ २१ ॥<br>आनर्त्तस्याभवत् पुत्रो रोचमानः प्रतापवान् ।<br>आनर्त्तो नाम देशोऽभून्नगरी च कुशस्थली ॥ २२ ॥<br>रोचमानस्य पुत्रोऽभूद् रेवो रैवत एव च ।<br>ककुद्मी चापरं नाम ज्येष्ठः पुत्रशतस्य च ॥ २३ ॥<br>रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्य विश्रुता ।<br>करूषस्य तु कारूषा बहवः प्रथिता भुवि ॥ २४ ॥<br>पृषध्रो गोवधाच्छूद्रो गुरुशापादजायत ।तभीसे इलके नामपर उस वर्षका नाम इलावृत पड़ गया। इस प्रकार चन्द्रवंश और सूर्यवंशके आदिमें सर्वप्रथम मनु-नन्दन इल ही राजा हुए थे। तपोधन ऋषियो! जैसे इलकी पुरुषावस्थामें उत्पन्न हुए राजा पुरूरवा चन्द्रवंशकी वृद्धि करनेवाले थे, वैसे ही महाराज इक्ष्वाकु सूर्य-वंशके विस्तारक कहे गये हैं। किम्पुरुषयोनिमें रहते समय इल सुद्युम्न नामसे कहे जाते थे। उन सुद्युम्नके पुनः उत्कल, गय और पराक्रमी हरिताश्व नामक तीन अपराजेय पुत्र उत्पन्न हुए थे। इलने (अपने इन चारों पुत्रोंमेंसे) उत्कलको उत्कल (उड़िसा), गयको गयाप्रदेश और हरिताश्वको कुरुप्रदेशकी सीमावर्तिनी पूर्व दिशाका प्रदेश (राज्य) समर्पित किया। तत्पश्चात् अपने ज्येष्ठ पुत्र पुरूरवाका प्रतिष्ठानपुरमें अभिषेक करके वे स्वयं दिव्य फलाहारका उपभोग करनेके लिये इलावृतवर्षमें चले गये। (सुद्युम्नके बाद) मनुके ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु मध्यदेशके अधिकारी हुए। (मनुके अन्य पुत्रोंमें) नरिष्यन्तके शुच नामक महाबली पुत्र हुआ। नाभागके अम्बरीष और धृष्टके धृष्टकेतु, चित्रनाथ और रणधृष्ट नामक तीन पराक्रमी पुत्र हुए। शर्यातिके आनर्त नामक एक पुत्र तथा सुकन्या नाम्नी एक पुत्री हुई। आनर्तके रोचमान नामका एक प्रतापी पुत्र हुआ। आनर्तद्वारा शासित देशका नाम आनर्त (गुजरात) पड़ा और कुशस्थली (द्वारका) नगरी उसकी राजधानी हुई। रोचमानका पुत्र रेव हुआ, जो रैवत और ककुद्मी नामसे भी पुकारा जाता था। वह रोचमानके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ था। उसके रेवती नामकी एक कन्या उत्पन्न हुई, जो बलरामजीकी भार्यारूपसे विख्यात है। करूषके बहुत-से पुत्र थे, जो भूतलपर कारूष नामसे विख्यात हुए। पृषध्र गौकी हत्या कर देनेके कारण गुरुके शापसे शूद्र हो गया॥ १४—२४ १/२ ॥

१५- पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन

५२ * मत्स्यपुराण *

संस्कृतहिन्दी
इक्ष्वाकुवंशं वक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः ॥ २५श्रेष्ठ ऋषियो ! अब मैं इक्ष्वाकु-वंशका वर्णन करने जा रहा हूँ आपलोग ध्यानपूर्वक सुनिये ।
इक्ष्वाकोः पुत्रतामाप विकुक्षिर्नाम देवराट् ।<br>ज्येष्ठः पुत्रशतस्यासीद् दश पञ्च च तत्सुताः ॥ २६देवराज विकुक्षि इक्ष्वाकुके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए । वे इक्ष्वाकुके सौ पुत्रोंमें ज्येष्ठ थे । उन (विकुक्षि)-के पंद्रह पुत्र थे,
मेरोरुत्तरतस्ते तु जाताः पार्थिवसत्तमाः ।<br>चतुर्दशोत्तरं चान्यच्छतमस्य तथाभवत् ॥ २७जो सुमेरुगिरिकी उत्तर दिशामें श्रेष्ठ राजा हुए । विकुक्षिके एक सौ चौदह पुत्र और हुए थे,
मेरोर्दक्षिणतो ये वै राजानः सम्प्रकीर्तिताः ।<br>ज्येष्ठः ककुत्स्थो नाम्नाभूत्तत्सुतस्तु सुयोधनः ॥ २८जो सुमेरुगिरिकी दक्षिण दिशाके शासक कहे गये हैं । विकुक्षिका ज्येष्ठ पुत्र ककुत्स्थ नामसे विख्यात था । उसका पुत्र सुयोधन हुआ ।
तस्य पुत्रः पृथुर्नाम विश्वगश्वः पृथोः सुतः ।<br>इन्दुस्तस्य च पुत्रोऽभूद् युवनाश्वस्ततोऽभवत् ॥ २९सुयोधनका पुत्र पृथु, पृथुका पुत्र विश्वग, विश्वगका पुत्र इन्दु और इन्दुका पुत्र युवनाश्व हुआ ।
श्रावस्तश्च महातेजा वत्सकस्तत्सुतोऽभवत् ।<br>निर्मिता येन श्रावस्ती गौडदेशे द्विजोत्तमाः ॥ ३०युवनाश्वका पुत्र श्रावस्त हुआ, जिसे वत्सक भी कहा जाता था । द्विजवरो ! उसीने गौडदेशमें श्रावस्ती नामकी नगरी बसायी थी ।
श्रावस्ताद् बृहदश्वोऽभूत् कुवलाश्वस्ततोऽभवत् ।<br>धुन्धुमारत्वमगमद् धुन्धुनाम्ना हतः पुरा ॥ ३१श्रावस्तसे बृहदश्व और उससे कुबलाश्वका जन्म हुआ, जो पूर्वकालमें धुन्धुद्वारा मारे जानेके कारण धुन्धुमार नामसे विख्यात था ।
तस्य पुत्रास्त्रयो जाता दृढाश्वो दण्ड एव च ।<br>कपिलाश्वश्च विख्यातो धौन्धुमारिः प्रतापवान् ॥ ३२धुन्धुमारके दृढाश्व, दण्ड और कपिलाश्व नामक तीन पुत्र हुए थे, जिनमें प्रतापी कपिलाश्व धौन्धुमारि नामसे भी प्रसिद्ध था ।
दृढाश्वस्य प्रमोदश्च हर्यश्वस्तस्य चात्मजः ।<br>हर्यश्वस्य निकुम्भोऽभूत् संहताश्वस्ततोऽभवत् ॥ ३३दृढाश्वका पुत्र प्रमोद और उसका पुत्र हर्यश्व हुआ । हर्यश्वका पुत्र निकुम्भ तथा उससे संहताश्वका जन्म हुआ ।
अकृताश्वो रणाश्वश्च संहताश्वसुतावुभौ ।<br>युवनाश्वो रणाश्वस्य मान्धाता च ततोऽभवत् ॥ ३४संहताश्वके अकृताश्व और रणाश्व नामक दो पुत्र हुए । उनमें रणाश्वका पुत्र युवनाश्व हुआ तथा उससे मान्धाताकी उत्पत्ति हुई ।
मान्धातुः पुरुकुत्सोऽभूद् धर्मसेनश्च पार्थिवः ।<br>मुचुकुन्दश्च विख्यातः शत्रुजिच्च प्रतापवान् ॥ ३५मान्धाताके पुरुकुत्स, राजा धर्मसेन और शत्रुओंको पराजित करनेवाले सुप्रसिद्ध प्रतापी मुचुकुन्द—ये तीन पुत्र हुए ।
पुरुकुत्सस्य पुत्रोऽभूद् वसुदो नर्मदापतिः ।<br>सम्भूतिस्तस्य पुत्रोऽभूत् त्रिधन्वा च ततोऽभवत् ॥ ३६इनमें पुरुकुत्सका पुत्र नर्मदापति वसुद हुआ । उसका पुत्र सम्भूति हुआ और सम्भूतिसे त्रिधन्वाका जन्म हुआ ।
त्रिधन्वनः सुतो जातस्त्रय्यारुण इति स्मृतः ।<br>तस्मात् सत्यव्रतो नाम तस्मात् सत्यरथः स्मृतः ॥ ३७त्रिधन्वासे उत्पन्न हुआ पुत्र त्रय्यारुण नामसे प्रसिद्ध हुआ । उससे सत्यव्रत और सत्यव्रतसे सत्यरथका जन्म हुआ ।
तस्य पुत्रो हरिश्चन्द्रो हरिश्चन्द्राच्च रोहितः ।<br>रोहिताच्च वृको जातो वृकाद् बाहुरजायत ॥ ३८सत्यरथसे हरिश्चन्द्र, हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे वृक और वृकसे बाहुकी उत्पत्ति हुई ।
सगरस्तस्य पुत्रोऽभूद् राजा परमधार्मिकः ।<br>द्वे भार्ये सगरस्यापि प्रभा भानुमती तथा ॥ ३९बाहुके पुत्र राजा सगर हुए, जो परम धर्मात्मा थे । उन सगरके प्रभा और भानुमती नामवाली दो पत्नियाँ थीं ।
ताभ्यामाराधितः पूर्वमौर्वोऽग्निः पुत्रकाम्यया ।<br>और्वस्तुष्टस्तयोः प्रादाद् यथेष्टं वरमुत्तमम् ॥ ४०उन दोनोंने पूर्वकालमें पुत्रकी कामनासे और्वाग्निकी आराधना की थी । उनकी आराधनासे संतुष्ट होकर उन्हें यथेष्ट उत्तम वर प्रदान करते हुए और्वने कहा—
एका षष्टिसहस्राणि सुतमेकं तथापरा ।<br>गृह्णातु वंशकर्तारं प्रभागृह्लाद् बहूंस्तदा ॥ ४१'तुम दोनोंमेंसे एकको साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरीको केवल एक वंशप्रवर्तक पुत्र होगा । (तुम दोनोंमें जिसकी जैसी इच्छा हो, वह वैसा वरदान ग्रहण करे ।)' तब प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको स्वीकार किया और भानुमतीने एक ही पुत्र माँगा ।
एकं भानुमती पुत्रमगृह्लादसमञ्जसम् ।<br>ततः षष्टिसहस्राणि सुषुवे यादवी प्रभा ॥ ४२<br>खनन्तः पृथिवीं दग्धा विष्णुना येऽश्वमार्गणे ।कुछ दिनोंके पश्चात् भानुमतीने असमञ्जसको पैदा किया तथा यदुवंशकी कन्या प्रभाने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया, जो अश्वमेध-यज्ञके अश्वकी खोजमें जिस समय पृथ्वीको खोद रहे थे, उसी समय उन्हें विष्णु (भगवदवतार कपिल)-ने जलाकर भस्म कर दिया ॥ २५-४२ $\frac{१}{२}$ ॥
* अध्याय १२ *५३

| असमञ्जसस्तु तनयो योंऽशुमान् नाम विश्रुतः ॥ ४३<br>तस्य पुत्रो दिलीपस्तु दिलीपात्तु भगीरथः ।<br>येन भागीरथी गङ्गा तपः कृत्वावतारिता ॥ ४४<br>भगीरथस्य तनयो नाभाग इति विश्रुतः ।<br>नाभागस्याम्बरीषोऽभूत् सिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ॥ ४५<br>तस्यायुतायुः पुत्रोऽभूद् ऋतुपर्णस्ततोऽभवत् ।<br>तस्य कल्माषपादस्तु सर्वकर्मा ततः स्मृतः ॥ ४६<br>तस्यानरण्यः पुत्रोऽभून्निघ्नस्तस्य सुतोऽभवत् ।<br>निघ्नपुत्रावुभौ जातावनमित्ररघू नृपौ ॥ ४७<br>अनमित्रो वनमगाद् भविता स कृते नृपः ।<br>रघोरभूद् दिलीपस्तु दिलीपादजकस्तथा ॥ ४८<br>दीर्घबाहुरजाज्जातश्चाजपालस्ततो नृपः ।<br>तस्माद् दशरथो जातस्तस्य पुत्रचतुष्टयम् ॥ ४९<br>नारायणात्मकाः सर्वे रामस्तेष्वग्रजोऽभवत् ।<br>रावणान्तकरस्तद्वद् रघूणां वंशवर्धनः ॥ ५०<br>वाल्मीकिस्तस्य चरितं चक्रे भार्गवसत्तमः ।<br>तस्य पुत्रौ कुशलवाविक्ष्वाकुकुलवर्धनौ ॥ ५१<br>अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निषधस्तस्य चात्मजः ।<br>नलस्तु नैषधस्तस्मान्नभास्तस्मादजायत ॥ ५२<br>नभसः पुण्डरीकोऽभूत् क्षेमधन्वा ततः स्मृतः ।<br>तस्य पुत्रोऽभवद् वीरो देवानीकः प्रतापवान् ॥ ५३<br>अहीनगुस्तस्य सुतः सहस्राश्वस्ततः परः ।<br>ततश्चन्द्रावलोकस्तु तारापीडस्ततोऽभवत् ॥ ५४<br>तस्यात्मजश्चन्द्रगिरिर्भानुश्चन्द्रस्ततोऽभवत् ।<br>श्रुतायुरभवत्तस्माद् भारते यो निपातितः ॥ ५५<br>नलौ द्वावेव विख्यातौ वंशे कश्यपसम्भवे ।<br>वीरसेनसुतस्तद्वन्नैषधश्च नराधिपः ॥ ५६<br>एते वैवस्वते वंशे राजानो भूरिदक्षिणाः ।<br>इक्ष्वाकुवंशप्रभवाः प्राधान्येन प्रकीर्तिताः ॥ ५७ | असमञ्जसका पुत्र अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। उसके पुत्र दिलीप और दिलीपसे भगीरथ हुए, जो तपस्या करके भागीरथी गङ्गाको स्वर्गसे भूतलपर ले आये। भगीरथके पुत्र नाभाग नामसे प्रसिद्ध हुए। नाभागके पुत्र अम्बरीष और उनसे सिन्धुद्वीपका जन्म हुआ। सिन्धुद्वीपका पुत्र अयुतायु हुआ तथा उससे ऋतुपर्णकी उत्पत्ति हुई। ऋतुपर्णका पुत्र कल्माषपाद और उससे सर्वकर्मा पैदा हुआ। उसका पुत्र अनरण्य और अनरण्यका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके अनमित्र और राजा रघु नामके दो पुत्र हुए, जिनमें अनमित्र वनमें चला गया, जो कृतयुगमें राजा होगा। रघुसे दिलीप तथा दिलीपसे अज हुए। अजसे दीर्घबाहु और उससे राजा अजपाल हुए। अजपालसे दशरथ पैदा हुए, जिनके चार पुत्र थे। वे सब-के-सब नारायणके अंशसे प्रादुर्भूत हुए थे। उनमें श्रीराम सबसे ज्येष्ठ थे, जो रावणका अन्त करनेवाले तथा रघुवंशके प्रवर्धक थे। भृगुवंशप्रवर महर्षि वाल्मीकिने श्रीरामके चरित्रका (रामायणरूपमें विस्तारपूर्वक) वर्णन किया है। श्रीरामके कुश और लव नामक दो पुत्र हुए, जो इक्ष्वाकु-कुलके विस्तारक थे। कुशसे अतिथि और उससे निषधका जन्म हुआ। निषधका पुत्र नल हुआ और उससे नभकी उत्पत्ति हुई। नभसे पुण्डरीकका तथा उससे क्षेमधन्वाका जन्म हुआ। क्षेमधन्वाका पुत्र प्रतापी वीरवर देवानीक हुआ। उसका पुत्र अहीनगु तथा उससे सहस्राश्वका जन्म हुआ। सहस्राश्वसे चन्द्रावलोक और उससे तारापीडकी उत्पत्ति हुई। तारापीडसे चन्द्रगिरि और उससे भानुचन्द्र पैदा हुआ। भानुचन्द्रका पुत्र श्रुतायु हुआ, जो महाभारत-युद्धमें मारा गया था। महर्षि कश्यपद्वारा उत्पन्न हुए इस वंशमें नल नामसे दो राजा विख्यात हुए हैं, उनमें एक वीरसेनका पुत्र तथा दूसरा राजा निषधका पुत्र था। इस प्रकार वैवस्वतवंशीय महाराज इक्ष्वाकुके वंशमें उत्पन्न होनेवाले ये सभी राजा अतिशय दानशील थे। मैंने इनका मुख्यरूपसे वर्णन कर दिया॥४३—५७॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सूर्यवंशानुकीर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सूर्यवंशानुकीर्तन नामक बारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १२ ॥

५४* मत्स्यपुराण *

तेरहवाँ अध्याय

पितृ-वंश-वर्णन तथा सतीके वृत्तान्त-प्रसङ्गमें देवीके एक सौ आठ नामोंका विवरण

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>रवेश्च श्राद्धदेवत्वं सोमस्य च विशेषतः॥ १**मनुने पूछा—**भगवन्! अब मैं पितरोंके उत्तम वंशका वर्णन सुनना चाहता हूँ। उसमें भी विशेषरूपसे यह जाननेकी अभिलाषा है कि सूर्य और चन्द्रमा श्राद्धके देवता कैसे हो गये?॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>हन्त ते कथयिष्यामि पितॄणां वंशमुत्तमम्।<br>स्वर्गे पितृगणा सप्त त्रयस्तेषाममूर्त्तयः॥ २<br>मूर्तिमन्तोऽथ चत्वारः सर्वेषाममितौजसः।<br>अमूर्तयः पितृगणा वैराजस्य प्रजापतेः॥ ३<br>यजन्ति यान् देवगणा वैराजा इति विश्रुताः।<br>ये चैते योगविभ्रष्टाः प्राप्य लोकान् सनातनान्॥ ४<br>पुनर्ब्रह्मादिनान्ते तु जायन्ते ब्रह्मवादिनः।<br>सम्प्राप्य तां स्मृतिं भूयो योगं सांख्यमनुत्तमम्॥ ५<br>सिद्धिं प्रयान्ति योगेन पुनरावृत्तिदुर्लभाम्।<br>योगिनामेव देयानि तस्माच्छ्राद्धानि दातृभिः॥ ६<br>एतेषां मानसी कन्या पत्नी हिमवतो मता।<br>मैनाकस्तस्य दायादः क्रौञ्चस्तस्याग्रजोऽभवत्।<br>क्रौञ्चद्वीपः स्मृतो येन चतुर्थो घृतसंवृतः॥ ७<br>मेना च सुषुवे तिस्रः कन्या योगवतीस्ततः।<br>उमैकपर्णा पर्णा च तीव्रव्रतपरायणाः॥ ८<br>रुद्रस्यैका सितस्यैका जैगीषव्यस्य चापरा।<br>दत्ता हिमवता बालाः सर्वा लोके तपोऽधिकाः॥ ९**मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! बड़े आनन्दकी बात है, अब मैं तुमसे पितरोंके श्रेष्ठ वंशका वर्णन कर रहा हूँ; सुनो। स्वर्गमें पितरोंके सात गण हैं। उनमें तीन मूर्तिरहित और चार मूर्तिमान् हैं। वे सब-के-सब अमित तेजस्वी हैं। अमूर्त पितृगण वैराजनामक प्रजापतिकी संतान हैं, इसीलिये वैराज नामसे प्रसिद्ध हैं। देवगण उनकी पूजा करते हैं। ये सभी सनातन लोकोंको प्राप्त करनेके पश्चात् योगमार्गसे च्युत हो जाते हैं तथा ब्रह्माके दिनके अन्तमें पुनः ब्रह्मवादीरूपमें उत्पन्न होते हैं। उस समय ये पूर्वजन्मकी स्मृति हो जानेसे पुनः सर्वोत्तम सांख्ययोगका आश्रय लेकर योगाभ्यासद्वारा आवागमनके चक्रसे मुक्त करनेवाली सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं। इस कारण दाताओंद्वारा योगियोंको ही श्राद्धीय वस्तुएँ प्रदान करनी चाहिये। इन उपर्युक्त पितरोंकी मानसी कन्या मेना हिमवान्की पत्नी मानी गयी है। मैनाक उसका पुत्र है। क्रौञ्च उससे भी पहले पैदा हुआ था। इसी क्रौञ्चके नामपर घृतसे परिवेष्टित चतुर्थ द्वीप क्रौञ्चद्वीप नामसे विख्यात है। तत्पश्चात् मेनाने उमा, एकपर्णा और अपर्णा नामकी तीन कन्याओंको जन्म दिया, जो सब-की-सब योगाभ्यासमें निरत, कठोर व्रतमें तत्पर तथा लोकमें सर्वश्रेष्ठ तपस्विनी थीं। हिमवान्ने इनमेंसे एक कन्या रुद्रको, एक सितको तथा एक जैगीषव्यको प्रदान कर दी॥ २—९॥
ऋषय ऊचुः<br>कस्माद् दाक्षायणी पूर्वं ददाहात्मानमात्मना।<br>हिमवद्दुहिता तद्वत् कथं जाता महीतले॥ १०<br>संहरन्ती किमुक्तासौ सुता वा ब्रह्मसूनुना।<br>दक्षेण लोकजननी सूत विस्तरतो वद॥ ११**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! पूर्वकालमें दक्ष-पुत्री सतीने अपने शरीरको अपने-आप ही क्यों जला डाला? तथा पुनः उसी प्रकारका शरीर धारणकर वे भूतलपर हिमवान्की कन्याके रूपमें कैसे प्रकट हुईं? उस समय ब्रह्माके पुत्र दक्षने लोकजननी सतीको, जो उन्हींकी पुत्री थीं, कौन-सी ऐसी बात कह दी थी, जिससे वे स्वयं ही जल मरीं? ये सभी बातें हमें विस्तारपूर्वक बतलाइये॥१०-११॥

१६- श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण

* अध्याय १३ * ५५


सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
दक्षस्य यज्ञे वितते प्रभूतवरदक्षिणे।<br>समाहूतेषु देवेषु प्रोवाच पितरं सती ॥ १२<br><br>किमर्थं तात भर्ता मे यज्ञेऽस्मिन्नाभिमन्त्रितः।<br>अयोग्य इति तामाह दक्षो यज्ञेषु शूलभृत्॥ १३<br><br>उपसंहारकृद् रुद्रस्तेनामङ्गलभागयम्।<br>चुकोपाथ सती देहं त्यक्ष्यामीति त्वदुद्भवम्॥ १४<br><br>दशानां त्वं च भविता पितॄणामेकपुत्रकः।<br>क्षत्रियत्वेऽश्वमेधे च रुद्रात् त्वं नाशमेष्यसि ॥ १५<br><br>इत्युक्त्वा योगमास्थाय स्वदेहोद्भवतेजसा।<br>निर्दहन्ती तदात्मानं सदेवासुरकिन्नरैः ॥ १६<br><br>किं किमेतदिति प्रोक्ता गन्धर्वगणगुह्यकैः।<br>उपगम्याब्रवीद् दक्षः प्रणिपत्याथ दुःखितः ॥ १७<br><br>त्वमस्य जगतो माता जगत्सौभाग्यदेवता।<br>दुहितृत्वं गता देवि ममानुग्रहकाम्यया ॥ १८<br><br>न त्वया रहितं किंचिद् ब्रह्माण्डे सचराचरम्।<br>प्रसादं कुरु धर्मज्ञे न मां त्यक्तुमिहार्हसि ॥ १९<br><br>प्राह देवी यदारब्धं तत् कार्यं मे न संशयः।<br>किन्त्ववश्यं त्वया मर्त्ये हतयज्ञेन शूलिना ॥ २०<br><br>प्रसादे लोकसृष्ट्यर्थं तपः कार्यं ममान्तिके।<br>प्रजापतिस्त्वं भविता दशानामङ्गजोऽप्यलम्॥ २१<br><br>मदंशेनाङ्गनाषष्टिर्भविष्यन्त्यङ्गजास्तव ।<br>मत्संनिधौ तपः कुर्वन् प्राप्स्यसे योगमुत्तमम् ॥ २२<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् दक्षः केषु केषु मयानघे।<br>तीर्थेषु च त्वं द्रष्टव्या स्तोतव्या कैश्च नामभिः ॥ २३ऋषियो! प्राचीनकालमें दक्षने एक विशाल यज्ञका अनुष्ठान किया था; उसमें प्रचुर धनराशि दक्षिणाके रूपमें बाँटी गयी थी तथा सभी देवता (अपना-अपना भाग ग्रहण करनेके लिये) आमन्त्रित किये गये थे। (परंतु द्वेषवश शिवजीको निमन्त्रण नहीं भेजा गया था। तब वहाँ अपने पतिका भाग न देखकर) सतीने पिता दक्षसे पूछा—'पिताजी! अपने इस विशाल यज्ञमें आपने मेरे पतिदेवको क्यों नहीं आमन्त्रित किया?' तब दक्षने सतीसे कहा—'बेटी! तुम्हारा पति त्रिशूल धारण कर रुद्ररूपसे जगत्‌का उपसंहार करता है, जिससे वह अमङ्गल-भागी है, इस कारण वह यज्ञोंमें भाग पानेके लिये अयोग्य है।' यह सुनकर सती क्रोधसे तमतमा उठीं और बोलीं—'तात! अब मैं तुम्हारे पापी शरीरसे उत्पन्न हुए अपनी देहका परित्याग कर दूँगी। तुम दस पितरोंके एकमात्र पुत्र होगे और क्षत्रिय-योनिमें जन्म लेनेपर अश्वमेध-यज्ञके अवसरपर रुद्रद्वारा तुम्हारा विनाश हो जायगा।' ऐसा कहकर सतीने योगबलका आश्रय लिया और स्वतः शरीरसे प्रकट हुए तेजसे अपने शरीरको जलाना प्रारम्भ कर दिया। तब देवता, असुर और किन्नरोंके साथ गन्धर्व एवं गुह्यकगण 'अरे! यह क्या हो रहा है? यह क्या हो रहा है?' इस प्रकार हो-हल्ला मचाने लगे। यह देखकर दक्ष भी दुःखी हो सतीके निकट गये और प्रणाम करके बोले—'देवि! तुम इस जगत्‌की जननी तथा जगत्‌को सौभाग्य प्रदान करनेवाली देवता हो। तुम मुझपर अनुग्रह करनेकी कामनासे ही मेरी पुत्री होकर अवतीर्ण हुई हो। धर्मज्ञे! इस निखिल ब्रह्माण्डमें—समस्त चराचर वस्तुओंमें कुछ भी तुमसे रहित नहीं है अर्थात् सबमें तुम्हारी सत्ता व्याप्त है। मुझपर कृपा करो। इस अवसरपर तुम्हें मेरा परित्याग नहीं करना चाहिये।' (दक्षके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर) देवीने कहा—'दक्ष! मैंने जिस कार्यका आरम्भ कर दिया है, उसे तो निःसंदेह अवश्य ही पूर्ण करूँगी, किंतु त्रिशूलधारी शिवजीद्वारा यज्ञ-विध्वंस हो जानेपर उनको प्रसन्न करनेके लिये तुम मृत्युलोकमें लोक-सृष्टिकी इच्छासे मेरे निकट तपस्या करना। उसके प्रभावसे तुम प्रचेता नामके दस पिताओंके एकमात्र पुत्र होनेपर भी प्रजापति हो जाओगे। उस समय मेरे अंशसे तुम्हें साठ कन्याएँ उत्पन्न होंगी तथा मेरे समीप तपस्या करते हुए तुम्हें उत्तम योगकी प्राप्ति हो जायगी।' ऐसा कहे जानेपर दक्षने पूछा—'पाप-रहित देवि! इस कार्यके निमित्त मुझे किन-किन तीर्थस्थानोंमें जाकर तुम्हारा दर्शन करना चाहिये तथा किन-किन नामोंद्वारा तुम्हारा स्तवन करना चाहिये'॥ १२—२३॥

५६ * मत्स्यपुराण *


देव्युवाचदेवीने कहा—
सर्वदा सर्वभूतेषु द्रष्टव्या सर्वतो भुवि।<br>सर्वलोकेषु यत् किंचिद् रहितं न मया विना॥ २४<br>तथापि येषु स्थानेषु द्रष्टव्या सिद्धिमीप्सुभिः।<br>स्मर्तव्या भूतिकामैर्वा तानि वक्ष्यामि तत्त्वतः॥ २५<br>वाराणस्यां विशालाक्षी नैमिषे लिङ्गधारिणी।<br>प्रयागे ललिता देवी कामाक्षी गन्धमादने॥ २६<br>मानसे कुमुदा नाम विश्वकाया तथाम्बरे॥ २७<br>गोमन्ते गोमती नाम मन्दरे कामचारिणी।<br>मदोत्कटा चैत्ररथे जयन्ती हस्तिनापुरे॥ २८<br>कान्यकुब्जे तथा गौरी रम्भा मलयपर्वते।<br>एकाम्रके कीर्तिमती विश्वा विश्वेश्वरे विदुः॥ २९<br>पुष्करे पुरुहूतेति केदारे मार्गदायिनी।<br>नन्दा हिमवतः पृष्ठे गोकर्णे भद्रकर्णिका॥ ३०<br>स्थाण्वीश्वरे भवानी तु बिल्वके बिल्वपत्रिका।<br>श्रीशैले माधवी नाम भद्रा भद्रेश्वरे तथा॥ ३१<br>जया वराहशैले तु कमला कमलालये।<br>रुद्रकोट्यां च रुद्राणी काली कालंजरे गिरौ॥ ३२<br>महालिङ्गे तु कपिला मर्कंटे मुकुटेश्वरी।<br>शालग्रामे महादेवी शिवलिङ्गे जलप्रिया॥ ३३<br>मायापुर्यां कुमारी तु संताने ललिता तथा।<br>उत्पलाक्षी सहस्राक्षे कमलाक्षे महोत्पला॥ ३४<br>गङ्गायां मङ्गला नाम विमला पुरुषोत्तमे।<br>विपाशायाममोघाक्षी पाटला पुण्ड्रवर्धने॥ ३५<br>नारायणी सुपार्श्वे तु विकूटे भद्रसुन्दरी।<br>विपुले विपुला नाम कल्याणी मलयाचले॥ ३६<br>कोटवी कोटितीर्थे तु सुगन्धा माधवे वने।<br>गोदाश्रमे त्रिसंध्या तु गङ्गाद्वारे रतिप्रिया॥ ३७<br>शिवकुण्डे शिवानन्दा नन्दिनी देविकातटे।<br>रुक्मिणी द्वारवत्यां तु राधा वृन्दावने वने॥ ३८दक्ष! यद्यपि भूतलपर समस्त प्राणियोंमें सब ओर सर्वदा मेरा ही दर्शन करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण लोकोंमें जो कुछ पदार्थ है, वह सब मुझसे रहित नहीं है, अर्थात् सभी पदार्थोंमें मेरी सत्ता विद्यमान है, तथापि सिद्धिकी कामनावाले अथवा ऐश्वर्याभिलाषी जनोंद्वारा जिन-जिन तीर्थस्थानोंमें मेरा दर्शन और स्मरण करना चाहिये, उनका मैं यथार्थरूपसे वर्णन कर रही हूँ। मैं वाराणसीमें विशालाक्षी, नैमिषारण्यमें लिङ्गधारिणी, प्रयागमें ललितादेवी, गन्धमादन पर्वतपर कामाक्षी, मानसरोवरतीर्थमें कुमुदा, अम्बरमें विश्वकाया, गोमन्त (गोआ)-में गोमती, मन्दराचलपर कामचारिणी, चैत्ररथवनमें मदोत्कटा, हस्तिनापुरमें जयन्ती, कान्यकुब्जमें गौरी, मलयपर्वतपर रम्भा, एकाम्रक (भुवनेश्वर)-तीर्थमें कीर्तिमती, विश्वेश्वरमें विश्वा, पुष्करमें पुरुहूता, केदारतीर्थमें मार्गदायिनी, हिमवान्‌के पृष्ठभागमें नन्दा, गोकर्णतीर्थमें भद्रकर्णिका, स्थानेश्वर (थानेश्वर)-में भवानी, बिल्वतीर्थमें बिल्वपत्रिका, श्रीशैलपर माधवी, भद्रेश्वरतीर्थमें भद्रा, वराहशैलपर जया, कमलालयतीर्थमें कमला, रुद्रकोटिमें रुद्राणी, कालञ्जर गिरिपर काली, महालिङ्गतीर्थमें कपिला, मर्कटमें मुकुटेश्वरी, शालग्रामतीर्थमें महादेवी, शिवलिङ्गमें जलप्रिया, मायापुरी (ऋषिकेश)-में कुमारी, संतानतीर्थमें ललिता, सहस्राक्षतीर्थमें उत्पलाक्षी, कमलाक्षतीर्थमें महोत्पला, गङ्गामें मङ्गला, पुरुषोत्तमतीर्थ (जगन्नाथपुरी)-में विमला, विपाशामें अमोघाक्षी, पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, सुपार्श्वतीर्थमें नारायणी, विकूटमें भद्रसुन्दरी, विपुलमें विपुला, मलयाचलपर कल्याणी, कोटितीर्थमें कोटवी, माधव-वनमें सुगन्धा, गोदाश्रममें त्रिसंध्या, गङ्गाद्वार (हरिद्वार)-में रतिप्रिया, शिवकुण्डतीर्थमें शिवानन्दा, देविका (पंजाबकी देवनदी)-के तटपर नन्दिनी, द्वारकापुरीमें रुक्मिणी और वृन्दावनमें राधा हूँ॥ २४-३८॥
देवकी मथुरायां तु पाताले परमेश्वरी।<br>चित्रकूटे तथा सीता विन्ध्ये विन्ध्याधिवासिनी॥ ३९<br>सह्याद्रावेकवीरा तु हरिश्चन्द्रे तु चन्द्रिका।<br>रमणा रामतीर्थे तु यमुनायां मृगावती॥ ४०<br>करवीरे महालक्ष्मीरुमादेवी विनायके।<br>अरोग्रा वैद्यनाथे तु महाकाले महेश्वरी॥ ४१<br>अभयेत्युष्णातीर्थेषु चामृता विन्ध्यकन्दरे।<br>माण्डव्ये माण्डवी नाम स्वाहा माहेश्वरे पुरे॥ ४२मैं मथुरापुरीमें देवकी, पातालमें परमेश्वरी, चित्रकूटमें सीता, विन्ध्यपर्वतपर विन्ध्याधिवासिनी, सह्याद्रिपर एकवीरा, हरिश्चन्द्रतीर्थमें चन्द्रिका, रामतीर्थमें रमणा, यमुनामें मृगावती, करवीर (कोल्हापुर)-में महालक्ष्मी, विनायकतीर्थमें उमादेवी, वैद्यनाथमें अरोग्रा, महाकालमें महेश्वरी, उष्णतीर्थोंमें अभया, विन्ध्यकन्दरमें अमृता, माण्डव्यतीर्थमें माण्डवी, माहेश्वरपुरमें स्वाहा,
  • अध्याय १३ * ५७

| छागलाण्डे प्रचण्डा तु चण्डिका मकरन्दके।<br>सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती॥ ४३<br>देवमाता सरस्वत्यां पारावारतटे मता।<br>महालये महाभागा पयोष्ण्यां पिङ्गलेश्वरी॥ ४४<br>सिंहिका कृतशौचे तु कार्त्तिकेये यशस्करी।<br>उत्पलावर्तके लोला सुभद्रा शोणसंगमे॥ ४५<br>माता सिद्धपुरे लक्ष्मीरङ्गना भरताश्रमे।<br>जालंधरे विश्वमुखी तारा किष्किन्धपर्वते॥ ४६<br>देवदारुवने पुष्टिर्मेधा काश्मीरमण्डले।<br>भीमा देवी हिमाद्रौ तु पुष्टिर्विश्वेश्वरे तथा॥ ४७<br>कपालमोचने शुद्धिर्माता कायावरोहणे।<br>शङ्खोद्धारे ध्वनिर्माता धृतिः पिण्डारके तथा॥ ४८<br>काला तु चन्द्रभागायामच्छोदे शिवकारिणी।<br>वेणायाममृता नाम बदर्यामुर्वशी तथा॥ ४९<br>औषधी चोत्तरकुरौ कुशद्वीपे कुशोदका।<br>मन्मथा हेमकूटे तु मुकुटे सत्यवादिनी॥ ५०<br>अश्वत्थे वन्दनीया तु निधिर्वैश्रवणालये।<br>गायत्री वेदवदने पार्वती शिवसंनिधौ॥ ५१<br>देवलोके तथेन्द्राणी ब्रह्मास्येषु सरस्वती।<br>सूर्यबिम्बे प्रभा नाम मातृणां वैष्णवी मता॥ ५२<br>अरुंधती सतीनां तु रामांसु च तिलोत्तमा।<br>चित्ते ब्रह्मकला नाम शक्तिः सर्वशरीरिणाम्॥ ५३ | छागलाण्डमें प्रचण्डा, मकरन्दमें चण्डिका, सोमेश्वरतीर्थमें वरारोहा, प्रभासमें पुष्करावती, सरस्वतीमें देवमाता, समुद्रतटवर्ती महालयतीर्थमें महाभागा, पयोष्णी-(पैनगङ्गा)-में पिङ्गलेश्वरी, कृतशौचतीर्थमें सिंहिका, कार्त्तिकेयमें यशस्करी, उत्पलावर्तकमें लोला, शोणसंगममें सुभद्रा, सिद्धपुरमें लक्ष्मी माता, भरताश्रममें अङ्गना, जालन्धरपर्वतपर विश्वमुखी, किष्किन्धापर्वतपर तारा, देवदारुवनमें पुष्टि, काश्मीरमण्डलमें मेधा, हिमगिरिपर भीमादेवी, विश्वेश्वरमें पुष्टि, कपालमोचनमें शुद्धि, कायावरोहण (कारावन, गुजरात)-में माता, शङ्खोद्धारमें ध्वनि, पिण्डारक-क्षेत्रमें धृति, चन्द्रभागा (चनाब)-में काला, अच्छोदमें शिवकारिणी, वेणामें अमृता, बदरीतीर्थमें उर्वशी, उत्तरकुरुमें औषधी, कुशद्वीपमें कुशोदका, हेमकूटपर्वतपर मन्मथा, मुकुटमें सत्यवादिनी, अश्वत्थतीर्थमें वन्दनीया, वैश्रवणालयमें निधि, वेदवदनमें गायत्री, शिव-सन्निधिमें पार्वती, देवलोकमें इन्द्राणी, ब्रह्माके मुखोंमें सरस्वती, सूर्य-बिम्बमें प्रभा, माताओंमें वैष्णवी, सतियोंमें अरुन्धती, सुन्दरी स्त्रियोंमें तिलोत्तमा, चित्तमें ब्रह्मकला और अखिल शरीरधारियोंमें शक्ति-नामसे निवास करती हूँ।*॥ ३९–५३॥ | | एतदुद्देशतः प्रोक्तं नामाष्टशतमुत्तमम्।<br>अष्टोत्तरं च तीर्थानां शतमेतदुदाहृतम्॥ ५४ | इस प्रकार मैंने अपने एक सौ आठ श्रेष्ठ नामोंका वर्णन कर दिया। इसीके साथ एक सौ आठ तीर्थोंका भी नामोल्लेख हो गया। | | यः स्मरेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>एषु तीर्थेषु यः कृत्वा स्नानं पश्यति मां नरः॥ ५५<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः कल्पं शिवपुरे वसेत्। | जो मनुष्य मेरे इन नामोंका स्मरण करेगा अथवा दूसरेके मुखसे श्रवणमात्र कर लेगा, वह अपने निखिल पापोंसे मुक्त हो जायगा। इसी प्रकार जो मनुष्य इन उपर्युक्त तीर्थोंमें स्नान करके मेरा दर्शन करेगा, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर कल्पपर्यन्त शिवपुरमें निवास करेगा | | यस्तु मत्परमं कालं करोत्येतेषु मानवः॥ ५६<br>स भित्त्वा ब्रह्मसदनं पदमभ्येति शाङ्करम्। | तथा जो मानव इन तीर्थोंमें मेरे इस परम अन्तिम समयका स्मरण करेगा, वह ब्रह्माण्डका भेदन करके शङ्करजीके परम पद (शिवलोक)-को प्राप्त हो जायगा। | | नाम्नामष्टशतं यस्तु श्रावयेच्छिवसन्निधौ॥ ५७<br>तृतीयायामथाष्टम्यां बहुपुत्रो भवेन्नरः। | जो मनुष्य तृतीया अथवा अष्टमी तिथिके दिन शिवजीके संनिकट जाकर मेरे इन एक सौ आठ नामोंका पाठ करके उन्हें सुनायेगा, वह बहुत-से पुत्रोंवाला हो जायगा। | | गोदाने श्राद्धदाने वा अहन्यहनि वा बुधः॥ ५८<br>देवार्चनविधौ विद्वान् पठन् ब्रह्माधिगच्छति। | जो विद्वान् गोदान, श्राद्धदान अथवा प्रतिदिन देवार्चनके समय इन नामोंका पाठ करेगा, वह परब्रह्म-पदको प्राप्त हो जायगा। | | एवं वदन्ती सा तत्र ददाहात्मानमात्मना॥ ५९ | इस प्रकारकी बातें कहती हुई सतीने दक्षके उस यज्ञमण्डपमें अपने-आप ही अपने शरीरको जलाकर भस्म |


*यह शक्तिपीठ-वर्णन पद्म, देवीभागवत एवं स्कन्दादि अन्य ४ पुराणोंमें भी यों ही है। इनकी पाठशुद्धि तथा स्थानोंके परिचयपर डी० सी० सरकार तथा नरपति मिश्रके शोधप्रबन्ध श्रेष्ठ हैं।

५८* मत्स्यपुराण *

| स्वायम्भुवोऽपि कालेन दक्षः प्राचेतसोऽभवत्।<br>पार्वती साभवद् देवी शिवदेहार्धधारिणी ॥ ६०<br>मेनागर्भसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।<br>अरुन्धती जपन्त्येतत् प्राप योगमनुत्तमम्॥ ६१<br>पुरूरवाश्च राजर्षिर्लोके व्यजेयतामगात्।<br>ययातिः पुत्रलाभं च धनलाभं च भार्गवः ॥ ६२<br>तथान्ये देवदैत्याश्च ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।<br>वैश्याः शूद्राश्च बहवः सिद्धिमीयैर्यथेप्सिताम् ॥ ६३<br>यत्रैतल्लिखितं तिष्ठेत् पूज्यते देवसंनिधौ।<br>न तत्र शोको दौर्गत्यं कदाचिदपि जायते ॥ ६४ | कर दिया। पुनः यथोक्त समय आनेपर ब्रह्माके पुत्र दक्ष प्रचेताओैंके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा सतीदेवी शिवजीके अर्द्धाङ्गमें विराजमान होनेवाली पार्वतीरूपसे मेनाके गर्भसे प्रादुर्भूत हुई, जो भुक्ति (भोग) और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाली हैं। इन्हीं पूर्वोक्त एक सौ आठ नामोंका जप करनेसे अरुन्धतीने सर्वोत्तम योगसिद्धि प्राप्त की, राजर्षि पुरूरवा लोकमें अजेय हो गये, ययातिने पुत्र-लाभ किया और भृगुनन्दनको धन-सम्पत्तिकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार अन्यान्य बहुत-से देवता, दैत्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंने भी (इन नामोंके जपसे) मनोवाञ्छित सिद्धियाँ प्राप्त कीं। जहाँ यह नामावली लिखकर रखी रहती है अथवा किसी देवताके संनिकट रखकर इसकी पूजा होती है, वहाँ कभी शोक और दुर्गर्तिका प्रवेश नहीं होता ॥ ५४—६४ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पितृवंशान्वये गौरीनामाष्टोत्तरशतकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितरोंके वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें गौरीनामाष्टोत्तरशतकथन नामक तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! मरीचिके वंशज
लोकाः सोमपथा नाम यत्र मारीचनन्दनाः।<br>वर्तन्ते देवपितरो देवा यान् भावयन्त्यलम् ॥ १देवताओंके पितृगण जहाँ निवास करते हैं, वे लोक सोमपथके नामसे विख्यात हैं। देवतालोग उन पितरोंका ध्यान किया करते हैं।
अग्निष्वात्ता इति ख्याता यज्वानो यत्र संस्थिताः।<br>अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी ॥ २वे यज्ञपरायण पितृगण अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं। जहाँ वे रहते हैं, वहीं अच्छोदा* नामकी एक नदी प्रवाहित होती है, जो उन्हीं पितरोंकी मानसी कन्या है।
अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा।<br>अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ३प्राचीनकालमें पितरोंने वहीं एक अच्छोद नामक सरोवरका भी निर्माण किया था। पूर्वकालमें अच्छोदाने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की।
आजग्मुः पितरस्तुष्टाः किल दातुं च तां वरम्।<br>दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्यमाल्यानुलेपनाः ॥ ४उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर पितृगण उसे वर प्रदान करनेके लिये उसके समीप पधारे। वे सब-के-सब पितर दिव्यरूपधारी थे। उनके शरीरपर दिव्य सुगन्धका अनुलेप लगा हुआ था तथा गलेमें दिव्य पुष्पमाला लटक रही थी।
सर्वे युवानो बलिनः कुसुमायुधसंनिभाः।<br>तन्मध्येऽमावसुं नाम पितरं वीक्ष्य साङ्गना ॥ ५वे सभी नवयुवक, बलसम्पन्न एवं कामदेवके सदृश सौन्दर्यशाली थे। उन पितरोंमें अमावसु नामक पितरको

* इस अध्यायके अन्तमें वर्णित अच्छोद सरोवर और अच्छोदा नदी—दोनों कश्मीरमें हैं तथा परम प्रसिद्ध हैं। सरोवरको आजकल वहाँके लोग 'अच्छावत' कहते हैं।

  • अध्याय १४ * ५९

| वव्रे वरार्थिनी सङ्गं कुसुमायुधपीडिता ।<br>योगाद् भ्रष्टा तु सा तेन व्यभिचारेण भामिनी ॥ ६<br><br>धरां तु नास्पृशत् पूर्वं पपाताथ भूतले ।<br>तिथावमावसुर्यस्यामिच्छां चक्रे न तां प्रति ॥ ७<br><br>धैर्येण तस्य सा लोकैरमावास्येति विश्रुता ।<br>पितॄणां वल्लभा तस्मात्तस्यामक्षयकारकम् ॥ ८<br><br>अच्छोदाधोमुखी दीना लज्जिता तपसः क्षयात् ।<br>सा पितॄन् प्रार्थयामास पुरे चात्मप्रसिद्धये ॥ ९<br><br>विलप्यमाना पितृभिरिदमुक्ता तपस्विनी ।<br>भविष्यमर्थमालोक्य देवकार्यं च ते तदा ॥ १०<br><br>इदमूचुर्महाभागाः प्रसादशुभया गिरा ।<br>दिवि दिव्यशरीरेण यत्किञ्चित् क्रियते बुधैः ॥ ११<br><br>तेनैव तत्कर्मफलं भुज्यते वरवर्णिनि ।<br>सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे ॥ १२<br><br>तस्मात् त्वं पुत्रि तपसः प्राप्स्यसे प्रेत्य तत्फलम् ।<br>अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा ॥ १३<br><br>व्यतिक्रमात् पितॄणां त्वं कष्टं कुलमवाप्स्यसि ।<br>तस्माद् राज्ञो वसोः कन्या त्वमवश्यं भविष्यसि ॥ १४<br><br>कन्या भूत्वा च लोकान् स्वान् पुनराप्स्यसि दुर्लभान् ।<br>पराशरस्य वीर्येण पुत्रमेकमवाप्स्यसि ॥ १५<br><br>द्वीपे तु बदरीप्राये बादरायणमच्युतम् ।<br>स वेदमेकं बहुधा विभजिष्यति ते सुतः ॥ १६<br><br>पौरवस्यात्मजौ द्वौ तु समुद्रांशस्य शांतनोः ।<br>विचित्रवीर्यस्तनयस्तथा चित्राङ्गदो नृपः ॥ १७<br><br>इमावुत्पाद्य तनयौ क्षेत्रजावस्य धीमतः ।<br>प्रौष्ठपद्यष्टकारूपा पितृलोके भविष्यसि ॥ १८ | देखकर वरकी अभिलाषावाली सुन्दरी अच्छोदा व्यग्र हो उठी और उनके साथ रहनेकी याचना करने लगी। इस मानसिक कदाचारके कारण सुन्दरी अच्छोदा योगसे भ्रष्ट हो गयी और (उसके परिणामस्वरूप वह स्वर्गलोकसे) भूतलपर गिर पड़ी। उसने पहले कभी पृथ्वीका स्पर्श नहीं किया था। जिस तिथिको अमावसुने अच्छोदाके साथ निवास करनेकी अनिच्छा प्रकट की, वह तिथि उनके धैर्यके प्रभावसे लोगोंद्वारा अमावस्या नामसे प्रसिद्ध हुई। इसी कारण यह तिथि पितरोंको परम प्रिय है। इस तिथिमें किया हुआ श्राद्धादि कार्य अक्षय फलदायक होता है॥ १-८॥<br><br>इस प्रकार (बहुकालार्जित) तपस्याके नष्ट हो जानेसे अच्छोदा लज्जित हो गयी। वह अत्यन्त दीन होकर नीचे मुख किये हुए देवपुरमें पुनः अपनी प्रसिद्धिके लिये पितरोंसे प्रार्थना करने लगी। तब रोती हुई उस तपस्विनीको पितरोंने सान्त्वना दी। वे महाभाग पितर भावी देव-कार्यका विचार कर प्रसन्नता एवं मङ्गलसे परिपूर्ण वाणीद्वारा उससे इस प्रकार बोले—'वरवर्णिनि ! बुद्धिमान् लोग स्वर्गलोकमें दिव्य शरीरद्वारा जो कुछ शुभाशुभ कर्म करते हैं, वे उसी शरीरसे उन कर्मोंके फलका उपभोग करते हैं; क्योंकि देव-योनिमें कर्म तुरन्त फलदायक हो जाते हैं। उसके विपरीत मानव-योनिमें मृत्युके पश्चात् (जन्मान्तरमें) कर्मफल भोगना पड़ता है। इसलिये पुत्रि ! तुम मृत्युके पश्चात् जन्मान्तरमें अपनी तपस्याका पूर्ण फल प्राप्त करोगी। अट्ठाईसवें द्वापरमें तुम मत्स्य-योनिमें उत्पन्न होओगी। पितृकुलका व्यतिक्रमण करनेके कारण तुम्हें उस कष्टदायक योनिकी प्राप्ति होगी। पुनः उस योनिसे मुक्त होकर तुम राजा (उपरिचर) वसुकी कन्या होओगी। कन्या होनेपर तुम अपने दुर्लभ लोकोंको अवश्य प्राप्त करोगी। उस कन्यावस्थामें तुम्हें बदरी (बेर)-के वृक्षोंसे व्यास द्वीपमें महर्षि पराशरसे एक ऐसे पुत्रकी प्राप्ति होगी, जो बादरायण नामसे प्रसिद्ध होगा और कभी अपने कर्मसे च्युत न होनेवाले नारायणका अवतार होगा। तुम्हारा वह पुत्र एक ही वेदको अनेक (चार) भागोंमें विभक्त करेगा। तदनन्तर समुद्रके अंशसे उत्पन्न हुए पुरुवंशी राजा शांतनुके संयोगसे तुम्हें विचित्रवीर्य एवं महाराज चित्राङ्गद नामक दो पुत्र प्राप्त होंगे। बुद्धिमान् विचित्रवीर्यके दो क्षेत्रज धृतराष्ट्र और पाण्डु-पुत्रोंको उत्पन्न कराकर तुम प्रौष्ठपदी (भाद्रपदकी पूर्णिमा और पौषकृष्णाष्टमी आदि)-में अष्टकारूपसे पितृलोकमें जन्म ग्रहण करोगी। |

१७- साधारण एवं आभ्युदयिक श्राद्धकी विधिका विवरण

६०* मत्स्यपुराण *

| नाम्ना सत्यवती लोके पितृलोके तथाष्टका।<br>आयुरारोग्यदा नित्यं सर्वकामफलप्रदा॥ १९<br>भविष्यसि परे काले नदीत्वं च गमिष्यसि।<br>पुण्यतोया सरिच्छ्रेष्ठा लोके ह्यच्छोदनामिका॥ २०<br>इत्युक्त्वा स गणस्तेषां तत्रैवान्तरधीयत।<br>साप्यवाप च तत् सर्वं फलं यदुदितं पुरा॥ २१ | इस प्रकार मनुष्य-लोकमें सत्यवती और पितृलोकमें आयु एवं आरोग्य प्रदान करनेवाली तथा नित्य सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंकी प्रदात्री अष्टका नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। कालान्तरमें तुम मनुष्यलोकमें नदियोंमें श्रेष्ठ पुण्यसलिला अच्छोदा नामसे नदीरूपमें जन्म धारण करोगी।' ऐसा कहकर पितरोंका वह समुदाय वहीं अन्तर्हित हो गया तथा अच्छोदाको अपने उन समस्त कर्मफलोंकी प्राप्ति हुई, जो पहले कहे जा चुके हैं॥ ९—२१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक चौदहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १४॥


पन्द्रहवाँ अध्याय

पितृ-वंशका वर्णन, पीवरीका वृत्तान्त तथा श्राद्ध-विधिका कथन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
विभ्राजा नाम चान्ये तु दिवि सन्ति सुवर्चसः।<br>लोका बर्हिषदो यत्र पितरः सन्ति सुव्रताः॥ १ऋषियो! स्वर्गमें विभ्राज नामक अन्य तेजस्वी लोक भी हैं, जहाँ परम श्रेष्ठ उत्तम व्रतपरायण बर्हिषद् नामक पितर निवास करते हैं।
यत्र बर्हिणयुक्तानि विमानानि सहस्रशः।<br>सङ्कल्पा बर्हिषो यत्र तिष्ठन्ति फलदायिनः॥ २जहाँ मयूरोंसे युक्त हजारों विमान विद्यमान रहते हैं। जहाँ संकल्पके लिये प्रयुक्त हुए बर्हि (कुश) फल देनेके लिये उन्मुख होकर उपस्थित रहते हैं
यत्राभ्युदयशालासु मोदन्ते श्राद्धदायिनः।<br>यांश्च देवासुरगणा गन्धर्वाप्सरसां गणाः॥ ३<br>यक्षरक्षोगणाश्चैव यजन्ति दिवि देवताः।एवं जहाँकी अभ्युदयशालाओंमें पितरोंको श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग आनन्द मनाते रहते हैं। देवताओं और असुरोंके गण, गन्धर्वों और अप्सराओंके समूह तथा यक्षों और राक्षसोंके समुदाय स्वर्गमें उन पितरोंके निमित्त यज्ञका विधान करते रहते हैं।
पुलस्त्यपुत्राः शतशस्तपोयोगसमन्विताः॥ ४<br>महात्मानो महाभागा भक्तानामभयप्रदाः।महर्षि पुलस्त्यके सैकड़ों पुत्र, जो तपस्या और योगसे परिपूर्ण, महान् आत्मबलसे सम्पन्न, महान् भाग्यशाली एवं अपने भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले हैं, वहाँ निवास करते हैं।
एतेषां पीवरी कन्या मानसी दिवि विश्रुता॥ ५<br>योगिनी योगमाता च तपश्चक्रे सुदारुणम्।इन पितरोंकी एक मानसी कन्या थी, जो पीवरी नामसे विख्यात थी। उस योगिनी एवं योगमाता पीवरीने अत्यन्त कठोर तप किया।
प्रसन्नो भगवांस्तस्या वरं वव्रे तु सा हरेः॥ ६<br>योगवन्तं सुरूपं च भर्तारं विजितेन्द्रियम्।<br>देहि देव प्रसन्नस्त्वं पतिं मे वदतां वरम्॥ ७उसकी तपस्यासे भगवान् विष्णु प्रसन्न हो गये (और उसके समक्ष प्रकट हुए)। तब पीवरीने श्रीहरिसे यह वरदान माँगा—'देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे योगाभ्यासी, अत्यन्त सौन्दर्यशाली, जितेन्द्रिय, वक्ताओंमें श्रेष्ठ एवं पालन-पोषण करनेवाला पति प्रदान कीजिये।'
उवाच देवो भविता व्यासपुत्रो यदा शुकः।<br>भविता तस्य भार्या त्वं योगाचार्यस्य सुव्रते॥ ८यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—'सुव्रते! जब महर्षि व्यासके पुत्र शुक जन्म धारण करेंगे, उस समय तुम उन योगाचार्यकी पत्नी होओगी।
भविष्यति च ते कन्या कृत्वी नाम च योगिनी।<br>पाञ्चालाधिपतेर्देया मानुषस्य त्वया तदा॥ ९उनके संयोगसे तुम्हें एक योगाभ्यासपरायणा कृत्वी नामकी कन्या उत्पन्न होगी। तब तुम उसे मानव-योनिमें उत्पन्न हुए पञ्चाल-नरेश (नीप मतान्तरसे अणुह)-को समर्पित कर देना।
जननी ब्रह्मदत्तस्य योगसिद्धा च गौः स्मृता।<br>कृष्णो गौरः प्रभुः शम्भुर्भविष्यन्ति च ते सुताः॥ १०तुम्हारी वह योगसिद्धा कन्या (कृत्वी) ब्रह्मदत्तकी माता होकर 'गौ' नामसे भी प्रसिद्ध होगी। तदनन्तर कृष्ण, गौर, प्रभु और शम्भु नामक तुम्हारे चार पुत्र होंगे,
* अध्याय १५ *६१

| महात्मानो महाभागा गमिष्यन्ति परं पदम्।<br>तानुत्पाद्य पुनर्योगात् सवरा मोक्षमेष्यसि॥ ११<br>सुमूर्तिमन्तः पितरो वसिष्ठस्य सुताः स्मृताः।<br>नाम्ना तु मानसाः सर्वे सर्वे ते धर्ममूर्तयः॥ १२<br>ज्योतिर्भांसिषु लोकेषु ये वसन्ति दिवः परम्।<br>विराजमानाः क्रीडन्ति यत्र ते श्राद्धदायिनः॥ १३<br>सर्वकामसमृद्धेषु विमानेष्वपि पादजाः।<br>किं पुनः श्राद्धदा विप्रा भक्तिमन्तः क्रियान्विताः॥ १४<br>गौर्नाम कन्या येषां तु मानसी दिवि राजते।<br>शुक्रस्य दयिता पत्नी साध्यानां कीर्तिवर्धिनी॥ १५<br><br>मरीचिगर्भा नाम्ना तु लोका मार्तण्डमण्डले।<br>पितरो यत्र तिष्ठन्ति हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः॥ १६<br>तीर्थश्राद्धप्रदा यान्ति ये च क्षत्रियसत्तमाः।<br>राज्ञां तु पितरस्ते वै स्वर्गमोक्षफलप्रदाः॥ १७<br>एतेषां मानसी कन्या यशोदा लोकविश्रुता।<br>पत्नी ह्यंशुमतः श्रेष्ठा स्नुषा पञ्चजनस्य च॥ १८<br>जनन्यथ दिलीपस्य भगीरथपितामही।<br>लोकाः कामदुघा नाम कामभोगफलप्रदाः॥ १९<br>सुस्वधा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति सुव्रताः।<br>आज्यपा नाम लोकेषु कर्दमस्य प्रजापतेः॥ २०<br>पुलहाङ्गजदायादा वैश्यास्तान् भावयन्ति च।<br>यत्र श्राद्धकृतः सर्वे पश्यन्ति युगपद्गताः॥ २१<br>मातृभ्रातृपितृस्वसृसखिसम्बन्धिबान्धवान् ।<br>अपि जन्मायुतैर्दृष्टाननुभूतान् सहस्रशः॥ २२<br>एतेषां मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता।<br>या पत्नी नहुषस्यासीद् ययातेर्जननी तथा॥ २३ | जो महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली होंगे और अन्तमें परमपदको प्राप्त करेंगे। उन पुत्रोंको पैदा करनेके पश्चात् तुम पुनः अपने योगबलसे वर प्राप्त करोगी और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लोगी।<sup></sup> महर्षि वसिष्ठके पुत्ररूप (सुकाली नामक) पितर, जो सब-के-सब मानस नामसे विख्यात हैं, अत्यन्त सुन्दर स्वरूपवाले तथा धर्मकी मूर्ति हैं। वे सभी स्वर्गलोकसे परे ज्योतिर्भांसी लोकोंमें निवास करते हैं। जहाँ श्राद्धकर्ता शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंमें विराजमान होकर क्रीड़ा करते रहते हैं, वहाँ क्रियानिष्ठ एवं भक्तिमान् श्राद्धदाता ब्राह्मणोंकी तो बात ही क्या है। इन पितरोंकी 'गौ' नामकी मानसी कन्या स्वर्गलोकमें विराजमान है, जो शुक्रकी प्रिय पत्नी और साध्योंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाली है॥ १—१५॥<br><br>इसी प्रकार सूर्यमण्डलमें मरीचिगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य लोक भी हैं, जहाँ अङ्गिराके पुत्र हविष्मान् नामक पितरके रूपमें निवास करते हैं। ये राजाओं (क्षत्रियों)-के पितर हैं, जो स्वर्ग एवं मोक्षरूप फलके प्रदाता हैं। जो श्रेष्ठ क्षत्रिय तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करते हैं, वे इन लोकोंमें जाते हैं। इन पितरोंकी एक यशोदा नामकी लोक-प्रसिद्ध मानसी कन्या थी, जो पञ्चजनकी श्रेष्ठ पुत्रवधू, अंशुमान्‌की पत्नी, (महाराज) दिलीपकी माता और भगीरथकी पितामही थी।<sup></sup> अभीष्ट कामनाओं एवं भोगोंका फल प्रदान करनेवाले कामदुघ नामक अन्य पितृलोक भी हैं, जहाँ उत्तम व्रतपरायण सुस्वधा नामवाले पितर निवास करते हैं। वे ही पितर प्रजापति कर्दमके लोकोंमें आज्यप नामसे प्रख्यात हैं। महर्षि पुलहके अङ्गसे उत्पन्न हुए वैश्यगण उनकी भावना (पूजा) करते हैं। श्राद्धकर्ता सभी वैश्यगण इन लोकोंमें पहुँचकर दस हजार जन्मान्तरोंमें देखे और अनुभव किये हुए भी अपने हजारों माता, भाई, पिता, बहन, मित्र, सम्बन्धी और बान्धवोंको एक साथ देखते हैं। इन पितरोंकी मानसी कन्या विरजा नामसे विख्यात थी, जो राजा नहुषकी पत्नी और ययातिकी माता थी। |


१. शुकदेवजीका यह वृत्त ठीक इसी प्रकार वायुपुराण ७३। २६-३१; ७०। ८५-८६; पद्मपुराण १। ९। ३०-४०; हरिवंश० १। १८। ५०-५३ आदिमें भी प्राप्त होता है। पर मत्स्यपुराणमें 'कृत्वी'का 'गौ' नाम देखकर शङ्का होती है; क्योंकि १५वें श्लोकमें तुरंत 'गौ'को शुकदेवकी दूसरी पत्नी कहा है। पर शङ्का ठीक नहीं; क्योंकि एक ही नाम कइयोंके होते हैं। पुराणोंमें वायुपुराण अध्याय ९। ३, १४ आदिमें 'यति' राजाकी स्त्री तथा वाल्मीकिरामायण ७। ६०। महाभारत आदिमें पुलस्त्य-पत्नीका भी नाम 'गौ' आता है।
२. यह विवरण वायुपुराण ७२, ब्रह्माण्ड० ३। १०, हरिवंश० १। ६, ब्रह्मपुराण ३४, पद्म० १। ९, लिङ्गपुराण १। ६ में भी है। यहाँ सूर्यवंशी दिलीप प्रथम इष्ट हैं। पुराणानुसार सूर्यवंशमें दो दिलीप हुए हैं। एकके पुत्र थे भगीरथ और दूसरेके रघुवंशप्रसिद्ध रघु हुए हैं।

६२* मत्स्यपुराण *

| एकाष्टकाभवत् पश्चाद् ब्रह्मलोके गता सती।<br>त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु वदाम्यतः॥ २४<br><br>लोकास्तु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थिताः।<br>येषां तु मानसी कन्या नर्मदानामविश्रुता॥ २५<br><br>सोमपा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति शाश्वताः।<br>धर्ममूर्तिधराः सर्वे परतो ब्रह्मणः स्मृताः॥ २६<br><br>उत्पन्नाः स्वधया ते तु ब्रह्मत्वं प्राप्य योगिनः।<br>कृत्वा सृष्ट्यादिकं सर्वं मानसे साम्प्रतं स्थिताः॥ २७<br><br>नर्मदा नाम तेषां तु कन्या तोयवहा सरित्।<br>भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी॥ २८<br><br>तेभ्यः सर्वे तु मनवः प्रजाः सर्गेषु निर्मिताः।<br>ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वन्ति धर्माभावेऽपि सर्वदा॥ २९<br><br>तेभ्य एव पुनः प्राप्तुं प्रसादाद् योगसंततिम्।<br>पितॄणामादिसर्गे तु श्राद्धमेव विनिर्मितम्॥ ३० | बादमें वह पतिपरायणा विरजा ब्रह्मलोकको चली गयी और वहाँ एकाष्टका नामसे प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार मैंने तीन पितृगणोंका वर्णन कर दिया। अब इसके बाद चौथे गणका वर्णन कर रहा हूँ। ब्रह्माण्डके ऊपर मानस नामक लोक विद्यमान हैं, उनमें अविनाशी 'सोमप' नामक पितर निवास करते हैं (ये ब्राह्मणोंके पितर हैं)। उनकी मानसी कन्या नर्मदा-नामसे प्रसिद्ध है। वे सभी पितर धर्मकी-सी मूर्ति धारण करनेवाले तथा ब्रह्मासे भी परे बतलाये गये हैं। स्वधासे उनकी उत्पत्ति हुई है। वे सभी योगाभ्यासी पितर ब्रह्मत्वको प्राप्त करके सृष्टि आदि समस्त कार्योंसे निवृत्त हो इस समय मानस लोकमें विद्यमान हैं। उनकी वह नर्मदा नाम्नी कन्या (भारतके) दक्षिणापथमें आकर जल प्रवाहित करनेवाली नदी हुई है, जो समस्त प्राणियोंको पवित्र कर रही है। इन्हीं पितरोंकी परम्परासे मनुगण (अपने-अपने कार्यकालमें) सृष्टिके प्रारम्भमें प्रजाओंका निर्माण करते हैं। इस रहस्यको जानकर लोग धर्मका अभाव हो जानेपर भी सर्वदा श्राद्ध करते रहते हैं। इन्हीं पितरोंकी कृपासे पुनः इन्हींके द्वारा योग-परम्पराको प्राप्त करनेके लिये सृष्टिके प्रारम्भमें पितरोंके लिये श्राद्धका ही निर्माण किया गया था॥ १६-३०॥ | | सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम्।<br>दत्तं स्वधा पुरोधाय पितॄन् प्रीणाति सर्वदा॥ ३१<br><br>अग्नीषोममयानां तु कार्यमाप्यायनं बुधैः।<br>अग्न्यभावेऽपि विप्रस्य पाणावपि जलेऽथवा॥ ३२<br><br>अजाकर्णेऽश्वकर्णे वा गोष्ठे वा सलिलान्तिके।<br>पितॄणामम्बरं स्थानं दक्षिणा दिक् प्रशस्यते॥ ३३<br><br>प्राचीनावीतमुदकं तिलाः सव्याङ्गमेव च।<br>दर्भा मांसं च पाठीनं गोक्षीरं मधुरा रसाः॥ ३४<br><br>खड्गलोहामिषमधुकुशश्यामाकशालयः ।<br>यवनीवारमुद्गेक्षुशुक्लपुष्पघृतानि च॥ ३५<br><br>वल्लभानि प्रशस्तानि पितॄणामिह सर्वदा।<br>द्वेष्याणि सम्प्रवक्ष्यामि श्राद्धे वर्ज्यानि यानि तु॥ ३६ | इन सभी पितरोंके निमित्त चाँदीका अथवा चाँदीमिश्रित अन्य धातुका भी पात्र आदि स्वधाका उच्चारण करके (ब्राह्मणको) दान कर दिया जाय तो वह सर्वदा पितरोंको प्रसन्न करता है। विद्वान् (श्राद्धकर्ता)-को चाहिये कि (श्राद्धकालमें प्रथमतः) अग्नि, सोम और यमका तर्पण करके उन्हें तृप्त करे (और पितरोंके उद्देश्यसे दिया गया अन्न आदि अग्निमें छोड़ दे)। अग्निके अभावमें ब्राह्मणके हाथपर, जलमें, अजाकर्णपर, अश्वकर्णपर, गोशालामें अथवा जलके निकट डाल दे। पितरोंका स्थान आकाश बतलाया जाता है। उनके लिये दक्षिण दिशा विशेषरूपसे प्रशस्त मानी गयी है। प्राचीनावीत (अपसव्य) होकर दिया गया जल, तिल, सव्याङ्ग (शरीरका दाहिना भाग), डाभ, फलका गूदा, गो-दुग्ध, मधुर रस, खड्ग, लोह, मधु, कुश, साँवाँ, अगहनीका चावल, यव, तिन्नीका चावल, मूँग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत-ये पदार्थ पितरोंके लिये सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कहे गये हैं। अब जो श्राद्धकार्यमें वर्जित तथा पितरोंके लिये अप्रिय हैं, उन पदार्थोंका वर्णन कर रहा हूँ- |

* अध्याय १६ *६३

| मसूरशणनिष्पावराजमाषकुसुम्भिकाः ।<br>पद्मबिल्वार्कधत्तूरपारिभद्रारटरूषकाः ॥ ३७<br><br>न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा।<br>कोद्रवोदारचणकाः कपित्थं मधुकातसी ॥ ३८<br><br>एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः प्रियमिच्छता।<br>पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम्॥ ३९<br><br>यच्छन्ति पितरः पुष्टिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम्।<br>देवकार्यादपि पुनः पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ४०<br><br>देवतानां च पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।<br>शीघ्रप्रसादास्त्वक्रोधा निःशस्त्राः स्थिरसौहृदाः ॥ ४१<br><br>शान्तात्मानः शौचपराः सततं प्रियवादिनः।<br>भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ ४२<br><br>हविष्मतामाधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः।<br>एतद् वः सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्तनम्।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं कीर्तनीयं सदा नृभिः ॥ ४३ | मसूर, शण (पेटुआका बीज), सेम, काला उड़द, कुसुमका पुष्प, कमल, बेल या बिल्वपत्र, मदार, धतूरा, पारिभद्र (नीम, देवदारुका पुष्प या पत्ता), अडूसेका फूल तथा भेड़ और बकरीका दूध। इन्हें पितृ-कार्योंमें नहीं देना चाहिये। पितरोंसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छावाले पुरुषको श्राद्धकार्यमें कोदो, उदार (गुलूके वृक्षका पुष्प अथवा पत्ता), चना, कैथ, महुआ और अलसी (तीसी)—इन पदार्थोंका भी उपयोग नहीं करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक (श्राद्धादिद्वारा) पितरोंको प्रसन्न करता है, उसे पितर भी बदलेमें हर्षित कर देते हैं। वे पितृगण प्रसन्न होकर समृद्धि, स्वर्ग, आरोग्य और संतानरूपी फल प्रदान करते हैं। इसलिये देवकार्यसे भी बढ़कर पितृकार्यकी विशेषता मानी जाती है तथा देवताओंसे पूर्व ही पितरोंके तर्पणकी विधि बतलायी गयी है। ये पितर शीघ्र ही कृपा करनेवाले, क्रोधरहित, शस्त्रविहीन, दृढ़ मैत्रीयुक्त, शान्तात्मा पवित्रतापरायण, सदा प्रियवादी, भक्तोंके प्रति अनुरक्त और सुखदायक (गृहस्थोंके) प्रथम देवता हैं। हविष्यान्नका भक्षण करनेवाले इन पितरोंके अधिनायक-पदपर श्राद्धके देवतारूपमें सूर्य अधिष्ठित माने गये हैं। इस प्रकार यह पितृ-वंशका वर्णन मैंने तुम लोगोंको पूर्णरूपसे बतला दिया। यह पुण्य-प्रदाता, परम पवित्र और आयुकी वृद्धि करनेवाला है, मनुष्योंको सदा इसका पठन-पाठन करना चाहिये ॥ ३१—४३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥


सोलहवाँ अध्याय

श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
श्रुत्वैतत् सर्वमखिलं मनुः पप्रच्छ केशवम्।<br>श्राद्धे कालं च विविधं श्राद्धभेदं तथैव च ॥ १<br><br>श्राद्धेषु भोजनीया ये ये च वर्ज्या द्विजातयः।<br>कस्मिन् वासरभागे वा पितृभ्यः श्राद्धमाचरेत् ॥ २ऋषियो! यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मनुने मत्स्यभगवान्‌से पूछा—'मधुसूदन! श्राद्धके लिये कौन-सा काल उत्तम है? श्राद्धके विभिन्न भेद कौन-से हैं? श्राद्धोंमें कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? तथा कैसे ब्राह्मण वर्जित हैं? दिनके किस भागमें पितरोंके लिये श्राद्ध करना उचित है?

६४ * मत्स्यपुराण *


कस्मिन दतं कथं याति श्राद्धं तु मधुसूदन।<br>विधिना केन कर्तव्यं कथं प्रीणाति तत् पितॄन्॥ ३कैसे पात्रको श्राद्धीय वस्तु प्रदान करनी चाहिये? तथा उसका फल पितरोंको कैसे प्राप्त होता है? श्राद्ध किस विधिसे करना उपयुक्त है? तथा वह श्राद्ध किस प्रकार पितरोंको प्रसन्न करता है? (ये सारी बातें मुझे बतलानेकी कृपा करें) ॥ १–३॥
मत्स्य उवाच<br>कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।<br>पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥ ४<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते।<br>नित्यं तावत् प्रवक्ष्यामि अर्घ्यावाहनवर्जितम्॥ ५<br><br>अदैवं तद् विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम्।<br>पार्वणं त्रिविधं प्रोक्तं शृणु तावन्महीपते॥ ६<br><br>पार्वणे ये नियोज्यास्तु ताञ्शृणुष्व नराधिप।<br>पञ्चाग्निः स्नातकश्चैव त्रिसुपर्णः षडङ्गवित्॥ ७<br><br>श्रोत्रियः श्रोत्रियसुतो विधिवाक्यविशारदः।<br>सर्वज्ञो वेदविन्मन्त्री ज्ञातवंशः कुलान्वितः॥ ८<br><br>पुराणवेत्ता धर्मज्ञः स्वाध्यायजपतत्परः।<br>शिवभक्तः पितृपरः सूर्यभक्तोऽथ वैष्णवः॥ ९<br><br>ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान्।<br>भोजयेच्चापि दौहित्रं यत्नतः स्वसुहृद् गुरून्॥ १०<br><br>विट्पतिं मातुलं बन्धुमृत्विगाचार्यसोमपान्।<br>यश्च व्याकुरुते वाक्यं यश्च मीमांसतेऽध्वरम्॥ ११<br><br>सामस्वरविधिज्ञश्च पङ्क्तिपावनपावनः।<br>सामगो ब्रह्मचारी च वेदयुक्तोऽथ ब्रह्मवित्॥ १२<br><br>यत्र ते भुञ्जते श्राद्धे तदेव परमार्थवत्।<br>एते भोज्याः प्रयत्नेन वर्जनीयान् निबोध मे॥ १३मत्स्यभगवान् कहने लगे— राजर्षे! प्रतिदिन पितरोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए अन्न आदिसे या केवल जलसे अथवा दूध या फल-मूलसे भी श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक और काम्यरूपसे तीन प्रकारका बतलाया गया है। इनमें मैं पहले नित्यश्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, जो अर्घ्य और आवाहनसे रहित होता है। इसे 'अदैव' मानना चाहिये। पर्वोंपर सम्पन्न होनेवाले (त्रिपुरुष) श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। महीपते! यह पार्वण श्राद्ध तीन प्रकारका बतलाया जाता है, उन्हें सुनो। नरेश्वर! पार्वण श्राद्धमें जिन्हें नियुक्त करना चाहिये, उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो पञ्चाग्नि विद्याका ज्ञाता अथवा गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका उपासक, स्नातक, त्रिसुपर्ण (ऋग्वेदके एक अंशका अध्येता<sup></sup>), वेदके छहों अङ्गोंका ज्ञाता, श्रोत्रिय, श्रोत्रियका पुत्र, धर्मशास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, सर्वज्ञ, वेदवेत्ता, उचित मन्त्रणा करनेवाला, जाने हुए वंशमें उत्पन्न, कुलीन, पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, स्वाध्याय एवं जपमें तत्पर रहनेवाला, शिवभक्त, पितृपरायण, सूर्यभक्त, वैष्णव, ब्राह्मणभक्त, योगवेत्ता, शान्त, आत्माको वशीभूत कर लेनेवाला एवं शीलवान् हो (ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करना चाहिये)। (अब इस पुनीत श्राद्धमें जिन्हें भोजन कराना चाहिये, उनके विषयमें बतला रहा हूँ, सुनो।) पुत्रीका पुत्र (नाती), अपना मित्र, गुरु (अथवा गुरुजन), कुलपति (आचार्य), मामा, भाई-बन्धु, ऋत्विक्, आचार्य (विद्यागुरु) और सोमपायी—इन्हें प्रयत्नपूर्वक बुलाकर श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। साथ ही जो विधि-वाक्योंके व्याख्याता, यज्ञके मीमांसक, सामवेदके स्वर और (उसके उच्चारणकी) विधिके ज्ञाता, पङ्क्तिपावनोंमें<sup></sup> भी परम पवित्र, सामवेदके पारगामी विद्वान्, ब्रह्मचारी, वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हैं—ये सभी श्राद्धमें चेष्टापूर्वक भोजन कराने योग्य हैं। ऐसे ब्राह्मण जिस श्राद्धमें भोजन करते हैं, वही श्राद्ध परमार्थसम्पन्न माना जाता है। अब जो ब्राह्मण श्राद्धमें वर्जित हैं, उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनो।

१. ऋग्वेद १०।११४ की ३–५ ऋचाएँ 'त्रिसुपर्ण' संज्ञक हैं। उसके विशेषज्ञको भी 'त्रिसुपर्ण' कहा जाता है। वहाँ वही इष्ट है।
२. विद्या, तप आदिसे विशिष्ट ब्राह्मण, जिससे श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी पङ्क्ति पवित्र हो जाती है।

* अध्याय १६ *६५
मूल श्लोकहिन्दी-अनुवाद
पतितोऽभिशस्तः क्लीबः पिशुनव्यङ्गरोगिणः।<br>कुनखी श्यावदन्तश्च कुण्डगोलाश्र्वपालकाः॥ १४<br><br>परिवित्तिर्नियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मत्तदारुणाः।<br>बैडालो बकवृत्तिश्च दम्भी देवलकादयः॥ १५<br><br>कृतघ्नान् नास्तिकांस्तद्वन्म्लेच्छदेशनिवासिनः।<br>त्रिशङ्कुर्बर्बरद्राववीतद्रविडकोङ्कणान् ॥ १६<br><br>वर्जयेल्लिङ्गिनः सर्वाञ्श्राद्धकाले विशेषतः।<br>पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १७<br><br>निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।<br>वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥ १८पतित (जो अपने वर्णाश्रम-धर्मसे च्युत हो गया हो), अभिशस्त (कलङ्कित, बदनाम), नपुंसक, चुगलखोर, विकृत अङ्गोंवाला, रोगी, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंसे युक्त, कुण्ड (सधवाका जारज पुत्र), गोलक (विधवाका जारज पुत्र), कुत्तोंका पालक, परिवित्ति*, नौकर अथवा जिसका मन किसी अन्य श्राद्धमें लगा हो, पागल, उन्मादी, क्रूर, बिडाल एवं बगुलेकी तरह चोरीसे जीविकोपार्जन करनेवाला, दम्भी तथा मन्दिरमें देव-पूजा करके वेतनभोगी (पुजारी)—ये सभी श्राद्धभोजमें निषिद्ध माने गये हैं। इसी प्रकार कृतघ्न (किये हुए उपकारको न माननेवाला), नास्तिक (परलोकपर विश्वास न करनेवाला), त्रिशङ्कु (कीकटसे दक्षिण और महानदीसे उत्तरका भाग), बर्बर (भारतकी पश्चिम सीमापरका प्रदेश), द्राव, वीत, द्रविड और कोंकण आदि देशोंके निवासी तथा संन्यासी—इन सभीका विशेषरूपसे श्राद्धकार्यमें परित्याग कर देना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके एक या दो दिन पहले ही श्राद्धकर्ता विनीतभावसे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे; क्योंकि पितृलोग आकर उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके निकट उपस्थित होते हैं। वे वायुरूप होकर उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलते हैं तथा उनके बैठ जानेपर पितर भी उन्हींके समीप बैठ जाते हैं॥ १४-१८॥
दक्षिणं जानुमालभ्य त्वं मया तु निमन्त्रितः।<br>एवं निमन्त्र्य नियमं श्रावयेत् पितृबान्धवान्॥ १९<br><br>अक्रोधनैः शौचपरैः सततं ब्रह्मचारिभिः।<br>भवितव्यं भवद्भिश्च मया च श्राद्धकारिणा॥ २०<br><br>पितृयज्ञं विनिर्वर्त्य तर्पणाख्यं तु योऽग्निमान्।<br>पिण्डान्वाहार्यकं कुर्याच्छ्राद्धमिन्दुक्षये सदा॥ २१<br><br>गोमयेनोपलिप्ते तु दक्षिणप्रवणे स्थले।<br>श्राद्धं समाचरेद् भक्त्या गोष्ठे वा जलसंनिधौ॥ २२<br><br>अग्निमान् निर्वपेत् पित्र्यं चरुं च सममुष्टिभिः।<br>पितृभ्यो निर्वपामीति सर्वं दक्षिणतो न्यसेत्॥ २३<br><br>अभिघार्य ततः कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः।<br>तेऽपि तस्यायताः कार्याश्चतुरङ्गुलविस्तृताः॥ २४<br><br>दर्वीत्रयं तु कुर्वीत खादिरं रजतान्वितम्।<br>रत्निमात्रं परिश्लक्ष्णं हस्ताकाराग्रमुत्तमम्॥ २५उस समय श्राद्धकर्ता ब्राह्मणके दाहिने घुटनेको स्पर्शकर (उससे) इस प्रकार प्रार्थना करे—‘मैं आपको निमन्त्रित कर रहा हूँ।’ इस प्रकार निमन्त्रण देकर अपने पिताके भाई-बन्धुओंको श्राद्ध-नियम बतलाते हुए यों कहे—‘(मैं अमुक दिन पितृ-श्राद्ध करूँगा, अतः उस दिन) आपलोगोंको निरन्तर क्रोधरहित, शौचाचारपरायण तथा ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित रहना चाहिये। मुझ श्राद्धकर्ताद्वारा भी इन नियमोंका पालन किया जायगा।’ इस प्रकार पितृ-यज्ञसे निवृत्त होकर तर्पण-कर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ताको ‘पिण्डान्वाहार्यक’ नामक श्राद्ध सदा अमावास्या तिथिमें करना चाहिये। गोशालामें या किसी जलाशयके निकट दक्षिण दिशाकी ओर ढालू स्थानको गोबरसे लीपकर वहीं भक्तिपूर्वक श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ता पितरोंके निमित्त बनी हुई चरुको समसंख्यक (२, ४, ६) मुष्टियोंद्वारा ‘मैं पितरोंको चरु प्रदान कर रहा हूँ’—यों कहकर पितरोंको चरु प्रदान करे और शेष सबको अपनी दाहिनी ओर रख ले। तत्पश्चात् अग्निमें घीकी धारा छोड़कर चरुको तीन भागोंमें विभक्त करके आगेकी ओर रखे। उन भागोंको भी चार अङ्गुलके विस्तारका लम्बा बना देना चाहिये। पुनः तीन दर्वी (करछुलें, जिनसे हवनीय पदार्थ अग्निमें छोड़े जाते हैं) रखनी चाहिये, जो खैर या चाँदीमिश्रित अन्य धातुकी बनी हों, जिनका परिमाण मुट्ठी बँधे हुए हाथके बराबर हो, जो अत्यन्त चिकनी, उत्तम एवं हथेलीकी-सी बनी हुई सुडौल हों।

* बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए जो छोटा भाई अपना विवाह कर लेता है, उसे 'परिवित्ति' कहा जाता है।

१८- एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि

६६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उदपात्रं च कांस्यं च मेक्षणं च समित् कुशान्।<br>तिलाः पात्राणि सद्वासो गन्धधूपानुलेपनम्॥ २६<br><br>आहरेदपसव्यं तु सर्वे दक्षिणतः शनैः।<br>एवमासाद्य तत् सर्वं भवनस्याग्रतो भुवि॥ २७<br><br>गोमयेनोपलिप्तायां गोमूत्रेण तु मण्डलम्।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिस्तदभ्यर्च्य्यापसव्यवत्॥ २८<br><br>विप्राणां क्षालयेत् पादावभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>आसनेषूपक्लृप्तेषु दर्भवत्सु विधानवत्॥ २९<br><br>उपस्पृष्टोदकान् विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत्।<br>द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र च॥ ३०इसी प्रकार अपसव्य होकर (जनेऊको बाँयें कंधेसे दाहिने कंधेपर रखकर) पीतलका जलपात्र, मेक्षण (प्रणीतापात्र), समिधा, कुश, तिल, अन्यान्य पात्र, शुद्ध नवीन वस्त्र, गन्ध, धूप, चन्दन आदिको लाकर सबको धीरेसे अपनी दाहिनी ओर रख ले। इस प्रकार सभी आवश्यक सामग्रियोंको एकत्र करके घरके दरवाजेपर गोबरसे लिपी हुई भूमिपर अपसव्य होकर गोमूत्रसे मण्डलकी रचना करे और पुष्पसहित अक्षतोंद्वारा उसकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् बारम्बार ब्राह्मणोंका अभिनन्दन करते हुए उनका पाद-प्रक्षालन करे। पुनः उन ब्राह्मणोंको कुशनिर्मित आसनोंपर बैठाकर विधिपूर्वक उन्हें आचमन या जलपान करावे। तदनन्तर उनसे श्राद्धके लिये सम्मति ले॥ १९—२९ १/२॥
भोजयेदीश्वरोऽपीह न कुर्याद् विस्तारं बुधः।<br>दैवपूर्वं नियोज्याथ विप्रानर्घ्यादिना बुधः॥ ३१बुद्धिमान् पुरुषको देवकार्यमें दो एवं पितृकार्यमें तीन अथवा दोनों कार्योंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न होनेपर भी पार्वण श्राद्धमें विस्तार करना उचित नहीं है। पहले विश्वेदेवको अर्घ्य आदि समर्पित करके तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी अर्घ्य आदि द्वारा पूजा करे।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो विप्रैर्विप्रो यथाविधि।<br>स्वगृहोक्तविधानेन कांस्ये कृत्वा चरुं ततः॥ ३२पुनः श्राद्धकर्ता ब्राह्मणको चाहिये कि वह उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर चरुको काँसेके बर्तनमें रखकर अपने गृह्योक्तके विधानानुसार विधिपूर्वक अग्निमें हवन करे,
अग्नीषोमयमानां तु कुर्यादाप्यायनं बुधः।<br>दक्षिणाग्नौ प्रतीते वा य एकाग्निर्द्विजोत्तमः॥ ३३फिर बुद्धिमान् पुरुषको अग्नि, सोम और यमका तर्पण करना चाहिये। इस प्रकार एक अग्निका उपासक यज्ञोपवीतधारी श्रेष्ठ ब्राह्मण 'दक्षिण' नामक अग्निके प्रज्वलित हो जानेपर श्राद्धकर्म सम्पन्न करे।
यज्ञोपवीती निर्वर्त्य ततः पर्युक्षणादिकम्।<br>प्राचीनावीतिना कार्यमतः सर्वं विजानता॥ ३४तदनन्तर पर्युक्षण आदिसे निवृत्त होकर उपर्युक्त सारी विधियोंको समझ ले और प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर सारा कार्य सम्पन्न करे।
षट् च तस्माद्धविःशेषात् पिण्डान् कृत्वा ततोदकम्।<br>दद्यादुदकपात्रैस्तु सतिलं सव्यपाणिना॥ ३५फिर उस बचे हुए हविसे छः पिण्ड बनाकर उनपर बायें हाथसे अपने जलपात्रद्वारा तिलसहित जल गिराये
जान्वाच्य सव्यं यत्नेन दर्भयुक्तो विमत्सरः।<br>विधाय लेखां यत्नेन निर्वापेष्क्ववनेजनम्॥ ३६और ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर हाथमें कुश लेकर बायाँ घुटना मोड़कर प्रयत्नपूर्वक (वेदीपर) रेखा बनाये (एवं रेखाओंपर कुश बिछाये।) तथा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके पिण्ड रखनेके लिये बिछाये गये कुशोंपर अवनेजन (श्राद्ध-वेदीपर बिछे हुए कुशोंपर जल सींचनेका संस्कार) करे।
दक्षिणाभिमुखः कुर्यात् करे दर्वीं निधाय वै।<br>निधाय पिण्डमेकैकं सर्वदर्भेष्वनुक्रमात्॥ ३७फिर हाथमें करछुल लेकर

* अध्याय १६ * <div align="right">६७</div>


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
निनयेदथ दर्भेषु नामगोत्रानुकीर्तनैः।<br>तेषु दर्भेषु तं हस्तं विमृज्याल्लेपभागिनाम्॥ ३८<br><br>तथैव च ततः कुर्यात् पुनः प्रत्यवनेजनम्।<br>षड्भ्यस्तॄन् नमस्कृत्य गन्धधूपार्हणादिभिः॥ ३९<br><br>एवमावाह्य तत् सर्वं वेदमन्त्रैर्यथोदितैः।<br>एकाग्नेरेक एव स्यान्निर्वापो दर्विका तथा॥ ४०<br><br>ततः कृतान्तरे दद्यात् पत्नीभ्योऽन्नं कुशेषु सः।<br>तद्वत् पिण्डादिके कुर्यादावाहनविसर्जनम्॥ ४१<br><br>ततो गृहीत्वा पिण्डेभ्यो मात्राः सर्वाः क्रमेण तु।<br>तानेव विप्रान् प्रथमं प्राशयेद् यत्नतो नरः॥ ४२तथा क्रमशः एक-एक पिण्ड उठाकर पितरोंके गोत्र एवं नामोंका उच्चारण करके उन सभी बिछाये गये कुशोंपर एक-एक करके रख दे और लेपभागी पितरोंकी तृप्तिके लिये उन कुशोंके मूलभागमें अपने उस हाथको पोंछ दे। तत्पश्चात् पुनः पूर्ववत् उन पिण्डोंपर प्रत्यवनेजन जल छोड़े। तदुपरान्त गन्ध, धूप आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा उन छहों पितरोंका पूजन करके उन्हें नमस्कार करे और फिर यथोक्त वेद-मन्त्रोंद्वारा उनका आवाहन करे। एकाग्निक ब्राह्मणके लिये एक ही निर्वाप और एक ही करछुलका विधान है। यह सब सम्पन्न कर लेनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता कुशोंपर पितरोंकी पत्नियोंके लिये अन्न प्रदान करे और पिण्डोंपर आवाहन एवं विसर्जन आदि क्रिया पूर्ववत् करे। तत्पश्चात् श्राद्धकर्ता उन सभी पिण्डोंमेंसे थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर उन्हें सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंको खिलावे॥ ३०—४२॥
यस्मादन्नाद्धृता मात्रा भक्षयन्ति द्विजातयः।<br>अन्वाहार्यकमित्युक्तं तस्मात् तच्चन्द्रसंक्षये॥ ४३<br><br>पूर्वं दत्त्वा तु तद्धस्ते सपवित्रं तिलोदकम्।<br>तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन्॥ ४४<br><br>वर्णयन् भोजयेदन्नं मिष्टं पूतं च सर्वदा।<br>वर्जयेत् क्रोधपरतां स्मरन् नारायणं हरिम्॥ ४५चूँकि पिण्डान्नसे निकाले गये अंशको अमावास्याके दिन ब्राह्मणलोग खाते हैं, इसीलिये इस श्राद्धको 'अन्वाहार्यक' कहा जाता है। श्राद्धकर्ता पहले पवित्रकसहित तिल और जलको उस ब्राह्मणके हाथमें देकर तत्पश्चात् पिण्डांशको समर्पित करे और 'यह हमारे पितरोंके लिये स्वधा हो' यों कहते हुए भोजन कराये। उस ब्राह्मणको चाहिये कि वह क्रोधका परित्याग करके भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए 'यह बहुत मीठा है', 'यह परम पवित्र है'—यों कहते हुए भोजन करे।
तृप्ता ज्ञात्वा ततः कुर्याद् विकिरन् सार्ववर्णिकम्।<br>सोदकं चान्नमुद्धृत्य सलिलं प्रक्षिपेद् भुवि॥ ४६<br><br>आचान्तेषु पुनर्दद्याज्जलपुष्पाक्षतोदकम्।<br>स्वस्तिवाचनकं सर्वं पिण्डोपरि समाहरेत्॥ ४७<br><br>देवायत्तं प्रकुर्वीत श्राद्धनाशोऽन्यथा भवेत्।<br>विसृज्य ब्राह्मणांस्तद्वत् तेषां कृत्वा प्रदक्षिणम्॥ ४८उन ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर तत्पश्चात् सभी वर्णोंके लिये विकिराकी क्रिया करनी चाहिये। उस समय जलसहित अन्न लेकर पृथ्वीपर जल गिरा दे। पुनः उन ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर जल, पुष्प, अक्षत आदि सभी सामग्री स्वस्तिवाचनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर डाल दे। फिर इस श्राद्धफलको भगवान्‌को अर्पित कर दे, अन्यथा श्राद्ध नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार उन ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे।
दक्षिणां दिशमाकाङ्क्षन् पितॄन् याचेत मानवः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥ ४९<br><br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।<br>अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि॥ ५०उस समय श्राद्धकर्ता दक्षिण दिशाकी ओर मुखकरके पितरोंसे अभिलाषापूर्तिके निमित्त याचना करते हुए यों कहे—'पितृगण! हमारे दाताओं, वेदों (वेदज्ञान) और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास प्रचुर सम्पत्ति हो, हमारे अधिक-से-अधिक अन्न उत्पन्न हों, हमारे घरपर अतिथियोंका जमघट लगा रहे।