मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६४ * मत्स्यपुराण *
| कस्मिन दतं कथं याति श्राद्धं तु मधुसूदन।<br>विधिना केन कर्तव्यं कथं प्रीणाति तत् पितॄन्॥ ३ | कैसे पात्रको श्राद्धीय वस्तु प्रदान करनी चाहिये? तथा उसका फल पितरोंको कैसे प्राप्त होता है? श्राद्ध किस विधिसे करना उपयुक्त है? तथा वह श्राद्ध किस प्रकार पितरोंको प्रसन्न करता है? (ये सारी बातें मुझे बतलानेकी कृपा करें) ॥ १–३॥ |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।<br>पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥ ४<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते।<br>नित्यं तावत् प्रवक्ष्यामि अर्घ्यावाहनवर्जितम्॥ ५<br><br>अदैवं तद् विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम्।<br>पार्वणं त्रिविधं प्रोक्तं शृणु तावन्महीपते॥ ६<br><br>पार्वणे ये नियोज्यास्तु ताञ्शृणुष्व नराधिप।<br>पञ्चाग्निः स्नातकश्चैव त्रिसुपर्णः षडङ्गवित्॥ ७<br><br>श्रोत्रियः श्रोत्रियसुतो विधिवाक्यविशारदः।<br>सर्वज्ञो वेदविन्मन्त्री ज्ञातवंशः कुलान्वितः॥ ८<br><br>पुराणवेत्ता धर्मज्ञः स्वाध्यायजपतत्परः।<br>शिवभक्तः पितृपरः सूर्यभक्तोऽथ वैष्णवः॥ ९<br><br>ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान्।<br>भोजयेच्चापि दौहित्रं यत्नतः स्वसुहृद् गुरून्॥ १०<br><br>विट्पतिं मातुलं बन्धुमृत्विगाचार्यसोमपान्।<br>यश्च व्याकुरुते वाक्यं यश्च मीमांसतेऽध्वरम्॥ ११<br><br>सामस्वरविधिज्ञश्च पङ्क्तिपावनपावनः।<br>सामगो ब्रह्मचारी च वेदयुक्तोऽथ ब्रह्मवित्॥ १२<br><br>यत्र ते भुञ्जते श्राद्धे तदेव परमार्थवत्।<br>एते भोज्याः प्रयत्नेन वर्जनीयान् निबोध मे॥ १३ | मत्स्यभगवान् कहने लगे— राजर्षे! प्रतिदिन पितरोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए अन्न आदिसे या केवल जलसे अथवा दूध या फल-मूलसे भी श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक और काम्यरूपसे तीन प्रकारका बतलाया गया है। इनमें मैं पहले नित्यश्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, जो अर्घ्य और आवाहनसे रहित होता है। इसे 'अदैव' मानना चाहिये। पर्वोंपर सम्पन्न होनेवाले (त्रिपुरुष) श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। महीपते! यह पार्वण श्राद्ध तीन प्रकारका बतलाया जाता है, उन्हें सुनो। नरेश्वर! पार्वण श्राद्धमें जिन्हें नियुक्त करना चाहिये, उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो पञ्चाग्नि विद्याका ज्ञाता अथवा गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका उपासक, स्नातक, त्रिसुपर्ण (ऋग्वेदके एक अंशका अध्येता<sup>१</sup>), वेदके छहों अङ्गोंका ज्ञाता, श्रोत्रिय, श्रोत्रियका पुत्र, धर्मशास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, सर्वज्ञ, वेदवेत्ता, उचित मन्त्रणा करनेवाला, जाने हुए वंशमें उत्पन्न, कुलीन, पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, स्वाध्याय एवं जपमें तत्पर रहनेवाला, शिवभक्त, पितृपरायण, सूर्यभक्त, वैष्णव, ब्राह्मणभक्त, योगवेत्ता, शान्त, आत्माको वशीभूत कर लेनेवाला एवं शीलवान् हो (ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करना चाहिये)। (अब इस पुनीत श्राद्धमें जिन्हें भोजन कराना चाहिये, उनके विषयमें बतला रहा हूँ, सुनो।) पुत्रीका पुत्र (नाती), अपना मित्र, गुरु (अथवा गुरुजन), कुलपति (आचार्य), मामा, भाई-बन्धु, ऋत्विक्, आचार्य (विद्यागुरु) और सोमपायी—इन्हें प्रयत्नपूर्वक बुलाकर श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। साथ ही जो विधि-वाक्योंके व्याख्याता, यज्ञके मीमांसक, सामवेदके स्वर और (उसके उच्चारणकी) विधिके ज्ञाता, पङ्क्तिपावनोंमें<sup>२</sup> भी परम पवित्र, सामवेदके पारगामी विद्वान्, ब्रह्मचारी, वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हैं—ये सभी श्राद्धमें चेष्टापूर्वक भोजन कराने योग्य हैं। ऐसे ब्राह्मण जिस श्राद्धमें भोजन करते हैं, वही श्राद्ध परमार्थसम्पन्न माना जाता है। अब जो ब्राह्मण श्राद्धमें वर्जित हैं, उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनो। |
१. ऋग्वेद १०।११४ की ३–५ ऋचाएँ 'त्रिसुपर्ण' संज्ञक हैं। उसके विशेषज्ञको भी 'त्रिसुपर्ण' कहा जाता है। वहाँ वही इष्ट है।
२. विद्या, तप आदिसे विशिष्ट ब्राह्मण, जिससे श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी पङ्क्ति पवित्र हो जाती है।