भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 72
६२* मत्स्यपुराण *

| एकाष्टकाभवत् पश्चाद् ब्रह्मलोके गता सती।<br>त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु वदाम्यतः॥ २४<br><br>लोकास्तु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थिताः।<br>येषां तु मानसी कन्या नर्मदानामविश्रुता॥ २५<br><br>सोमपा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति शाश्वताः।<br>धर्ममूर्तिधराः सर्वे परतो ब्रह्मणः स्मृताः॥ २६<br><br>उत्पन्नाः स्वधया ते तु ब्रह्मत्वं प्राप्य योगिनः।<br>कृत्वा सृष्ट्यादिकं सर्वं मानसे साम्प्रतं स्थिताः॥ २७<br><br>नर्मदा नाम तेषां तु कन्या तोयवहा सरित्।<br>भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी॥ २८<br><br>तेभ्यः सर्वे तु मनवः प्रजाः सर्गेषु निर्मिताः।<br>ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वन्ति धर्माभावेऽपि सर्वदा॥ २९<br><br>तेभ्य एव पुनः प्राप्तुं प्रसादाद् योगसंततिम्।<br>पितॄणामादिसर्गे तु श्राद्धमेव विनिर्मितम्॥ ३० | बादमें वह पतिपरायणा विरजा ब्रह्मलोकको चली गयी और वहाँ एकाष्टका नामसे प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार मैंने तीन पितृगणोंका वर्णन कर दिया। अब इसके बाद चौथे गणका वर्णन कर रहा हूँ। ब्रह्माण्डके ऊपर मानस नामक लोक विद्यमान हैं, उनमें अविनाशी 'सोमप' नामक पितर निवास करते हैं (ये ब्राह्मणोंके पितर हैं)। उनकी मानसी कन्या नर्मदा-नामसे प्रसिद्ध है। वे सभी पितर धर्मकी-सी मूर्ति धारण करनेवाले तथा ब्रह्मासे भी परे बतलाये गये हैं। स्वधासे उनकी उत्पत्ति हुई है। वे सभी योगाभ्यासी पितर ब्रह्मत्वको प्राप्त करके सृष्टि आदि समस्त कार्योंसे निवृत्त हो इस समय मानस लोकमें विद्यमान हैं। उनकी वह नर्मदा नाम्नी कन्या (भारतके) दक्षिणापथमें आकर जल प्रवाहित करनेवाली नदी हुई है, जो समस्त प्राणियोंको पवित्र कर रही है। इन्हीं पितरोंकी परम्परासे मनुगण (अपने-अपने कार्यकालमें) सृष्टिके प्रारम्भमें प्रजाओंका निर्माण करते हैं। इस रहस्यको जानकर लोग धर्मका अभाव हो जानेपर भी सर्वदा श्राद्ध करते रहते हैं। इन्हीं पितरोंकी कृपासे पुनः इन्हींके द्वारा योग-परम्पराको प्राप्त करनेके लिये सृष्टिके प्रारम्भमें पितरोंके लिये श्राद्धका ही निर्माण किया गया था॥ १६-३०॥ | | सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम्।<br>दत्तं स्वधा पुरोधाय पितॄन् प्रीणाति सर्वदा॥ ३१<br><br>अग्नीषोममयानां तु कार्यमाप्यायनं बुधैः।<br>अग्न्यभावेऽपि विप्रस्य पाणावपि जलेऽथवा॥ ३२<br><br>अजाकर्णेऽश्वकर्णे वा गोष्ठे वा सलिलान्तिके।<br>पितॄणामम्बरं स्थानं दक्षिणा दिक् प्रशस्यते॥ ३३<br><br>प्राचीनावीतमुदकं तिलाः सव्याङ्गमेव च।<br>दर्भा मांसं च पाठीनं गोक्षीरं मधुरा रसाः॥ ३४<br><br>खड्गलोहामिषमधुकुशश्यामाकशालयः ।<br>यवनीवारमुद्गेक्षुशुक्लपुष्पघृतानि च॥ ३५<br><br>वल्लभानि प्रशस्तानि पितॄणामिह सर्वदा।<br>द्वेष्याणि सम्प्रवक्ष्यामि श्राद्धे वर्ज्यानि यानि तु॥ ३६ | इन सभी पितरोंके निमित्त चाँदीका अथवा चाँदीमिश्रित अन्य धातुका भी पात्र आदि स्वधाका उच्चारण करके (ब्राह्मणको) दान कर दिया जाय तो वह सर्वदा पितरोंको प्रसन्न करता है। विद्वान् (श्राद्धकर्ता)-को चाहिये कि (श्राद्धकालमें प्रथमतः) अग्नि, सोम और यमका तर्पण करके उन्हें तृप्त करे (और पितरोंके उद्देश्यसे दिया गया अन्न आदि अग्निमें छोड़ दे)। अग्निके अभावमें ब्राह्मणके हाथपर, जलमें, अजाकर्णपर, अश्वकर्णपर, गोशालामें अथवा जलके निकट डाल दे। पितरोंका स्थान आकाश बतलाया जाता है। उनके लिये दक्षिण दिशा विशेषरूपसे प्रशस्त मानी गयी है। प्राचीनावीत (अपसव्य) होकर दिया गया जल, तिल, सव्याङ्ग (शरीरका दाहिना भाग), डाभ, फलका गूदा, गो-दुग्ध, मधुर रस, खड्ग, लोह, मधु, कुश, साँवाँ, अगहनीका चावल, यव, तिन्नीका चावल, मूँग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत-ये पदार्थ पितरोंके लिये सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कहे गये हैं। अब जो श्राद्धकार्यमें वर्जित तथा पितरोंके लिये अप्रिय हैं, उन पदार्थोंका वर्णन कर रहा हूँ- |

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