मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय १७ * ७३
| निवृत्य प्रणिपत्याथ पर्युक्ष्याग्निं समन्त्रवत्।<br>वैश्वदेवं प्रकुर्वीत नैत्यकं बलिमेव च॥ ६१<br><br>ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यसुतबान्धवः।<br>भुञ्जीतातिथिसंयुक्तः सर्वं पितृनिषेवितम्॥ ६२<br><br>एतच्चानुपनीतोऽपि कुर्यात् सर्वेषु पर्वसु।<br>श्राद्धं साधारणं नाम सर्वकामफलप्रदम्॥ ६३<br><br>भार्याविरहितोऽप्येतत् प्रवासस्थोऽपि भक्तिमान्।<br>शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः॥ ६४<br><br>तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते।<br>उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोद्वाहादिमङ्गले॥ ६५ | वहाँसे लौटकर अग्निको प्रणाम करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका पर्युक्षण करे तथा वैश्वदेव और नित्य बलि प्रदान करे। वैश्वदेवबलि समाप्त कर लेनेके बाद अपने नौकर-चाकर, पुत्र, भाई-बन्धु और अतिथियोंके साथ सभी प्रकारके पितृ-सेवित (जिन्हें पहले पितरोंको समर्पित किया जा चुका है) पदार्थोंका भोजन करे। इस सामान्य पार्वण नामक श्राद्धको, जो सभी प्रकारके मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है, उपनयन-संस्कारसे रहित व्यक्ति भी सभी पर्वोंके अवसरपर कर सकता है। बुद्धिमान् पितृ-भक्त पुरुष पत्नीरहित अवस्थामें तथा परदेशमें स्थित रहनेपर भी इस श्राद्धका विधान कर सकता है। शूद्रको भी पूर्वोक्त विधिके अनुसार मन्त्ररहित ही इस श्राद्धको करनेका अधिकार है। ऋषियो! अब तीसरे प्रकारके पार्वण श्राद्धको, जो आभ्युदयिक वृद्धिश्राद्धके नामसे कहा जाता है, बतला रहा हूँ। यह श्राद्ध किसी उत्सव, हर्ष-संयोग, यज्ञ, विवाह आदिके शुभ अवसरपर किया जाता है॥ ५४—६५ ॥ | | मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनन्तरम्।<br>ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च॥ ६६<br><br>प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डान् दूर्वया च कुशैर्यतान्॥ ६७<br><br>सम्पन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्घ्यं द्वयोर्द्वयोः।<br>युग्मा द्विजातयः पूज्या वस्त्रकार्त्तस्वरादिभिः॥ ६८<br><br>तिलार्थस्तु यवैः कार्यो नान्दीशब्दानुपूर्वकः।<br>माङ्गल्यानि च सर्वाणि वाचयेद् द्विजपुङ्गवैः॥ ६९<br><br>एवं शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सर्वदा।<br>नमस्कारेण मन्त्रेण कुर्यादामात्रतः सदा॥ ७०<br><br>दानप्रधानः शूद्रः स्यादित्याह भगवान् प्रभुः।<br>दानेन सर्वकामाप्तिरस्य संजायते यतः॥ ७१ | राजन्! इस श्राद्धमें प्रथमतः माताओंकी पूजा करके तत्पश्चात् पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर मातामह (नाना) और विश्वेदेवोंके पूजनका विधान है। श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो प्रदक्षिणा करके दही, अक्षत, फल और जल आदि सामग्री-समेत दूर्वा और कुशोंसे संयुक्त पिण्डोंको समर्पित करे। इस आभ्युदयिक श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके दोनों प्रकारके पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय वस्त्र, सुवर्ण आदि सामग्रियोंसे दो ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। तिलके स्थानपर 'नान्दी' शब्दके उच्चारणपूर्वक यवसे ही कार्य सम्पन्न करे और श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा सभी प्रकारके माङ्गलिक सूक्तों अथवा स्तोत्रोंका पाठ कराये। इसी प्रकार इस सामान्य वृद्धिश्राद्धमें शूद्र भी सदा-सर्वदा नमस्काररूपी मन्त्रके उच्चारणसे तथा आमान्न-दानसे (बिना पके हुए कच्चे अन्नके दानसे) कार्य सम्पन्न कर सकता है। शूद्रको विशेषरूपसे दानप्रधान (दानमें तत्पर, दानशील) होना चाहिये; क्योंकि दानसे उसके सभी मनोरथोंकी पूर्ति हो जाती है—ऐसा सर्वसमर्थ भगवान्ने कहा है॥ ६६—७१॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे साधारणाभ्युदयकीर्तनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें साधारणाभ्युदयश्राद्ध-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७॥