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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
* अध्याय १७ *७१
अन्नं तु सदधिक्षीरं गोघृतं शर्करान्वितम्।<br>मांसं प्रीणाति वै सर्वान् पितृन्नित्याह केशवः॥ ३०<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनाथ पञ्च वै॥ ३१<br>षण्मासं छागमांसेन तृप्यन्ति पितरस्तथा।<br>सप्त पार्षतमांसेन तथाष्टावैणजेन तु॥ ३२<br>दश मासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः।<br>शशकूर्मजमांसेन मासानेकादशैव तु॥ ३३<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन च।<br>रौरवेण च तृप्यन्ति मासान् पञ्चदशैव तु॥ ३४<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी।<br>कालशाकेन चानन्ता खड्गमांसेन चैव हि॥ ३५<br>यत् किञ्चिन्मधुसंमिश्रं गोक्षीरं घृतपायसम्।<br>दत्तमक्षयमित्याहुः पितरः पूर्वदेवताः॥ ३६<br>स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्यं पुराणान्यखिलानि च।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणां सूक्तानि विविधानि च॥ ३७<br>इन्द्राग्निसोमसूक्तानि पावनानि स्वशक्तितः।<br>बृहद्रथन्तरं तद्वज्ज्येष्ठसाम सरौहिणम्॥ ३८<br>तथैव शान्तिकाध्यायं मधुब्राह्मणमेव च।<br>मण्डलं ब्राह्मणं तद्वत् प्रीतिकारि तु यत् पुनः॥ ३९<br>विप्राणामात्मनश्चैव तत् सर्वं समुदीरयेत्।<br>भुक्तवत्सु ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप॥ ४०<br>सार्ववर्णिकमन्नाद्यं संन्नीयाप्लाव्य वारिणा।<br>समुत्सृजेद् भुक्तवतामग्रतो विकिरेद् भुवि॥ ४१<br>अग्निदग्धास्तु ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।<br>भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु प्रयान्तु परमां गतिम्॥ ४२<br>येषां न माता न पिता न बन्धु-<br>र्न गोत्रशुद्धिर्न तथान्नमस्ति।<br>तत्तृप्तयेऽन्नं भुवि दत्तमेतत्<br>प्रयान्तु लोकेषु सुखाय तद्वत्॥ ४३<br>असंस्कृतप्रमीतानां त्यक्तानां कुलयोषिताम्।<br>उच्छिष्टभागधेयः स्याद् दर्भे विकिरयोश्च यः॥ ४४<br>तृप्ता ज्ञात्वोदकं दद्यात् सकृद् विप्रकरे तथा।<br>उपलिप्ते महीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा॥ ४५हाथोंसे लाकर 'पूर्णरूपसे परिवेषण करे (परोसे)। पदार्थोंमें दही, दूध और शक्करमिश्रित अन्न तथा गोघृत, गोदुग्ध और खीर आदि जो कुछ पितरोंके निमित्त दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। पितरलोग गृहस्थोंके प्रथम देवता हैं, इसलिये श्राद्धके अवसरपर पितृसम्बन्धी सूक्तोंका स्वाध्याय (पाठ), सम्पूर्ण पुराण, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके विभिन्न प्रकारके सूक्त, इन्द्र, अग्नि और सोमके पवित्र सूक्त, बृहद्रथन्तर, रौहिणसहित ज्येष्ठ साम, शान्तिकाध्याय, मधुब्राह्मण और मण्डलब्राह्मण आदि तथा इसी प्रकारके अन्यान्य प्रीतिवर्धक सूक्तों या स्तोत्रोंका स्वयं अथवा ब्राह्मणोंद्वारा पाठ करना-करवाना चाहिये॥ १८—३९ ½ ॥<br><br>राजन्! उन ब्राह्मणोंके भोजन कर चुकनेपर उनके भोजनके संनिकट ही सभी वर्णोंके लिये नियत किये हुए अन्न आदि पदार्थोंको लाकर उन्हें जलसे परिपूर्ण कर भोजन करनेवालोंके समक्ष ही यह कहते हुए पृथ्वीपर बिखेर दे—'मेरे कुलमें (मृत्युके पश्चात्) जिन जीवोंका अग्नि-संस्कार हुआ हो अथवा जिनका अग्नि-संस्कार नहीं भी हुआ हो, वे सभी पृथ्वीपर बिखेरे हुए इस अन्नसे तृप्त हों और परम गतिको प्राप्त हों। जिनकी न माता है, न जिनके पिता या भाई-बन्धु हैं, न तो जिनकी गोत्र-शुद्धि हुई है तथा जिनके पास अन्न भी नहीं है, उनकी तृप्तिके निमित्त मैंने भूतलपर यह अन्न छींट दिया है, अतः वे भी (मेरे पितरोंकी भाँति) सुखभोगके लिये उत्तम लोकोंमें जायें। इसी प्रकार जो कुलवधुएँ बिना संस्कृत हुए ही मृत्युको प्राप्त हो गयी हैं अथवा जिनका परिवारवालोंने परित्याग कर दिया है, उनके लिये कुश-मूलमें लगा हुआ तथा विकिराका बचा हुआ उच्छिष्ट भाग ही हिस्सा है।' तदनन्तर ब्राह्मणोंको तृप्त जानकर एक बार उनके हाथोंपर जल डाल दे। फिर गोबर, गोमूत्र और जलसे लिपी हुई भूमिपर

२१- ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन

७२* मत्स्यपुराण *
निधाय दर्भान् विधिवद् दक्षिणाग्रान् प्रयत्नतः।<br>सर्ववर्णेन चान्नेन पिण्डांस्तु पितृयज्ञवत्॥ ४६<br>अवनेजनपूर्वं तु नामगोत्रेण मानवः।<br>गन्धधूपादिकं दद्यात् कृत्वा प्रत्यवनेजनम्॥ ४७<br>जान्वाच्य सव्यं सव्येन पाणिनाथ प्रदक्षिणम्।<br>पित्र्यमानीय तत् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना॥ ४८<br>दीपप्रज्वालनं तद्वत् कुर्यात् पुष्पार्चनं बुधः।<br>अथाचान्तेषु चाचम्य वारि दद्यात् सकृत् सकृत्॥ ४९<br>अथ पुष्पाक्षतान् पश्चादक्षय्योदकमेव च।<br>सतिलं नामगोत्रेण दद्याच्छक्त्या च दक्षिणाम्॥ ५०<br>गोभूहिरण्यवासांसि भव्यानि शयनानि च।<br>दद्याद् यदिष्टं विप्राणामात्मनः पितुरेव च॥ ५१<br>वित्तशाठ्येन रहितः पितृभ्यः प्रीतिमावहन्।<br>ततः स्वधावाचनकं विश्वेदेवेषु चोदकम्॥ ५२<br>दत्त्वाशीः प्रतिगृह्णीयाद् विश्वेभ्यः प्राङ्मुखो बुधः।<br>अघोराः पितरः सन्तु सन्त्वित्युक्तः पुनर्द्विजैः॥ ५३<br>गोत्रं तथा वर्धतां नस्तथेत्युक्तश्च तैः पुनः।<br>दातारो नोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत्॥ ५४<br>एताः सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तश्च तैः पुनः।<br>स्वस्तिवाचनकं कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तितः॥ ५५<br>उच्छेषणं तु तत् तिष्ठेद् यावद् विप्रा विसर्जिताः।<br>ततो ग्रहबलिं कुर्यादिति धर्मव्यवस्थितिः॥ ५६<br>उच्छेषणं भूमिगतमजिह्मस्यास्तिकस्य च।<br>दासवर्गस्य तत् पित्र्यं भागधेयं प्रचक्षते॥ ५७<br>पितृभिर्निर्मितं पूर्वमेतदाप्यायनं सदा।<br>अपुत्राणां सपुत्राणां स्त्रीणामपि नराधिप॥ ५८<br>ततस्तानग्रतः स्थित्वा परिगृह्योदपात्रकम्।<br>वाजे वाज इति जपन् कुशाग्रेण विसर्जयेत्॥ ५९<br>बहिः प्रदक्षिणां कुर्यात् पदान्यष्टावनुव्रजन्।<br>बन्धुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासन्वितः॥ ६०कुशोंको विधिपूर्वक दक्षिणाभिमुख बिछा दे। तब श्राद्धकर्ता पिताके नाम और गोत्रका उच्चारण करके पहले (कुशोंपर) अवनेजन दे (पिण्डकी वेदीपर कुशसे जल छिड़के), फिर पितृ-यज्ञकी भाँति सभी प्रकारके अन्नोंसे बने हुए पिण्डोंको उन कुशोंपर रख दे। पुनः गन्ध, पुष्प आदिसे पिण्ड-पूजा करके उनपर प्रत्यवनेजनका जल छोड़े और बायाँ घुटना टेककर बायें हाथसे प्रदक्षिणा करे; फिर कुश हाथमें लेकर विधिपूर्वक पितृकार्य सम्पन्न करे। बुद्धिमान् श्राद्धकर्ताको पूर्वोक्त विधिके अनुसार दीप जलाना एवं पुष्पोंद्वारा पूजन करना चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंके आचमन कर लेनेपर स्वयं भी आचमन करके उनके हाथोंपर एक-एक बार जल, पुष्प, अक्षत और तिलसहित अक्षय्योदक डालकर यथाशक्ति उन्हें दक्षिणा दे। पुनः कंजूसी छोड़कर पितरोंको प्रसन्न करते हुए गौ, पृथ्वी, सोना, वस्त्र, सुन्दर शय्याएँ तथा जो वस्तु अपने तथा पिताको अभीष्ट रही हो, वह सब ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये। तदुपरान्त स्वधाका उच्चारण करके विद्वान् श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो विश्वेदेवोंको जल प्रदान करके उनसे आशीर्वाद ग्रहण करे। उस समय ब्राह्मणोंसे कहे—'हमारे पितर सौम्य हों।' पुनः ब्राह्मण लोग कहें—'सन्तु—हों'॥ ४०—५३॥<br><br>(पुनः यजमान कहे) 'हमारे गोत्रकी वृद्धि हो तथा हमारे दाताओंकी अभिवृद्धि हो।' यों कहे जानेपर पुनः वे ब्राह्मण कहें—'वैसा ही हो।' पुनः प्रार्थना करे—'ये आशीर्वाद सत्य हों।' ब्राह्मणलोग कहें—'सन्तु—(सत्य) हों'। पुनः उन ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये और पिण्डोंको उठाकर भक्तिपूर्वक ग्रहबलि करे—यही धर्मकी मर्यादा है। जबतक निमन्त्रित ब्राह्मण विसर्जित किये जाते हैं, तबतक सभी वस्तुएँ उच्छिष्ट रहती हैं। कपटरहित एवं आस्तिक ब्राह्मणोंका जूठन और पितृकार्यमें भूमिपर बिखरे हुए अन्न नौकरोंके भाग हैं—ऐसा कहा जाता है। नरेश्वर! पितरोंद्वारा व्यवस्थित यह तर्पणरूप कार्य पुत्रहीनों, पुत्रवानों तथा स्त्रियोंके लिये भी है। तदनन्तर ब्राह्मणोंको आगे खड़ा करके जलपात्रको हाथमें लेकर 'वाजे वाजे'—यों कहते हुए कुशोंके अग्रभागसे पितरोंका विसर्जन करे तथा बाहर जाकर पुत्र, स्त्री और भाई-बन्धुओंको साथ लेकर आठ पग तक उन ब्राह्मणोंके पीछे-पीछे चलकर उनकी प्रदक्षिणा करे।

* अध्याय १७ * ७३


| निवृत्य प्रणिपत्याथ पर्युक्ष्याग्निं समन्त्रवत्।<br>वैश्वदेवं प्रकुर्वीत नैत्यकं बलिमेव च॥ ६१<br><br>ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यसुतबान्धवः।<br>भुञ्जीतातिथिसंयुक्तः सर्वं पितृनिषेवितम्॥ ६२<br><br>एतच्चानुपनीतोऽपि कुर्यात् सर्वेषु पर्वसु।<br>श्राद्धं साधारणं नाम सर्वकामफलप्रदम्॥ ६३<br><br>भार्याविरहितोऽप्येतत् प्रवासस्थोऽपि भक्तिमान्।<br>शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः॥ ६४<br><br>तृतीयमाभ्युदयिकं वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते।<br>उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोद्वाहादिमङ्गले॥ ६५ | वहाँसे लौटकर अग्निको प्रणाम करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसका पर्युक्षण करे तथा वैश्वदेव और नित्य बलि प्रदान करे। वैश्वदेवबलि समाप्त कर लेनेके बाद अपने नौकर-चाकर, पुत्र, भाई-बन्धु और अतिथियोंके साथ सभी प्रकारके पितृ-सेवित (जिन्हें पहले पितरोंको समर्पित किया जा चुका है) पदार्थोंका भोजन करे। इस सामान्य पार्वण नामक श्राद्धको, जो सभी प्रकारके मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है, उपनयन-संस्कारसे रहित व्यक्ति भी सभी पर्वोंके अवसरपर कर सकता है। बुद्धिमान् पितृ-भक्त पुरुष पत्नीरहित अवस्थामें तथा परदेशमें स्थित रहनेपर भी इस श्राद्धका विधान कर सकता है। शूद्रको भी पूर्वोक्त विधिके अनुसार मन्त्ररहित ही इस श्राद्धको करनेका अधिकार है। ऋषियो! अब तीसरे प्रकारके पार्वण श्राद्धको, जो आभ्युदयिक वृद्धिश्राद्धके नामसे कहा जाता है, बतला रहा हूँ। यह श्राद्ध किसी उत्सव, हर्ष-संयोग, यज्ञ, विवाह आदिके शुभ अवसरपर किया जाता है॥ ५४—६५ ॥ | | मातरः प्रथमं पूज्याः पितरस्तदनन्तरम्।<br>ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च॥ ६६<br><br>प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकैः।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डान् दूर्वया च कुशैर्यतान्॥ ६७<br><br>सम्पन्नमित्यभ्युदये दद्यादर्घ्यं द्वयोर्द्वयोः।<br>युग्मा द्विजातयः पूज्या वस्त्रकार्त्तस्वरादिभिः॥ ६८<br><br>तिलार्थस्तु यवैः कार्यो नान्दीशब्दानुपूर्वकः।<br>माङ्गल्यानि च सर्वाणि वाचयेद् द्विजपुङ्गवैः॥ ६९<br><br>एवं शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सर्वदा।<br>नमस्कारेण मन्त्रेण कुर्यादामात्रतः सदा॥ ७०<br><br>दानप्रधानः शूद्रः स्यादित्याह भगवान् प्रभुः।<br>दानेन सर्वकामाप्तिरस्य संजायते यतः॥ ७१ | राजन्! इस श्राद्धमें प्रथमतः माताओंकी पूजा करके तत्पश्चात् पितरोंकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर मातामह (नाना) और विश्वेदेवोंके पूजनका विधान है। श्राद्धकर्ता पूर्वाभिमुख हो प्रदक्षिणा करके दही, अक्षत, फल और जल आदि सामग्री-समेत दूर्वा और कुशोंसे संयुक्त पिण्डोंको समर्पित करे। इस आभ्युदयिक श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके दोनों प्रकारके पितरोंको अर्घ्य प्रदान करे। उस समय वस्त्र, सुवर्ण आदि सामग्रियोंसे दो ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। तिलके स्थानपर 'नान्दी' शब्दके उच्चारणपूर्वक यवसे ही कार्य सम्पन्न करे और श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणोंद्वारा सभी प्रकारके माङ्गलिक सूक्तों अथवा स्तोत्रोंका पाठ कराये। इसी प्रकार इस सामान्य वृद्धिश्राद्धमें शूद्र भी सदा-सर्वदा नमस्काररूपी मन्त्रके उच्चारणसे तथा आमान्न-दानसे (बिना पके हुए कच्चे अन्नके दानसे) कार्य सम्पन्न कर सकता है। शूद्रको विशेषरूपसे दानप्रधान (दानमें तत्पर, दानशील) होना चाहिये; क्योंकि दानसे उसके सभी मनोरथोंकी पूर्ति हो जाती है—ऐसा सर्वसमर्थ भगवान्ने कहा है॥ ६६—७१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे साधारणाभ्युदयकीर्तनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें साधारणाभ्युदयश्राद्ध-वर्णन नामक सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १७॥

७४ * मत्स्यपुराण *


अठारहवाँ अध्याय

एकोद्दिष्ट और सपिण्डीकरण श्राद्धकी विधि

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके उपरान्त अब मैं उस 'एकोद्दिष्ट'¹ श्राद्धकी विधि बतला रहा हूँ, जिसका वर्णन स्वयं भगवान् चक्रपाणि विष्णुने किया है। पिताकी मृत्यु हो जानेपर पुत्रोंको शौचपर्यन्त जैसा कार्य करना चाहिये, उसे सुनिये॥ १॥
एकोद्दिष्टमतो वक्ष्ये यदुक्तं चक्रपाणिना।<br>मृते पुत्रैर्यथा कार्यमाशौचं च पितर्यपि॥ १ब्राह्मणोंमें दस दिनके अशौचका विधान है। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें बारह दिनका, वैश्योंमें पन्द्रह दिनका और शूद्रोंमें एक मासका अशौच लगता है। इस अशौचका विधान सगोत्रमें ही किया गया है। जिसका मुण्डन-संस्कार नहीं हुआ हो, ऐसे बच्चेका मरणाशौच एक राततक तथा इससे बड़ी अवस्थावालेका तीन राततक बतलाया गया है। इसी प्रकार जननाशौच भी सर्वदा सभी वर्णोंके लिये होता है। मरणाशौचमें अस्थिसञ्चयनके उपरान्त (परिवारवालोंका) अङ्गस्पर्श करनेका विधान है। प्रेतात्माके लिये बारह दिनोंतक पिण्डदान करना चाहिये; क्योंकि वे पिण्ड उस प्रेतके लिये पाथेय (मार्गका कलेवा) बतलाये गये हैं, अतः अतिशय सुखदायी होते हैं। इसी कारण वह प्रेतात्मा बारह दिनोंतक प्रेतपुर (यमपुरी)—को नहीं ले जाया जाता। वह बारह दिनोंतक अपने गृह, पुत्र और पत्नीको देखता रहता है। इसलिये उसके समस्त दाहोंकी शान्ति तथा मार्गकी थकावटका विनाश करनेके निमित्त दस राततक आकाशमें (पीपलके वृक्षमें बँधा हुआ) जलघट रखना चाहिये। तत्पश्चात् ग्यारहवें दिन ग्यारह ब्राह्मणोंको भोजन करावे। इसी प्रकार क्षत्रिय आदि अन्य वर्णवालोंको भी अपने-अपने सूतककी समाप्तिपर (विषम-संख्यक) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पुनः दूसरे अर्थात् बारहवें दिन पूर्ववत् विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्धका समारम्भ करे। इसमें आवाहन, अग्निमें पिण्डदान तथा विश्वेदेवोंका पूजन निषिद्ध है। इस श्राद्धमें एक ही पवित्रक, एक ही अर्घ्य और एक ही पिण्डका विधान है। इसके पश्चात् 'उपतिष्ठताम्' इस शब्दका उच्चारण करके तिलसहित जल प्रदान करे और 'स्वदितम्०' इस सम्पूर्ण मन्त्रको बोलकर अन्नको पृथ्वीपर बिखेर दे तथा विसर्जनके समय 'अभिरम्यताम्' ऐसा कहे। इस प्रकार वेदज्ञ पुत्रको अपने पिताका शेष श्राद्ध-कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। इसी विधिसे प्रतिमास (पिताकी मृत्यु-तिथिपर) सारा कार्य सम्पादित करना चाहिये। सूतक समाप्त होनेके पश्चात् दूसरे दिन
दशाहं शावमाशौचं ब्राह्मणेषु विधीयते।<br>क्षत्रियेषु दश द्वे च पक्षं वैश्येषु चैव हि॥ २
शूद्रेषु मासमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते।<br>नैशं वाकृतचूडस्य त्रिरात्रं परतः स्मृतम्॥ ३
जननेऽप्येवमेव स्यात् सर्ववर्णेषु सर्वदा।<br>तथास्थिसञ्चयनादूर्ध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते॥ ४
प्रेताय पिण्डदानं तु द्वादशाहं समाचरेत्।<br>पाथेयं तस्य तत् प्रोक्तं यतः प्रीतिकरं महत्॥ ५
तस्मात् प्रेतपुरं प्रेतो द्वादशाहं¹ न नीयते।<br>गृहं पुत्रं कलत्रं च द्वादशाहं प्रपश्यति॥ ६
तस्मान्निधेयमाकाशे दशरात्रं पयस्तथा।<br>सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥ ७
तत एकादशाहे तु द्विजानेकादशैव तु।<br>क्षत्रादिः सूतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान्॥ ८
द्वितीयेऽह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्टं समाचरेत्।<br>आवाहनाग्नौकरणं दैवहीनं विधानतः॥ ९
एकं पवित्रमेकोऽर्घ्य एकः पिण्डो विधीयते।<br>उपत्तिष्ठतामित्येतद् देयं पश्चात्तिलोदकम्॥ १०
स्वदितं विकिरेद् ब्रूयाद् विसर्गे चाभिरम्यताम्।<br>शेषं पूर्ववदत्रापि कार्यं वेदविदा पितुः॥ ११
अनेन विधिना सर्वमनुमासं समाचरेत्।<br>सूतकान्ताद् द्वितीयेऽह्नि शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ १२

१. 'कहीं-कहीं द्वादशाहेन नीयते' पाठ भी है। वहाँ १२ दिनोंमें यमपुरी या पितृपुर ले जाया जाता है, ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
२. पिता आदि केवल एक व्यक्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाला श्राद्ध 'एकोद्दिष्ट' है।

* अध्याय १८ * ७५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
काञ्चनं पुरुषं तद्वत् फलवस्त्रसमन्वितम्।<br>सम्पूज्य द्विजदाम्पत्यं नानाभरणभूषणैः॥ १३<br><br>वृषोत्सर्गं प्रकुर्वीत देया च कपिला शुभा।<br>उदकुम्भश्च दातव्यो भक्ष्यभोज्यसमन्वितः॥ १४<br><br>यावदब्दं नरश्रेष्ठ सतिलोदकपूर्वकम्।<br>ततः संवत्सरे पूर्णे सपिण्डीकरणं भवेत्॥ १५<br><br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं प्रेतः पार्वणभाग् भवेत्।<br>वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्ततः॥ १६काञ्चनपुरुष (सोनेकी प्रतिमा) और फल-वस्त्रसे समन्वित विलक्षण शय्याका दान करना चाहिये। उसी समय अनेकविध वस्त्राभूषणोंसे द्विज-दम्पतीका पूजन करे। तत्पश्चात् वृषोत्सर्ग (साँड़ छोड़ने)-का काम सम्पन्न करे। उस समय एक सुन्दर कपिला गौका दान करे। नरश्रेष्ठ! पुनः अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंसे युक्त एक जलपात्र, जो तिल और जलसे परिपूर्ण हो, दान करे। इस प्रकारके जलपात्रका दान वर्षपर्यन्त करना चाहिये। इस तरह एक वर्ष पूर्ण होनेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध किया जाता है। सपिण्डीकरण श्राद्धके पश्चात् प्रेतात्मा पार्वणश्राद्धका भागी हो जाता है तथा पूर्वकथित आभ्युदयिक आदि वृद्धि श्राद्धोंमें भाग पानेके योग्य एवं गृहस्थ हो जाता है॥ २—१६॥
सपिण्डीकरणे श्राद्धे देवपूर्वं नियोजयेत्।<br>पितॄनेवासयेत् तत्र पृथक् प्रेतं विनिर्दिशेत्॥ १७<br><br>गन्धोदकतिलैर्युक्तं कुर्यात् पात्रचतुष्टयम्।<br>अर्घार्थं पितृपात्रेषु प्रेतपात्रं प्रसेचयेत्॥ १८<br><br>तद्वत् संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तथा।<br>ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यं तु विभजेत् तथा॥ १९<br><br>चतुर्थस्य पुनः कार्यं न कदाचिदतो भवेत्।<br>ततः पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः॥ २०<br><br>अग्निष्वात्तादिमध्यत्वं प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम्।<br>सपिण्डीकरणादूर्ध्वं तस्मै तस्मान्न दीयते॥ २१<br><br>पितृष्वेव तु दातव्यं तत्पिण्डो येषु संस्थितः।<br>ततः प्रभृति संक्रान्तावुपरागादिपर्वसु॥ २२<br><br>त्रिपिण्डमाचरेच्छ्राद्धमेकोद्दिष्टे मृतेऽहनि।<br>एकोद्दिष्टं परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत्॥ २३<br><br>सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशकः।<br>मृताहे पार्वणं कुर्वन्नधोऽधो याति मानवः॥ २४<br><br>सम्पृक्तेष्वाकुलीभावः प्रेतेषु तु यतो भवेत्।<br>प्रतिसंवत्सरं तस्मादेकोद्दिष्टं समाचरेत्॥ २५सपिण्डीकरण श्राद्धमें सर्वप्रथम विश्वेदेवोंको नियुक्त करे। तत्पश्चात् पितरोंको स्थान दे और प्रेतका स्थान उनसे अलग निश्चित करे। फिर अर्घ्य देनेके लिये चन्दन, जल और तिलसे युक्त चार पात्र तैयार करे और प्रेतपात्रके जलसे पितृपात्रोंको सिक्त कर दे। (अर्थात् प्रेतपात्रके जलको तीन भागमें विभक्त करके उन्हें पितृपात्रोंमें डाल दे।) इसी प्रकार पिण्डदाता चार पिण्डोंका निर्माण करके उन्हें संकल्पपूर्वक (पितरों और प्रेतके स्थानोंपर पृथक्-पृथक्) रख दे। फिर 'ये समानाः०' (वाजस० १९।४५-४६)—इन दो मन्त्रोंद्वारा अन्तके (चौथे प्रेतके) पिण्डको (स्वर्णशलाका या कुशसे) तीन भागोंमें विभक्त कर दे (और एक-एक भागको क्रमशः पितरोंके पिण्डोंमें मिला दे)। इसके पश्चात् उस चौथे पिण्डका कहीं भी कोई उपयोग नहीं रह जाता। इसके बाद वह प्रेतात्मा सब ओरसे संतुष्ट होकर पितृरूपमें परिवर्तित हो जाता है और 'अग्निष्वात्त' आदि देवपितरोंके मध्य उत्तम एवं अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है। इसी कारण सपिण्डीकरणके पश्चात् उसे कुछ नहीं दिया जाता। वह प्रेतात्मा जिन पितरोंके बीच स्थित है, उसके पिण्डके तीनों भागोंको उन्हीं पितरोंके पिण्डोंमें मिला देना चाहिये। तत्पश्चात् संक्रान्ति अथवा ग्रहण आदि पर्वोंके समय त्रिपिण्ड श्राद्ध ही करना चाहिये। एकोद्दिष्ट श्राद्धको प्रेतात्माकी मृत्युके दिन करनेका विधान है। जो श्राद्धकर्ता पिताकी मृत्युतिथिपर एकोद्दिष्ट श्राद्धका परित्याग कर (केवल) अन्य श्राद्धोंको करता है, वह सदैव पितृघाती तथा माता और भाईका विनाशक हो जाता है। पिताकी क्षयातिथिपर पार्वण श्राद्ध करनेवाला मानव अधम-से-अधम गतिको प्राप्त होता है। चूँकि प्रेतोंसे सम्बन्धित हो जानेसे पितृगण व्याकुल हो जाते हैं, इसलिये प्रतिवर्ष एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये।

२२- श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन

७६* मत्स्यपुराण *

| यावदब्दं तु यो दद्यादुदकुम्भं विमत्सरः।<br>प्रेतायान्नसमायुक्तं सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ २६<br><br>आमश्राद्धं यदा कुर्याद् विधिज्ञः श्राद्धदस्तदा।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ २७<br><br>त्रिभिः सपिण्डीकरणे अशेषत्रितये पिता।<br>यदा प्राप्स्यति कालेन तदा मुच्येत बन्धनात्॥ २८<br><br>मुक्तोऽपि लेपभागित्वं प्राप्नोति कुशमार्जनात्।<br><br>लेपभाजश्चतुर्थाद्याः पित्राद्याः पिण्डभागिनः।<br>पिण्डदः सप्तमस्तेषां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ २९ | जो मनुष्य मत्सररहित होकर वर्षपर्यन्त प्रेतके निमित्त अन्न आदि पदार्थोंसे युक्त जलपात्र दान करता रहता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। विधियोंका ज्ञाता श्राद्धकर्ता जब आमश्राद्ध (जिसमें ब्राह्मणोंको भोजन न कराकर कच्चा अन्न दिया जाता है) करे तो विधिपूर्वक अग्निकरण करे और उसी समय पिण्डदान भी करे। जब पिता सपिण्डीकरण श्राद्धमें अपने पिता, पितामह, प्रपितामहके साथ सम्बन्ध प्राप्त कर लेता है, तब वह बन्धनसे मुक्त हो जाता है। मुक्त होनेपर भी वह कुशके मार्जनसे लेपभागी हो जाता है। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चमसहित तीन पितर लेपभागी और पिता आदि तीन पिण्डभागी हैं। उनमें पिण्डदाता सातवीं संतान है। इस प्रकार सात पीढ़ीतक सपिण्डता मानी जाती है॥ २७—२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सपिण्डीकरणकल्पो नामाष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें सपिण्डीकरण नामक अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

श्राद्धोंमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्यकी प्राप्तिका विवरण

| ऋषय ऊचुः<br><br>कथं कव्यानि देयानि हव्यानि च जनैरिह।<br>गच्छन्ति पितृलोकस्थान् प्रापकः कोऽत्र गद्यते॥ १<br><br>यदि मर्त्यो द्विजो भुङ्क्ते हूयते यदि वानले।<br>शुभाशुभात्मकैः प्रेतैर्दत्तं तद् भुज्यते कथम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! मनुष्योंको (पितरोंके निमित्त) हव्य और कव्य किस प्रकार देना चाहिये? इस मृत्युलोकमें पितरोंके लिये प्रदान किये गये हव्य-कव्य पितृलोकमें स्थित पितरोंके पास कैसे पहुँच जाते हैं? यहाँ उनको पहुँचानेवाला कौन कहा गया है? यदि मृत्युलोकवासी ब्राह्मण उन्हें खा जाता है अथवा अग्निमें उनकी आहुति दे दी जाती है तो अपने कर्मानुसार शुभ एवं अशुभ योनियोंमें गये हुए प्रेतोंद्वारा उस पदार्थका उपभोग कैसे किया जाता है?॥ १-२॥ |

* अध्याय १९ * ७७


सूत उवाच
वसून् वदन्ति च पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान्।<br>प्रपितामहांस्तथादित्यानित्येवं वैदिकी श्रुतिः॥ ३<br><br>नाम गोत्रं पितॄणां तु प्रापकं हव्यकव्ययोः।<br>श्राद्धस्य मन्त्राः श्रद्धा च उपयोज्यातिभक्तितः॥ ४<br><br>अग्निष्वात्तादयस्तेषामधिपत्ये व्यवस्थिताः।<br>नामगोत्रकालदेशा भवान्तरगतानपि॥ ५<br><br>प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान्।<br>देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः॥ ६<br><br>तस्यान्नममृतं भूत्वा दिव्यत्वेऽप्यनुगच्छति।<br>दैत्यत्वे भोगरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्॥ ७<br><br>श्राद्धान्नं वायुरूपेण सर्पत्वेऽप्युपतिष्ठति।<br>पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषम्॥ ८<br><br>दनुजत्वे तथा माया प्रेतत्वे रुधिरोदकम्।<br>मनुष्यत्वेऽन्नपानानि नानाभोगरसं भवेत्॥ ९<br><br>रतिशक्तिः स्त्रियः कान्ता भोज्यं भोजनशक्तिता।<br>दानशक्तिः सविभवा रूपमारोग्यमेव च॥ १०<br><br>श्रद्धापुष्पमिदं प्रोक्तं फलं ब्रह्मसमागमः।<br>आयुः पुत्रान् धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ११<br><br>राज्यं चैव प्रयच्छन्ति प्रीताः पितृगणा नृणाम्।<br><br>श्रूयते च पुरा मोक्षं प्राप्ताः कौशिकसूनवः।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैर्गता विष्णोः परं पदम्॥ १२**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पितरोंको वसुगण, पितामहोंको रुद्रगण तथा प्रपितामहोंको आदित्यगण कहा जाता है—ऐसी वैदिकी श्रुति है। पितरोंके नाम और गोत्र (उनके निमित्त प्रदान किये गये) हव्य-कव्यको उनके पास पहुँचानेवाले हैं। अतिशय भक्तिपूर्वक उच्चरित श्राद्धके मन्त्र भी कारण हैं एवं श्रद्धाके उपयोग भी हेतु है। अग्निष्वात्त आदि पितरोंके आधिपत्य-पदपर स्थित हैं। उन देव-पितरोंके समक्ष जो खाद्य पदार्थ पितरोंका नाम, गोत्र, काल और देशका उच्चारण करके श्रद्धासे अर्पित किया जाता है, वह पितृगणोंको यदि वे जन्मान्तरमें भी गये हुए हों तो भी उन्हें तृप्त कर देता है। वह उस समय उस योनिके लिये उपयुक्त आहारके रूपमें परिणत हो जाता है। यदि शुभ कर्मोंके प्रभावसे पिता देवयोनिमें उत्पन्न हो गये हैं तो उनके उद्देश्यसे दिया गया अन्न अमृत होकर देवयोनिमें भी उन्हें प्राप्त होता है। वह श्राद्धान्न दैत्ययोनिमें भोगरूपमें और पशुयोनिमें तृणरूपमें बदल जाता है। सर्पयोनिमें वह वायुरूपसे सर्पके निकट पहुँचता है। यक्ष-योनिमें वह पीनेवाला पदार्थ तथा राक्षस्योनिमें मांस हो जाता है। दनुजयोनिमें मायारूपमें, प्रेतयोनिमें रुधिर और जलके रूपमें तथा मानवयोनिमें नाना प्रकारके भोग-रसोंसे युक्त अन्न-पानादिके रूपमें परिवर्तित हो जाता है। रमण करनेकी शक्ति, सुन्दरी स्त्रियाँ, भोजन करनेके पदार्थ, भोजन पचानेकी शक्ति, प्रचुर सम्पत्तिके साथ-साथ दान देनेकी निष्ठा, सुन्दर रूप और स्वास्थ्य—ये सभी श्रद्धारूपी वृक्षके पुष्प बतलाये गये हैं और ब्रह्मप्राप्ति उसका फल है। पितृगण प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, अनेक पुत्र, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख और राज्य प्रदान करते हैं। सुना जाता है कि कौशिकके पुत्र पूर्वकालमें (श्राद्धके प्रभावसे व्याध, मृग, चक्रवाक आदि योनियोंमें) पाँच बार जन्म लेनेके पश्चात् मुक्त होकर भगवान् विष्णुके परमपद वैकुण्ठलोकको चले गये थे॥ ३–१२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे फलानुगमनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें फलानुगमन नामक उन्नीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १९॥

७८ * मत्स्यपुराण *


बीसवाँ अध्याय

महर्षि कौशिकके पुत्रोंका वृत्तान्त तथा पिपीलिकाकी कथा

ऋषय ऊचुःऋषियोंने पूछा—
कथं कौशिकदायादाः प्राप्तास्ते योगमुत्तमम्।<br>पञ्चभिर्जन्मसम्बन्धैः कथं कर्मक्षयो भवेत्॥ १सूतजी! महर्षि कौशिकके* वे पुत्र किस प्रकार उत्तम योगको प्राप्त हुए तथा पाँच ही बार जन्म ग्रहण करनेसे उनके अशुभ कर्मोंका विनाश कैसे हुआ?॥ १॥
सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! कुरुक्षेत्रमें कौशिक नामक एक धर्मात्मा महर्षि थे। उनके सात पुत्र थे। (उन पुत्रोंके वृत्तान्त) नाम एवं कर्मानुसार बतला रहा हूँ, सुनिये।
कौशिको नाम धर्मात्मा कुरुक्षेत्रे महानृषिः।<br>नामतः कर्मतस्तस्य सुतान् सप्त निबोधत॥ २उनके स्वसृप, क्रोधन, हिंस्र, पिशुन, कवि, वाग्दुष्ट और पितृवर्ती—ये नाम थे। पिताकी मृत्युके पश्चात् वे सभी महर्षि गर्गके शिष्य हुए।
स्वसृपः क्रोधनो हिंस्रः पिशुनः कविरेव च।<br>वाग्दुष्टः पितृवर्ती च गर्गशिष्यास्तदाभवन्॥ ३उस समय समस्त लोकोंको भयभीत करनेवाली महती अनावृष्टि हुई, जिसके कारण भीषण अकाल पड़ गया।
पितर्युपरते तेषामभूद् दुर्भिक्षमुल्बणम्।<br>अनावृष्टिश्च महती सर्वलोकभयंकारी॥ ४इसी बीच वे सभी तपस्वी अपने गुरु गर्गाचार्यकी आज्ञासे उनकी सेवामें लग गये। वहाँ वनमें वे सभी भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो गये।
गर्गादेशाद् वने दोग्ध्रीं रक्षन्तस्ते तपोधनाः।<br>खादामः कपिलामेतां वयं क्षुत्पीडिता भृशम्॥ ५जब क्षुधा-शान्तिका कोई अन्य उपाय न सूझा, तब छोटे भाई पितृवर्तीने श्राद्ध-कर्म करनेकी सम्मति दी।
इति चिन्तयतां पापं लघुः प्राह तदानुजः।<br>यद्यवश्यमियं वध्या श्राद्धरूपेण योज्यताम्॥ ६बड़े भाइयोंने ‘अच्छा, ऐसा ही करो’—ऐसी आज्ञा पाकर
श्राद्धे नियोज्यमानेयं पापात् त्रास्यति नो ध्रुवम्।<br>एवं कुर्वित्यनुज्ञातः पितृवर्ती तदाग्रजैः॥ ७पितृवर्तीने समाहित-चित्त होकर श्राद्धका उपक्रम आरम्भ किया। उस समय उसने छोटे-बड़ेके क्रमसे दो भाइयोंको देव-कार्यमें, तीनको पितृकार्यमें और एकको अतिथिरूपमें नियुक्त किया तथा स्वयं श्राद्धकर्ता बन गया।
चक्रे समाहितः श्राद्धमुपयुज्य च तां पुनः।<br>द्वौ दैवे भ्रातरौ कृत्वा पित्रे त्रीनप्यनुक्रमात्॥ ८इस प्रकार पितृपरायण पितृवर्तीने पितरोंका स्मरण करते हुए मन्त्रोच्चारणपूर्वक श्राद्धकार्य सम्पन्न किया।
तथैकमतिथिं कृत्वा श्राद्धदः स्वयमेव तु।<br>चकार मन्त्रवच्छ्राद्धं स्मरन् पितृपरायणः॥ ९कालक्रमानुसार मृत्युके उपरान्त श्राद्धवैगुण्यरूप कर्मदोषसे वे सभी दाशपुर (मन्दसौर) नामक नगरमें बहेलिया होकर उत्पन्न हुए, किंतु पितृ-स्नेह (श्राद्धकृत्य)-से भावित होनेके कारण उन्हें पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंका स्मरण बना रहा।
विना गवां वत्सकोऽपि गुरवे विनिवेदितः।<br>व्याघ्रेण निहता धेनुर्वत्सोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ १०पूर्वजन्मके कर्मोंके परिणाम-स्वरूप वे क्रूरकर्मी बहेलियोंके घरमें पैदा तो हुए,
एवं सा भक्षिता धेनुः सप्तभिस्तैस्तपोधनैः।<br>वैदिकं बलमाश्रित्य क्रूरे कर्मणि निर्भयाः॥ ११
ततः कालावकृष्टास्ते व्याधा दाशपुरेऽभवन्।<br>जातिस्मरत्वं प्राप्तास्ते पितृभावेन भाविताः॥ १२
यत् कृतं क्रूरकर्माणिश्राद्धरूपेण तैस्तदा।<br>तेन ते भवने जाता व्याधानां क्रूरकर्मणाम्॥ १३

* कौशिक नामके प्राचीन समयमें १०—१२ व्यक्ति हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। पर ये उनसे भिन्न हैं। विश्वामित्रका सम्बन्ध बिहारसे लेकर कन्नौजतक रहा है, पर ये कुरुक्षेत्रवासी हैं। यह कथा पद्मपुराण १।१०, हरिवंश १।२१—२७ आदिमें भी है। और इसका संकेत गरुडपु० १।२१०।२०-२१ आदि बीसों स्थलोंपर है।

* अध्याय २० * ७९

| पितॄणां चैव माहात्म्याज्जाता जातिस्मरास्तु ते।<br>ते तु वैराग्ययोगेन आस्थायानशनं पुनः॥ १४<br>जातिस्मराः सप्त जाता मृगाः कालञ्जरे गिरौ।<br>नीलकण्ठस्य पुरतः पितृभावानुभाविताः ॥ १५<br>तत्रापि ज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्य धर्मतः।<br>लोकैरवेक्ष्यमाणास्ते तीर्थान्तेऽनशनेन तु॥ १६<br>मानसे चक्रवाकास्ते सञ्जाताः सप्त योगिनः।<br>नामतः कर्मतः सर्वाञ्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥ १७<br>सुमनाः कुमुदः शुद्धश्छिद्रदर्शी सुनेत्रकः।<br>सुनेत्रांशुमांश्चैव सप्तैते योगपारगाः ॥ १८<br>योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभ्रमुश्चाल्पचेतनाः।<br>दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम्॥ १९<br>क्रीडन्तं विविधैर्भावैर्महाबलपराक्रमम्।<br>पाञ्चालान्वयसम्भूतं प्रभूतबलवाहनम्॥ २०<br>राज्यकामोऽभवच्चैकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्।<br>पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत् पितृवत्सलः॥ २१<br>अपरौ मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ।<br>मन्त्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन् मर्त्ये द्विजोत्तमाः॥ २२<br>तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते बभूवुर्द्विजोत्तमाः।<br>विभ्राजपुत्रस्त्वेकोऽभूद् ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥ २३<br>मन्त्रिपुत्रौ तथा चोभौ कण्डरीकसुबालकौ।<br>ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्तः सन् पुरोहितविपश्चिता॥ २४<br>पाञ्चालराजो विक्रान्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>योगिवत् सर्वजन्तूनां रुतवेत्ताभवत् तदा॥ २५<br>तस्य राज्ञोऽभवद् भार्या देवलस्यात्मजा शुभा।<br>संनतिर्नाम विख्याता कपिला याभवत् पुरा॥ २६<br>पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद् ब्रह्मवादिनी।<br>तया चकार सहितः स राज्यं राजनन्दनः॥ २७<br>कदाचिदुद्यानगतस्तया सह स पार्थिवः।<br>ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम्॥ २८<br>पिपीलिकामनुनयन् परितः कीटकामुकः।<br>पञ्चबाणाभितप्ताङ्गः सगद्गदमुवाच ह॥ २९ | परंतु पितरोंके ही माहात्म्यसे वे सभी जातिस्मर (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञाता) बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्मके फलसे वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन सभीने अनशन करके अपने-अपने उस शरीरका त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वतपर भगवान् नीलकण्ठके समक्ष मृग-योनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरोंके स्नेहसे अनुभावित होनेके कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनिमें भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन लोगोंने तीर्थ-स्थानमें अनशन करके लोगोंके देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनोंने मानसरोवरमें चक्रवाककी योनिमें जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आपलोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभीका वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनिमें उनके नाम हैं—सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योगके पारदर्शी थे। इनमेंसे अल्पबुद्धिवाले तीन तो योगसे भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यानमें स्त्रियोंके साथ अनेकविध हाव-भावोंसे क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजाको देखकर उन जलपक्षियोंमेंसे एकको, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्तिकी आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनोंने राजाके दो मन्त्रियोंको प्रचुर सेना और वाहनोंसे युक्त देखकर इस मृत्युलोकमें मन्त्रि-पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए। उन तीनोंमेंसे पहला राजा विभ्राजके* पुत्ररूपमें ब्रह्मदत्त नामसे विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नामसे मन्त्रीके पुत्र हुए। (राजा विभ्राजकी मृत्युके उपरान्त) विद्वान् पुरोहितने ब्रह्मदत्तको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रोंमें प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओंकी बोलीका ज्ञाता था। देवलकी सुन्दरी कन्या, जो संनति नामसे विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्तकी पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नीके साथ रहकर राजकुमार ब्रह्मदत्त राज्य-भार सँभालने लगा ॥ २—२७॥<br><br>एक बार राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनतिके साथ भ्रमण करनेके लिये उद्यानमें गया। वहाँ उसने काम-कलहसे व्याकुल एक कीट-दम्पति (चींटा-चींटी)-को देखा। वह कीट, जिसका शरीर कामदेवके बाणोंसे संतप्त हो उठा था, चारों ओरसे चींटीसे अनुनय-विनय करता हुआ गद्गद वाणीमें बोला— |


* इसका कहीं अणुह तथा कहीं नीप नाम भी आया है।

८० * मत्स्यपुराण *

| न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्।<br>मध्यक्षामातिजघना बृहद्वक्षोऽभिगामिनी ॥ ३०<br><br>सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारुहासिनी।<br>सुलक्ष्यनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला ॥ ३१<br><br>भोक्ष्यसे मयि भुङ्क्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि।<br>प्रोषिते सति दीना त्वं क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला ॥ ३२<br><br>किमर्थं वद कल्याणि सरोषवदना स्थिता।<br>सा तमाह सकोपा तु किमालपसि मां शठ ॥ ३३<br><br>त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय विनेष्यता।<br>प्रदत्तं समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्याः समन्मथ ॥ ३४<br><br>पिपीलिक उवाच<br>त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि।<br>तदेकमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ ३५<br><br>नैतदेवं करिष्यामि पुनः क्वापीह सुव्रते।<br>स्पृशामि पादौ सत्येन प्रसीद प्रणतस्य मे ॥ ३६<br><br>सूत उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत् ततः।<br>आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका ॥ ३७<br><br>ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषं तं ज्ञात्वा विस्मयमागमत्।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञत्वात् प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ३८ | 'प्रिये! इस जगत्में तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री कहीं कोई भी नहीं है। तुम्हारा कटिप्रदेश पतला और जंघे मोटे हैं, तुम स्तनोंके भारी भारसे विनम्र होकर चलनेवाली, स्वर्णके समान गौरवर्णा, सुन्दर कमरवाली, मृदुभाषिणी, मनोहर हास्यसे युक्त, भलीभाँति लक्ष्यको भेदन करनेवाले नेत्रों और जीभसे समन्वित तथा गुड़ और शक्करकी प्रेमी हो। तुम मेरे भोजन कर लेनेके पश्चात् भोजन करती हो तथा मेरे स्नान कर लेनेपर स्नान करती हो। इसी प्रकार मेरे परदेश चले जानेपर तुम दीन हो जाती हो और क्रुद्ध होनेपर भयभीत हो उठती हो। कल्याणि! बतलाओ तो सही, तुम किस कारण क्रोधसे मुँह फुलाये बैठी हो।' तब क्रोधसे भरी हुई चींटी उस कीटसे बोली—'शठ! तुम क्या मुझसे व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? अरे धूर्त! अभी कल ही तुमने मेरा परित्याग करके लड्डूका चूर्ण ले जाकर दूसरी चींटीको नहीं दिया है?'॥ २८—३४॥<br><br>चींटा बोला—वरवर्णिनि! तुम्हारे सदृश रूप-रंगवाली होनेके कारण मैंने भूलसे दूसरी चींटीको लड्डू दे दिया है, अतः भामिनि! तुम मेरे इस एक अपराधको क्षमा कर दो। सुव्रते! मैं पुनः कभी भी इस प्रकारका कार्य नहीं करूँगा। मैं सत्यकी दुहाई देकर तुम्हारे चरण छूता हूँ, तुम मुझ विनीतपर प्रसन्न हो जाओ॥ ३५-३६॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उस चींटेका कथन सुनकर वह चींटी प्रसन्न हो गयी। इधर, चक्रपाणि भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता होनेके कारण ब्रह्मदत्त भी उस सारे वृत्तान्तको जानकर विस्मयविमुग्ध हो गये॥ ३७-३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पके श्राद्धमाहात्म्यमें पिपीलिकावहास नामक बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन

| ऋषय ऊचुः<br>कथं सत्त्वरुतज्ञोऽभूद् ब्रह्मदत्तो धरातले।<br>तच्चाभवत् कस्य कुले चक्रवाकचतुष्टयम् ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>तस्मिन्नेव पुरे जातास्ते च चक्राह्वयास्तदा।<br>वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मराः पुरा ॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! ब्रह्मदत्त इस भूतलपर जन्म लेकर समस्त प्राणियोंकी बोलीके ज्ञाता कैसे हो गये? तथा वे चारों चक्रवाक किसके कुलमें उत्पन्न हुए?॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! वे चारों चक्रवाक उसी ब्रह्मदत्तके नगरमें एक वृद्ध ब्राह्मणके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें भी वे ब्राह्मण पूर्ववत् जातिस्मर बने रहे। |

* अध्याय २१ * ८१


| धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्याचण्डस्तपोत्सुकः।<br>नामतः कर्मतश्चैते सुदरिद्रस्य ते सुताः॥ ३<br>तपसे बुद्धिरभवत् तदा तेषां द्विजन्मनाम्।<br>यास्यामः परमां सिद्धिमित्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः॥ ४<br>ततस्तद्वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः।<br>उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः॥ ५<br>अधर्म एष इति वः पिता तानभ्यवारयत्।<br>वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनः॥ ६<br>को नु धर्मोऽत्र भविता मत्त्यागाद् गतिरेव वा।<br>ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तव तात वदस्व तत्॥ ७<br>वित्तमेतत् पुरो राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम्।<br>धनं ग्रामसहस्राणि प्रभाते पठतस्तव॥ ८<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च।<br>कालंजरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ ९<br>इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः।<br>वृद्धोऽपि राजभवनं जगामात्मार्थसिद्धये॥ १० | (उस समय उनके) धृतिमान्, तत्त्वदर्शी, विद्याचण्ड और तपोत्सुक—ये चार नाम थे। वे कर्मानुसार एक अत्यन्त सुदरिद्र (उस ब्राह्मणका नाम भी सुदरिद्र था) ब्राह्मणके पुत्र थे। बचपनमें ही इन ब्राह्मणोंकी बुद्धि तपस्याकी ओर प्रवृत्त हो गयी। तब ये द्विजश्रेष्ठ पितासे प्रार्थना करते हुए बोले—'पिताजी! हमलोग तपस्या करके परम सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।' उनके इस कथनको सुनकर महातपस्वी सुदरिद्र दीन वाणीमें बोले—'पुत्रो! यह कैसी बात कह रहे हो? मुझ दरिद्र बूढ़े पिताको छोड़कर तुमलोग वनवासी होना चाहते हो, भला मेरा परित्याग कर देनेसे तुमलोगोंको कौन-सा धर्म प्राप्त होगा तथा तुम्हारी क्या गति होगी? यह तो महान् अधर्म है।' ऐसा कहकर पिताने उन्हें मना कर दिया। यह सुनकर उन पुत्रोंने कहा—'तात! हमलोगोंने आपके जीविकोपार्जनका प्रबन्ध कर लिया है। इसके अतिरिक्त आपको और क्या चाहिये, सो बतलाइये। यदि आप प्रातःकाल राजा ब्रह्मदत्तके समक्ष जाकर (आगे बताये जानेवाले श्लोकका) पाठ कीजियेगा तो वे आपको प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं सहस्रों ग्राम प्रदान करेंगे। (उस श्लोकका अर्थ यों है—)'जो कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग और मानसरोवरमें सात चक्रवाक थे, वे सिद्ध (होकर) यहाँ निवास करते हैं।' पितासे ऐसा कहकर वे सभी तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इधर वृद्ध सुदरिद्र भी अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये राजभवनकी ओर चल पड़े॥ २—१०॥ | | अणुहो नाम वैभ्राजः पाञ्चालाधिपतिः पुरा।<br>पुत्रार्थी देवदेवेशं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ ११<br>आराधयामास विभुं तीव्रव्रतपरायणः।<br>ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य जनार्दनः॥ १२<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते हृदयेनेप्सितं नृप।<br>एवमुक्तस्तु देवेन वव्रे स वरमुत्तमम्॥ १३<br>पुत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम्।<br>पारगं सर्वशास्त्राणां धार्मिकं योगिनां परम्॥ १४<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम्।<br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः॥ १५<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः स तस्य पुत्रोऽभूद् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्॥ १६ | (अब ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति-कथा बतलाते हैं—) पूर्वकालमें पञ्चाल देशके एक अणुह नामक नरेश हो गये हैं, जो विभ्राट्के पुत्र थे। वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर व्रतमें तत्पर होकर सामर्थ्यशाली एवं सर्वव्यापक देवदेवेश्वर नारायण श्रीहरिकी आराधना करने लगे। तत्पश्चात् अधिक काल व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दन उनकी आराधनासे प्रसन्न हुए (और उनके समक्ष प्रकट होकर बोले—) 'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोऽभिलषित वरदान माँग लो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर राजाने उत्तम वरकी याचना करते हुए कहा—'देवेश! मुझे ऐसा पुत्र प्रदान कीजिये, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, धार्मिक, श्रेष्ठ योगी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता और योगाभ्यासी हो। भगवन्! मुझे ऐसा ही औरस पुत्र दीजिये।' यह सुनकर विश्वात्मा परमेश्वर राजासे 'ऐसा ही हो'—यों कहकर समस्त देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर समयानुसार वही प्रतापी ब्रह्मदत्त उस राजा अणुहका पुत्र हुआ, जो आगे |

२३- चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूययज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना

८२ * मत्स्यपुराण *


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वसत्त्वानुकम्पी च सर्वसत्त्वबलाधिकः ।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च सर्वसत्त्वेश्वरेश्वरः ॥ १७चलकर सम्पूर्ण जीवोंपर दयालु, समस्त प्राणियोंमें अमित बलसम्पन्न, सम्पूर्ण प्राणियोंकी भाषाका ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके राजाधिराज-सम्राट् हुआ ॥ ११—१७ ॥
अहसत् तेन योगात्मा स पिपीलिकरागतः ।<br>यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम् ॥ १८<br><br>ततः सा संनतिर्दृष्ट्वा तं हसन्तं सुविस्मिता ।<br>किमप्याशङ्क्य मनसा तमपृच्छन्नरेश्वरम् ॥ १९तत्पश्चात् जहाँ वे कीट-दम्पति (चींटे-चींटी) बातें करते हुए स्थित थे, वहाँ पहुँचनेपर चींटेकी कामचेष्टाको देखकर योगात्मा ब्रह्मदत्तको हँसी आ गयी। राजाको हँसते देखकर महारानी संनति आश्चर्यचकित हो उठी और मनमें किसी भावी अनर्थकी आशङ्का करके नरेश्वर ब्रह्मदत्तसे प्रश्न कर बैठी ॥ १८-१९ ॥
संनतिरुवाच<br>अकस्मादतिहासस्ते किमर्थमभवन्नृप ।<br>हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया ॥ २०संनतिने पूछा— राजन्! अकस्मात् आपका यह अट्टहास किसलिये हुआ है? असमयमें आपको जो यह हँसी आयी है, इस हास्यका कारण मैं नहीं समझ पा रही हूँ ॥ २० ॥
सूत उवाच<br>अवदद् राजपुत्रोऽपि स पिपीलिकभाषितम् ।<br>रागवाग्भिः समुत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने ॥ २१<br><br>न चान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतौ शुचिस्मिते ।<br>न सामन्यत् तदा देवी प्राहालीकमिदं वचः ॥ २२<br><br>अहमेवाद्य हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना ।<br>कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति विना सुरान् ॥ २३<br><br>तस्मात् त्वयाहमेवेह हसिता किमतः परम् ।<br>ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तत्पुरो हरेः ॥ २४<br><br>आस्थाय नियमं तस्थौ समरात्रमकल्मषः ।<br>स्वप्ने प्राह हृषीकेशः प्रभाते पर्यटन् पुरम् ॥ २५<br><br>वृद्धद्विजो यस्तद्वाक्यात् सर्वं ज्ञास्यस्यशेषतः ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः प्रभातेऽथ नृपः पुरात् ॥ २६<br><br>निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः ।<br>गदन्तं विप्रमायान्तं तं वृद्धं संददर्श ह ॥ २७सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तब राजकुमार ब्रह्मदत्तने (महारानी संनतिसे) चींटे-चींटीके उस सारे वार्तालापको सुनाते हुए कहा—'वरानने! इनके प्रेमालापपूर्ण वचनोंको सुननेसे मुझे ऐसी हँसी आ गयी है। शुचिस्मिते! मेरी हँसीके विषयमें कोई अन्य कारण नहीं है।' परंतु रानी संनतिने (राजाके उस कथनपर) विश्वास नहीं किया और कहा—'राजन्! आपका यह कथन सरासर असत्य है। अभी-अभी आपने मेरे ही किसी विषयको लेकर हास्य किया है, अतः अब मैं जीवन धारण नहीं करूँगी। भला, देवताओंके अतिरिक्त मृत्युलोकनिवासी प्राणी चींटे-चींटीके वार्तालापको कैसे जान सकता है! इसलिये यहाँ आपने मेरी ही हँसी उड़ायी है। इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है?' रानीकी बात सुनकर निष्पाप राजा ब्रह्मदत्त कुछ उत्तर न दे सके। फिर इस रहस्यको जाननेकी इच्छासे वे श्रीहरिके समक्ष नियमपूर्वक आराधना करते हुए सात राततक बैठे रहे। अन्तमें भगवान् हृषीकेशने स्वप्नमें राजासे कहा—'राजन्! प्रातःकाल तुम्हारे नगरमें घूमता हुआ एक वृद्ध ब्राह्मण जो कुछ कहेगा, उसके उन वचनोंसे तुम्हें सारा रहस्य ज्ञात हो जायगा।' यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर प्रातःकाल जब राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी और दोनों मन्त्रियोंके साथ नगरसे निकल रहे थे, उसी समय उन्होंने अपने समक्ष आते हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको देखा, जो इस प्रकार कह रहा था ॥ २१—२७ ॥
ब्राह्मण उवाच<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च ।ब्राह्मण कह रहा था— 'जो (पहले) कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याधके रूपमें,
* अध्याय २१ *८३

| कालञ्जरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ २८ | कालञ्जर-पर्वतपर मृग-योनिमें और मानसरोवरमें सात चक्रवाकके रूपमें उत्पन्न हुए थे, वे ही (व्यक्ति अब) सिद्ध (होकर) यहाँ निवास कर रहे हैं'॥ २८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्ताभ्यां स पपात शुचा ततः।<br>जातिस्मरत्वमगमत् तौ च मन्त्रिवरावुभौ॥ २९<br>कामशास्त्रप्रणेता च बाभ्रव्यस्तु सुबालकः।<br>पाञ्चाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्॥ ३०<br>कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः।<br>भूत्वा जातिस्मरौ शोकात् पतितावग्रतस्तदा॥ ३१<br>हा वयं योगविभ्रष्टाः कामतः कर्मबन्धनाः।<br>एवं विलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः॥ ३२<br>विस्मयाच्छाद्धमाहात्म्यमभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>ततस्तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम्॥ ३३<br>विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमुदान्वितम्।<br>आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम्॥ ३४<br>विष्वक्सेनाभिधानं तु राजा राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>मानसे मिलिताः सर्वे ततस्ते योगिनो वराः॥ ३५<br>ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन् पितृसक्ता विमत्सराः।<br>संनतिश्चाभवद् भ्रष्टा मयैतत् किल दर्शितम्॥ ३६<br>राज्यत्यागफलं सर्वं यदेतदभिलक्ष्यते।<br>तथेति प्राह राजा तु पुनस्तामभिनन्दयन्॥ ३७<br>त्वत्प्रसादादिदं सर्वं मयैतत् प्राप्यते फलम्।<br>ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः॥ ३८<br>ब्रह्मरन्ध्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात्।<br>एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ३९<br>प्रयच्छन्ति सुतान् राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः।<br>य इदं पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य च द्विजाः॥ ४०<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद् यो वा शृणोत्यथ पठेत्तु वा।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते॥ ४१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर राजा शोकाकुल हो अपने दोनों मन्त्रियोंके साथ भूतलपर गिर पड़े। उस समय उन्हें जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञातृत्व)-की प्राप्ति हो गयी। उन दोनों श्रेष्ठ मन्त्रियोंमें एक बाभ्रव्य सुबालक कामशास्त्रका प्रणेता और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता था। वह संसारमें पाञ्चाल नामसे विख्यात था। दूसरा कण्डरीक भी धर्मात्मा और वेद-शास्त्रका प्रवर्तक था। वे दोनों भी उस समय राजाके अग्रभागमें शोकाविष्ट हो धराशायी हो गये और उन्हें भी जातिस्मरत्वकी प्राप्ति हुई। (उस समय वे विलाप करते हुए कहने लगे—)'हाय! हमलोग लोलुप हो कर्मबन्धनमें फँसकर योगसे पूर्णतया भ्रष्ट हो गये।' इस तरह अनेकविध विलाप करके वे तीनों योगके पारदर्शी विद्वान् विस्मयाविष्ट हो बारंबार श्राद्धके माहात्म्यका अभिनन्दन करने लगे। तत्पश्चात् राजाने उस ब्राह्मणको अनेक गाँवोंसहित प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान की। इस प्रकार धनकी प्राप्तिसे हर्षित हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको विदाकर राजा ब्रह्मदत्तने राजलक्षणोंसे युक्त अपने विष्वक्सेन नामक औरस पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया (और स्वयं जंगलकी राह ली)। तदनन्तर ब्रह्मदत्त आदि वे सभी श्रेष्ठ योगी मत्सररहित एवं पितृभक्त होकर उस मानसरोवरमें परस्पर आ मिले। संनतिका अमर्ष गल गया और वह राजासे कहने लगी—'राजन्! आप जो यह अभिलाषा कर रहे हैं, वह सब राज्य-त्यागका ही परिणाम है और निश्चय ही मेरे द्वारा घटित हुआ है।' राजाने 'तथेति'—ऐसा ही है कहकर उसकी बातको स्वीकार किया और पुनः उसका अभिनन्दन करते हुए कहा—'यह तुम्हारी ही कृपा है, जो मुझे यह सारा फल प्राप्त हो रहा है।' तदनन्तर वे सभी वनवासी योगका आश्रय लेकर अपने तपोबलके प्रभावसे ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्राणत्याग करके परमपदको प्राप्त हो गये। इस प्रकार प्रसन्न हुए पितामह—पितरलोग मनुष्योंको, आयु, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, पुत्र और राज्य प्रदान करते हैं। द्विजवरो! जो मनुष्य ब्रह्मदत्तके इस पितृमाहात्म्यको ब्राह्मणोंको सुनाता है या स्वयं श्रवण करता है अथवा पढ़ता है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें प्रशंसित होता है॥ २९—४१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे पितृमाहात्म्यं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें पितृमाहात्म्य नामक इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१॥

८४ * मत्स्यपुराण *

बाईसवाँ अध्याय

श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>कस्मिन् काले च तच्छ्राद्धमनन्तफलं भवेत्।<br>कस्मिन् वासरभोगे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत्।<br>तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! श्राद्धकर्ताको दिनके किस भागमें श्राद्ध करना चाहिये? किस कालमें किया गया वह श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है? तथा किन-किन तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अधिक-से-अधिक फल प्रदान करता है?॥ १॥
सूत उवाच<br>अपराह्ने तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये।<br>यत्किञ्चिद् दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्॥ २<br>तीर्थानि यानि सर्वाणि पितॄणां वल्लभानि च।<br>नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः॥ ३<br>पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम्।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः॥ ४<br>तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः॥ ५<br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ६<br>तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा।<br>यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ७<br>पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम्।<br>पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्॥ ८<br>वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः।<br>योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अपराह्न-काल (दिनके तीसरे पहरमें प्राप्त होनेवाले) अभिजित् मुहूर्तमें तथा रोहिणीके उदयकालमें (पितरोंके निमित्त) जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। द्विजवरो! अब जो-जो तीर्थ पितरोंको परम प्रिय हैं, उन सबका नाम-निर्देशपूर्वक संक्षेपसे वर्णन कर रहा हूँ। गया नामक पितृतीर्थ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एवं मङ्गलदायक है, वहाँ देवदेवेश्वर भगवान् पितामह स्वयं ही विराजमान हैं। वहाँ श्राद्धमें भाग पानेकी कामनावाले पितरोंद्वारा यह गाथा गायी गयी है—'मनुष्योंको अनेक पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे यदि एक भी पुत्र गयाकी यात्रा करेगा अथवा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर देगा या नील वृष (साँड़)-का उत्सर्ग कर देगा (तो हमारा उद्धार हो जायगा)।' उसी प्रकार पुण्यप्रदा वाराणसी नगरी सदा पितरोंको प्रिय है, जहाँ अविमुक्तके निकट किया गया श्राद्ध भुक्ति (भोग) एवं मुक्ति (मोक्ष)-रूप फल प्रदान करता है। उसी प्रकार पुण्यप्रद विमलेश्वर तीर्थ भी पितरोंके लिये परम प्रिय है। पितृतीर्थ प्रयाग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है। वहाँ माधवसमेत भगवान् वटेश्वर तथा उसी प्रकार योगनिद्रामें शयन करते हुए भगवान् केशव सदा निवास करते हैं॥ २—९॥
दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च।<br>नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थं मायापुरी शुभा॥ १०<br>तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम्।<br>गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्॥ ११<br>तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले ह्रदे।<br>तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्॥ १२पुण्यमय दशाश्वमेधिक तीर्थ, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), नन्दा, ललिता तथा मङ्गलमयी मायापुरी (ऋषिकेश)—ये सभी तीर्थ भी उसी प्रकार पितरोंको प्रिय हैं। मित्रपद (तीर्थ) भी श्रेष्ठ हैं। उत्तम केदारतीर्थ और सर्वतीर्थमय एवं मङ्गलप्रद गङ्गासागरतीर्थको भी पितृप्रिय कहा गया है। उसी तरह शतद्रु (सतलज) नदीके जलके अन्तर्गत कुण्डमें स्थित ब्रह्मसर तीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। नैमिषारण्य सम्पूर्ण तीर्थोंका एकत्र फल प्रदान करनेवाला है। यह

* अध्याय २२ * । ८५


| गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः।<br>तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥ १३<br>यत्र तत्काञ्चनं द्वारमष्टादशभुजो हरः।<br>नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत् पुरा ॥ १४<br>तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्।<br>देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५<br>यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत्।<br>कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ १६<br>यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः।<br>तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा ॥ १७<br>सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा।<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥ १८<br>तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता।<br>इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ॥ १९<br>यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती।<br>नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा ॥ २०<br>पितॄणां वल्लभा होताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः।<br>जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते ॥ २१<br>अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम्।<br>नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः ॥ २२<br>तथा रुद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च।<br>मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ॥ २३<br>पूर्वमित्रपदं तद्वद् वैद्यनाथं महाफलम्।<br>क्षिप्रा नदी महाकालस्तथा कालञ्जरं शुभम् ॥ २४<br>वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम्।<br>भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५<br>गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः।<br>एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥ २६<br>स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकृतां नृणाम्।<br>ओंकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् ॥ २७ | पितरोंको (बहुत) प्रिय है। यहीं गोमती नदीमें गङ्गाका सनातन स्रोत प्रकट हुआ है। यहाँ त्रिशूलधारी महादेव और सनातन यज्ञवराह विराजते हैं। यहाँ अष्टादश भुजाधारी शंकरकी प्रतिमा है। यहाँका काञ्चनद्वार प्रसिद्ध है। यहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुद्वारा दिये गये धर्मचक्रकी नेमि शीर्ण होकर गिरी थी। यह सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा निषेवित नैमिषारण्य नामक तीर्थ है। यहाँ देवाधिदेव भगवान् वाराहका भी दर्शन होता है। जो वहाँकी यात्रा करता है, वह पवित्रात्मा होकर नारायणपदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण पापोंका विनाशक एवं महान् पुण्यशाली कृतशौच नामक तीर्थ है, जहाँ भगवान् जनार्दन नृसिंहरूपसे विराजमान रहते हैं। तीर्थभूता इक्षुमती (काली नदी) पितरोंको सदा प्रिय है। (कन्नौजके पास इस इक्षुमतीके साथ) गङ्गाजीके संगमपर पितरलोग सदा निवास करते हैं। सम्पूर्ण तीर्थोंसे युक्त कुरुक्षेत्र नामक महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। इसी प्रकार समस्त देवताओंद्वारा नमस्कृत पुण्यसलिला सरयू, पितृ-तीर्थोंकी अधिवासिनीरूपा इरावती नदी, यमुना, देविका (देग), काली (कालीसिंध), चन्द्रभागा (चनाब), दृषद्वती (घग्गर), पुण्यतोया वेणुमती (वेण्वा) नदी तथा सर्वश्रेष्ठ वेत्रवती (बेतवा)—ये नदियाँ पितरोंको परम प्रिय हैं। इसलिये श्राद्धके विषयमें करोड़ों गुना फलदायिनी मानी गयी हैं। द्विजवरो! जम्बूमार्ग (भड़ौंच) नामक तीर्थ महान् पुण्यदायक एवं सम्पूर्ण मनोऽभिलषित फलोंका प्रदाता है, यह पितरोंका प्रिय तीर्थ है। वहाँसे पितृलोक जानेका मार्ग अभी भी दिखायी पड़ता है। नीलकुण्ड तीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है॥ १०—२२॥<br><br>इसी प्रकार पुण्यप्रद रुद्रसर, मानससर, मन्दाकिनी, अच्छोदा (अच्छावत), विपाशा (व्यास नदी), सरस्वती, पूर्वमित्रपद, महान् फलदायक वैद्यनाथ, क्षिप्रा नदी, महाकाल, मङ्गलमय कालञ्जर, वंशोद्भेद, हरोद्भेद, महान् फलप्रद गङ्गोद्भेद, भद्रेश्वर, विष्णुपद और नर्मदाद्वार—ये सभी पितृप्रिय तीर्थ हैं। इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेसे गया तीर्थमें पिण्ड-प्रदानके तुल्य ही फल प्राप्त होता है—ऐसा महर्षियोंने कहा है। ये सभी पितृतीर्थ जब स्मरणमात्र कर लेनेसे लोगोंके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करते हैं, तब (वहाँ जाकर) श्राद्ध करनेवाले मनुष्योंके पापनाशकी तो बात ही क्या है। इसी तरह ओंकार पितृतीर्थ है। कावेरी, कपिलोदका, |

२४- ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त

८६ * मत्स्यपुराण *

| सम्भेदश्चण्डवेगायास्तथैवामरकण्टकम् ।<br>कुरुक्षेत्राच्छतगुणं तस्मिन् स्नानादिकं भवेत् ॥ २८<br>शुक्रतीर्थं च विख्यातं तीर्थं सोमेश्वरं परम् ।<br>सर्वव्याधिहरं पुण्यं शतकोटिफलाधिकम् ॥ २९<br>श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये जलसंनिधौ ।<br>कायावरोहणं नाम तथा चर्मण्वती नदी ॥ ३०<br>गोमती वरुणा तद्वत्तीर्थमौशनसं परम् ।<br>भैरवं भृगुतुङ्गं च गौरीतीर्थमनुत्तमम् ॥ ३१<br>तीर्थं वैनायकं नाम भद्रेश्वरमतः परम् ।<br>तथा पापहरं नाम पुण्याथ तपती नदी ॥ ३२<br>मूलतापी पयोष्णी च पयोष्णीसङ्गमस्तथा ।<br>महाबोधिः पाटला च नागतीर्थमवन्तिका ॥ ३३<br>तथा वेणा नदी पुण्या महाशालं तथैव च ।<br>महारुद्रं महालिङ्गं दशार्णा च नदी शुभा ॥ ३४<br>शतरुद्रा शताह्वा च तथा विष्णुपदं परम् ।<br>अङ्गारवाहिका तद्वन्नदौ तौ शोणघर्घरौ ॥ ३५<br>कालिका च नदी पुण्या वितस्ता च नदी तथा ।<br>एतानि पितृतीर्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः ॥ ३६<br>श्राद्धमेतेषु यद् दत्तं तदनन्तफलं स्मृतम् ।<br>द्रोणी वाटनदी धारासरित् क्षीरनदी तथा ॥ ३७<br>गोकर्णं गजकर्णं च तथा च पुरुषोत्तमः ।<br>द्वारका कृष्णतीर्थं च तथार्बुदसरस्वती ॥ ३८<br>नदी मणिमती नाम तथा च गिरिकर्णिका ।<br>धूतपापं तथा तीर्थं समुद्रो दक्षिणस्तथा ॥ ३९<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते ।<br>तीर्थं मेघंकरं नाम स्वयमेव जनार्दनः ॥ ४०<br>यत्र शार्ङ्गधरो विष्णुर्मेखलायामवस्थितः ।<br>तथा मन्दोदरीतीर्थं तीर्थं चम्पा नदी शुभा ॥ ४१<br>तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा ।<br>चक्रवाकं चर्मकोटं तथा जन्मेश्वरं महत् ॥ ४२<br>अर्जुनं त्रिपुरं चैव सिद्धेश्वरमतः परम् ।<br>श्रीशैलं शांकरं तीर्थं नारसिंहमतः परम् ॥ ४३<br>महेन्द्रं च तथा पुण्यमथ श्रीरङ्गसंज्ञितम् ।<br>एतेष्वपि सदा श्राद्धमनन्तफलदं स्मृतम् ॥ ४४<br>दर्शनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै ।<br>तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित् ॥ ४५ | चण्डवेगा और नर्मदाका संगम तथा अमरकण्टक—इन पितृतीर्थोंमें स्नान आदि करनेसे कुरुक्षेत्रसे सौगुने अधिक फलकी प्राप्ति होती है। शुक्रतीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है तथा सर्वोत्तम सोमेश्वरतीर्थ स्नान, श्राद्ध, दान, हवन तथा स्वाध्याय करनेपर समस्त व्याधियोंका विनाशक, पुण्यप्रदाता और सौ करोड़ गुना फलसे भी अधिक फलदायी है। कायावरोहण (गुजरातका कारावन) नामक तीर्थ, चर्मण्वती (चम्बल) नदी, गोमती, वरुणा (वरणा), उसी प्रकार औशनस नामक उत्तम तीर्थ, भैरव, (केदारनाथके पास) भृगुतुङ्ग, सर्वश्रेष्ठ गौरीतीर्थ, वैनायक नामक तीर्थ, उसके बाद भद्रेश्वरतीर्थ तथा पापहर नामक तीर्थ, पुण्यसलिला तपती नदी, मूलतापी, पयोष्णी तथा पयोष्णी-संगम, महाबोधि, पाटला, नागतीर्थ, अवन्तिका (उज्जैनी) तथा पुण्यतोया वेणानदी, महाशाल, महारुद्र, महालिङ्ग और मङ्गलमयी दशार्णा (धसान) नदी तो अत्यन्त ही शुभ हैं॥ २३—३४॥<br><br>शतरुद्रा, शताह्वा तथा श्रेष्ठ विष्णुपद, अङ्गारवाहिका, उसी प्रकार शोण और घर्घर (घाघरा) नामक दो नद, पुण्यजला कालिका नदी तथा वितस्ता (झेलम) नदी—ये पितृतीर्थ स्नान और दानके लिये प्रशस्त माने गये हैं। इनमें जो श्राद्ध आदि कर्म किया जाता है, वह अनन्त फलदायक कहा गया है। द्रोणी, वाटनदी, धारानदी, क्षीरनदी, गोकर्ण, गजकर्ण, पुरुषोत्तम-क्षेत्र, द्वारका, कृष्णतीर्थ तथा अर्बुदगिरि (आबू), सरस्वती, मणिमती नदी गिरिकर्णिका, धूतपापतीर्थ तथा दक्षिण समुद्र—इन पितृतीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। इसके पश्चात् मेघंकर नामक तीर्थ (गुजरातमें) है, जिसकी मेखलामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले स्वयं जनार्दन भगवान् विष्णु स्थित हैं। इसी प्रकार मन्दोदरीतीर्थ तथा मङ्गलमयी चम्पा नदी, सामलनाथ, महाशाल नदी, चक्रवाक, चर्मकोट, महान् तीर्थ जन्मेश्वर, अर्जुन, त्रिपुर इसके बाद सिद्धेश्वर, श्रीशैल (मल्लिकार्जुन), शाङ्करतीर्थ, इसके पश्चात् नारसिंहतीर्थ, महेन्द्र तथा पुण्यप्रद श्रीरङ्ग नामक तीर्थ हैं। इनमें भी किया गया श्राद्ध सदा अनन्त फलदाता माना गया है तथा ये दर्शनमात्रसे ही तुरंत पापोंको हर लेते हैं। पुण्यसलिला तुङ्गभद्रा नदी तथा भीमरथी नदी, |

* अध्याय २२ *८७

| भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मला नदी।<br>नदी गोदावरी नाम त्रिसंध्या तीर्थमुत्तमम्॥ ४६<br>तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम्।<br>यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः॥ ४७<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत्।<br>स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजाः॥ ४८<br>श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम्।<br>तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च॥ ४९<br>भद्रतीर्थं च विख्यातं पम्पातीर्थं च शाश्वतम्।<br>पुण्यं रामेश्वरं तद्वदेलापुरमलंपुरम्॥ ५०<br>अङ्गारक च विख्यातमामर्दकमलम्बुषम्।<br>आम्रातकेश्वरं तद्वदेकाम्रकमतः परम्॥ ५१<br>गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं कृपुचन्द्रं पृथूदकम्।<br>सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी॥ ५२<br>रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसङ्गमः।<br>इन्द्रकीलं महानादं तथा च प्रियमेलकम्॥ ५३<br>एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु।<br>एतेषु सर्वदेवानां सांनिध्यं दृश्यते यतः॥ ५४<br>दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम्।<br>बाहुदा च नदी पुण्या तथा सिद्धवनं शुभम्॥ ५५<br>तीर्थं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा।<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम्॥ ५६<br>तथैव पितृतीर्थं तु यत्र गोदावरी नदी।<br>युता लिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा॥ ५७<br>जामदग्न्यस्य तत् तीर्थं क्रमादायातमुत्तमम्।<br>प्रतीकस्य भयाद् भिन्नं यत्र गोदावरी नदी॥ ५८<br>तत् तीर्थं हव्यकव्यानामप्सरोयुगसंज्ञितम्।<br>श्राद्धाग्निकार्यदानेषु तथा कोटिशताधिकम्॥ ५९<br>तथा सहस्रलिङ्गं च राघवेश्वरमुत्तमम्।<br>सेन्द्रफेना नदी पुण्या यत्रेन्द्रः पतितः पुरा॥ ६०<br>निहत्य नमुचिं शक्रस्तपसा स्वर्गमाप्तवान्।<br>तत्र दत्तं नरैः श्राद्धमनन्तफलं भवेत्॥ ६१<br>तीर्थं तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च।<br>सोमपानं च विख्यातं यत्र वैश्वानरालयम्॥ ६२ | भीमेश्वर, कृष्णवेणा, कावेरी, कुड्मला नदी, गोदावरी नदी, त्रिसंध्या नामक उत्तम तीर्थ तथा समस्त तीर्थोंद्वारा नमस्कृत त्रैयम्बक नामक तीर्थ, जहाँ त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर स्वयं ही निवास करते हैं—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध करोड़ों-करोड़ों गुना फलदायक होता है। ब्राह्मणो ! इन तीर्थोंका स्मरणमात्र करनेसे पापसमूह सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर होकर नष्ट हो जाते हैं ॥४६—४८॥<br><br>इसी प्रकार श्रीपर्णी, ताम्रपर्णी, सर्वश्रेष्ठ जयातीर्थ, पुण्यतोया मत्स्य नदी, शिवधार, सुप्रसिद्ध भद्रतीर्थ, सनातन पम्पातीर्थ, पुण्यमय रामेश्वर, एलापुर, अलमपुर, अङ्गारक, प्रख्यात आमर्दक, अलम्बुष, (अलम्बुषा देवीका स्थान) आम्रातकेश्वर एवं एकाग्रक (भुवनेश्वर) हैं। इसके बाद गोवर्धन, हरिश्चन्द्र, कृपुचन्द्र, पृथूदक, सहस्राक्ष, हिरण्याक्ष, कदली नदी, रामाधिवास, उसमें भी सौमित्रिसंगम, इन्द्रकील, महानाद तथा प्रियमेलक—ये सभी श्राद्धमें सदा सर्वाधिक प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि इन तीर्थोंमें सम्पूर्ण देवताओंका सांनिध्य देखा जाता है, इसलिये इन सभीमें दिया गया दान सैकड़ों कोटि गुनासे भी अधिक फलदायी होता है। पुण्यजला बाहुदा (धवला) नदी, मङ्गलमय सिद्धवन, पाशुपत नामक तीर्थ तथा शुभदायिनी पार्वतिका नदी—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध सौ करोड़ गुनासे भी अधिक फलदाता होता है। उसी प्रकार यह भी एक पितृतीर्थ है, जहाँ सहस्रों शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं अन्तरमें सभी नदियोंका जल प्रवाहित करनेवाली गोदावरी नदी बहती है। वहींपर जामदग्न्यका वह उत्तम तीर्थ क्रमशः आकर सम्मिलित हुआ है, जो प्रतीकके भयसे पृथक् हो गया था। गोदावरी नदीमें स्थित हव्य-कव्य-भोजी पितरोंका वह परम प्रियतीर्थ अप्सरोयुग नामसे प्रसिद्ध है। यह भी श्राद्ध, हवन और दान आदि कार्योंमें सैकड़ों कोटि गुनेसे अधिक फल देनेवाला है तथा सहस्रलिङ्ग, उत्तम राघवेश्वर और पुण्यतोया इन्द्रफेना नदी नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें इन्द्रका पतन हो गया था तथा पुनः उन्होंने अपने तपोबलसे नमुचिका वध करके स्वर्गलोकको प्राप्त किया था। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। पुष्कर नामक तीर्थ, शालग्राम और जहाँ वैश्वानरका निवासस्थान है, वह सुप्रसिद्ध सोमपानतीर्थ, |

८८ * मत्स्यपुराण *

तीर्थं सारस्वतं नाम स्वामितीर्थं तथैव च।<br>मलन्दरा नदी पुण्या कौशिकी चन्द्रिका तथा॥ ६३<br>वैदर्भी चाथ वेणा च पयोष्णी प्राङ्मुखा परा।<br>कावेरी चोत्तरा पुण्या तथा जालंधरो गिरिः॥ ६४<br>एतेषु श्राद्धतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते।<br>लोहदण्डं तथा तीर्थं चित्रकूटस्तथैव च॥ ६५सारस्वततीर्थ, स्वामितीर्थ, मलन्दरा नदी, कौशिकी और चन्द्रिका—ये पुण्यजला नदियाँ हैं। वैदर्भा, वैणा, पूर्वमुख बहनेवाली श्रेष्ठा पयोष्णी, उत्तरमुख बहनेवाली पुण्यसलिला कावेरी तथा जालंधर गिरि—इन श्राद्धसम्बन्धी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है॥ ४९–६४ १/२ ॥
विन्ध्ययोगश्च गङ्गायास्तथा नदीतटं शुभम्।<br>कुब्जाम्रं तु तथा तीर्थमुर्वशीपुलिनं तथा॥ ६६<br>संसारमोचनं तीर्थं तथैव ऋणमोचनम्।<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते॥ ६७<br>अट्टहासं तथा तीर्थं गौत्मेश्वरमेव च।<br>तथा वसिष्ठं तीर्थं तु हारीतं तु ततः परम्॥ ६८<br>ब्रह्मावर्तं कुशावर्तं हयतीर्थं तथैव च।<br>पिण्डारकं च विख्यातं शङ्खोद्धारं तथैव च॥ ६९<br>घण्टेश्वरं बिल्वकं च नीलपर्वतमेव च।<br>तथा च धरणीतीर्थं रामतीर्थं तथैव च॥ ७०<br>अश्वतीर्थं च विख्यातममन्तं श्राद्धदानयोः।उसी प्रकार लोहदण्डतीर्थ, चित्रकूट, विन्ध्ययोग, गङ्गा नदीका मङ्गलमय तट, कुब्जाम्र (ऋषिकेश) तीर्थ, उर्वशीपुलिन, संसारमोचनतीर्थ तथा ऋणमोचन—इन पितृतीर्थोंमें श्राद्धका फल अनन्त हो जाता है। अट्टहासतीर्थ, गौतमेश्वर, वसिष्ठतीर्थ, उसके बाद हारीततीर्थ, ब्रह्मावर्त, कुशावर्त, हयतीर्थ, (द्वारकाके पास) प्रख्यात पिण्डारक, शङ्खोद्धार, घण्टेश्वर, बिल्वक, नीलपर्वत, धरणीतीर्थ, रामतीर्थ तथा अश्वतीर्थ (कन्नौज)—ये सब भी श्राद्ध एवं दानके लिये अनन्त फलदायक-रूपसे विख्यात हैं॥ ६५–७० १/२ ॥
तीर्थं वेदशिरो नाम तथैवौघवती नदी॥ ७१<br>तीर्थं वसुप्रदं नामच्छागलाण्डं तथैव च।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमं पदम्॥ ७२<br>तथा च बदरीतीर्थं गणतीर्थं तथैव च।<br>जयन्तं विजयं चैव शक्रतीर्थं तथैव च॥ ७३<br>श्रीपतेश्च तथा तीर्थं तीर्थं रैवतकं तथा।<br>तथैव शारदातीर्थं भद्रकालेश्वरं तथा॥ ७४<br>वैकुण्ठतीर्थं च परं भीमेश्वरमथापि वा।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ७५<br>तीर्थं मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा।<br>कुशेशयं च विख्यातं गौरीशिखरमेव च॥ ७६<br>नकुलेशस्य तीर्थं च कर्दमालं तथैव च।<br>दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपुरं तथा॥ ७७<br>समगोदावरी तीर्थं सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम्।<br>तत्र श्राद्धं प्रदातव्यमनन्तफलमीप्सुभिः॥ ७८वेदशिर नामक तीर्थ, उसी तरह ओघवती नदी, वसुप्रद नामक तीर्थ एवं छागलाण्डतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। बदरीतीर्थ, गणतीर्थ, जयन्त, विजय, शक्रतीर्थ, श्रीपतितीर्थ, रैवतकतीर्थ, शारदातीर्थ, भद्रकालेश्वर, वैकुण्ठतीर्थ, श्रेष्ठ भीमेश्वरतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेवाले लोग परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। मातृगृह नामक तीर्थ, करवीरपुर, कुशेशय, सुप्रसिद्ध गौरी-शिखर, नकुलेशतीर्थ, कर्दमाल, दिण्डिपुण्यकर, उसी तरह पुण्डरीकपुर तथा समस्त तीर्थेश्वरोंका भी अधीश्वर समगोदावरीतीर्थ—इन तीर्थोंमें अनन्त फलप्राप्तिके इच्छुकोंको श्राद्ध प्रदान करना चाहिये॥ ७१–७८॥
एष तूद्देशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संग्रहो मया।<br>वागीशोऽपि न शक्नोति विस्तरात् किमु मानुषः॥ ७९इस प्रकार मैंने तीर्थोंके इस संग्रहका संक्षेपमें वर्णन किया; वैसे इनका विस्तृत वर्णन करनेमें तो बृहस्पति भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो गणना ही क्या है?
सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः।<br>वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्॥ ८०सत्यतीर्थ, दयातीर्थ तथा इन्द्रियनिग्रहतीर्थ—ये सभी वर्णाश्रम-धर्म माननेवालोंके घरमें भी तीर्थरूपसे बतलाये गये हैं।

* अध्याय २२ *

८९

एतत्तीर्थेषु यच्छ्राद्धं तत् कोटिगुणमिष्यते ।<br>यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन तीर्थे श्राद्धं समाचरेत् ॥ ७९<br>प्रातःकालो मुहूर्तास्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु ।<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्नस्ततः परम् ॥ ८२<br>सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत् ।<br>राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥ ८३<br>अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा ।<br>तत्राष्टमो मुहूर्त्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥ ८४<br>मध्याह्ने सर्वदा यस्मान्मन्दो भवति भास्करः ।<br>तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भो भविष्यति ॥ ८५<br>मध्याह्नखड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः ।<br>रूप्यं दर्भांस्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः ॥ ८६<br>पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य संतापकारिणः ।<br>अष्टावेते यतस्तस्मात् कुतपा इति विश्रुताः ॥ ८७<br>ऊर्ध्वं मुहूर्त्तात् कुतपाद्यान्मुहूर्त्तचतुष्टयम् ।<br>मुहूर्त्तपञ्चकं चैतत् स्वधाभवनमिष्यते ॥ ८८<br>विष्णोर्देहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा ।<br>श्राद्धस्य रक्षणार्थालमेतत्प्राहूर्दिवौकसः ॥ ८९<br>तिलोदकाञ्जलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः ।<br>सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते ॥ ९०<br>श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनाैकेन दीयते ।<br>तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः ॥ ९१चूँकि इन तीर्थोंमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कोटिगुना फलदायक होता है, अतः प्रयत्नपूर्वक तीर्थोंमें श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। प्रातःकाल तीन मुहूर्ततकका काल संगव कहलाता है। उसके बाद तीन मुहूर्ततकका काल मध्याह्न और उसके बाद उतने ही समयतक अपराह्न है। फिर तीन मुहूर्ततक सायंकाल होता है, उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकालका समय राक्षसी वेला नामसे प्रसिद्ध है। यह सभी कार्योंमें निन्दित है। एक दिनमें पन्द्रह मुहूर्त होते हैं, यह तो सदासे विख्यात है। उनमें जो आठवाँ मुहूर्त है, वह कुतप नामसे प्रसिद्ध है। चूँकि मध्याह्नके समय सूर्य सदा मन्द हो जाते हैं, इसलिये उस समय अनन्त फलदायक उस (कुतप)-का आरम्भ होता है। मध्याह्नकाल, खड्गपात्र, नेपालकम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ और आठवाँ दौहित्र (कन्याका पुत्र)—ये आठों चूँकि पापको, जिसे कुत्सित कहा जाता है, संतप्त करनेवाले हैं, इसलिये 'कुतप' नामसे विख्यात हैं। इस कुतप मुहूर्तके उपरान्त चार मुहूर्त अर्थात् कुल पाँच मुहूर्त स्वधावाचनके लिये उत्तम काल हैं। कुश तथा काला तिल—ये दोनों भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रादुर्भूत हुए हैं, अतः ये श्राद्धकी रक्षा करनेमें सर्वसमर्थ हैं—ऐसा देवगण कहते हैं। तीर्थवासियोंको जलमें प्रवेश करके एक हाथमें कुश लेकर तिलसहित जलाञ्जलि देनी चाहिये। ऐसा करनेसे श्राद्धकी विशेषता बढ़ जाती है। श्राद्ध करते समय (पिण्ड आदि तो) एक ही हाथसे दिया जाता है, परंतु तर्पण दोनों हाथोंसे किया जाता है—यह विधि सदासे प्रचलित है॥ ७९-९१॥
सूत उवाच<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ।<br>पुरा मत्स्येन कथितं तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम् ।<br>शृणोति यः पठेद् वापि श्रीमान् संजायते नरः ॥ ९२<br>श्राद्धकाले च वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः ।<br>सर्वपापोपशान्त्यर्थमलक्ष्मीनाशनं परम् ॥ ९३<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br>मिदं महापापहरं च पुंसाम् ।<br>ब्रह्मार्कुरुद्रैरपि पूजितं च<br>श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः ॥ ९४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें मत्स्यभगवान्ने इस तीर्थ-श्राद्धका वर्णन किया था। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। जो मनुष्य इसे सुनता है अथवा स्वयं इसका पाठ करता है, वह श्रीसम्पन्न हो जाता है। तीर्थनिवासियाेंद्वारा समस्त पापोंकी शान्तिके निमित्त श्राद्धके समय इस परम श्रेष्ठ दरिद्रताविनाशक (श्राद्ध-माहात्म्यरूप) प्रसङ्गका पाठ करना चाहिये। यह श्राद्ध-माहात्म्य परम पवित्र, यशका आश्रयस्थान, पुरुषोंके महान्-से-महान् पापोंका विनाशक तथा ब्रह्मा, सूर्य और रुद्रद्वारा भी पूजित (सम्मानित) है॥ ९२-९४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२॥

९०

* मत्स्यपुराण *


तेईसवाँ अध्याय

चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br><br>सोमः पितॄणामधिपः कथं शास्त्रविशारद।<br>तद्वंश्या ये च राजानो बभूवुः कीर्तिवर्धनाः॥ १**ऋषियोंने पूछा—**शास्त्रविशारद सूतजी! पितरोंके अधिपति चन्द्रमाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आप यह सब हमें बताइये तथा चन्द्रवंशमें जो कीर्तिवर्धक राजा हो गये हैं, उनके विषयमें भी हमलोग सुनना चाहते हैं, कृपया वह सब भी विस्तारसे बतलायें॥ १॥
सूत उवाच<br><br>आदिष्टो ब्रह्मणा पूर्वमत्रिः सर्गविधौ पुरा।<br>अनुत्तरं नाम तपः सृष्ट्यर्थं तप्तवान् प्रभुः॥ २<br>यदानन्दकरं ब्रह्म जगत्क्लेशविनाशनम्।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणामभ्यन्तरमतीन्द्रियम् ॥ ३<br>शान्तिकृच्छान्तमनसस्तदन्तर्नयने स्थितम्।<br>माहात्म्यात्तपसा विप्राः परमानन्दकारकम्॥ ४<br>यस्मादुमापतिः सार्धमुमया तमधिष्ठितः।<br>तं दृष्ट्वा चाष्टमांशेन तस्मात् सोमोऽभवच्छिशुः॥ ५<br>अधः सुस्राव नेत्राभ्यां धाम तच्चाम्बुसम्भवम्।<br>दीपयद् विश्वमखिलं ज्योत्स्नया सचराचरम्॥ ६<br>तद्दिशो जगृहुर्धाम स्त्रीरूपेण सुतेच्छया।<br>गर्भोऽभूत् तदुदरे तासामास्थितोऽब्दशतत्रयम्॥ ७<br>आशास्तं मुमुचुर्गर्भमशक्ता धारणे ततः।<br>समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः॥ ८<br>युवानमकरोद् ब्रह्मा सर्वायुधधरं नरम्।<br>स्यन्दनेऽथ सहस्त्राश्वे वेदशक्तिमये प्रभुः॥ ९<br>आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः।<br>तत्र ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तमस्मत् स्वामी भवत्वयम्॥ १०**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने अपने मानसपुत्र अत्रिको सृष्टि-रचनाके लिये आज्ञा दी। उन सामर्थ्यशाली महर्षिने सृष्टि-रचनाके निमित्त अनुत्तर<sup></sup> नामक (भीषण) तप किया। उस तपके प्रभावसे जगत्के कष्टोंका विनाशक, शान्तिकर्ता, इन्द्रियोंसे परे जो परमानन्द है तथा जो ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके अन्तःप्रदेशमें निवास करनेवाला है, वही ब्रह्म उन प्रशान्त मनवाले<sup></sup> महर्षिके (मन एवं) नेत्रोंके भीतर स्थित हो गया। चूँकि उस समय उमासहित उमापति शंकरने भी अत्रिके मन-नेत्रोंको अधियम बनाया था, अतः उन्हें देखकर शिवके या उनके अष्टमांशसे शिशु (ललाटस्थ चन्द्रके) रूपमें चन्द्रमा प्रकट हो गये। उस समय महर्षि अत्रिके नेत्रोंसे जलसम्भूत धाम (तेज) नीचेकी ओर बह चला। उसने अपने प्रकाशसे अखिल चराचर विश्वको उद्दीप्त कर दिया। दिशाओंने उस तेजको स्त्री-रूपसे धारणकर पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे ग्रहण कर लिया। वह उनके उदरमें गर्भरूप होकर तीन सौ वर्षोंतक स्थित रहा। जब दिशाएँ उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ हो गयीं, तब उन्होंने उसका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माने उस गर्भको उठाकर उसे एकत्र कर सर्वायुधधारी तरुण पुरुषके रूपमें परिणत कर दिया तथा वे शक्तिशाली पितामह सहस्र घोड़ोंसे जुते हुए वेदशक्तिमय रथपर उसे बैठाकर अपने लोकको ले गये। वहाँ (उस पुरुषको देखकर) ब्रह्मर्षियोंने कहा—'ये हम लोगोंके स्वामी हों।'

१. यह अध्याय पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, १२ में भी यों ही है।
२. जिसके बाद किसीने वैसा या उससे कोई दूसरा बड़ा तप न किया हो, वह तपस्या ही 'अनुत्तर' तप है।
३. इसमें 'चन्द्रमा मनसो जातः' (पुरुषसूक्त १३०)-का उपबृंहण है।