भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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७२* मत्स्यपुराण *
निधाय दर्भान् विधिवद् दक्षिणाग्रान् प्रयत्नतः।<br>सर्ववर्णेन चान्नेन पिण्डांस्तु पितृयज्ञवत्॥ ४६<br>अवनेजनपूर्वं तु नामगोत्रेण मानवः।<br>गन्धधूपादिकं दद्यात् कृत्वा प्रत्यवनेजनम्॥ ४७<br>जान्वाच्य सव्यं सव्येन पाणिनाथ प्रदक्षिणम्।<br>पित्र्यमानीय तत् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना॥ ४८<br>दीपप्रज्वालनं तद्वत् कुर्यात् पुष्पार्चनं बुधः।<br>अथाचान्तेषु चाचम्य वारि दद्यात् सकृत् सकृत्॥ ४९<br>अथ पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च।<br>सतिलं नामगोत्रेण दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ५०<br>गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च।<br>दद्याद् यदिष्टं विप्राणामात्मनः पितुरेव च॥ ५१<br>वित्तशाठ्येन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।<br>ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु चोदकम्॥ ५२<br>दत्त्वाशीः प्रतिगृह्णीयाद् विश्वेभ्यः प्राङ्मुखो बुधः।<br>अघोराः पितरः सन्तु सन्त्वित्युक्तः पुनर्द्विजैः॥ ५३<br>गोत्रं तथा वर्धतां नस्तथेत्युक्तश्च तैः पुनः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत्॥ ५४<br>एताः सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तश्च तैः पुनः।<br>स्वस्तिवाचनकं कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तितः॥ ५५<br>उच्छेषणं तु तत् तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः।<br>ततो ग्रहबलिं कुर्यादिति धर्मव्यवस्थितिः॥ ५६<br>उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्यास्तिकस्य च।<br>दासवर्गस्य तत् पित्र्यं भागधेयं प्रचक्षते॥ ५७<br>पितृभिर्निर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा।<br>अपुत्राणां सपुत्राणां स्त्रीणामपि नराधिप॥ ५८<br>ततस्तानग्रतः स्थित्वा परिगृह्योदपात्रकम्।<br>वाजे वाज इति जपन् कुशाग्रेण विसर्जयेत्॥ ५९<br>बहिः प्रदक्षिणां कुर्यात् पदान्यष्टावनुव्रजन्।<br>बन्धुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासन्वितः॥ ६०कुशोंको विधिपूर्वक दक्षिणाभिमुख बिछा दे। तब श्राद्धकर्ता पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करके पहले (कुशोंपर) अवनेजन दे (पिण्डकी वेदीपर कुशसे जल छिड़के), फिर पितृ-यज्ञकी भाँति सभी प्रकारके अन्नोंसे बने हुए पिण्डोंको उन कुशोंपर रख दे। पुनः गन्ध, पुष्प आदिसे पिण्ड-पूजा करके उनपर प्रत्यवनेजनका जल छोड़े और बायाँ घुटना टेककर बायें हाथसे प्रदक्षिणा करे; फिर कुश हाथमें लेकर विधिपूर्वक पितृकार्य सम्पन्न करे। बुद्धिमान् श्राद्धकर्ताको पूर्वोक्त विधिके अनुसार दीप जलाना एवं पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर स्वयं भी आचमन करके उनके हाथोंपर एक-एक बार जल, पुष्प, अक्षत और तिलसहित अक्षय्योदक डालकर यथाशक्ति उन्हें दक्षिणा दे। पुनः कंजूसी छोड़कर पितरोंको प्रसन्न करते हुए गौ, पृथ्वी, सोना, वस्त्र, सुन्दर शय्याएँ तथा जो वस्तु अपने तथा पिताको अभीष्ट रही हो, वह सब ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। तदुपरान्त स्वधाका उच्चारण करके विद्वान् श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो विश्वेदेवोंको जल प्रदान करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करे। उस समय ब्राह्मणोंसे कहे—'हमारे पितर सौम्य हों।' पुनः ब्राह्मण लोग कहें—'सन्तु—हों'॥ ४०—५३॥<br><br>(पुनः यजमान कहे) 'हमारे गोत्रकी वृद्धि हो तथा हमारे दाताओंकी अभिवृद्धि हो।' यों कहे जानेपर पुनः वे ब्राह्मण कहें—'वैसा ही हो।' पुनः प्रार्थना करे—'ये आशीर्वाद सत्य हों।' ब्राह्मणलोग कहें—'सन्तु—(सत्य) हों'। पुनः उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और पिण्डोंको उठाकर भक्तिपूर्वक ग्रहबलि करे—यही धर्मकी मर्यादा है। जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण विसर्जित किये जाते हैं, तबतक सभी वस्तुएँ उच्छिष्ट रहती हैं। कपटरहित एवं आस्तिक ब्राह्मणोंका जूठन और पितृकार्यमें भूमिपर बिखरे हुए अन्न नौकरोंके भाग हैं—ऐसा कहा जाता है। नरेश्वर! पितरोंद्वारा व्यवस्थित यह तर्पणरूप कार्य पुत्रहीनों, पुत्रवानों तथा स्त्रियोंके लिये भी है। तदनन्तर ब्राह्मणोंको आगे खड़ा करके जलपात्रको हाथमें लेकर 'वाजे वाजे'—यों कहते हुए कुशोंके अग्रभागसे पितरोंका विसर्जन करे तथा बाहर जाकर पुत्र, स्त्री और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर आठ पग तक उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलकर उनकी प्रदक्षिणा करे।