भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८४ * मत्स्यपुराण *

बाईसवाँ अध्याय

श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन

ऋषय ऊचुः<br>कस्मिन् काले च तच्छ्राद्धमनन्तफलं भवेत्।<br>कस्मिन् वासरभोगे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत्।<br>तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्॥ १**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! श्राद्धकर्ताको दिनके किस भागमें श्राद्ध करना चाहिये? किस कालमें किया गया वह श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है? तथा किन-किन तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अधिक-से-अधिक फल प्रदान करता है?॥ १॥
सूत उवाच<br>अपराह्ने तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये।<br>यत्किञ्चिद् दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्॥ २<br>तीर्थानि यानि सर्वाणि पितॄणां वल्लभानि च।<br>नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः॥ ३<br>पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम्।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः॥ ४<br>तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः॥ ५<br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ६<br>तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा।<br>यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ७<br>पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम्।<br>पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्॥ ८<br>वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः।<br>योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अपराह्न-काल (दिनके तीसरे पहरमें प्राप्त होनेवाले) अभिजित् मुहूर्तमें तथा रोहिणीके उदयकालमें (पितरोंके निमित्त) जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। द्विजवरो! अब जो-जो तीर्थ पितरोंको परम प्रिय हैं, उन सबका नाम-निर्देशपूर्वक संक्षेपसे वर्णन कर रहा हूँ। गया नामक पितृतीर्थ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एवं मङ्गलदायक है, वहाँ देवदेवेश्वर भगवान् पितामह स्वयं ही विराजमान हैं। वहाँ श्राद्धमें भाग पानेकी कामनावाले पितरोंद्वारा यह गाथा गायी गयी है—'मनुष्योंको अनेक पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे यदि एक भी पुत्र गयाकी यात्रा करेगा अथवा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर देगा या नील वृष (साँड़)-का उत्सर्ग कर देगा (तो हमारा उद्धार हो जायगा)।' उसी प्रकार पुण्यप्रदा वाराणसी नगरी सदा पितरोंको प्रिय है, जहाँ अविमुक्तके निकट किया गया श्राद्ध भुक्ति (भोग) एवं मुक्ति (मोक्ष)-रूप फल प्रदान करता है। उसी प्रकार पुण्यप्रद विमलेश्वर तीर्थ भी पितरोंके लिये परम प्रिय है। पितृतीर्थ प्रयाग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है। वहाँ माधवसमेत भगवान् वटेश्वर तथा उसी प्रकार योगनिद्रामें शयन करते हुए भगवान् केशव सदा निवास करते हैं॥ २—९॥
दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च।<br>नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थं मायापुरी शुभा॥ १०<br>तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम्।<br>गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्॥ ११<br>तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले ह्रदे।<br>तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्॥ १२पुण्यमय दशाश्वमेधिक तीर्थ, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), नन्दा, ललिता तथा मङ्गलमयी मायापुरी (ऋषिकेश)—ये सभी तीर्थ भी उसी प्रकार पितरोंको प्रिय हैं। मित्रपद (तीर्थ) भी श्रेष्ठ हैं। उत्तम केदारतीर्थ और सर्वतीर्थमय एवं मङ्गलप्रद गङ्गासागरतीर्थको भी पितृप्रिय कहा गया है। उसी तरह शतद्रु (सतलज) नदीके जलके अन्तर्गत कुण्डमें स्थित ब्रह्मसर तीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। नैमिषारण्य सम्पूर्ण तीर्थोंका एकत्र फल प्रदान करनेवाला है। यह