मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १७ * | ७१ |
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| अन्नं तु सदधिक्षीरं गोघृतं शर्करान्वितम्।<br>मांसं प्रीणाति वै सर्वान् पितृन्नित्याह केशवः॥ ३०<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै॥ ३१<br>षण्मासं छागमांसेन तृप्यन्ति पितरस्तथा।<br>सप्त पार्षतमांसेन तथाष्टावैणजेन तु॥ ३२<br>दश मासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः।<br>शशकूर्मजमांसेन मासानेकादशैव तु॥ ३३<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।<br>रौरवेण च तृप्यन्ति मासान् पञ्चदशैव तु॥ ३४<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।<br>कालशाकेन चानन्ता खड्गमांसेन चैव हि॥ ३५<br>यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्।<br>दत्तमक्षयमित्याहुः पितरः पूर्वदेवताः॥ ३६<br>स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्यं पुराणान्यखिलानि च।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां सूक्तानि विविधानि च॥ ३७<br>इन्द्राग्निसोमसूक्तानि पावनानि स्वशक्तितः।<br>बृहद्रथन्तरं तद्वज्ज्येष्ठसाम सरौहिणम्॥ ३८<br>तथैव शान्तिकाध्यायं मधुब्राह्मणमेव च।<br>मण्डलं ब्राह्मणं तद्वत् प्रीतिकारि तु यत् पुनः॥ ३९<br>विप्राणामात्मनश्चैव तत् सर्वं समुदीरयेत्।<br>भुक्तवत्सु ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप॥ ४०<br>सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संन्नीयाप्लाव्य वारिणा।<br>समुत्सृजेद् भुक्तवतामग्रतो विकिरेद् भुवि॥ ४१<br>अग्निदग्धास्तु ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।<br>भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु प्रयान्तु परमां गतिम्॥ ४२<br>येषां न माता न पिता न बन्धु-<br>र्न गोत्रशुद्धिर्न तथान्नमस्ति।<br>तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्<br>प्रयान्तु लोकेषु सुखाय तद्वत्॥ ४३<br>असंस्कृतप्रमीतानां त्यक्तानां कुलयोषिताम्।<br>उच्छिष्टभागधेयः स्याद् दर्भे विकिरयोश्च यः॥ ४४<br>तृप्ता ज्ञात्वोदकं दद्यात् सकृद् विप्रकरे तथा।<br>उपलिप्ते महीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा॥ ४५ | हाथोंसे लाकर 'पूर्णरूपसे परिवेषण करे (परोसे)। पदार्थोंमें दही, दूध और शक्करमिश्रित अन्न तथा गोघृत, गोदुग्ध और खीर आदि जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। पितरलोग गृहस्थोंके प्रथम देवता हैं, इसलिये श्राद्धके अवसरपर पितृसम्बन्धी सूक्तोंका स्वाध्याय (पाठ), सम्पूर्ण पुराण, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके विभिन्न प्रकारके सूक्त, इन्द्र, अग्नि और सोमके पवित्र सूक्त, बृहद्रथन्तर, रौहिणसहित ज्येष्ठ साम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण और मण्डलब्राह्मण आदि तथा इसी प्रकारके अन्यान्य प्रीतिवर्धक सूक्तों या स्तोत्रोंका स्वयं अथवा ब्राह्मणोंद्वारा पाठ करना-करवाना चाहिये॥ १८—३९ ½ ॥<br><br>राजन्! उन ब्राह्मणोंके भोजन कर चुकनेपर उनके भोजनके संनिकट ही सभी वर्णोंके लिये नियत किये हुए अन्न आदि पदार्थोंको लाकर उन्हें जलसे परिपूर्ण कर भोजन करनेवालोंके समक्ष ही यह कहते हुए पृथ्वीपर बिखेर दे—'मेरे कुलमें (मृत्युके पश्चात्) जिन जीवोंका अग्नि-संस्कार हुआ हो अथवा जिनका अग्नि-संस्कार नहीं भी हुआ हो, वे सभी पृथ्वीपर बिखेरे हुए इस अन्नसे तृप्त हों और परम गतिको प्राप्त हों। जिनकी न माता है, न जिनके पिता या भाई-बन्धु हैं, न तो जिनकी गोत्र-शुद्धि हुई है तथा जिनके पास अन्न भी नहीं है, उनकी तृप्तिके निमित्त मैंने भूतलपर यह अन्न छींट दिया है, अतः वे भी (मेरे पितरोंकी भाँति) सुखभोगके लिये उत्तम लोकोंमें जायें। इसी प्रकार जो कुलवधुएँ बिना संस्कृत हुए ही मृत्युको प्राप्त हो गयी हैं अथवा जिनका परिवारवालोंने परित्याग कर दिया है, उनके लिये कुश-मूलमें लगा हुआ तथा विकिराका बचा हुआ उच्छिष्ट भाग ही हिस्सा है।' तदनन्तर ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर एक बार उनके हाथोंपर जल डाल दे। फिर गोबर, गोमूत्र और जलसे लिपी हुई भूमिपर |