मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * अध्याय १५ * | ६१ |
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| महात्मानो महाभागा गमिष्यन्ति परं पदम्।<br>तानुत्पाद्य पुनर्योगात् सवरा मोक्षमेष्यसि॥ ११<br>सुमूर्तिमन्तः पितरो वसिष्ठस्य सुताः स्मृताः।<br>नाम्ना तु मानसाः सर्वे सर्वे ते धर्ममूर्तयः॥ १२<br>ज्योतिर्भांसिषु लोकेषु ये वसन्ति दिवः परम्।<br>विराजमानाः क्रीडन्ति यत्र ते श्राद्धदायिनः॥ १३<br>सर्वकामसमृद्धेषु विमानेष्वपि पादजाः।<br>किं पुनः श्राद्धदा विप्रा भक्तिमन्तः क्रियान्विताः॥ १४<br>गौर्नाम कन्या येषां तु मानसी दिवि राजते।<br>शुक्रस्य दयिता पत्नी साध्यानां कीर्तिवर्धिनी॥ १५<br><br>मरीचिगर्भा नाम्ना तु लोका मार्तण्डमण्डले।<br>पितरो यत्र तिष्ठन्ति हविष्मन्तोऽङ्गिरःसुताः॥ १६<br>तीर्थश्राद्धप्रदा यान्ति ये च क्षत्रियसत्तमाः।<br>राज्ञां तु पितरस्ते वै स्वर्गमोक्षफलप्रदाः॥ १७<br>एतेषां मानसी कन्या यशोदा लोकविश्रुता।<br>पत्नी ह्यंशुमतः श्रेष्ठा स्नुषा पञ्चजनस्य च॥ १८<br>जनन्यथ दिलीपस्य भगीरथपितामही।<br>लोकाः कामदुघा नाम कामभोगफलप्रदाः॥ १९<br>सुस्वधा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति सुव्रताः।<br>आज्यपा नाम लोकेषु कर्दमस्य प्रजापतेः॥ २०<br>पुलहाङ्गजदायादा वैश्यास्तान् भावयन्ति च।<br>यत्र श्राद्धकृतः सर्वे पश्यन्ति युगपद्गताः॥ २१<br>मातृभ्रातृपितृस्वसृसखिसम्बन्धिबान्धवान् ।<br>अपि जन्मायुतैर्दृष्टाननुभूतान् सहस्रशः॥ २२<br>एतेषां मानसी कन्या विरजा नाम विश्रुता।<br>या पत्नी नहुषस्यासीद् ययातेर्जननी तथा॥ २३ | जो महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं महान् भाग्यशाली होंगे और अन्तमें परमपदको प्राप्त करेंगे। उन पुत्रोंको पैदा करनेके पश्चात् तुम पुनः अपने योगबलसे वर प्राप्त करोगी और अन्तमें मोक्ष प्राप्त कर लोगी।<sup>१</sup> महर्षि वसिष्ठके पुत्ररूप (सुकाली नामक) पितर, जो सब-के-सब मानस नामसे विख्यात हैं, अत्यन्त सुन्दर स्वरूपवाले तथा धर्मकी मूर्ति हैं। वे सभी स्वर्गलोकसे परे ज्योतिर्भांसी लोकोंमें निवास करते हैं। जहाँ श्राद्धकर्ता शूद्र भी सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले विमानोंमें विराजमान होकर क्रीड़ा करते रहते हैं, वहाँ क्रियानिष्ठ एवं भक्तिमान् श्राद्धदाता ब्राह्मणोंकी तो बात ही क्या है। इन पितरोंकी 'गौ' नामकी मानसी कन्या स्वर्गलोकमें विराजमान है, जो शुक्रकी प्रिय पत्नी और साध्योंकी कीर्तिका विस्तार करनेवाली है॥ १—१५॥<br><br>इसी प्रकार सूर्यमण्डलमें मरीचिगर्भ नामसे प्रसिद्ध अन्य लोक भी हैं, जहाँ अङ्गिराके पुत्र हविष्मान् नामक पितरके रूपमें निवास करते हैं। ये राजाओं (क्षत्रियों)-के पितर हैं, जो स्वर्ग एवं मोक्षरूप फलके प्रदाता हैं। जो श्रेष्ठ क्षत्रिय तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करते हैं, वे इन लोकोंमें जाते हैं। इन पितरोंकी एक यशोदा नामकी लोक-प्रसिद्ध मानसी कन्या थी, जो पञ्चजनकी श्रेष्ठ पुत्रवधू, अंशुमान्की पत्नी, (महाराज) दिलीपकी माता और भगीरथकी पितामही थी।<sup>२</sup> अभीष्ट कामनाओं एवं भोगोंका फल प्रदान करनेवाले कामदुघ नामक अन्य पितृलोक भी हैं, जहाँ उत्तम व्रतपरायण सुस्वधा नामवाले पितर निवास करते हैं। वे ही पितर प्रजापति कर्दमके लोकोंमें आज्यप नामसे प्रख्यात हैं। महर्षि पुलहके अङ्गसे उत्पन्न हुए वैश्यगण उनकी भावना (पूजा) करते हैं। श्राद्धकर्ता सभी वैश्यगण इन लोकोंमें पहुँचकर दस हजार जन्मान्तरोंमें देखे और अनुभव किये हुए भी अपने हजारों माता, भाई, पिता, बहन, मित्र, सम्बन्धी और बान्धवोंको एक साथ देखते हैं। इन पितरोंकी मानसी कन्या विरजा नामसे विख्यात थी, जो राजा नहुषकी पत्नी और ययातिकी माता थी। |
१. शुकदेवजीका यह वृत्त ठीक इसी प्रकार वायुपुराण ७३। २६-३१; ७०। ८५-८६; पद्मपुराण १। ९। ३०-४०; हरिवंश० १। १८। ५०-५३ आदिमें भी प्राप्त होता है। पर मत्स्यपुराणमें 'कृत्वी'का 'गौ' नाम देखकर शङ्का होती है; क्योंकि १५वें श्लोकमें तुरंत 'गौ'को शुकदेवकी दूसरी पत्नी कहा है। पर शङ्का ठीक नहीं; क्योंकि एक ही नाम कइयोंके होते हैं। पुराणोंमें वायुपुराण अध्याय ९। ३, १४ आदिमें 'यति' राजाकी स्त्री तथा वाल्मीकिरामायण ७। ६०। महाभारत आदिमें पुलस्त्य-पत्नीका भी नाम 'गौ' आता है।
२. यह विवरण वायुपुराण ७२, ब्रह्माण्ड० ३। १०, हरिवंश० १। ६, ब्रह्मपुराण ३४, पद्म० १। ९, लिङ्गपुराण १। ६ में भी है। यहाँ सूर्यवंशी दिलीप प्रथम इष्ट हैं। पुराणानुसार सूर्यवंशमें दो दिलीप हुए हैं। एकके पुत्र थे भगीरथ और दूसरेके रघुवंशप्रसिद्ध रघु हुए हैं।
| ६२ | * मत्स्यपुराण * |
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| एकाष्टकाभवत् पश्चाद् ब्रह्मलोके गता सती।<br>त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु वदाम्यतः॥ २४<br><br>लोकास्तु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपरि संस्थिताः।<br>येषां तु मानसी कन्या नर्मदानामविश्रुता॥ २५<br><br>सोमपा नाम पितरो यत्र तिष्ठन्ति शाश्वताः।<br>धर्ममूर्तिधराः सर्वे परतो ब्रह्मणः स्मृताः॥ २६<br><br>उत्पन्नाः स्वधया ते तु ब्रह्मत्वं प्राप्य योगिनः।<br>कृत्वा सृष्ट्यादिकं सर्वं मानसे साम्प्रतं स्थिताः॥ २७<br><br>नर्मदा नाम तेषां तु कन्या तोयवहा सरित्।<br>भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी॥ २८<br><br>तेभ्यः सर्वे तु मनवः प्रजाः सर्गेषु निर्मिताः।<br>ज्ञात्वा श्राद्धानि कुर्वन्ति धर्माभावेऽपि सर्वदा॥ २९<br><br>तेभ्य एव पुनः प्राप्तुं प्रसादाद् योगसंततिम्।<br>पितॄणामादिसर्गे तु श्राद्धमेव विनिर्मितम्॥ ३० | बादमें वह पतिपरायणा विरजा ब्रह्मलोकको चली गयी और वहाँ एकाष्टका नामसे प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार मैंने तीन पितृगणोंका वर्णन कर दिया। अब इसके बाद चौथे गणका वर्णन कर रहा हूँ। ब्रह्माण्डके ऊपर मानस नामक लोक विद्यमान हैं, उनमें अविनाशी 'सोमप' नामक पितर निवास करते हैं (ये ब्राह्मणोंके पितर हैं)। उनकी मानसी कन्या नर्मदा-नामसे प्रसिद्ध है। वे सभी पितर धर्मकी-सी मूर्ति धारण करनेवाले तथा ब्रह्मासे भी परे बतलाये गये हैं। स्वधासे उनकी उत्पत्ति हुई है। वे सभी योगाभ्यासी पितर ब्रह्मत्वको प्राप्त करके सृष्टि आदि समस्त कार्योंसे निवृत्त हो इस समय मानस लोकमें विद्यमान हैं। उनकी वह नर्मदा नाम्नी कन्या (भारतके) दक्षिणापथमें आकर जल प्रवाहित करनेवाली नदी हुई है, जो समस्त प्राणियोंको पवित्र कर रही है। इन्हीं पितरोंकी परम्परासे मनुगण (अपने-अपने कार्यकालमें) सृष्टिके प्रारम्भमें प्रजाओंका निर्माण करते हैं। इस रहस्यको जानकर लोग धर्मका अभाव हो जानेपर भी सर्वदा श्राद्ध करते रहते हैं। इन्हीं पितरोंकी कृपासे पुनः इन्हींके द्वारा योग-परम्पराको प्राप्त करनेके लिये सृष्टिके प्रारम्भमें पितरोंके लिये श्राद्धका ही निर्माण किया गया था॥ १६-३०॥ | | सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम्।<br>दत्तं स्वधा पुरोधाय पितॄन् प्रीणाति सर्वदा॥ ३१<br><br>अग्नीषोममयानां तु कार्यमाप्यायनं बुधैः।<br>अग्न्यभावेऽपि विप्रस्य पाणावपि जलेऽथवा॥ ३२<br><br>अजाकर्णेऽश्वकर्णे वा गोष्ठे वा सलिलान्तिके।<br>पितॄणामम्बरं स्थानं दक्षिणा दिक् प्रशस्यते॥ ३३<br><br>प्राचीनावीतमुदकं तिलाः सव्याङ्गमेव च।<br>दर्भा मांसं च पाठीनं गोक्षीरं मधुरा रसाः॥ ३४<br><br>खड्गलोहामिषमधुकुशश्यामाकशालयः ।<br>यवनीवारमुद्गेक्षुशुक्लपुष्पघृतानि च॥ ३५<br><br>वल्लभानि प्रशस्तानि पितॄणामिह सर्वदा।<br>द्वेष्याणि सम्प्रवक्ष्यामि श्राद्धे वर्ज्यानि यानि तु॥ ३६ | इन सभी पितरोंके निमित्त चाँदीका अथवा चाँदीमिश्रित अन्य धातुका भी पात्र आदि स्वधाका उच्चारण करके (ब्राह्मणको) दान कर दिया जाय तो वह सर्वदा पितरोंको प्रसन्न करता है। विद्वान् (श्राद्धकर्ता)-को चाहिये कि (श्राद्धकालमें प्रथमतः) अग्नि, सोम और यमका तर्पण करके उन्हें तृप्त करे (और पितरोंके उद्देश्यसे दिया गया अन्न आदि अग्निमें छोड़ दे)। अग्निके अभावमें ब्राह्मणके हाथपर, जलमें, अजाकर्णपर, अश्वकर्णपर, गोशालामें अथवा जलके निकट डाल दे। पितरोंका स्थान आकाश बतलाया जाता है। उनके लिये दक्षिण दिशा विशेषरूपसे प्रशस्त मानी गयी है। प्राचीनावीत (अपसव्य) होकर दिया गया जल, तिल, सव्याङ्ग (शरीरका दाहिना भाग), डाभ, फलका गूदा, गो-दुग्ध, मधुर रस, खड्ग, लोह, मधु, कुश, साँवाँ, अगहनीका चावल, यव, तिन्नीका चावल, मूँग, गन्ना, श्वेत पुष्प और घृत-ये पदार्थ पितरोंके लिये सर्वदा प्रिय और प्रशस्त कहे गये हैं। अब जो श्राद्धकार्यमें वर्जित तथा पितरोंके लिये अप्रिय हैं, उन पदार्थोंका वर्णन कर रहा हूँ- |
| * अध्याय १६ * | ६३ |
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| मसूरशणनिष्पावराजमाषकुसुम्भिकाः ।<br>पद्मबिल्वार्कधत्तूरपारिभद्रारटरूषकाः ॥ ३७<br><br>न देयाः पितृकार्येषु पयश्चाजाविकं तथा।<br>कोद्रवोदारचणकाः कपित्थं मधुकातसी ॥ ३८<br><br>एतान्यपि न देयानि पितृभ्यः प्रियमिच्छता।<br>पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या ते पुनः प्रीणयन्ति तम्॥ ३९<br><br>यच्छन्ति पितरः पुष्टिं स्वर्गारोग्यं प्रजाफलम्।<br>देवकार्यादपि पुनः पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ४०<br><br>देवतानां च पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।<br>शीघ्रप्रसादास्त्वक्रोधा निःशस्त्राः स्थिरसौहृदाः ॥ ४१<br><br>शान्तात्मानः शौचपराः सततं प्रियवादिनः।<br>भक्तानुरक्ताः सुखदाः पितरः पूर्वदेवताः ॥ ४२<br><br>हविष्मतामाधिपत्ये श्राद्धदेवः स्मृतो रविः।<br>एतद् वः सर्वमाख्यातं पितृवंशानुकीर्तनम्।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं कीर्तनीयं सदा नृभिः ॥ ४३ | मसूर, शण (पेटुआका बीज), सेम, काला उड़द, कुसुमका पुष्प, कमल, बेल या बिल्वपत्र, मदार, धतूरा, पारिभद्र (नीम, देवदारुका पुष्प या पत्ता), अडूसेका फूल तथा भेड़ और बकरीका दूध। इन्हें पितृ-कार्योंमें नहीं देना चाहिये। पितरोंसे कल्याणप्राप्तिकी इच्छावाले पुरुषको श्राद्धकार्यमें कोदो, उदार (गुलूके वृक्षका पुष्प अथवा पत्ता), चना, कैथ, महुआ और अलसी (तीसी)—इन पदार्थोंका भी उपयोग नहीं करना चाहिये। जो भक्तिपूर्वक (श्राद्धादिद्वारा) पितरोंको प्रसन्न करता है, उसे पितर भी बदलेमें हर्षित कर देते हैं। वे पितृगण प्रसन्न होकर समृद्धि, स्वर्ग, आरोग्य और संतानरूपी फल प्रदान करते हैं। इसलिये देवकार्यसे भी बढ़कर पितृकार्यकी विशेषता मानी जाती है तथा देवताओंसे पूर्व ही पितरोंके तर्पणकी विधि बतलायी गयी है। ये पितर शीघ्र ही कृपा करनेवाले, क्रोधरहित, शस्त्रविहीन, दृढ़ मैत्रीयुक्त, शान्तात्मा पवित्रतापरायण, सदा प्रियवादी, भक्तोंके प्रति अनुरक्त और सुखदायक (गृहस्थोंके) प्रथम देवता हैं। हविष्यान्नका भक्षण करनेवाले इन पितरोंके अधिनायक-पदपर श्राद्धके देवतारूपमें सूर्य अधिष्ठित माने गये हैं। इस प्रकार यह पितृ-वंशका वर्णन मैंने तुम लोगोंको पूर्णरूपसे बतला दिया। यह पुण्य-प्रदाता, परम पवित्र और आयुकी वृद्धि करनेवाला है, मनुष्योंको सदा इसका पठन-पाठन करना चाहिये ॥ ३१—४३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे पितृवंशानुकीर्तनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितृवंशानुकीर्तन नामक पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १५ ॥
सोलहवाँ अध्याय
श्राद्धोंके विविध भेद, उनके करनेका समय तथा श्राद्धमें निमन्त्रित करनेयोग्य ब्राह्मणके लक्षण
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं— |
|---|---|
| श्रुत्वैतत् सर्वमखिलं मनुः पप्रच्छ केशवम्।<br>श्राद्धे कालं च विविधं श्राद्धभेदं तथैव च ॥ १<br><br>श्राद्धेषु भोजनीया ये ये च वर्ज्या द्विजातयः।<br>कस्मिन् वासरभागे वा पितृभ्यः श्राद्धमाचरेत् ॥ २ | ऋषियो! यह सारा वृत्तान्त पूर्णरूपसे सुनकर मनुने मत्स्यभगवान्से पूछा—'मधुसूदन! श्राद्धके लिये कौन-सा काल उत्तम है? श्राद्धके विभिन्न भेद कौन-से हैं? श्राद्धोंमें कैसे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये? तथा कैसे ब्राह्मण वर्जित हैं? दिनके किस भागमें पितरोंके लिये श्राद्ध करना उचित है? |
६४ * मत्स्यपुराण *
| कस्मिन दतं कथं याति श्राद्धं तु मधुसूदन।<br>विधिना केन कर्तव्यं कथं प्रीणाति तत् पितॄन्॥ ३ | कैसे पात्रको श्राद्धीय वस्तु प्रदान करनी चाहिये? तथा उसका फल पितरोंको कैसे प्राप्त होता है? श्राद्ध किस विधिसे करना उपयुक्त है? तथा वह श्राद्ध किस प्रकार पितरोंको प्रसन्न करता है? (ये सारी बातें मुझे बतलानेकी कृपा करें) ॥ १–३॥ |
|---|---|
| मत्स्य उवाच<br>कुर्यादहरहः श्राद्धमन्नाद्येनोदकेन वा।<br>पयोमूलफलैर्वापि पितृभ्यः प्रीतिमावहन्॥ ४<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं श्राद्धमुच्यते।<br>नित्यं तावत् प्रवक्ष्यामि अर्घ्यावाहनवर्जितम्॥ ५<br><br>अदैवं तद् विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम्।<br>पार्वणं त्रिविधं प्रोक्तं शृणु तावन्महीपते॥ ६<br><br>पार्वणे ये नियोज्यास्तु ताञ्शृणुष्व नराधिप।<br>पञ्चाग्निः स्नातकश्चैव त्रिसुपर्णः षडङ्गवित्॥ ७<br><br>श्रोत्रियः श्रोत्रियसुतो विधिवाक्यविशारदः।<br>सर्वज्ञो वेदविन्मन्त्री ज्ञातवंशः कुलान्वितः॥ ८<br><br>पुराणवेत्ता धर्मज्ञः स्वाध्यायजपतत्परः।<br>शिवभक्तः पितृपरः सूर्यभक्तोऽथ वैष्णवः॥ ९<br><br>ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान्।<br>भोजयेच्चापि दौहित्रं यत्नतः स्वसुहृद् गुरून्॥ १०<br><br>विट्पतिं मातुलं बन्धुमृत्विगाचार्यसोमपान्।<br>यश्च व्याकुरुते वाक्यं यश्च मीमांसतेऽध्वरम्॥ ११<br><br>सामस्वरविधिज्ञश्च पङ्क्तिपावनपावनः।<br>सामगो ब्रह्मचारी च वेदयुक्तोऽथ ब्रह्मवित्॥ १२<br><br>यत्र ते भुञ्जते श्राद्धे तदेव परमार्थवत्।<br>एते भोज्याः प्रयत्नेन वर्जनीयान् निबोध मे॥ १३ | मत्स्यभगवान् कहने लगे— राजर्षे! प्रतिदिन पितरोंके प्रति श्रद्धा रखते हुए अन्न आदिसे या केवल जलसे अथवा दूध या फल-मूलसे भी श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्ध नित्य, नैमित्तिक और काम्यरूपसे तीन प्रकारका बतलाया गया है। इनमें मैं पहले नित्यश्राद्धका वर्णन कर रहा हूँ, जो अर्घ्य और आवाहनसे रहित होता है। इसे 'अदैव' मानना चाहिये। पर्वोंपर सम्पन्न होनेवाले (त्रिपुरुष) श्राद्धको 'पार्वण' कहते हैं। महीपते! यह पार्वण श्राद्ध तीन प्रकारका बतलाया जाता है, उन्हें सुनो। नरेश्वर! पार्वण श्राद्धमें जिन्हें नियुक्त करना चाहिये, उन्हें बतलाता हूँ, सुनो। जो पञ्चाग्नि विद्याका ज्ञाता अथवा गार्हपत्य आदि पाँच अग्नियोंका उपासक, स्नातक, त्रिसुपर्ण (ऋग्वेदके एक अंशका अध्येता<sup>१</sup>), वेदके छहों अङ्गोंका ज्ञाता, श्रोत्रिय, श्रोत्रियका पुत्र, धर्मशास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, सर्वज्ञ, वेदवेत्ता, उचित मन्त्रणा करनेवाला, जाने हुए वंशमें उत्पन्न, कुलीन, पुराणोंका ज्ञाता, धर्मज्ञ, स्वाध्याय एवं जपमें तत्पर रहनेवाला, शिवभक्त, पितृपरायण, सूर्यभक्त, वैष्णव, ब्राह्मणभक्त, योगवेत्ता, शान्त, आत्माको वशीभूत कर लेनेवाला एवं शीलवान् हो (ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धकर्ममें नियुक्त करना चाहिये)। (अब इस पुनीत श्राद्धमें जिन्हें भोजन कराना चाहिये, उनके विषयमें बतला रहा हूँ, सुनो।) पुत्रीका पुत्र (नाती), अपना मित्र, गुरु (अथवा गुरुजन), कुलपति (आचार्य), मामा, भाई-बन्धु, ऋत्विक्, आचार्य (विद्यागुरु) और सोमपायी—इन्हें प्रयत्नपूर्वक बुलाकर श्राद्धमें भोजन कराना चाहिये। साथ ही जो विधि-वाक्योंके व्याख्याता, यज्ञके मीमांसक, सामवेदके स्वर और (उसके उच्चारणकी) विधिके ज्ञाता, पङ्क्तिपावनोंमें<sup>२</sup> भी परम पवित्र, सामवेदके पारगामी विद्वान्, ब्रह्मचारी, वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हैं—ये सभी श्राद्धमें चेष्टापूर्वक भोजन कराने योग्य हैं। ऐसे ब्राह्मण जिस श्राद्धमें भोजन करते हैं, वही श्राद्ध परमार्थसम्पन्न माना जाता है। अब जो ब्राह्मण श्राद्धमें वर्जित हैं, उन्हें मैं बतला रहा हूँ, सुनो। |
१. ऋग्वेद १०।११४ की ३–५ ऋचाएँ 'त्रिसुपर्ण' संज्ञक हैं। उसके विशेषज्ञको भी 'त्रिसुपर्ण' कहा जाता है। वहाँ वही इष्ट है।
२. विद्या, तप आदिसे विशिष्ट ब्राह्मण, जिससे श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंकी पङ्क्ति पवित्र हो जाती है।
| * अध्याय १६ * | ६५ |
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| मूल श्लोक | हिन्दी-अनुवाद |
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| पतितोऽभिशस्तः क्लीबः पिशुनव्यङ्गरोगिणः।<br>कुनखी श्यावदन्तश्च कुण्डगोलाश्र्वपालकाः॥ १४<br><br>परिवित्तिर्नियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मत्तदारुणाः।<br>बैडालो बकवृत्तिश्च दम्भी देवलकादयः॥ १५<br><br>कृतघ्नान् नास्तिकांस्तद्वन्म्लेच्छदेशनिवासिनः।<br>त्रिशङ्कुर्बर्बरद्राववीतद्रविडकोङ्कणान् ॥ १६<br><br>वर्जयेल्लिङ्गिनः सर्वाञ्श्राद्धकाले विशेषतः।<br>पूर्वेद्युरपरेद्युर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १७<br><br>निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान्।<br>वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते॥ १८ | पतित (जो अपने वर्णाश्रम-धर्मसे च्युत हो गया हो), अभिशस्त (कलङ्कित, बदनाम), नपुंसक, चुगलखोर, विकृत अङ्गोंवाला, रोगी, बुरे नखोंवाला, काले दाँतोंसे युक्त, कुण्ड (सधवाका जारज पुत्र), गोलक (विधवाका जारज पुत्र), कुत्तोंका पालक, परिवित्ति*, नौकर अथवा जिसका मन किसी अन्य श्राद्धमें लगा हो, पागल, उन्मादी, क्रूर, बिडाल एवं बगुलेकी तरह चोरीसे जीविकोपार्जन करनेवाला, दम्भी तथा मन्दिरमें देव-पूजा करके वेतनभोगी (पुजारी)—ये सभी श्राद्धभोजमें निषिद्ध माने गये हैं। इसी प्रकार कृतघ्न (किये हुए उपकारको न माननेवाला), नास्तिक (परलोकपर विश्वास न करनेवाला), त्रिशङ्कु (कीकटसे दक्षिण और महानदीसे उत्तरका भाग), बर्बर (भारतकी पश्चिम सीमापरका प्रदेश), द्राव, वीत, द्रविड और कोंकण आदि देशोंके निवासी तथा संन्यासी—इन सभीका विशेषरूपसे श्राद्धकार्यमें परित्याग कर देना चाहिये। श्राद्ध-दिवसके एक या दो दिन पहले ही श्राद्धकर्ता विनीतभावसे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे; क्योंकि पितृलोग आकर उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंके निकट उपस्थित होते हैं। वे वायुरूप होकर उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलते हैं तथा उनके बैठ जानेपर पितर भी उन्हींके समीप बैठ जाते हैं॥ १४-१८॥ |
| दक्षिणं जानुमालभ्य त्वं मया तु निमन्त्रितः।<br>एवं निमन्त्र्य नियमं श्रावयेत् पितृबान्धवान्॥ १९<br><br>अक्रोधनैः शौचपरैः सततं ब्रह्मचारिभिः।<br>भवितव्यं भवद्भिश्च मया च श्राद्धकारिणा॥ २०<br><br>पितृयज्ञं विनिर्वर्त्य तर्पणाख्यं तु योऽग्निमान्।<br>पिण्डान्वाहार्यकं कुर्याच्छ्राद्धमिन्दुक्षये सदा॥ २१<br><br>गोमयेनोपलिप्ते तु दक्षिणप्रवणे स्थले।<br>श्राद्धं समाचरेद् भक्त्या गोष्ठे वा जलसंनिधौ॥ २२<br><br>अग्निमान् निर्वपेत् पित्र्यं चरुं च सममुष्टिभिः।<br>पितृभ्यो निर्वपामीति सर्वं दक्षिणतो न्यसेत्॥ २३<br><br>अभिघार्य ततः कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः।<br>तेऽपि तस्यायताः कार्याश्चतुरङ्गुलविस्तृताः॥ २४<br><br>दर्वीत्रयं तु कुर्वीत खादिरं रजतान्वितम्।<br>रत्निमात्रं परिश्लक्ष्णं हस्ताकाराग्रमुत्तमम्॥ २५ | उस समय श्राद्धकर्ता ब्राह्मणके दाहिने घुटनेको स्पर्शकर (उससे) इस प्रकार प्रार्थना करे—‘मैं आपको निमन्त्रित कर रहा हूँ।’ इस प्रकार निमन्त्रण देकर अपने पिताके भाई-बन्धुओंको श्राद्ध-नियम बतलाते हुए यों कहे—‘(मैं अमुक दिन पितृ-श्राद्ध करूँगा, अतः उस दिन) आपलोगोंको निरन्तर क्रोधरहित, शौचाचारपरायण तथा ब्रह्मचर्य-व्रतमें स्थित रहना चाहिये। मुझ श्राद्धकर्ताद्वारा भी इन नियमोंका पालन किया जायगा।’ इस प्रकार पितृ-यज्ञसे निवृत्त होकर तर्पण-कर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ताको ‘पिण्डान्वाहार्यक’ नामक श्राद्ध सदा अमावास्या तिथिमें करना चाहिये। गोशालामें या किसी जलाशयके निकट दक्षिण दिशाकी ओर ढालू स्थानको गोबरसे लीपकर वहीं भक्तिपूर्वक श्राद्धकर्म करना चाहिये। श्राद्धकर्ता पितरोंके निमित्त बनी हुई चरुको समसंख्यक (२, ४, ६) मुष्टियोंद्वारा ‘मैं पितरोंको चरु प्रदान कर रहा हूँ’—यों कहकर पितरोंको चरु प्रदान करे और शेष सबको अपनी दाहिनी ओर रख ले। तत्पश्चात् अग्निमें घीकी धारा छोड़कर चरुको तीन भागोंमें विभक्त करके आगेकी ओर रखे। उन भागोंको भी चार अङ्गुलके विस्तारका लम्बा बना देना चाहिये। पुनः तीन दर्वी (करछुलें, जिनसे हवनीय पदार्थ अग्निमें छोड़े जाते हैं) रखनी चाहिये, जो खैर या चाँदीमिश्रित अन्य धातुकी बनी हों, जिनका परिमाण मुट्ठी बँधे हुए हाथके बराबर हो, जो अत्यन्त चिकनी, उत्तम एवं हथेलीकी-सी बनी हुई सुडौल हों। |
* बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए जो छोटा भाई अपना विवाह कर लेता है, उसे 'परिवित्ति' कहा जाता है।
१८- एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि
| ६६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| उदपात्रं च कांस्यं च मेक्षणं च समित् कुशान्।<br>तिलाः पात्राणि सद्वासो गन्धधूपानुलेपनम्॥ २६<br><br>आहरेदपसव्यं तु सर्वे दक्षिणतः शनैः।<br>एवमासाद्य तत् सर्वं भवनस्याग्रतो भुवि॥ २७<br><br>गोमयेनोपलिप्तायां गोमूत्रेण तु मण्डलम्।<br>अक्षताभिः सपुष्पाभिस्तदभ्यर्च्य्यापसव्यवत्॥ २८<br><br>विप्राणां क्षालयेत् पादावभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>आसनेषूपक्लृप्तेषु दर्भवत्सु विधानवत्॥ २९<br><br>उपस्पृष्टोदकान् विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत्।<br>द्वौ दैवे पितृकृत्ये त्रीनेकैकमुभयत्र च॥ ३० | इसी प्रकार अपसव्य होकर (जनेऊको बाँयें कंधेसे दाहिने कंधेपर रखकर) पीतलका जलपात्र, मेक्षण (प्रणीतापात्र), समिधा, कुश, तिल, अन्यान्य पात्र, शुद्ध नवीन वस्त्र, गन्ध, धूप, चन्दन आदिको लाकर सबको धीरेसे अपनी दाहिनी ओर रख ले। इस प्रकार सभी आवश्यक सामग्रियोंको एकत्र करके घरके दरवाजेपर गोबरसे लिपी हुई भूमिपर अपसव्य होकर गोमूत्रसे मण्डलकी रचना करे और पुष्पसहित अक्षतोंद्वारा उसकी भी पूजा करे। तत्पश्चात् बारम्बार ब्राह्मणोंका अभिनन्दन करते हुए उनका पाद-प्रक्षालन करे। पुनः उन ब्राह्मणोंको कुशनिर्मित आसनोंपर बैठाकर विधिपूर्वक उन्हें आचमन या जलपान करावे। तदनन्तर उनसे श्राद्धके लिये सम्मति ले॥ १९—२९ १/२॥ |
| भोजयेदीश्वरोऽपीह न कुर्याद् विस्तारं बुधः।<br>दैवपूर्वं नियोज्याथ विप्रानर्घ्यादिना बुधः॥ ३१ | बुद्धिमान् पुरुषको देवकार्यमें दो एवं पितृकार्यमें तीन अथवा दोनों कार्योंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। धन-सम्पत्तिसे सम्पन्न होनेपर भी पार्वण श्राद्धमें विस्तार करना उचित नहीं है। पहले विश्वेदेवको अर्घ्य आदि समर्पित करके तत्पश्चात् ब्राह्मणोंकी अर्घ्य आदि द्वारा पूजा करे। |
| अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो विप्रैर्विप्रो यथाविधि।<br>स्वगृहोक्तविधानेन कांस्ये कृत्वा चरुं ततः॥ ३२ | पुनः श्राद्धकर्ता ब्राह्मणको चाहिये कि वह उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा लेकर चरुको काँसेके बर्तनमें रखकर अपने गृह्योक्तके विधानानुसार विधिपूर्वक अग्निमें हवन करे, |
| अग्नीषोमयमानां तु कुर्यादाप्यायनं बुधः।<br>दक्षिणाग्नौ प्रतीते वा य एकाग्निर्द्विजोत्तमः॥ ३३ | फिर बुद्धिमान् पुरुषको अग्नि, सोम और यमका तर्पण करना चाहिये। इस प्रकार एक अग्निका उपासक यज्ञोपवीतधारी श्रेष्ठ ब्राह्मण 'दक्षिण' नामक अग्निके प्रज्वलित हो जानेपर श्राद्धकर्म सम्पन्न करे। |
| यज्ञोपवीती निर्वर्त्य ततः पर्युक्षणादिकम्।<br>प्राचीनावीतिना कार्यमतः सर्वं विजानता॥ ३४ | तदनन्तर पर्युक्षण आदिसे निवृत्त होकर उपर्युक्त सारी विधियोंको समझ ले और प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर सारा कार्य सम्पन्न करे। |
| षट् च तस्माद्धविःशेषात् पिण्डान् कृत्वा ततोदकम्।<br>दद्यादुदकपात्रैस्तु सतिलं सव्यपाणिना॥ ३५ | फिर उस बचे हुए हविसे छः पिण्ड बनाकर उनपर बायें हाथसे अपने जलपात्रद्वारा तिलसहित जल गिराये |
| जान्वाच्य सव्यं यत्नेन दर्भयुक्तो विमत्सरः।<br>विधाय लेखां यत्नेन निर्वापेष्क्ववनेजनम्॥ ३६ | और ईर्ष्या-द्वेषरहित होकर हाथमें कुश लेकर बायाँ घुटना मोड़कर प्रयत्नपूर्वक (वेदीपर) रेखा बनाये (एवं रेखाओंपर कुश बिछाये।) तथा दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके पिण्ड रखनेके लिये बिछाये गये कुशोंपर अवनेजन (श्राद्ध-वेदीपर बिछे हुए कुशोंपर जल सींचनेका संस्कार) करे। |
| दक्षिणाभिमुखः कुर्यात् करे दर्वीं निधाय वै।<br>निधाय पिण्डमेकैकं सर्वदर्भेष्वनुक्रमात्॥ ३७ | फिर हाथमें करछुल लेकर |
* अध्याय १६ * <div align="right">६७</div>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| निनयेदथ दर्भेषु नामगोत्रानुकीर्तनैः।<br>तेषु दर्भेषु तं हस्तं विमृज्याल्लेपभागिनाम्॥ ३८<br><br>तथैव च ततः कुर्यात् पुनः प्रत्यवनेजनम्।<br>षड्भ्यस्तॄन् नमस्कृत्य गन्धधूपार्हणादिभिः॥ ३९<br><br>एवमावाह्य तत् सर्वं वेदमन्त्रैर्यथोदितैः।<br>एकाग्नेरेक एव स्यान्निर्वापो दर्विका तथा॥ ४०<br><br>ततः कृतान्तरे दद्यात् पत्नीभ्योऽन्नं कुशेषु सः।<br>तद्वत् पिण्डादिके कुर्यादावाहनविसर्जनम्॥ ४१<br><br>ततो गृहीत्वा पिण्डेभ्यो मात्राः सर्वाः क्रमेण तु।<br>तानेव विप्रान् प्रथमं प्राशयेद् यत्नतो नरः॥ ४२ | तथा क्रमशः एक-एक पिण्ड उठाकर पितरोंके गोत्र एवं नामोंका उच्चारण करके उन सभी बिछाये गये कुशोंपर एक-एक करके रख दे और लेपभागी पितरोंकी तृप्तिके लिये उन कुशोंके मूलभागमें अपने उस हाथको पोंछ दे। तत्पश्चात् पुनः पूर्ववत् उन पिण्डोंपर प्रत्यवनेजन जल छोड़े। तदुपरान्त गन्ध, धूप आदि पूजन-सामग्रियोंद्वारा उन छहों पितरोंका पूजन करके उन्हें नमस्कार करे और फिर यथोक्त वेद-मन्त्रोंद्वारा उनका आवाहन करे। एकाग्निक ब्राह्मणके लिये एक ही निर्वाप और एक ही करछुलका विधान है। यह सब सम्पन्न कर लेनेके पश्चात् श्राद्धकर्ता कुशोंपर पितरोंकी पत्नियोंके लिये अन्न प्रदान करे और पिण्डोंपर आवाहन एवं विसर्जन आदि क्रिया पूर्ववत् करे। तत्पश्चात् श्राद्धकर्ता उन सभी पिण्डोंमेंसे थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर उन्हें सर्वप्रथम प्रयत्नपूर्वक उन निमन्त्रित ब्राह्मणोंको खिलावे॥ ३०—४२॥ |
| यस्मादन्नाद्धृता मात्रा भक्षयन्ति द्विजातयः।<br>अन्वाहार्यकमित्युक्तं तस्मात् तच्चन्द्रसंक्षये॥ ४३<br><br>पूर्वं दत्त्वा तु तद्धस्ते सपवित्रं तिलोदकम्।<br>तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन्॥ ४४<br><br>वर्णयन् भोजयेदन्नं मिष्टं पूतं च सर्वदा।<br>वर्जयेत् क्रोधपरतां स्मरन् नारायणं हरिम्॥ ४५ | चूँकि पिण्डान्नसे निकाले गये अंशको अमावास्याके दिन ब्राह्मणलोग खाते हैं, इसीलिये इस श्राद्धको 'अन्वाहार्यक' कहा जाता है। श्राद्धकर्ता पहले पवित्रकसहित तिल और जलको उस ब्राह्मणके हाथमें देकर तत्पश्चात् पिण्डांशको समर्पित करे और 'यह हमारे पितरोंके लिये स्वधा हो' यों कहते हुए भोजन कराये। उस ब्राह्मणको चाहिये कि वह क्रोधका परित्याग करके भगवान् नारायणका स्मरण करते हुए 'यह बहुत मीठा है', 'यह परम पवित्र है'—यों कहते हुए भोजन करे। |
| तृप्ता ज्ञात्वा ततः कुर्याद् विकिरन् सार्ववर्णिकम्।<br>सोदकं चान्नमुद्धृत्य सलिलं प्रक्षिपेद् भुवि॥ ४६<br><br>आचान्तेषु पुनर्दद्याज्जलपुष्पाक्षतोदकम्।<br>स्वस्तिवाचनकं सर्वं पिण्डोपरि समाहरेत्॥ ४७<br><br>देवायत्तं प्रकुर्वीत श्राद्धनाशोऽन्यथा भवेत्।<br>विसृज्य ब्राह्मणांस्तद्वत् तेषां कृत्वा प्रदक्षिणम्॥ ४८ | उन ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर तत्पश्चात् सभी वर्णोंके लिये विकिराकी क्रिया करनी चाहिये। उस समय जलसहित अन्न लेकर पृथ्वीपर जल गिरा दे। पुनः उन ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर जल, पुष्प, अक्षत आदि सभी सामग्री स्वस्तिवाचनपूर्वक पिण्डोंके ऊपर डाल दे। फिर इस श्राद्धफलको भगवान्को अर्पित कर दे, अन्यथा श्राद्ध नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार उन ब्राह्मणोंकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा करे। |
| दक्षिणां दिशमाकाङ्क्षन् पितॄन् याचेत मानवः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च॥ ४९<br><br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोऽस्त्विति।<br>अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि॥ ५० | उस समय श्राद्धकर्ता दक्षिण दिशाकी ओर मुखकरके पितरोंसे अभिलाषापूर्तिके निमित्त याचना करते हुए यों कहे—'पितृगण! हमारे दाताओं, वेदों (वेदज्ञान) और संतानोंकी वृद्धि हो, हमारी श्रद्धा कभी न घटे, देनेके लिये हमारे पास प्रचुर सम्पत्ति हो, हमारे अधिक-से-अधिक अन्न उत्पन्न हों, हमारे घरपर अतिथियोंका जमघट लगा रहे। |
१९- श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण
| ६८ | * मत्स्यपुराण * |
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| याचितारश्च नः सन्तु मा च याचिष्म कञ्चन।<br>एतदस्त्विति तत्प्रोक्तमन्वाहार्यं तु पार्वणम्॥ ५१<br>यथेन्दुसंक्षये तद्वदन्यत्रापि निगद्यते।<br>पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा॥ ५२<br>विप्राग्रतो वा विकिरेद् वयोभिरभिवाशयेत्।<br>पत्नी तु मध्यमं पिण्डं प्राशयेद् विनयान्विता॥ ५३<br>आधत्त पितरो गर्भमत्र संतानवर्धनम्।<br>तावदुच्छेषणं तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः॥ ५४<br>वैश्वदेवं ततः कुर्यान्निवृत्ते पितृकर्मणि।<br>इष्टैः सह ततः शान्तो भुञ्जीत पितृसेवितम्॥ ५५ | हमसे माँगनेवाले बहुत हों, परंतु हम किसीसे याचना न करें।' उस समय ब्राह्मणलोग कहें—'ऐसा ही हो।' इस प्रकार अन्वाहार्यक नामक पार्वण श्राद्ध जिस प्रकार अमावास्या तिथिको बतलाया गया है, उसी प्रकार अन्य तिथियोंमें भी किया जा सकता है। श्राद्ध-समाप्तिके पश्चात् उन पिण्डोंको गौ, बकरी या ब्राह्मणको दे दे अथवा अग्नि या जलमें भी डाल दे अथवा ब्राह्मणके सामने ही पक्षियोंके लिये छींट दे। उनमें मझले पिण्डको (श्राद्धकर्ताकी) पत्नी 'पितृगण मेरे उदरमें संतानकी वृद्धि करनेवाले गर्भकी स्थापना करायें' यों याचना करती हुई विनयपूर्वक स्वयं खा जाय। यह पिण्ड तबतक उच्छिष्ट बना रहता है, जबतक ब्राह्मण विदा नहीं कर दिये जाते। इस प्रकार पितृकर्मके समाप्त हो जानेपर वैश्वदेवका पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् अपने इष्ट-मित्रोंसहित शान्तिपूर्वक उस पितृसेवित अन्नका स्वयं भोजन करना चाहिये॥ ४३—५५॥ | | पुनर्भोजनमध्वानं यानमायासमैथुनम्।<br>श्राद्धकृच्छ्राद्धभुक्चैव सर्वमेतद् विवर्जयेत्॥ ५६<br>स्वाध्यायं कलहं चैव दिवास्वप्नं च सर्वदा।<br>अनेन विधिना श्राद्धं निरुद्गारस्येह निर्वपेत्॥ ५७<br>कन्याकुम्भवृषस्थेऽर्के कृष्णपक्षेषु सर्वदा।<br>यत्र यत्र प्रदातव्यं सपिण्डीकरणात् परम्।<br>तत्रानेन विधानेन देयमग्निम्रता सदा॥ ५८ | श्राद्धकर्ता और श्राद्धभोक्ता—दोनोंको श्राद्धमें भोजन करनेके पश्चात् पुनः भोजन करना, मार्गगमन, सवारीपर चढ़ना, परिश्रमका काम करना, मैथुन, स्वाध्याय, कलह और दिनमें शयन—इन सबका उस दिन परित्याग कर देना चाहिये। इस प्रकार उपर्युक्त विधिसे जमुहाई आदि न लेकर श्राद्ध-कर्म सम्पन्न करना चाहिये। सपिण्डीकरणके पश्चात् कन्या, कुम्भ और वृष राशिपर सूर्यके स्थित रहनेपर कृष्णपक्षमें जहाँ-जहाँ पिण्डदान करे, वहाँ-वहाँ अग्निहोत्री श्राद्धकर्ताको सदा इसी विधिसे पिण्डदान करना चाहिये॥ ५६—५८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽग्रिमच्छ्राद्धे श्राद्धकल्पो नाम षोडशोऽध्यायः॥ १६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अग्रिमच्छ्राद्धविषयक श्राद्धकल्प नामक सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
साधारण एवं आभ्युदयिक श्राद्धकी विधिका विवरण
| सूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि विष्णुना यदुदीरितम्।<br>श्राद्धं साधारणं नाम भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ १<br>अयने विषुवे युग्मे सामान्ये चार्कसंक्रमे।<br>अमावास्याष्टकाकृष्णपक्षे पञ्चदशीषु च॥ २<br>आर्द्रा मघारोहिणीषु द्रव्यब्राह्मणसङ्गमे।<br>गजच्छायाव्यतीपाते विष्टिवैधृतिवासरे॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इसके पश्चात् अब मैं उस साधारण श्राद्धके विषयमें बतला रहा हूँ, जो भोग एवं मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला है तथा जिसका स्वयं भगवान् विष्णुने वर्णन किया है। सूर्यके उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुवयोग (सूर्यके तुला और मेष राशिपर संक्रमण करते समय), कृष्णपक्षकी अष्टका (मार्गशीर्ष, पौष, फाल्गुन कृष्णपक्षकी सप्तमी, अष्टमी, नवमी—इन तीन तिथियोंका समुदाय), अमावास्या और पूर्णिमा तिथियोंमें, आर्द्रा मघा और रोहिणी नक्षत्रोंमें, द्रव्य और ब्राह्मणके मिलनेपर, गजच्छाया, व्यतिपात और वैधृति योगोंमें तथा विष्टि (भद्रा) करणमें पूर्वोक्त साधारण श्राद्ध किया जाता है। |
| * अध्याय १७ * | ६९ |
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| वैशाखस्य तृतीया या नवमी कार्त्तिकस्य च।<br>पञ्चदशी च माघस्य नभस्ये च त्रयोदशी॥ ४<br><br>युगादयः स्मृता ह्येता दत्तस्याक्षयकारिकाः।<br>तथा मन्वन्तरादौ च देयं श्राद्धं विजानता॥ ५ | वैशाखमासकी शुक्लतृतीया (अक्षयतृतीया), कार्तिकमासकी शुक्लनवमी (अक्षयनवमी), माघमासकी पूर्णिमा और भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी—ये युगादि तिथियोंके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनमें किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायक होता है। इसी प्रकार विद्वान् श्राद्धकर्ताको मन्वन्तरोंकी आदि तिथियोंमें भी श्राद्ध-कर्म करना चाहिये॥ १—५॥ |
| अश्वयुक्छुक्लनवमी द्वादशी कार्त्तिके तथा।<br>तृतीया चैत्रमासस्य तथा भाद्रपदस्य च॥ ६<br><br>फाल्गुनस्य ह्यमावास्या पौषस्यैकादशी तथा।<br>आषाढस्यापि दशमी माघमासस्य सप्तमी॥ ७<br><br>श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथाषाढी च पूर्णिमा।<br>कार्त्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठपञ्चदशी सिता।<br>मन्वन्तरादयश्चैता दत्तस्याक्षयकारिकाः॥ ८ | आश्विनमासकी शुक्लनवमी, कार्तिकमासकी शुक्लद्वादशी, चैत्रमासकी शुक्लतृतीया, भाद्रपदमासकी शुक्लतृतीया, फाल्गुनमासकी अमावास्या, पौषमासकी शुक्ल-एकादशी, आषाढ़मासकी शुक्लदशमी, माघमासकी शुक्लसप्तमी, श्रावणमासकी कृष्णाष्टमी, आषाढ़मासकी पूर्णिमा तथा कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठकी पूर्णिमा—ये चौदह तिथियाँ चौदह मन्वन्तरोंकी आदि तिथियाँ हैं; इनमें किया गया श्राद्ध अक्षय फलकारक होता है। |
| यस्यां मन्वन्तरस्यादौ रथमास्ते दिवाकरः।<br>माघमासस्य सप्तम्यां सा तु स्याद् रथसप्तमी॥ ९<br><br>पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं<br>दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः।<br>श्राद्धं कृतं तेन समाः सहस्रं<br>रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति॥ १० | जिस मन्वन्तरकी आदि तिथि माघमासकी शुक्लसप्तमीमें भगवान् सूर्य रथपर आरूढ़ होते हैं, वह सप्तमी रथसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है। इस तिथिमें यदि मनुष्य प्रयत्नपूर्वक अपने पितरोंको तिलमिश्रित जलमात्र प्रदान करता है अर्थात् तर्पण कर लेता है तो वह सहस्रों वर्षोंतक किये गये श्राद्धके समान फलदायक होता है। इसका रहस्य पितृगण स्वयं बतलाते हैं। |
| वैशाख्यामुपरागेषु तथोत्सवमहालये।<br>तीर्थायतनगोष्ठेषु दीपोद्यानगृहेषु च॥ ११<br><br>विविक्तेषूपलिप्तेषु श्राद्धं देयं विजानता।<br>विप्रान् पूर्वे परे चाह्नि विनीतात्मा निमन्त्रयेत्॥ १२<br><br>शीलवृत्तगुणोपेतान् वयोरूपसमन्वितान्।<br>द्वौ दैवे त्रींस्तथा पित्र्ये एकैकमुभयत्र वा॥ १३<br><br>भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे।<br>विश्वान् देवान् यवैः पुष्पैरण्यर्च्य्यासनपूर्वकम्॥ १४<br><br>पूरयेत् पात्रयुग्मं तु स्थाप्य दर्भपवित्रकम्।<br>शंनो देवीत्यपः कुर्याद् यवोऽसीति यवानपि॥ १५ | विद्वान् श्राद्धकर्ताको चाहिये कि वह वैशाखी पूर्णिमामें, सूर्य एवं चन्द्रग्रहणमें, विशेष उत्सवके अवसरपर, पितृपक्षमें,* तीर्थस्थान, देव-मन्दिर एवं गोशालामें, दीपगृह और वाटिकामें एकान्तमें लिपी-पुती हुई भूमिपर श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करे। वह श्राद्धके एक या दो दिन पूर्व ही विनम्रभावसे शीलवान्, सदाचारी, गुणी, रूपवान् एवं अधिक अवस्थावाले ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। देवकार्यमें दो और पितृ-कार्यमें तीन अथवा दोनोंमें एक-एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। अतिशय समृद्धिशाली होनेपर भी विस्तारमें नहीं लगना चाहिये। उस समय विश्वेदेवोंको आसन प्रदान करके यव और पुष्पोंद्वारा उनकी अर्चना करे। फिर दो मिट्टीके पात्र (कोसा) रखकर उनमें कुशनिर्मित पवित्रक डाल दे और ‘शं नो देवीरभीष्टये०’ (वाज० सं० ३६। १२) इस मन्त्रको पढ़कर उन्हें जलसे भर दे और ‘यवोऽसि०’ (नारायणोपनिषद्) यह मन्त्र उच्चारणकर उनमें यव डाल दे। |
* इस प्रकार श्राद्धके ९६ अवसर प्रसिद्ध हैं और ये ही वचन हेमाद्रि आदिके श्राद्धकाण्डों तथा श्राद्धतत्त्व, श्राद्धविवेक, श्राद्धप्रकाश, श्राद्धकल्पलता, पितृदयिता आदि सभी श्राद्ध-निबन्धोंमें प्राप्त होते हैं।
२०- महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा
| ७० | * मत्स्यपुराण * |
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| गन्धपुष्पैश्च सम्पूज्य विश्वेदेवं प्रति न्यसेत्।<br>विश्वेदेवास इत्याभ्यामावाह्य विकिरेद् यवान्॥ १६ | फिर गन्ध, पुष्प आदिसे पूजा करके उन्हें विश्वेदेवोंके उद्देश्यसे (उनके निकट) रख दे। फिर 'विश्वेदेवास०' (शु० यजु० ७। ३४) इत्यादि दो मन्त्रोंद्वारा विश्वेदेवोंका आवाहन करके (वेदीपर) जौ बिखेर दे। तत्पश्चात् गन्ध-पुष्प आदिसे अलंकृत करके 'या दिव्या आपः०' (तै० सं०) इस मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। इस प्रकार उनकी पूजा करके और उनसे निवृत्त होकर पितृ-कार्य आरम्भ करे॥ ६–१७॥ | | गन्धपुष्पैरलङ्कृत्य या दिव्येत्यर्घ्यमुत्सृजेत्।<br>अभ्यर्च्य ताभ्यामुत्सृष्टिं पितृकार्यं समारभेत्॥ १७ | | | दर्भासनं तु दत्त्वादौ त्रीणि पात्राणि पूरयेत्।<br>सपवित्राणि कृत्वादौ शन्नो देवीत्यपः क्षिपेत्॥ १८ | (पितृ-श्राद्धमें) पहले कुशोंका आसन प्रदान करके तीन अर्घ्यपात्रोंको तैयार करना चाहिये। उनमें प्रथमतः कुशनिर्मित पवित्रक डालकर 'शं नो' देवी०' (शु० यजु० ३६। १२)—' इस मन्त्रसे उन्हें जलसे भर दे, पुनः 'तिलोऽसि०'— इस मन्त्रसे उनमें तिल डालकर उन्हें (अमन्त्रक ही) गन्ध, पुष्प आदिसे पूरा कर दे। पितरोंके निमित्त प्रयुक्त किये गये ये पात्र काष्ठके या वृक्षके पत्तेके या जल एवं सागरसे उत्पन्न हुए पत्तेके अथवा सुवर्णमय या रजतमय होने चाहिये। (यदि चाँदीका पात्र देनेकी सामर्थ्य न हो तो) चाँदीके विषयमें कथनोपकथन, दर्शन अथवा दानसे ही कार्य सम्पन्न हो सकता है। पितरोंके निमित्त यदि चाँदीके बने हुए या चाँदीसे मढ़े हुए पात्रोंद्वारा श्रद्धापूर्वक जलमात्र भी प्रदान कर दिया जाय तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। इसी प्रकार पितरोंके लिये अर्घ्य, पिण्ड और भोजनके पात्र भी चाँदीके ही प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि चाँदी शिवजीके नेत्रसे उद्भूत हुई है, इसलिये यह पितरोंको परम प्रिय है; किन्तु देवकार्यमें इसे अशुभ माना गया है, इसलिये देवकार्यमें चाँदीको दूर रखना चाहिये। इस प्रकार यथाशक्ति पात्रोंकी व्यवस्था करके मत्सररहित हो कुश हाथमें लेकर 'या दिव्या०' (तै० स०)—इस मन्त्रद्वारा अपने पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करते हुए (उन अर्घ्यपात्रोंको) रख दे। (फिर ब्राह्मणोंकी ओर देखकर यों कहे कि) 'मैं अपने पितरोंका आवाहन करूँगा।' इसके उत्तरमें ब्राह्मणलोग कहें—'करो'। ऐसा कहे जानेपर 'उशन्तस्वा०'—एवं 'आयान्तु नः०'—इन दोनों ऋचाओं द्वारा पितरोंका आवाहन करे। तत्पश्चात् 'या दिव्या०'— इस मन्त्रसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करके गन्ध, पुष्प आदिसे उनकी पूजा करे। फिर पिण्डदानसे पूर्व उस जलको हाथमें लेकर उसे पितृ-पात्रमें रखकर वेदीके अग्रभागमें उलटकर रख दे और 'पितृभ्यः स्थानमसि'—यह पितरोंके लिये स्थान है'—ऐसा कहकर उसे जलसे सींच दे। इस कार्यमें भी पूर्ववत् सावधानीपूर्वक अग्निकार्य सम्पन्न करे। तदुपरान्त हाथमें कुश लिये हुए प्रशान्तचित्तसे गुणकारी दाल, शाक आदिसे युक्त विविध प्रकारके खाद्य पदार्थोंको अपने दोनों | | तिलोऽसीति तिलान् कुर्याद् गन्धपुष्पादिकं पुनः।<br>पात्रं वनस्पतिमयं तथा पर्णमयं पुनः॥ १९ | | | जलजं वाथ कुर्वीत तथा सागरसम्भवम्।<br>सौवर्णं रजतं वापि पितॄणां पात्रमुच्यते॥ २० | | | रजतस्य कथा वापि दर्शनं दानमेव वा।<br>रजतैर्भाजनैरेषामथवा रजतान्वितैः॥ २१ | | | वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्पते।<br>तथार्घ्यपिण्डभोज्यादौ पितॄणां रजतं मतम्॥ २२ | | | शिवनेत्रोद्भवं यस्मात् तस्मात् पितृवल्लभम्।<br>अमङ्गलं तद् यत्नेन देवकार्येषु वर्जयेत्॥ २३ | | | एवं पात्राणि सङ्कल्प्य यथालाभं विमत्सरः।<br>या दिव्येति पितॄर्नाम गोत्रैर्दर्भकरो न्यसेत्॥ २४ | | | पितॄनावाहयिष्यामि कुर्वित्युक्तस्तु तैः पुनः।<br>उशन्तस्त्वा तथायान्तु ऋग्भ्यामावाहयेत् पितॄन्॥ २५ | | | या दिव्येत्यर्घ्यमुत्सृज्य दद्याद् गन्धादिकांस्ततः।<br>हस्तात् तदुदकं पूर्वं दत्त्वा संस्रवमादितः॥ २६ | | | पितृपात्रे निधायाथ न्युब्जमुत्तरतो न्यसेत्।<br>पितृभ्यः स्थानमसीति निधाय परिषेषयेत्॥ २७ | | | तत्रापि पूर्ववत् कुर्यादग्निकार्यं विमत्सरः।<br>उभाभ्यामपि हस्ताभ्यामाहृत्य परिवेशयेत्॥ २८ | | | प्रशान्तचित्तः सततं दर्भपाणिरशेषतः।<br>गुणाढ्यैः सूपशाकैस्तु नानाभक्ष्यैर्विशेषतः॥ २९ | |
| * अध्याय १७ * | ७१ |
|---|---|
| अन्नं तु सदधिक्षीरं गोघृतं शर्करान्वितम्।<br>मांसं प्रीणाति वै सर्वान् पितृन्नित्याह केशवः॥ ३०<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै॥ ३१<br>षण्मासं छागमांसेन तृप्यन्ति पितरस्तथा।<br>सप्त पार्षतमांसेन तथाष्टावैणजेन तु॥ ३२<br>दश मासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः।<br>शशकूर्मजमांसेन मासानेकादशैव तु॥ ३३<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।<br>रौरवेण च तृप्यन्ति मासान् पञ्चदशैव तु॥ ३४<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।<br>कालशाकेन चानन्ता खड्गमांसेन चैव हि॥ ३५<br>यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्।<br>दत्तमक्षयमित्याहुः पितरः पूर्वदेवताः॥ ३६<br>स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्यं पुराणान्यखिलानि च।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां सूक्तानि विविधानि च॥ ३७<br>इन्द्राग्निसोमसूक्तानि पावनानि स्वशक्तितः।<br>बृहद्रथन्तरं तद्वज्ज्येष्ठसाम सरौहिणम्॥ ३८<br>तथैव शान्तिकाध्यायं मधुब्राह्मणमेव च।<br>मण्डलं ब्राह्मणं तद्वत् प्रीतिकारि तु यत् पुनः॥ ३९<br>विप्राणामात्मनश्चैव तत् सर्वं समुदीरयेत्।<br>भुक्तवत्सु ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप॥ ४०<br>सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संन्नीयाप्लाव्य वारिणा।<br>समुत्सृजेद् भुक्तवतामग्रतो विकिरेद् भुवि॥ ४१<br>अग्निदग्धास्तु ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।<br>भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु प्रयान्तु परमां गतिम्॥ ४२<br>येषां न माता न पिता न बन्धु-<br>र्न गोत्रशुद्धिर्न तथान्नमस्ति।<br>तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्<br>प्रयान्तु लोकेषु सुखाय तद्वत्॥ ४३<br>असंस्कृतप्रमीतानां त्यक्तानां कुलयोषिताम्।<br>उच्छिष्टभागधेयः स्याद् दर्भे विकिरयोश्च यः॥ ४४<br>तृप्ता ज्ञात्वोदकं दद्यात् सकृद् विप्रकरे तथा।<br>उपलिप्ते महीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा॥ ४५ | हाथोंसे लाकर 'पूर्णरूपसे परिवेषण करे (परोसे)। पदार्थोंमें दही, दूध और शक्करमिश्रित अन्न तथा गोघृत, गोदुग्ध और खीर आदि जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। पितरलोग गृहस्थोंके प्रथम देवता हैं, इसलिये श्राद्धके अवसरपर पितृसम्बन्धी सूक्तोंका स्वाध्याय (पाठ), सम्पूर्ण पुराण, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके विभिन्न प्रकारके सूक्त, इन्द्र, अग्नि और सोमके पवित्र सूक्त, बृहद्रथन्तर, रौहिणसहित ज्येष्ठ साम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण और मण्डलब्राह्मण आदि तथा इसी प्रकारके अन्यान्य प्रीतिवर्धक सूक्तों या स्तोत्रोंका स्वयं अथवा ब्राह्मणोंद्वारा पाठ करना-करवाना चाहिये॥ १८—३९ ½ ॥<br><br>राजन्! उन ब्राह्मणोंके भोजन कर चुकनेपर उनके भोजनके संनिकट ही सभी वर्णोंके लिये नियत किये हुए अन्न आदि पदार्थोंको लाकर उन्हें जलसे परिपूर्ण कर भोजन करनेवालोंके समक्ष ही यह कहते हुए पृथ्वीपर बिखेर दे—'मेरे कुलमें (मृत्युके पश्चात्) जिन जीवोंका अग्नि-संस्कार हुआ हो अथवा जिनका अग्नि-संस्कार नहीं भी हुआ हो, वे सभी पृथ्वीपर बिखेरे हुए इस अन्नसे तृप्त हों और परम गतिको प्राप्त हों। जिनकी न माता है, न जिनके पिता या भाई-बन्धु हैं, न तो जिनकी गोत्र-शुद्धि हुई है तथा जिनके पास अन्न भी नहीं है, उनकी तृप्तिके निमित्त मैंने भूतलपर यह अन्न छींट दिया है, अतः वे भी (मेरे पितरोंकी भाँति) सुखभोगके लिये उत्तम लोकोंमें जायें। इसी प्रकार जो कुलवधुएँ बिना संस्कृत हुए ही मृत्युको प्राप्त हो गयी हैं अथवा जिनका परिवारवालोंने परित्याग कर दिया है, उनके लिये कुश-मूलमें लगा हुआ तथा विकिराका बचा हुआ उच्छिष्ट भाग ही हिस्सा है।' तदनन्तर ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर एक बार उनके हाथोंपर जल डाल दे। फिर गोबर, गोमूत्र और जलसे लिपी हुई भूमिपर |
२१- ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन
| ७२ | * मत्स्यपुराण * |
|---|---|
| निधाय दर्भान् विधिवद् दक्षिणाग्रान् प्रयत्नतः।<br>सर्ववर्णेन चान्नेन पिण्डांस्तु पितृयज्ञवत्॥ ४६<br>अवनेजनपूर्वं तु नामगोत्रेण मानवः।<br>गन्धधूपादिकं दद्यात् कृत्वा प्रत्यवनेजनम्॥ ४७<br>जान्वाच्य सव्यं सव्येन पाणिनाथ प्रदक्षिणम्।<br>पित्र्यमानीय तत् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना॥ ४८<br>दीपप्रज्वालनं तद्वत् कुर्यात् पुष्पार्चनं बुधः।<br>अथाचान्तेषु चाचम्य वारि दद्यात् सकृत् सकृत्॥ ४९<br>अथ पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च।<br>सतिलं नामगोत्रेण दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ५०<br>गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च।<br>दद्याद् यदिष्टं विप्राणामात्मनः पितुरेव च॥ ५१<br>वित्तशाठ्येन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।<br>ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु चोदकम्॥ ५२<br>दत्त्वाशीः प्रतिगृह्णीयाद् विश्वेभ्यः प्राङ्मुखो बुधः।<br>अघोराः पितरः सन्तु सन्त्वित्युक्तः पुनर्द्विजैः॥ ५३<br>गोत्रं तथा वर्धतां नस्तथेत्युक्तश्च तैः पुनः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत्॥ ५४<br>एताः सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तश्च तैः पुनः।<br>स्वस्तिवाचनकं कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तितः॥ ५५<br>उच्छेषणं तु तत् तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः।<br>ततो ग्रहबलिं कुर्यादिति धर्मव्यवस्थितिः॥ ५६<br>उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्यास्तिकस्य च।<br>दासवर्गस्य तत् पित्र्यं भागधेयं प्रचक्षते॥ ५७<br>पितृभिर्निर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा।<br>अपुत्राणां सपुत्राणां स्त्रीणामपि नराधिप॥ ५८<br>ततस्तानग्रतः स्थित्वा परिगृह्योदपात्रकम्।<br>वाजे वाज इति जपन् कुशाग्रेण विसर्जयेत्॥ ५९<br>बहिः प्रदक्षिणां कुर्यात् पदान्यष्टावनुव्रजन्।<br>बन्धुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासन्वितः॥ ६० | कुशोंको विधिपूर्वक दक्षिणाभिमुख बिछा दे। तब श्राद्धकर्ता पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करके पहले (कुशोंपर) अवनेजन दे (पिण्डकी वेदीपर कुशसे जल छिड़के), फिर पितृ-यज्ञकी भाँति सभी प्रकारके अन्नोंसे बने हुए पिण्डोंको उन कुशोंपर रख दे। पुनः गन्ध, पुष्प आदिसे पिण्ड-पूजा करके उनपर प्रत्यवनेजनका जल छोड़े और बायाँ घुटना टेककर बायें हाथसे प्रदक्षिणा करे; फिर कुश हाथमें लेकर विधिपूर्वक पितृकार्य सम्पन्न करे। बुद्धिमान् श्राद्धकर्ताको पूर्वोक्त विधिके अनुसार दीप जलाना एवं पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर स्वयं भी आचमन करके उनके हाथोंपर एक-एक बार जल, पुष्प, अक्षत और तिलसहित अक्षय्योदक डालकर यथाशक्ति उन्हें दक्षिणा दे। पुनः कंजूसी छोड़कर पितरोंको प्रसन्न करते हुए गौ, पृथ्वी, सोना, वस्त्र, सुन्दर शय्याएँ तथा जो वस्तु अपने तथा पिताको अभीष्ट रही हो, वह सब ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। तदुपरान्त स्वधाका उच्चारण करके विद्वान् श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो विश्वेदेवोंको जल प्रदान करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करे। उस समय ब्राह्मणोंसे कहे—'हमारे पितर सौम्य हों।' पुनः ब्राह्मण लोग कहें—'सन्तु—हों'॥ ४०—५३॥<br><br>(पुनः यजमान कहे) 'हमारे गोत्रकी वृद्धि हो तथा हमारे दाताओंकी अभिवृद्धि हो।' यों कहे जानेपर पुनः वे ब्राह्मण कहें—'वैसा ही हो।' पुनः प्रार्थना करे—'ये आशीर्वाद सत्य हों।' ब्राह्मणलोग कहें—'सन्तु—(सत्य) हों'। पुनः उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और पिण्डोंको उठाकर भक्तिपूर्वक ग्रहबलि करे—यही धर्मकी मर्यादा है। जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण विसर्जित किये जाते हैं, तबतक सभी वस्तुएँ उच्छिष्ट रहती हैं। कपटरहित एवं आस्तिक ब्राह्मणोंका जूठन और पितृकार्यमें भूमिपर बिखरे हुए अन्न नौकरोंके भाग हैं—ऐसा कहा जाता है। नरेश्वर! पितरोंद्वारा व्यवस्थित यह तर्पणरूप कार्य पुत्रहीनों, पुत्रवानों तथा स्त्रियोंके लिये भी है। तदनन्तर ब्राह्मणोंको आगे खड़ा करके जलपात्रको हाथमें लेकर 'वाजे वाजे'—यों कहते हुए कुशोंके अग्रभागसे पितरोंका विसर्जन करे तथा बाहर जाकर पुत्र, स्त्री और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर आठ पग तक उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलकर उनकी प्रदक्षिणा करे। |
* अध्याय १७ * ७३
| निवृत्य प्रणिपत्याथ पर्युक्ष्याग्निं समन्त्रवत्।<br>वैश्वदेवं प्रकुर्वीत नैत्यकं बलिमेव च॥ ६१<br><br>ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यसुतबान्धवः।<br>भुञ्जीतातिथिसंयुक्तः सर्वं पितृनिषेवितम्॥ ६२<br><br>एतच्चानुपनीतोऽपि कुर्यात् सर्वेषु पर्वसु।<br>श्राद्धं साधारणं नाम सर्वकामफलप्रदम्॥ ६३<br><br>भार्याविरहितोऽप्येतत् प्रवासस्थोऽपि भक्तिमान्।<br>शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः॥ ६४<br><br>तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते।<br>उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोद्वाहादिमङ्गले॥ ६५ | वहाँसे लौटकर अग्निको प्रणाम करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका पर्युक्षण करे तथा वैश्वदेव और नित्य बलि प्रदान करे। वैश्वदेवबलि समाप्त कर लेनेके बाद अपने नौकर-चाकर, पुत्र, भाई-बन्धु और अतिथियोंके साथ सभी प्रकारके पितृ-सेवित (जिन्हें पहले पितरोंको समर्पित किया जा चुका है) पदार्थोंका भोजन करे। इस सामान्य पार्वण नामक श्राद्धको, जो सभी प्रकारके मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है, उपनयन-संस्कारसे रहित व्यक्ति भी सभी पर्वोंके अवसरपर कर सकता है। बुद्धिमान् पितृ-भक्त पुरुष पत्नीरहित अवस्थामें तथा परदेशमें स्थित रहनेपर भी इस श्राद्धका विधान कर सकता है। शूद्रको भी पूर्वोक्त विधिके अनुसार मन्त्ररहित ही इस श्राद्धको करनेका अधिकार है। ऋषियो! अब तीसरे प्रकारके पार्वण श्राद्धको, जो आभ्युदयिक वृद्धिश्राद्धके नामसे कहा जाता है, बतला रहा हूँ। यह श्राद्ध किसी उत्सव, हर्ष-संयोग, यज्ञ, विवाह आदिके शुभ अवसरपर किया जाता है॥ ५४—६५ ॥ | | मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनन्तरम्।<br>ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च॥ ६६<br><br>प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डान् दूर्वया च कुशैर्यतान्॥ ६७<br><br>सम्पन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्घ्यं द्वयोर्द्वयोः।<br>युग्मा द्विजातयः पूज्या वस्त्रकार्त्तस्वरादिभिः॥ ६८<br><br>तिलार्थस्तु यवैः कार्यो नान्दीशब्दानुपूर्वकः।<br>माङ्गल्यानि च सर्वाणि वाचयेद् द्विजपुङ्गवैः॥ ६९<br><br>एवं शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सर्वदा।<br>नमस्कारेण मन्त्रेण कुर्यादामात्रतः सदा॥ ७०<br><br>दानप्रधानः शूद्रः स्यादित्याह भगवान् प्रभुः।<br>दानेन सर्वकामाप्तिरस्य संजायते यतः॥ ७१ | राजन्! इस श्राद्धमें प्रथमतः माताओंकी पूजा करके तत्पश्चात् पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर मातामह (नाना) और विश्वेदेवोंके पूजनका विधान है। श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो प्रदक्षिणा करके दही, अक्षत, फल और जल आदि सामग्री-समेत दूर्वा और कुशोंसे संयुक्त पिण्डोंको समर्पित करे। इस आभ्युदयिक श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके दोनों प्रकारके पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय वस्त्र, सुवर्ण आदि सामग्रियोंसे दो ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। तिलके स्थानपर 'नान्दी' शब्दके उच्चारणपूर्वक यवसे ही कार्य सम्पन्न करे और श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा सभी प्रकारके माङ्गलिक सूक्तों अथवा स्तोत्रोंका पाठ कराये। इसी प्रकार इस सामान्य वृद्धिश्राद्धमें शूद्र भी सदा-सर्वदा नमस्काररूपी मन्त्रके उच्चारणसे तथा आमान्न-दानसे (बिना पके हुए कच्चे अन्नके दानसे) कार्य सम्पन्न कर सकता है। शूद्रको विशेषरूपसे दानप्रधान (दानमें तत्पर, दानशील) होना चाहिये; क्योंकि दानसे उसके सभी मनोरथोंकी पूर्ति हो जाती है—ऐसा सर्वसमर्थ भगवान्ने कहा है॥ ६६—७१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे साधारणाभ्युदयकीर्तनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें साधारणाभ्युदयश्राद्ध-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७॥
७४ * मत्स्यपुराण *
अठारहवाँ अध्याय
एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके उपरान्त अब मैं उस 'एकोद्दिष्ट'¹ श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका वर्णन स्वयं भगवान् चक्रपाणि विष्णुने किया है। पिताकी मृत्यु हो जानेपर पुत्रोंको शौचपर्यन्त जैसा कार्य करना चाहिये, उसे सुनिये॥ १॥ |
|---|---|
| एकोद्दिष्टमतो वक्ष्ये यदुक्तं चक्रपाणिना।<br>मृते पुत्रैर्यथा कार्यमाशौचं च पितर्यपि॥ १ | ब्राह्मणोंमें दस दिनके अशौचका विधान है। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें बारह दिनका, वैश्योंमें पन्द्रह दिनका और शूद्रोंमें एक मासका अशौच लगता है। इस अशौचका विधान सगोत्रमें ही किया गया है। जिसका मुण्डन-संस्कार नहीं हुआ हो, ऐसे बच्चेका मरणाशौच एक राततक तथा इससे बड़ी अवस्थावालेका तीन राततक बतलाया गया है। इसी प्रकार जननाशौच भी सर्वदा सभी वर्णोंके लिये होता है। मरणाशौचमें अस्थिसञ्चयनके उपरान्त (परिवारवालोंका) अङ्गस्पर्श करनेका विधान है। प्रेतात्माके लिये बारह दिनोंतक पिण्डदान करना चाहिये; क्योंकि वे पिण्ड उस प्रेतके लिये पाथेय (मार्गका कलेवा) बतलाये गये हैं, अतः अतिशय सुखदायी होते हैं। इसी कारण वह प्रेतात्मा बारह दिनोंतक प्रेतपुर (यमपुरी)—को नहीं ले जाया जाता। वह बारह दिनोंतक अपने गृह, पुत्र और पत्नीको देखता रहता है। इसलिये उसके समस्त दाहोंकी शान्ति तथा मार्गकी थकावटका विनाश करनेके निमित्त दस राततक आकाशमें (पीपलके वृक्षमें बँधा हुआ) जलघट रखना चाहिये। तत्पश्चात् ग्यारहवें दिन ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसी प्रकार क्षत्रिय आदि अन्य वर्णवालोंको भी अपने-अपने सूतककी समाप्तिपर (विषम-संख्यक) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पुनः दूसरे अर्थात् बारहवें दिन पूर्ववत् विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्धका समारम्भ करे। इसमें आवाहन, अग्निमें पिण्डदान तथा विश्वेदेवोंका पूजन निषिद्ध है। इस श्राद्धमें एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्डका विधान है। इसके पश्चात् 'उपतिष्ठताम्' इस शब्दका उच्चारण करके तिलसहित जल प्रदान करे और 'स्वदितम्०' इस सम्पूर्ण मन्त्रको बोलकर अन्नको पृथ्वीपर बिखेर दे तथा विसर्जनके समय 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे। इस प्रकार वेदज्ञ पुत्रको अपने पिताका शेष श्राद्ध-कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। इसी विधिसे प्रतिमास (पिताकी मृत्यु-तिथिपर) सारा कार्य सम्पादित करना चाहिये। सूतक समाप्त होनेके पश्चात् दूसरे दिन |
| दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणेषु विधीयते।<br>क्षत्रियेषु दश द्वे च पक्षं वैश्येषु चैव हि॥ २ | |
| शूद्रेषु मासमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।<br>नैशं वाकृतचूडस्य त्रिरात्रं परतः स्मृतम्॥ ३ | |
| जननेऽप्येवमेव स्यात् सर्ववर्णेषु सर्वदा।<br>तथास्थिसञ्चयनादूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते॥ ४ | |
| प्रेताय पिण्डदानं तु द्वादशाहं समाचरेत्।<br>पाथेयं तस्य तत् प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत्॥ ५ | |
| तस्मात् प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहं¹ न नीयते।<br>गृहं पुत्रं कलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति॥ ६ | |
| तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा।<br>सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥ ७ | |
| तत एकादशाहे तु द्विजानेकादशैव तु।<br>क्षत्रादिः सूतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान्॥ ८ | |
| द्वितीयेऽह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्टं समाचरेत्।<br>आवाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः॥ ९ | |
| एकं पवित्रमेकोऽर्घ्य एकः पिण्डो विधीयते।<br>उपत्तिष्ठतामित्येतद् देयं पश्चात्तिलोदकम्॥ १० | |
| स्वदितं विकिरेद् ब्रूयाद् विसर्गे चाभिरम्यताम्।<br>शेषं पूर्ववदत्रापि कार्यं वेदविदा पितुः॥ ११ | |
| अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत्।<br>सूतकान्ताद् द्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ १२ |
१. 'कहीं-कहीं द्वादशाहेन नीयते' पाठ भी है। वहाँ १२ दिनोंमें यमपुरी या पितृपुर ले जाया जाता है, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
२. पिता आदि केवल एक व्यक्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाला श्राद्ध 'एकोद्दिष्ट' है।
* अध्याय १८ * ७५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्वितम्।<br>सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः॥ १३<br><br>वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा।<br>उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः॥ १४<br><br>यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे सपिण्डीकरणं भवेत्॥ १५<br><br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रेतः पार्वणभाग् भवेत्।<br>वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्ततः॥ १६ | काञ्चनपुरुष (सोनेकी प्रतिमा) और फल-वस्त्रसे समन्वित विलक्षण शय्याका दान करना चाहिये। उसी समय अनेकविध वस्त्राभूषणोंसे द्विज-दम्पतीका पूजन करे। तत्पश्चात् वृषोत्सर्ग (साँड़ छोड़ने)-का काम सम्पन्न करे। उस समय एक सुन्दर कपिला गौका दान करे। नरश्रेष्ठ! पुनः अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त एक जलपात्र, जो तिल और जलसे परिपूर्ण हो, दान करे। इस प्रकारके जलपात्रका दान वर्षपर्यन्त करना चाहिये। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध किया जाता है। सपिण्डीकरण श्राद्धके पश्चात् प्रेतात्मा पार्वणश्राद्धका भागी हो जाता है तथा पूर्वकथित आभ्युदयिक आदि वृद्धि श्राद्धोंमें भाग पानेके योग्य एवं गृहस्थ हो जाता है॥ २—१६॥ |
| सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्।<br>पितॄनेवासयेत् तत्र पृथक् प्रेतं विनिर्दिशेत्॥ १७<br><br>गन्धोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात् पात्रचतुष्टयम्।<br>अर्घार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्॥ १८<br><br>तद्वत् संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तथा।<br>ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यं तु विभजेत् तथा॥ १९<br><br>चतुर्थस्य पुनः कार्यं न कदाचिदतो भवेत्।<br>ततः पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः॥ २०<br><br>अग्निष्वात्तादिमध्यत्वं प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम्।<br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्मै तस्मान्न दीयते॥ २१<br><br>पितृष्वेव तु दातव्यं तत्पिण्डो येषु संस्थितः।<br>ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादिपर्वसु॥ २२<br><br>त्रिपिण्डमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टे मृतेऽहनि।<br>एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत्॥ २३<br><br>सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशकः।<br>मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानवः॥ २४<br><br>सम्पृक्तेष्वाकुलीभावः प्रेतेषु तु यतो भवेत्।<br>प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्टं समाचरेत्॥ २५ | सपिण्डीकरण श्राद्धमें सर्वप्रथम विश्वेदेवोंको नियुक्त करे। तत्पश्चात् पितरोंको स्थान दे और प्रेतका स्थान उनसे अलग निश्चित करे। फिर अर्घ्य देनेके लिये चन्दन, जल और तिलसे युक्त चार पात्र तैयार करे और प्रेतपात्रके जलसे पितृपात्रोंको सिक्त कर दे। (अर्थात् प्रेतपात्रके जलको तीन भागमें विभक्त करके उन्हें पितृपात्रोंमें डाल दे।) इसी प्रकार पिण्डदाता चार पिण्डोंका निर्माण करके उन्हें संकल्पपूर्वक (पितरों और प्रेतके स्थानोंपर पृथक्-पृथक्) रख दे। फिर 'ये समानाः०' (वाजस० १९।४५-४६)—इन दो मन्त्रोंद्वारा अन्तके (चौथे प्रेतके) पिण्डको (स्वर्णशलाका या कुशसे) तीन भागोंमें विभक्त कर दे (और एक-एक भागको क्रमशः पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे)। इसके पश्चात् उस चौथे पिण्डका कहीं भी कोई उपयोग नहीं रह जाता। इसके बाद वह प्रेतात्मा सब ओरसे संतुष्ट होकर पितृरूपमें परिवर्तित हो जाता है और 'अग्निष्वात्त' आदि देवपितरोंके मध्य उत्तम एवं अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है। इसी कारण सपिण्डीकरणके पश्चात् उसे कुछ नहीं दिया जाता। वह प्रेतात्मा जिन पितरोंके बीच स्थित है, उसके पिण्डके तीनों भागोंको उन्हीं पितरोंके पिण्डोंमें मिला देना चाहिये। तत्पश्चात् संक्रान्ति अथवा ग्रहण आदि पर्वोंके समय त्रिपिण्ड श्राद्ध ही करना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धको प्रेतात्माकी मृत्युके दिन करनेका विधान है। जो श्राद्धकर्ता पिताकी मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग कर (केवल) अन्य श्राद्धोंको करता है, वह सदैव पितृघाती तथा माता और भाईका विनाशक हो जाता है। पिताकी क्षयातिथिपर पार्वण श्राद्ध करनेवाला मानव अधम-से-अधम गतिको प्राप्त होता है। चूँकि प्रेतोंसे सम्बन्धित हो जानेसे पितृगण व्याकुल हो जाते हैं, इसलिये प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। |
२२- श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन
| ७६ | * मत्स्यपुराण * |
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| यावदब्दं तु यो दद्यादुदकुम्भं विमत्सरः।<br>प्रेतायान्नसमायुक्तं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २६<br><br>आमश्राद्धं यदा कुर्याद् विधिज्ञः श्राद्धदस्तदा।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ २७<br><br>त्रिभिः सपिण्डीकरणे अशेषत्रितये पिता।<br>यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बन्धनात्॥ २८<br><br>मुक्तोऽपि लेपभागित्वं प्राप्नोति कुशमार्जनात्।<br><br>लेपभाजश्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः।<br>पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ २९ | जो मनुष्य मत्सररहित होकर वर्षपर्यन्त प्रेतके निमित्त अन्न आदि पदार्थोंसे युक्त जलपात्र दान करता रहता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। विधियोंका ज्ञाता श्राद्धकर्ता जब आमश्राद्ध (जिसमें ब्राह्मणोंको भोजन न कराकर कच्चा अन्न दिया जाता है) करे तो विधिपूर्वक अग्निकरण करे और उसी समय पिण्डदान भी करे। जब पिता सपिण्डीकरण श्राद्धमें अपने पिता, पितामह, प्रपितामहके साथ सम्बन्ध प्राप्त कर लेता है, तब वह बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर भी वह कुशके मार्जनसे लेपभागी हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चमसहित तीन पितर लेपभागी और पिता आदि तीन पिण्डभागी हैं। उनमें पिण्डदाता सातवीं संतान है। इस प्रकार सात पीढ़ीतक सपिण्डता मानी जाती है॥ २७—२९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सपिण्डीकरणकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सपिण्डीकरण नामक अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८॥
उन्नीसवाँ अध्याय
श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण
| ऋषय ऊचुः<br><br>कथं कव्यानि देयानि हव्यानि च जनैरिह।<br>गच्छन्ति पितृलोकस्थान् प्रापकः कोऽत्र गद्यते॥ १<br><br>यदि मर्त्यो द्विजो भुङ्क्ते हूयते यदि वानले।<br>शुभाशुभात्मकैः प्रेतैर्दत्तं तद् भुज्यते कथम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! मनुष्योंको (पितरोंके निमित्त) हव्य और कव्य किस प्रकार देना चाहिये? इस मृत्युलोकमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्य पितृलोकमें स्थित पितरोंके पास कैसे पहुँच जाते हैं? यहाँ उनको पहुँचानेवाला कौन कहा गया है? यदि मृत्युलोकवासी ब्राह्मण उन्हें खा जाता है अथवा अग्निमें उनकी आहुति दे दी जाती है तो अपने कर्मानुसार शुभ एवं अशुभ योनियोंमें गये हुए प्रेतोंद्वारा उस पदार्थका उपभोग कैसे किया जाता है?॥ १-२॥ |
* अध्याय १९ * ७७
| सूत उवाच | |
|---|---|
| वसून् वदन्ति च पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान्।<br>प्रपितामहांस्तथादित्यानित्येवं वैदिकी श्रुतिः॥ ३<br><br>नाम गोत्रं पितॄणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः।<br>श्राद्धस्य मन्त्राः श्रद्धा च उपयोज्यातिभक्तितः॥ ४<br><br>अग्निष्वात्तादयस्तेषामधिपत्ये व्यवस्थिताः।<br>नामगोत्रकालदेशा भवान्तरगतानपि॥ ५<br><br>प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान्।<br>देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः॥ ६<br><br>तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्वेऽप्यनुगच्छति।<br>दैत्यत्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्॥ ७<br><br>श्राद्धान्नं वायुरूपेण सर्पत्वेऽप्युपतिष्ठति।<br>पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषम्॥ ८<br><br>दनुजत्वे तथा माया प्रेतत्वे रुधिरोदकम्।<br>मनुष्यत्वेऽन्नपानानि नानाभोगरसं भवेत्॥ ९<br><br>रतिशक्तिः स्त्रियः कान्ता भोज्यं भोजनशक्तिता।<br>दानशक्तिः सविभवा रूपमारोग्यमेव च॥ १०<br><br>श्रद्धापुष्पमिदं प्रोक्तं फलं ब्रह्मसमागमः।<br>आयुः पुत्रान् धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ११<br><br>राज्यं चैव प्रयच्छन्ति प्रीताः पितृगणा नृणाम्।<br><br>श्रूयते च पुरा मोक्षं प्राप्ताः कौशिकसूनवः।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैर्गता विष्णोः परं पदम्॥ १२ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पितरोंको वसुगण, पितामहोंको रुद्रगण तथा प्रपितामहोंको आदित्यगण कहा जाता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। पितरोंके नाम और गोत्र (उनके निमित्त प्रदान किये गये) हव्य-कव्यको उनके पास पहुँचानेवाले हैं। अतिशय भक्तिपूर्वक उच्चरित श्राद्धके मन्त्र भी कारण हैं एवं श्रद्धाके उपयोग भी हेतु है। अग्निष्वात्त आदि पितरोंके आधिपत्य-पदपर स्थित हैं। उन देव-पितरोंके समक्ष जो खाद्य पदार्थ पितरोंका नाम, गोत्र, काल और देशका उच्चारण करके श्रद्धासे अर्पित किया जाता है, वह पितृगणोंको यदि वे जन्मान्तरमें भी गये हुए हों तो भी उन्हें तृप्त कर देता है। वह उस समय उस योनिके लिये उपयुक्त आहारके रूपमें परिणत हो जाता है। यदि शुभ कर्मोंके प्रभावसे पिता देवयोनिमें उत्पन्न हो गये हैं तो उनके उद्देश्यसे दिया गया अन्न अमृत होकर देवयोनिमें भी उन्हें प्राप्त होता है। वह श्राद्धान्न दैत्ययोनिमें भोगरूपमें और पशुयोनिमें तृणरूपमें बदल जाता है। सर्पयोनिमें वह वायुरूपसे सर्पके निकट पहुँचता है। यक्ष-योनिमें वह पीनेवाला पदार्थ तथा राक्षस्योनिमें मांस हो जाता है। दनुजयोनिमें मायारूपमें, प्रेतयोनिमें रुधिर और जलके रूपमें तथा मानवयोनिमें नाना प्रकारके भोग-रसोंसे युक्त अन्न-पानादिके रूपमें परिवर्तित हो जाता है। रमण करनेकी शक्ति, सुन्दरी स्त्रियाँ, भोजन करनेके पदार्थ, भोजन पचानेकी शक्ति, प्रचुर सम्पत्तिके साथ-साथ दान देनेकी निष्ठा, सुन्दर रूप और स्वास्थ्य—ये सभी श्रद्धारूपी वृक्षके पुष्प बतलाये गये हैं और ब्रह्मप्राप्ति उसका फल है। पितृगण प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, अनेक पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य प्रदान करते हैं। सुना जाता है कि कौशिकके पुत्र पूर्वकालमें (श्राद्धके प्रभावसे व्याध, मृग, चक्रवाक आदि योनियोंमें) पाँच बार जन्म लेनेके पश्चात् मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परमपद वैकुण्ठलोकको चले गये थे॥ ३–१२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे फलानुगमनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें फलानुगमन नामक उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९॥
७८ * मत्स्यपुराण *
बीसवाँ अध्याय
महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने पूछा— |
|---|---|
| कथं कौशिकदायादाः प्राप्तास्ते योगमुत्तमम्।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्॥ १ | सूतजी! महर्षि कौशिकके* वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योगको प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करनेसे उनके अशुभ कर्मोंका विनाश कैसे हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कुरुक्षेत्रमें कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। (उन पुत्रोंके वृत्तान्त) नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये। |
| कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः।<br>नामतः कर्मतस्तस्य सुतान् सप्त निबोधत॥ २ | उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—ये नाम थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् वे सभी महर्षि गर्गके शिष्य हुए। |
| स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च।<br>वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्॥ ३ | उस समय समस्त लोकोंको भयभीत करनेवाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया। |
| पितर्युपरते तेषामभूद् दुर्भिक्षमुल्बणम्।<br>अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकारी॥ ४ | इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्यकी आज्ञासे उनकी सेवामें लग गये। वहाँ वनमें वे सभी भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो गये। |
| गर्गादेशाद् वने दोग्ध्रीं रक्षन्तस्ते तपोधनाः।<br>खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम्॥ ५ | जब क्षुधा-शान्तिका कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्तीने श्राद्ध-कर्म करनेकी सम्मति दी। |
| इति चिन्तयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः।<br>यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम्॥ ६ | बड़े भाइयोंने ‘अच्छा, ऐसा ही करो’—ऐसी आज्ञा पाकर |
| श्राद्धे नियोज्यमानेयं पापात् त्रास्यति नो ध्रुवम्।<br>एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदाग्रजैः॥ ७ | पितृवर्तीने समाहित-चित्त होकर श्राद्धका उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़ेके क्रमसे दो भाइयोंको देव-कार्यमें, तीनको पितृकार्यमें और एकको अतिथिरूपमें नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया। |
| चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्य च तां पुनः।<br>द्वौ दैवे भ्रातरौ कृत्वा पित्रे त्रीनप्यनुक्रमात्॥ ८ | इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्तीने पितरोंका स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया। |
| तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु।<br>चकार मन्त्रवच्छ्राद्धं स्मरन् पितृपरायणः॥ ९ | कालक्रमानुसार मृत्युके उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोषसे वे सभी दाशपुर (मन्दसौर) नामक नगरमें बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह (श्राद्धकृत्य)-से भावित होनेके कारण उन्हें पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण बना रहा। |
| विना गवां वत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदितः।<br>व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ १० | पूर्वजन्मके कर्मोंके परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियोंके घरमें पैदा तो हुए, |
| एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः।<br>वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः॥ ११ | |
| ततः कालावकृष्टास्ते व्याधा दाशपुरेऽभवन्।<br>जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः॥ १२ | |
| यत् कृतं क्रूरकर्माणिश्राद्धरूपेण तैस्तदा।<br>तेन ते भवने जाता व्याधानां क्रूरकर्मणाम्॥ १३ |
* कौशिक नामके प्राचीन समयमें १०—१२ व्यक्ति हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। पर ये उनसे भिन्न हैं। विश्वामित्रका सम्बन्ध बिहारसे लेकर कन्नौजतक रहा है, पर ये कुरुक्षेत्रवासी हैं। यह कथा पद्मपुराण १।१०, हरिवंश १।२१—२७ आदिमें भी है। और इसका संकेत गरुडपु० १।२१०।२०-२१ आदि बीसों स्थलोंपर है।
* अध्याय २० * ७९
| पितॄणां चैव माहात्म्याज्जाता जातिस्मरास्तु ते।<br>ते तु वैराग्ययोगेन आस्थायानशनं पुनः॥ १४<br>जातिस्मराः सप्त जाता मृगाः कालञ्जरे गिरौ।<br>नीलकण्ठस्य पुरतः पितृभावानुभाविताः ॥ १५<br>तत्रापि ज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्य धर्मतः।<br>लोकैरवेक्ष्यमाणास्ते तीर्थान्तेऽनशनेन तु॥ १६<br>मानसे चक्रवाकास्ते सञ्जाताः सप्त योगिनः।<br>नामतः कर्मतः सर्वाञ्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥ १७<br>सुमनाः कुमुदः शुद्धश्छिद्रदर्शी सुनेत्रकः।<br>सुनेत्रांशुमांश्चैव सप्तैते योगपारगाः ॥ १८<br>योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभ्रमुश्चाल्पचेतनाः।<br>दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम्॥ १९<br>क्रीडन्तं विविधैर्भावैर्महाबलपराक्रमम्।<br>पाञ्चालान्वयसम्भूतं प्रभूतबलवाहनम्॥ २०<br>राज्यकामोऽभवच्चैकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्।<br>पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत् पितृवत्सलः॥ २१<br>अपरौ मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ।<br>मन्त्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन् मर्त्ये द्विजोत्तमाः॥ २२<br>तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते बभूवुर्द्विजोत्तमाः।<br>विभ्राजपुत्रस्त्वेकोऽभूद् ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥ २३<br>मन्त्रिपुत्रौ तथा चोभौ कण्डरीकसुबालकौ।<br>ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्तः सन् पुरोहितविपश्चिता॥ २४<br>पाञ्चालराजो विक्रान्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>योगिवत् सर्वजन्तूनां रुतवेत्ताभवत् तदा॥ २५<br>तस्य राज्ञोऽभवद् भार्या देवलस्यात्मजा शुभा।<br>संनतिर्नाम विख्याता कपिला याभवत् पुरा॥ २६<br>पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद् ब्रह्मवादिनी।<br>तया चकार सहितः स राज्यं राजनन्दनः॥ २७<br>कदाचिदुद्यानगतस्तया सह स पार्थिवः।<br>ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम्॥ २८<br>पिपीलिकामनुनयन् परितः कीटकामुकः।<br>पञ्चबाणाभितप्ताङ्गः सगद्गदमुवाच ह॥ २९ | परंतु पितरोंके ही माहात्म्यसे वे सभी जातिस्मर (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञाता) बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्मके फलसे वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन सभीने अनशन करके अपने-अपने उस शरीरका त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वतपर भगवान् नीलकण्ठके समक्ष मृग-योनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरोंके स्नेहसे अनुभावित होनेके कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनिमें भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन लोगोंने तीर्थ-स्थानमें अनशन करके लोगोंके देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनोंने मानसरोवरमें चक्रवाककी योनिमें जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आपलोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभीका वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनिमें उनके नाम हैं—सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योगके पारदर्शी थे। इनमेंसे अल्पबुद्धिवाले तीन तो योगसे भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यानमें स्त्रियोंके साथ अनेकविध हाव-भावोंसे क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजाको देखकर उन जलपक्षियोंमेंसे एकको, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्तिकी आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनोंने राजाके दो मन्त्रियोंको प्रचुर सेना और वाहनोंसे युक्त देखकर इस मृत्युलोकमें मन्त्रि-पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए। उन तीनोंमेंसे पहला राजा विभ्राजके* पुत्ररूपमें ब्रह्मदत्त नामसे विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नामसे मन्त्रीके पुत्र हुए। (राजा विभ्राजकी मृत्युके उपरान्त) विद्वान् पुरोहितने ब्रह्मदत्तको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रोंमें प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओंकी बोलीका ज्ञाता था। देवलकी सुन्दरी कन्या, जो संनति नामसे विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्तकी पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नीके साथ रहकर राजकुमार ब्रह्मदत्त राज्य-भार सँभालने लगा ॥ २—२७॥<br><br>एक बार राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनतिके साथ भ्रमण करनेके लिये उद्यानमें गया। वहाँ उसने काम-कलहसे व्याकुल एक कीट-दम्पति (चींटा-चींटी)-को देखा। वह कीट, जिसका शरीर कामदेवके बाणोंसे संतप्त हो उठा था, चारों ओरसे चींटीसे अनुनय-विनय करता हुआ गद्गद वाणीमें बोला— |
* इसका कहीं अणुह तथा कहीं नीप नाम भी आया है।
८० * मत्स्यपुराण *
| न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्।<br>मध्यक्षामातिजघना बृहद्वक्षोऽभिगामिनी ॥ ३०<br><br>सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारुहासिनी।<br>सुलक्ष्यनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला ॥ ३१<br><br>भोक्ष्यसे मयि भुङ्क्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि।<br>प्रोषिते सति दीना त्वं क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला ॥ ३२<br><br>किमर्थं वद कल्याणि सरोषवदना स्थिता।<br>सा तमाह सकोपा तु किमालपसि मां शठ ॥ ३३<br><br>त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय विनेष्यता।<br>प्रदत्तं समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्याः समन्मथ ॥ ३४<br><br>पिपीलिक उवाच<br>त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि।<br>तदेकमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ ३५<br><br>नैतदेवं करिष्यामि पुनः क्वापीह सुव्रते।<br>स्पृशामि पादौ सत्येन प्रसीद प्रणतस्य मे ॥ ३६<br><br>सूत उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत् ततः।<br>आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका ॥ ३७<br><br>ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषं तं ज्ञात्वा विस्मयमागमत्।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञत्वात् प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ३८ | 'प्रिये! इस जगत्में तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री कहीं कोई भी नहीं है। तुम्हारा कटिप्रदेश पतला और जंघे मोटे हैं, तुम स्तनोंके भारी भारसे विनम्र होकर चलनेवाली, स्वर्णके समान गौरवर्णा, सुन्दर कमरवाली, मृदुभाषिणी, मनोहर हास्यसे युक्त, भलीभाँति लक्ष्यको भेदन करनेवाले नेत्रों और जीभसे समन्वित तथा गुड़ और शक्करकी प्रेमी हो। तुम मेरे भोजन कर लेनेके पश्चात् भोजन करती हो तथा मेरे स्नान कर लेनेपर स्नान करती हो। इसी प्रकार मेरे परदेश चले जानेपर तुम दीन हो जाती हो और क्रुद्ध होनेपर भयभीत हो उठती हो। कल्याणि! बतलाओ तो सही, तुम किस कारण क्रोधसे मुँह फुलाये बैठी हो।' तब क्रोधसे भरी हुई चींटी उस कीटसे बोली—'शठ! तुम क्या मुझसे व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? अरे धूर्त! अभी कल ही तुमने मेरा परित्याग करके लड्डूका चूर्ण ले जाकर दूसरी चींटीको नहीं दिया है?'॥ २८—३४॥<br><br>चींटा बोला—वरवर्णिनि! तुम्हारे सदृश रूप-रंगवाली होनेके कारण मैंने भूलसे दूसरी चींटीको लड्डू दे दिया है, अतः भामिनि! तुम मेरे इस एक अपराधको क्षमा कर दो। सुव्रते! मैं पुनः कभी भी इस प्रकारका कार्य नहीं करूँगा। मैं सत्यकी दुहाई देकर तुम्हारे चरण छूता हूँ, तुम मुझ विनीतपर प्रसन्न हो जाओ॥ ३५-३६॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उस चींटेका कथन सुनकर वह चींटी प्रसन्न हो गयी। इधर, चक्रपाणि भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता होनेके कारण ब्रह्मदत्त भी उस सारे वृत्तान्तको जानकर विस्मयविमुग्ध हो गये॥ ३७-३८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पके श्राद्धमाहात्म्यमें पिपीलिकावहास नामक बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०॥
इक्कीसवाँ अध्याय
ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं सत्त्वरुतज्ञोऽभूद् ब्रह्मदत्तो धरातले।<br>तच्चाभवत् कस्य कुले चक्रवाकचतुष्टयम् ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>तस्मिन्नेव पुरे जातास्ते च चक्राह्वयास्तदा।<br>वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मराः पुरा ॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! ब्रह्मदत्त इस भूतलपर जन्म लेकर समस्त प्राणियोंकी बोलीके ज्ञाता कैसे हो गये? तथा वे चारों चक्रवाक किसके कुलमें उत्पन्न हुए?॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! वे चारों चक्रवाक उसी ब्रह्मदत्तके नगरमें एक वृद्ध ब्राह्मणके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें भी वे ब्राह्मण पूर्ववत् जातिस्मर बने रहे। |