भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71
* अध्याय १५ *६१

| महात्मानो महाभागा गमिष्यन्ति परं पदम्।<br>तानुत्पाद्य पुनर्योगात् सवरा मोक्षमेष्यसि॥ ११<br>सुमूर्तिमन्तः पितरो वसिष्ठस्य सुताः स्मृताः।<br>नाम्ना तु मानसाः सर्वे सर्वे ते धर्ममूर्तयः॥ १२<br>ज्योतिर्भांसिषु लोकेषु ये वसन्ति दिवः परम्।<br>विराजमानाः क्रीडन्ति यत्र ते श्राद्धदायिनः॥ १३<br>सर्वकामसमृद्धेषु विमानेष्वपि पादजाः।<br>किं पुनः श्राद्धदा विप्रा भक्तिमन्तः क्रियान्विताः॥ १४<br>गौर्नाम कन्या येषां तु मानसी दिवि राजते।<br>शुक्रस्य दयिता पत्नी साध्यानां कीर्तिवर्धिनी॥ १५<br><br>मरीचिगर्भा नाम्ना तु लोका मार्तण्डमण्डले।<br>पितरो यत्र तिष्ठन्ति हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः॥ १६<br>तीर्थश्राद्धप्रदा यान्ति ये च क्षत्रियसत्तमाः।<br>राज्ञां तु पितरस्ते वै स्वर्गमोक्षफलप्रदाः॥ १७<br>एतेषां मानसी कन्या यशोदा लोकविश्रुता।<br>पत्नी ह्यंशुमतः श्रेष्ठा स्नुषा पञ्चजनस्य च॥ १८<br>जनन्यथ दिलीपस्य भगीरथपितामही।<br>लोकाः कामदुघा नाम कामभोगफलप्रदाः॥ १९<br>सुस्वधा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति सुव्रताः।<br>आज्यपा नाम लोकेषु कर्दमस्य प्रजापतेः॥ २०<br>पुलहाङ्गजदायादा वैश्यास्तान् भावयन्ति च।<br>यत्र श्राद्धकृतः सर्वे पश्यन्ति युगपद्गताः॥ २१<br>मातृभ्रातृपितृस्वसृसखिसम्बन्धिबान्धवान् ।<br>अपि जन्मायुतैर्दृष्टाननुभूतान् सहस्रशः॥ २२<br>एतेषां मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता।<br>या पत्नी नहुषस्यासीद् ययातेर्जननी तथा॥ २३ | जो महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली होंगे और अन्तमें परमपदको प्राप्त करेंगे। उन पुत्रोंको पैदा करनेके पश्चात् तुम पुनः अपने योगबलसे वर प्राप्त करोगी और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लोगी।<sup></sup> महर्षि वसिष्ठके पुत्ररूप (सुकाली नामक) पितर, जो सब-के-सब मानस नामसे विख्यात हैं, अत्यन्त सुन्दर स्वरूपवाले तथा धर्मकी मूर्ति हैं। वे सभी स्वर्गलोकसे परे ज्योतिर्भांसी लोकोंमें निवास करते हैं। जहाँ श्राद्धकर्ता शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंमें विराजमान होकर क्रीड़ा करते रहते हैं, वहाँ क्रियानिष्ठ एवं भक्तिमान् श्राद्धदाता ब्राह्मणोंकी तो बात ही क्या है। इन पितरोंकी 'गौ' नामकी मानसी कन्या स्वर्गलोकमें विराजमान है, जो शुक्रकी प्रिय पत्नी और साध्योंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाली है॥ १—१५॥<br><br>इसी प्रकार सूर्यमण्डलमें मरीचिगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य लोक भी हैं, जहाँ अङ्गिराके पुत्र हविष्मान् नामक पितरके रूपमें निवास करते हैं। ये राजाओं (क्षत्रियों)-के पितर हैं, जो स्वर्ग एवं मोक्षरूप फलके प्रदाता हैं। जो श्रेष्ठ क्षत्रिय तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करते हैं, वे इन लोकोंमें जाते हैं। इन पितरोंकी एक यशोदा नामकी लोक-प्रसिद्ध मानसी कन्या थी, जो पञ्चजनकी श्रेष्ठ पुत्रवधू, अंशुमान्‌की पत्नी, (महाराज) दिलीपकी माता और भगीरथकी पितामही थी।<sup></sup> अभीष्ट कामनाओं एवं भोगोंका फल प्रदान करनेवाले कामदुघ नामक अन्य पितृलोक भी हैं, जहाँ उत्तम व्रतपरायण सुस्वधा नामवाले पितर निवास करते हैं। वे ही पितर प्रजापति कर्दमके लोकोंमें आज्यप नामसे प्रख्यात हैं। महर्षि पुलहके अङ्गसे उत्पन्न हुए वैश्यगण उनकी भावना (पूजा) करते हैं। श्राद्धकर्ता सभी वैश्यगण इन लोकोंमें पहुँचकर दस हजार जन्मान्तरोंमें देखे और अनुभव किये हुए भी अपने हजारों माता, भाई, पिता, बहन, मित्र, सम्बन्धी और बान्धवोंको एक साथ देखते हैं। इन पितरोंकी मानसी कन्या विरजा नामसे विख्यात थी, जो राजा नहुषकी पत्नी और ययातिकी माता थी। |


१. शुकदेवजीका यह वृत्त ठीक इसी प्रकार वायुपुराण ७३। २६-३१; ७०। ८५-८६; पद्मपुराण १। ९। ३०-४०; हरिवंश० १। १८। ५०-५३ आदिमें भी प्राप्त होता है। पर मत्स्यपुराणमें 'कृत्वी'का 'गौ' नाम देखकर शङ्का होती है; क्योंकि १५वें श्लोकमें तुरंत 'गौ'को शुकदेवकी दूसरी पत्नी कहा है। पर शङ्का ठीक नहीं; क्योंकि एक ही नाम कइयोंके होते हैं। पुराणोंमें वायुपुराण अध्याय ९। ३, १४ आदिमें 'यति' राजाकी स्त्री तथा वाल्मीकिरामायण ७। ६०। महाभारत आदिमें पुलस्त्य-पत्नीका भी नाम 'गौ' आता है।
२. यह विवरण वायुपुराण ७२, ब्रह्माण्ड० ३। १०, हरिवंश० १। ६, ब्रह्मपुराण ३४, पद्म० १। ९, लिङ्गपुराण १। ६ में भी है। यहाँ सूर्यवंशी दिलीप प्रथम इष्ट हैं। पुराणानुसार सूर्यवंशमें दो दिलीप हुए हैं। एकके पुत्र थे भगीरथ और दूसरेके रघुवंशप्रसिद्ध रघु हुए हैं।