भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २२ * । ८५


| गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः।<br>तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥ १३<br>यत्र तत्काञ्चनं द्वारमष्टादशभुजो हरः।<br>नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत् पुरा ॥ १४<br>तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्।<br>देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५<br>यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत्।<br>कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ १६<br>यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः।<br>तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा ॥ १७<br>सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा।<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥ १८<br>तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता।<br>इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ॥ १९<br>यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती।<br>नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा ॥ २०<br>पितॄणां वल्लभा होताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः।<br>जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते ॥ २१<br>अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम्।<br>नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः ॥ २२<br>तथा रुद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च।<br>मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ॥ २३<br>पूर्वमित्रपदं तद्वद् वैद्यनाथं महाफलम्।<br>क्षिप्रा नदी महाकालस्तथा कालञ्जरं शुभम् ॥ २४<br>वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम्।<br>भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५<br>गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः।<br>एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥ २६<br>स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकृतां नृणाम्।<br>ओंकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् ॥ २७ | पितरोंको (बहुत) प्रिय है। यहीं गोमती नदीमें गङ्गाका सनातन स्रोत प्रकट हुआ है। यहाँ त्रिशूलधारी महादेव और सनातन यज्ञवराह विराजते हैं। यहाँ अष्टादश भुजाधारी शंकरकी प्रतिमा है। यहाँका काञ्चनद्वार प्रसिद्ध है। यहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुद्वारा दिये गये धर्मचक्रकी नेमि शीर्ण होकर गिरी थी। यह सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा निषेवित नैमिषारण्य नामक तीर्थ है। यहाँ देवाधिदेव भगवान् वाराहका भी दर्शन होता है। जो वहाँकी यात्रा करता है, वह पवित्रात्मा होकर नारायणपदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण पापोंका विनाशक एवं महान् पुण्यशाली कृतशौच नामक तीर्थ है, जहाँ भगवान् जनार्दन नृसिंहरूपसे विराजमान रहते हैं। तीर्थभूता इक्षुमती (काली नदी) पितरोंको सदा प्रिय है। (कन्नौजके पास इस इक्षुमतीके साथ) गङ्गाजीके संगमपर पितरलोग सदा निवास करते हैं। सम्पूर्ण तीर्थोंसे युक्त कुरुक्षेत्र नामक महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। इसी प्रकार समस्त देवताओंद्वारा नमस्कृत पुण्यसलिला सरयू, पितृ-तीर्थोंकी अधिवासिनीरूपा इरावती नदी, यमुना, देविका (देग), काली (कालीसिंध), चन्द्रभागा (चनाब), दृषद्वती (घग्गर), पुण्यतोया वेणुमती (वेण्वा) नदी तथा सर्वश्रेष्ठ वेत्रवती (बेतवा)—ये नदियाँ पितरोंको परम प्रिय हैं। इसलिये श्राद्धके विषयमें करोड़ों गुना फलदायिनी मानी गयी हैं। द्विजवरो! जम्बूमार्ग (भड़ौंच) नामक तीर्थ महान् पुण्यदायक एवं सम्पूर्ण मनोऽभिलषित फलोंका प्रदाता है, यह पितरोंका प्रिय तीर्थ है। वहाँसे पितृलोक जानेका मार्ग अभी भी दिखायी पड़ता है। नीलकुण्ड तीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है॥ १०—२२॥<br><br>इसी प्रकार पुण्यप्रद रुद्रसर, मानससर, मन्दाकिनी, अच्छोदा (अच्छावत), विपाशा (व्यास नदी), सरस्वती, पूर्वमित्रपद, महान् फलदायक वैद्यनाथ, क्षिप्रा नदी, महाकाल, मङ्गलमय कालञ्जर, वंशोद्भेद, हरोद्भेद, महान् फलप्रद गङ्गोद्भेद, भद्रेश्वर, विष्णुपद और नर्मदाद्वार—ये सभी पितृप्रिय तीर्थ हैं। इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेसे गया तीर्थमें पिण्ड-प्रदानके तुल्य ही फल प्राप्त होता है—ऐसा महर्षियोंने कहा है। ये सभी पितृतीर्थ जब स्मरणमात्र कर लेनेसे लोगोंके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करते हैं, तब (वहाँ जाकर) श्राद्ध करनेवाले मनुष्योंके पापनाशकी तो बात ही क्या है। इसी तरह ओंकार पितृतीर्थ है। कावेरी, कपिलोदका, |