मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १६ * | ६५ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी-अनुवाद |
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| पतितोऽभिशस्तः क्लीबः पिशुनव्यङ्गरोगिणः।<br>कुनखी श्यावदन्तश्च कुण्डगोलाश्र्वपालकाः॥ १४<br><br>परिवित्तिर्नियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मत्तदारुणाः।<br>बैडालो बकवृत्तिश्च दम्भी देवलकादयः॥ १५<br><br>कृतघ्नान् नास्तिकांस्तद्वन्म्लेच्छदेशनिवासिनः।<br>त्रिशङ्कुर्बर्बरद्राववीतद्रविडकोङ्कणान् ॥ १६<br><br>वर्जयेल्लिङ्गिनः सर्वाञ्श्राद्धकाले विशेषतः।<br>पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १७<br><br>निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।<br>वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥ १८ | पतित (जो अपने वर्णाश्रम-धर्मसे च्युत हो गया हो), अभिशस्त (कलङ्कित, बदनाम), नपुंसक, चुगलखोर, विकृत अङ्गोंवाला, रोगी, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंसे युक्त, कुण्ड (सधवाका जारज पुत्र), गोलक (विधवाका जारज पुत्र), कुत्तोंका पालक, परिवित्ति*, नौकर अथवा जिसका मन किसी अन्य श्राद्धमें लगा हो, पागल, उन्मादी, क्रूर, बिडाल एवं बगुलेकी तरह चोरीसे जीविकोपार्जन करनेवाला, दम्भी तथा मन्दिरमें देव-पूजा करके वेतनभोगी (पुजारी)—ये सभी श्राद्धभोजमें निषिद्ध माने गये हैं। इसी प्रकार कृतघ्न (किये हुए उपकारको न माननेवाला), नास्तिक (परलोकपर विश्वास न करनेवाला), त्रिशङ्कु (कीकटसे दक्षिण और महानदीसे उत्तरका भाग), बर्बर (भारतकी पश्चिम सीमापरका प्रदेश), द्राव, वीत, द्रविड और कोंकण आदि देशोंके निवासी तथा संन्यासी—इन सभीका विशेषरूपसे श्राद्धकार्यमें परित्याग कर देना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके एक या दो दिन पहले ही श्राद्धकर्ता विनीतभावसे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे; क्योंकि पितृलोग आकर उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके निकट उपस्थित होते हैं। वे वायुरूप होकर उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलते हैं तथा उनके बैठ जानेपर पितर भी उन्हींके समीप बैठ जाते हैं॥ १४-१८॥ |
| दक्षिणं जानुमालभ्य त्वं मया तु निमन्त्रितः।<br>एवं निमन्त्र्य नियमं श्रावयेत् पितृबान्धवान्॥ १९<br><br>अक्रोधनैः शौचपरैः सततं ब्रह्मचारिभिः।<br>भवितव्यं भवद्भिश्च मया च श्राद्धकारिणा॥ २०<br><br>पितृयज्ञं विनिर्वर्त्य तर्पणाख्यं तु योऽग्निमान्।<br>पिण्डान्वाहार्यकं कुर्याच्छ्राद्धमिन्दुक्षये सदा॥ २१<br><br>गोमयेनोपलिप्ते तु दक्षिणप्रवणे स्थले।<br>श्राद्धं समाचरेद् भक्त्या गोष्ठे वा जलसंनिधौ॥ २२<br><br>अग्निमान् निर्वपेत् पित्र्यं चरुं च सममुष्टिभिः।<br>पितृभ्यो निर्वपामीति सर्वं दक्षिणतो न्यसेत्॥ २३<br><br>अभिघार्य ततः कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः।<br>तेऽपि तस्यायताः कार्याश्चतुरङ्गुलविस्तृताः॥ २४<br><br>दर्वीत्रयं तु कुर्वीत खादिरं रजतान्वितम्।<br>रत्निमात्रं परिश्लक्ष्णं हस्ताकाराग्रमुत्तमम्॥ २५ | उस समय श्राद्धकर्ता ब्राह्मणके दाहिने घुटनेको स्पर्शकर (उससे) इस प्रकार प्रार्थना करे—‘मैं आपको निमन्त्रित कर रहा हूँ।’ इस प्रकार निमन्त्रण देकर अपने पिताके भाई-बन्धुओंको श्राद्ध-नियम बतलाते हुए यों कहे—‘(मैं अमुक दिन पितृ-श्राद्ध करूँगा, अतः उस दिन) आपलोगोंको निरन्तर क्रोधरहित, शौचाचारपरायण तथा ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित रहना चाहिये। मुझ श्राद्धकर्ताद्वारा भी इन नियमोंका पालन किया जायगा।’ इस प्रकार पितृ-यज्ञसे निवृत्त होकर तर्पण-कर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ताको ‘पिण्डान्वाहार्यक’ नामक श्राद्ध सदा अमावास्या तिथिमें करना चाहिये। गोशालामें या किसी जलाशयके निकट दक्षिण दिशाकी ओर ढालू स्थानको गोबरसे लीपकर वहीं भक्तिपूर्वक श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ता पितरोंके निमित्त बनी हुई चरुको समसंख्यक (२, ४, ६) मुष्टियोंद्वारा ‘मैं पितरोंको चरु प्रदान कर रहा हूँ’—यों कहकर पितरोंको चरु प्रदान करे और शेष सबको अपनी दाहिनी ओर रख ले। तत्पश्चात् अग्निमें घीकी धारा छोड़कर चरुको तीन भागोंमें विभक्त करके आगेकी ओर रखे। उन भागोंको भी चार अङ्गुलके विस्तारका लम्बा बना देना चाहिये। पुनः तीन दर्वी (करछुलें, जिनसे हवनीय पदार्थ अग्निमें छोड़े जाते हैं) रखनी चाहिये, जो खैर या चाँदीमिश्रित अन्य धातुकी बनी हों, जिनका परिमाण मुट्ठी बँधे हुए हाथके बराबर हो, जो अत्यन्त चिकनी, उत्तम एवं हथेलीकी-सी बनी हुई सुडौल हों। |
* बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए जो छोटा भाई अपना विवाह कर लेता है, उसे 'परिवित्ति' कहा जाता है।