मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
८४ * मत्स्यपुराण *
बाईसवाँ अध्याय
श्राद्धके योग्य समय, स्थान (तीर्थ) तथा कुछ विशेष नियमोंका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>कस्मिन् काले च तच्छ्राद्धमनन्तफलं भवेत्।<br>कस्मिन् वासरभोगे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत्।<br>तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! श्राद्धकर्ताको दिनके किस भागमें श्राद्ध करना चाहिये? किस कालमें किया गया वह श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है? तथा किन-किन तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अधिक-से-अधिक फल प्रदान करता है?॥ १॥ |
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| सूत उवाच<br>अपराह्ने तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये।<br>यत्किञ्चिद् दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्॥ २<br>तीर्थानि यानि सर्वाणि पितॄणां वल्लभानि च।<br>नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः॥ ३<br>पितृतीर्थं गयानाम सर्वतीर्थवरं शुभम्।<br>यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः॥ ४<br>तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः॥ ५<br>एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्।<br>यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्॥ ६<br>तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा।<br>यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ ७<br>पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम्।<br>पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्॥ ८<br>वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः।<br>योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अपराह्न-काल (दिनके तीसरे पहरमें प्राप्त होनेवाले) अभिजित् मुहूर्तमें तथा रोहिणीके उदयकालमें (पितरोंके निमित्त) जो कुछ दिया जाता है, वह अक्षय बतलाया गया है। द्विजवरो! अब जो-जो तीर्थ पितरोंको परम प्रिय हैं, उन सबका नाम-निर्देशपूर्वक संक्षेपसे वर्णन कर रहा हूँ। गया नामक पितृतीर्थ सभी तीर्थोंमें श्रेष्ठ एवं मङ्गलदायक है, वहाँ देवदेवेश्वर भगवान् पितामह स्वयं ही विराजमान हैं। वहाँ श्राद्धमें भाग पानेकी कामनावाले पितरोंद्वारा यह गाथा गायी गयी है—'मनुष्योंको अनेक पुत्रोंकी अभिलाषा करनी चाहिये; क्योंकि उनमेंसे यदि एक भी पुत्र गयाकी यात्रा करेगा अथवा अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर देगा या नील वृष (साँड़)-का उत्सर्ग कर देगा (तो हमारा उद्धार हो जायगा)।' उसी प्रकार पुण्यप्रदा वाराणसी नगरी सदा पितरोंको प्रिय है, जहाँ अविमुक्तके निकट किया गया श्राद्ध भुक्ति (भोग) एवं मुक्ति (मोक्ष)-रूप फल प्रदान करता है। उसी प्रकार पुण्यप्रद विमलेश्वर तीर्थ भी पितरोंके लिये परम प्रिय है। पितृतीर्थ प्रयाग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंका प्रदाता है। वहाँ माधवसमेत भगवान् वटेश्वर तथा उसी प्रकार योगनिद्रामें शयन करते हुए भगवान् केशव सदा निवास करते हैं॥ २—९॥ |
| दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च।<br>नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थं मायापुरी शुभा॥ १०<br>तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम्।<br>गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्॥ ११<br>तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद्रुसलिले ह्रदे।<br>तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्॥ १२ | पुण्यमय दशाश्वमेधिक तीर्थ, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), नन्दा, ललिता तथा मङ्गलमयी मायापुरी (ऋषिकेश)—ये सभी तीर्थ भी उसी प्रकार पितरोंको प्रिय हैं। मित्रपद (तीर्थ) भी श्रेष्ठ हैं। उत्तम केदारतीर्थ और सर्वतीर्थमय एवं मङ्गलप्रद गङ्गासागरतीर्थको भी पितृप्रिय कहा गया है। उसी तरह शतद्रु (सतलज) नदीके जलके अन्तर्गत कुण्डमें स्थित ब्रह्मसर तीर्थ भी श्रेष्ठ हैं। नैमिषारण्य सम्पूर्ण तीर्थोंका एकत्र फल प्रदान करनेवाला है। यह |
* अध्याय २२ * । ८५
| गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः।<br>तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत् ॥ १३<br>यत्र तत्काञ्चनं द्वारमष्टादशभुजो हरः।<br>नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत् पुरा ॥ १४<br>तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम्।<br>देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम् ॥ १५<br>यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत्।<br>कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम् ॥ १६<br>यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः।<br>तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा ॥ १७<br>सङ्गमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा।<br>कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम् ॥ १८<br>तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता।<br>इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी ॥ १९<br>यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती।<br>नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा ॥ २०<br>पितॄणां वल्लभा होताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः।<br>जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते ॥ २१<br>अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम्।<br>नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः ॥ २२<br>तथा रुद्रसरः पुण्यं सरो मानसमेव च।<br>मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती ॥ २३<br>पूर्वमित्रपदं तद्वद् वैद्यनाथं महाफलम्।<br>क्षिप्रा नदी महाकालस्तथा कालञ्जरं शुभम् ॥ २४<br>वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम्।<br>भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च ॥ २५<br>गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः।<br>एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥ २६<br>स्मरणादपि लोकानां किमु श्राद्धकृतां नृणाम्।<br>ओंकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम् ॥ २७ | पितरोंको (बहुत) प्रिय है। यहीं गोमती नदीमें गङ्गाका सनातन स्रोत प्रकट हुआ है। यहाँ त्रिशूलधारी महादेव और सनातन यज्ञवराह विराजते हैं। यहाँ अष्टादश भुजाधारी शंकरकी प्रतिमा है। यहाँका काञ्चनद्वार प्रसिद्ध है। यहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुद्वारा दिये गये धर्मचक्रकी नेमि शीर्ण होकर गिरी थी। यह सम्पूर्ण तीर्थोंद्वारा निषेवित नैमिषारण्य नामक तीर्थ है। यहाँ देवाधिदेव भगवान् वाराहका भी दर्शन होता है। जो वहाँकी यात्रा करता है, वह पवित्रात्मा होकर नारायणपदको प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार सम्पूर्ण पापोंका विनाशक एवं महान् पुण्यशाली कृतशौच नामक तीर्थ है, जहाँ भगवान् जनार्दन नृसिंहरूपसे विराजमान रहते हैं। तीर्थभूता इक्षुमती (काली नदी) पितरोंको सदा प्रिय है। (कन्नौजके पास इस इक्षुमतीके साथ) गङ्गाजीके संगमपर पितरलोग सदा निवास करते हैं। सम्पूर्ण तीर्थोंसे युक्त कुरुक्षेत्र नामक महान् पुण्यप्रद तीर्थ है। इसी प्रकार समस्त देवताओंद्वारा नमस्कृत पुण्यसलिला सरयू, पितृ-तीर्थोंकी अधिवासिनीरूपा इरावती नदी, यमुना, देविका (देग), काली (कालीसिंध), चन्द्रभागा (चनाब), दृषद्वती (घग्गर), पुण्यतोया वेणुमती (वेण्वा) नदी तथा सर्वश्रेष्ठ वेत्रवती (बेतवा)—ये नदियाँ पितरोंको परम प्रिय हैं। इसलिये श्राद्धके विषयमें करोड़ों गुना फलदायिनी मानी गयी हैं। द्विजवरो! जम्बूमार्ग (भड़ौंच) नामक तीर्थ महान् पुण्यदायक एवं सम्पूर्ण मनोऽभिलषित फलोंका प्रदाता है, यह पितरोंका प्रिय तीर्थ है। वहाँसे पितृलोक जानेका मार्ग अभी भी दिखायी पड़ता है। नीलकुण्ड तीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है॥ १०—२२॥<br><br>इसी प्रकार पुण्यप्रद रुद्रसर, मानससर, मन्दाकिनी, अच्छोदा (अच्छावत), विपाशा (व्यास नदी), सरस्वती, पूर्वमित्रपद, महान् फलदायक वैद्यनाथ, क्षिप्रा नदी, महाकाल, मङ्गलमय कालञ्जर, वंशोद्भेद, हरोद्भेद, महान् फलप्रद गङ्गोद्भेद, भद्रेश्वर, विष्णुपद और नर्मदाद्वार—ये सभी पितृप्रिय तीर्थ हैं। इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेसे गया तीर्थमें पिण्ड-प्रदानके तुल्य ही फल प्राप्त होता है—ऐसा महर्षियोंने कहा है। ये सभी पितृतीर्थ जब स्मरणमात्र कर लेनेसे लोगोंके सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करते हैं, तब (वहाँ जाकर) श्राद्ध करनेवाले मनुष्योंके पापनाशकी तो बात ही क्या है। इसी तरह ओंकार पितृतीर्थ है। कावेरी, कपिलोदका, |
२४- ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त
८६ * मत्स्यपुराण *
| सम्भेदश्चण्डवेगायास्तथैवामरकण्टकम् ।<br>कुरुक्षेत्राच्छतगुणं तस्मिन् स्नानादिकं भवेत् ॥ २८<br>शुक्रतीर्थं च विख्यातं तीर्थं सोमेश्वरं परम् ।<br>सर्वव्याधिहरं पुण्यं शतकोटिफलाधिकम् ॥ २९<br>श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये जलसंनिधौ ।<br>कायावरोहणं नाम तथा चर्मण्वती नदी ॥ ३०<br>गोमती वरुणा तद्वत्तीर्थमौशनसं परम् ।<br>भैरवं भृगुतुङ्गं च गौरीतीर्थमनुत्तमम् ॥ ३१<br>तीर्थं वैनायकं नाम भद्रेश्वरमतः परम् ।<br>तथा पापहरं नाम पुण्याथ तपती नदी ॥ ३२<br>मूलतापी पयोष्णी च पयोष्णीसङ्गमस्तथा ।<br>महाबोधिः पाटला च नागतीर्थमवन्तिका ॥ ३३<br>तथा वेणा नदी पुण्या महाशालं तथैव च ।<br>महारुद्रं महालिङ्गं दशार्णा च नदी शुभा ॥ ३४<br>शतरुद्रा शताह्वा च तथा विष्णुपदं परम् ।<br>अङ्गारवाहिका तद्वन्नदौ तौ शोणघर्घरौ ॥ ३५<br>कालिका च नदी पुण्या वितस्ता च नदी तथा ।<br>एतानि पितृतीर्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः ॥ ३६<br>श्राद्धमेतेषु यद् दत्तं तदनन्तफलं स्मृतम् ।<br>द्रोणी वाटनदी धारासरित् क्षीरनदी तथा ॥ ३७<br>गोकर्णं गजकर्णं च तथा च पुरुषोत्तमः ।<br>द्वारका कृष्णतीर्थं च तथार्बुदसरस्वती ॥ ३८<br>नदी मणिमती नाम तथा च गिरिकर्णिका ।<br>धूतपापं तथा तीर्थं समुद्रो दक्षिणस्तथा ॥ ३९<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते ।<br>तीर्थं मेघंकरं नाम स्वयमेव जनार्दनः ॥ ४०<br>यत्र शार्ङ्गधरो विष्णुर्मेखलायामवस्थितः ।<br>तथा मन्दोदरीतीर्थं तीर्थं चम्पा नदी शुभा ॥ ४१<br>तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा ।<br>चक्रवाकं चर्मकोटं तथा जन्मेश्वरं महत् ॥ ४२<br>अर्जुनं त्रिपुरं चैव सिद्धेश्वरमतः परम् ।<br>श्रीशैलं शांकरं तीर्थं नारसिंहमतः परम् ॥ ४३<br>महेन्द्रं च तथा पुण्यमथ श्रीरङ्गसंज्ञितम् ।<br>एतेष्वपि सदा श्राद्धमनन्तफलदं स्मृतम् ॥ ४४<br>दर्शनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै ।<br>तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित् ॥ ४५ | चण्डवेगा और नर्मदाका संगम तथा अमरकण्टक—इन पितृतीर्थोंमें स्नान आदि करनेसे कुरुक्षेत्रसे सौगुने अधिक फलकी प्राप्ति होती है। शुक्रतीर्थ भी पितृतीर्थरूपसे विख्यात है तथा सर्वोत्तम सोमेश्वरतीर्थ स्नान, श्राद्ध, दान, हवन तथा स्वाध्याय करनेपर समस्त व्याधियोंका विनाशक, पुण्यप्रदाता और सौ करोड़ गुना फलसे भी अधिक फलदायी है। कायावरोहण (गुजरातका कारावन) नामक तीर्थ, चर्मण्वती (चम्बल) नदी, गोमती, वरुणा (वरणा), उसी प्रकार औशनस नामक उत्तम तीर्थ, भैरव, (केदारनाथके पास) भृगुतुङ्ग, सर्वश्रेष्ठ गौरीतीर्थ, वैनायक नामक तीर्थ, उसके बाद भद्रेश्वरतीर्थ तथा पापहर नामक तीर्थ, पुण्यसलिला तपती नदी, मूलतापी, पयोष्णी तथा पयोष्णी-संगम, महाबोधि, पाटला, नागतीर्थ, अवन्तिका (उज्जैनी) तथा पुण्यतोया वेणानदी, महाशाल, महारुद्र, महालिङ्ग और मङ्गलमयी दशार्णा (धसान) नदी तो अत्यन्त ही शुभ हैं॥ २३—३४॥<br><br>शतरुद्रा, शताह्वा तथा श्रेष्ठ विष्णुपद, अङ्गारवाहिका, उसी प्रकार शोण और घर्घर (घाघरा) नामक दो नद, पुण्यजला कालिका नदी तथा वितस्ता (झेलम) नदी—ये पितृतीर्थ स्नान और दानके लिये प्रशस्त माने गये हैं। इनमें जो श्राद्ध आदि कर्म किया जाता है, वह अनन्त फलदायक कहा गया है। द्रोणी, वाटनदी, धारानदी, क्षीरनदी, गोकर्ण, गजकर्ण, पुरुषोत्तम-क्षेत्र, द्वारका, कृष्णतीर्थ तथा अर्बुदगिरि (आबू), सरस्वती, मणिमती नदी गिरिकर्णिका, धूतपापतीर्थ तथा दक्षिण समुद्र—इन पितृतीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। इसके पश्चात् मेघंकर नामक तीर्थ (गुजरातमें) है, जिसकी मेखलामें शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले स्वयं जनार्दन भगवान् विष्णु स्थित हैं। इसी प्रकार मन्दोदरीतीर्थ तथा मङ्गलमयी चम्पा नदी, सामलनाथ, महाशाल नदी, चक्रवाक, चर्मकोट, महान् तीर्थ जन्मेश्वर, अर्जुन, त्रिपुर इसके बाद सिद्धेश्वर, श्रीशैल (मल्लिकार्जुन), शाङ्करतीर्थ, इसके पश्चात् नारसिंहतीर्थ, महेन्द्र तथा पुण्यप्रद श्रीरङ्ग नामक तीर्थ हैं। इनमें भी किया गया श्राद्ध सदा अनन्त फलदाता माना गया है तथा ये दर्शनमात्रसे ही तुरंत पापोंको हर लेते हैं। पुण्यसलिला तुङ्गभद्रा नदी तथा भीमरथी नदी, |
| * अध्याय २२ * | ८७ |
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| भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मला नदी।<br>नदी गोदावरी नाम त्रिसंध्या तीर्थमुत्तमम्॥ ४६<br>तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम्।<br>यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः॥ ४७<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत्।<br>स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजाः॥ ४८<br>श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम्।<br>तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च॥ ४९<br>भद्रतीर्थं च विख्यातं पम्पातीर्थं च शाश्वतम्।<br>पुण्यं रामेश्वरं तद्वदेलापुरमलंपुरम्॥ ५०<br>अङ्गारक च विख्यातमामर्दकमलम्बुषम्।<br>आम्रातकेश्वरं तद्वदेकाम्रकमतः परम्॥ ५१<br>गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं कृपुचन्द्रं पृथूदकम्।<br>सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी॥ ५२<br>रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसङ्गमः।<br>इन्द्रकीलं महानादं तथा च प्रियमेलकम्॥ ५३<br>एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु।<br>एतेषु सर्वदेवानां सांनिध्यं दृश्यते यतः॥ ५४<br>दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम्।<br>बाहुदा च नदी पुण्या तथा सिद्धवनं शुभम्॥ ५५<br>तीर्थं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा।<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम्॥ ५६<br>तथैव पितृतीर्थं तु यत्र गोदावरी नदी।<br>युता लिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा॥ ५७<br>जामदग्न्यस्य तत् तीर्थं क्रमादायातमुत्तमम्।<br>प्रतीकस्य भयाद् भिन्नं यत्र गोदावरी नदी॥ ५८<br>तत् तीर्थं हव्यकव्यानामप्सरोयुगसंज्ञितम्।<br>श्राद्धाग्निकार्यदानेषु तथा कोटिशताधिकम्॥ ५९<br>तथा सहस्रलिङ्गं च राघवेश्वरमुत्तमम्।<br>सेन्द्रफेना नदी पुण्या यत्रेन्द्रः पतितः पुरा॥ ६०<br>निहत्य नमुचिं शक्रस्तपसा स्वर्गमाप्तवान्।<br>तत्र दत्तं नरैः श्राद्धमनन्तफलं भवेत्॥ ६१<br>तीर्थं तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च।<br>सोमपानं च विख्यातं यत्र वैश्वानरालयम्॥ ६२ | भीमेश्वर, कृष्णवेणा, कावेरी, कुड्मला नदी, गोदावरी नदी, त्रिसंध्या नामक उत्तम तीर्थ तथा समस्त तीर्थोंद्वारा नमस्कृत त्रैयम्बक नामक तीर्थ, जहाँ त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर स्वयं ही निवास करते हैं—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध करोड़ों-करोड़ों गुना फलदायक होता है। ब्राह्मणो ! इन तीर्थोंका स्मरणमात्र करनेसे पापसमूह सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर होकर नष्ट हो जाते हैं ॥४६—४८॥<br><br>इसी प्रकार श्रीपर्णी, ताम्रपर्णी, सर्वश्रेष्ठ जयातीर्थ, पुण्यतोया मत्स्य नदी, शिवधार, सुप्रसिद्ध भद्रतीर्थ, सनातन पम्पातीर्थ, पुण्यमय रामेश्वर, एलापुर, अलमपुर, अङ्गारक, प्रख्यात आमर्दक, अलम्बुष, (अलम्बुषा देवीका स्थान) आम्रातकेश्वर एवं एकाग्रक (भुवनेश्वर) हैं। इसके बाद गोवर्धन, हरिश्चन्द्र, कृपुचन्द्र, पृथूदक, सहस्राक्ष, हिरण्याक्ष, कदली नदी, रामाधिवास, उसमें भी सौमित्रिसंगम, इन्द्रकील, महानाद तथा प्रियमेलक—ये सभी श्राद्धमें सदा सर्वाधिक प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि इन तीर्थोंमें सम्पूर्ण देवताओंका सांनिध्य देखा जाता है, इसलिये इन सभीमें दिया गया दान सैकड़ों कोटि गुनासे भी अधिक फलदायी होता है। पुण्यजला बाहुदा (धवला) नदी, मङ्गलमय सिद्धवन, पाशुपत नामक तीर्थ तथा शुभदायिनी पार्वतिका नदी—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध सौ करोड़ गुनासे भी अधिक फलदाता होता है। उसी प्रकार यह भी एक पितृतीर्थ है, जहाँ सहस्रों शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं अन्तरमें सभी नदियोंका जल प्रवाहित करनेवाली गोदावरी नदी बहती है। वहींपर जामदग्न्यका वह उत्तम तीर्थ क्रमशः आकर सम्मिलित हुआ है, जो प्रतीकके भयसे पृथक् हो गया था। गोदावरी नदीमें स्थित हव्य-कव्य-भोजी पितरोंका वह परम प्रियतीर्थ अप्सरोयुग नामसे प्रसिद्ध है। यह भी श्राद्ध, हवन और दान आदि कार्योंमें सैकड़ों कोटि गुनेसे अधिक फल देनेवाला है तथा सहस्रलिङ्ग, उत्तम राघवेश्वर और पुण्यतोया इन्द्रफेना नदी नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें इन्द्रका पतन हो गया था तथा पुनः उन्होंने अपने तपोबलसे नमुचिका वध करके स्वर्गलोकको प्राप्त किया था। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। पुष्कर नामक तीर्थ, शालग्राम और जहाँ वैश्वानरका निवासस्थान है, वह सुप्रसिद्ध सोमपानतीर्थ, |
८८ * मत्स्यपुराण *
| तीर्थं सारस्वतं नाम स्वामितीर्थं तथैव च।<br>मलन्दरा नदी पुण्या कौशिकी चन्द्रिका तथा॥ ६३<br>वैदर्भी चाथ वेणा च पयोष्णी प्राङ्मुखा परा।<br>कावेरी चोत्तरा पुण्या तथा जालंधरो गिरिः॥ ६४<br>एतेषु श्राद्धतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते।<br>लोहदण्डं तथा तीर्थं चित्रकूटस्तथैव च॥ ६५ | सारस्वततीर्थ, स्वामितीर्थ, मलन्दरा नदी, कौशिकी और चन्द्रिका—ये पुण्यजला नदियाँ हैं। वैदर्भा, वैणा, पूर्वमुख बहनेवाली श्रेष्ठा पयोष्णी, उत्तरमुख बहनेवाली पुण्यसलिला कावेरी तथा जालंधर गिरि—इन श्राद्धसम्बन्धी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है॥ ४९–६४ १/२ ॥ |
| विन्ध्ययोगश्च गङ्गायास्तथा नदीतटं शुभम्।<br>कुब्जाम्रं तु तथा तीर्थमुर्वशीपुलिनं तथा॥ ६६<br>संसारमोचनं तीर्थं तथैव ऋणमोचनम्।<br>एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते॥ ६७<br>अट्टहासं तथा तीर्थं गौत्मेश्वरमेव च।<br>तथा वसिष्ठं तीर्थं तु हारीतं तु ततः परम्॥ ६८<br>ब्रह्मावर्तं कुशावर्तं हयतीर्थं तथैव च।<br>पिण्डारकं च विख्यातं शङ्खोद्धारं तथैव च॥ ६९<br>घण्टेश्वरं बिल्वकं च नीलपर्वतमेव च।<br>तथा च धरणीतीर्थं रामतीर्थं तथैव च॥ ७०<br>अश्वतीर्थं च विख्यातममन्तं श्राद्धदानयोः। | उसी प्रकार लोहदण्डतीर्थ, चित्रकूट, विन्ध्ययोग, गङ्गा नदीका मङ्गलमय तट, कुब्जाम्र (ऋषिकेश) तीर्थ, उर्वशीपुलिन, संसारमोचनतीर्थ तथा ऋणमोचन—इन पितृतीर्थोंमें श्राद्धका फल अनन्त हो जाता है। अट्टहासतीर्थ, गौतमेश्वर, वसिष्ठतीर्थ, उसके बाद हारीततीर्थ, ब्रह्मावर्त, कुशावर्त, हयतीर्थ, (द्वारकाके पास) प्रख्यात पिण्डारक, शङ्खोद्धार, घण्टेश्वर, बिल्वक, नीलपर्वत, धरणीतीर्थ, रामतीर्थ तथा अश्वतीर्थ (कन्नौज)—ये सब भी श्राद्ध एवं दानके लिये अनन्त फलदायक-रूपसे विख्यात हैं॥ ६५–७० १/२ ॥ |
| तीर्थं वेदशिरो नाम तथैवौघवती नदी॥ ७१<br>तीर्थं वसुप्रदं नामच्छागलाण्डं तथैव च।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमं पदम्॥ ७२<br>तथा च बदरीतीर्थं गणतीर्थं तथैव च।<br>जयन्तं विजयं चैव शक्रतीर्थं तथैव च॥ ७३<br>श्रीपतेश्च तथा तीर्थं तीर्थं रैवतकं तथा।<br>तथैव शारदातीर्थं भद्रकालेश्वरं तथा॥ ७४<br>वैकुण्ठतीर्थं च परं भीमेश्वरमथापि वा।<br>एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमां गतिम्॥ ७५<br>तीर्थं मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा।<br>कुशेशयं च विख्यातं गौरीशिखरमेव च॥ ७६<br>नकुलेशस्य तीर्थं च कर्दमालं तथैव च।<br>दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपुरं तथा॥ ७७<br>समगोदावरी तीर्थं सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम्।<br>तत्र श्राद्धं प्रदातव्यमनन्तफलमीप्सुभिः॥ ७८ | वेदशिर नामक तीर्थ, उसी तरह ओघवती नदी, वसुप्रद नामक तीर्थ एवं छागलाण्डतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध प्रदान करनेवाले लोग परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। बदरीतीर्थ, गणतीर्थ, जयन्त, विजय, शक्रतीर्थ, श्रीपतितीर्थ, रैवतकतीर्थ, शारदातीर्थ, भद्रकालेश्वर, वैकुण्ठतीर्थ, श्रेष्ठ भीमेश्वरतीर्थ—इन तीर्थोंमें श्राद्ध करनेवाले लोग परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं। मातृगृह नामक तीर्थ, करवीरपुर, कुशेशय, सुप्रसिद्ध गौरी-शिखर, नकुलेशतीर्थ, कर्दमाल, दिण्डिपुण्यकर, उसी तरह पुण्डरीकपुर तथा समस्त तीर्थेश्वरोंका भी अधीश्वर समगोदावरीतीर्थ—इन तीर्थोंमें अनन्त फलप्राप्तिके इच्छुकोंको श्राद्ध प्रदान करना चाहिये॥ ७१–७८॥ |
| एष तूद्देशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संग्रहो मया।<br>वागीशोऽपि न शक्नोति विस्तरात् किमु मानुषः॥ ७९ | इस प्रकार मैंने तीर्थोंके इस संग्रहका संक्षेपमें वर्णन किया; वैसे इनका विस्तृत वर्णन करनेमें तो बृहस्पति भी समर्थ नहीं हैं, फिर मनुष्यकी तो गणना ही क्या है? |
| सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः।<br>वर्णाश्रमाणां गेहेऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्॥ ८० | सत्यतीर्थ, दयातीर्थ तथा इन्द्रियनिग्रहतीर्थ—ये सभी वर्णाश्रम-धर्म माननेवालोंके घरमें भी तीर्थरूपसे बतलाये गये हैं। |
* अध्याय २२ *
८९
| एतत्तीर्थेषु यच्छ्राद्धं तत् कोटिगुणमिष्यते ।<br>यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन तीर्थे श्राद्धं समाचरेत् ॥ ७९<br>प्रातःकालो मुहूर्तास्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु ।<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्नस्ततः परम् ॥ ८२<br>सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत् ।<br>राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥ ८३<br>अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा ।<br>तत्राष्टमो मुहूर्त्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥ ८४<br>मध्याह्ने सर्वदा यस्मान्मन्दो भवति भास्करः ।<br>तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भो भविष्यति ॥ ८५<br>मध्याह्नखड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः ।<br>रूप्यं दर्भांस्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः ॥ ८६<br>पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य संतापकारिणः ।<br>अष्टावेते यतस्तस्मात् कुतपा इति विश्रुताः ॥ ८७<br>ऊर्ध्वं मुहूर्त्तात् कुतपाद्यान्मुहूर्त्तचतुष्टयम् ।<br>मुहूर्त्तपञ्चकं चैतत् स्वधाभवनमिष्यते ॥ ८८<br>विष्णोर्देहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा ।<br>श्राद्धस्य रक्षणार्थालमेतत्प्राहूर्दिवौकसः ॥ ८९<br>तिलोदकाञ्जलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः ।<br>सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते ॥ ९०<br>श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनाैकेन दीयते ।<br>तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः ॥ ९१ | चूँकि इन तीर्थोंमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कोटिगुना फलदायक होता है, अतः प्रयत्नपूर्वक तीर्थोंमें श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। प्रातःकाल तीन मुहूर्ततकका काल संगव कहलाता है। उसके बाद तीन मुहूर्ततकका काल मध्याह्न और उसके बाद उतने ही समयतक अपराह्न है। फिर तीन मुहूर्ततक सायंकाल होता है, उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकालका समय राक्षसी वेला नामसे प्रसिद्ध है। यह सभी कार्योंमें निन्दित है। एक दिनमें पन्द्रह मुहूर्त होते हैं, यह तो सदासे विख्यात है। उनमें जो आठवाँ मुहूर्त है, वह कुतप नामसे प्रसिद्ध है। चूँकि मध्याह्नके समय सूर्य सदा मन्द हो जाते हैं, इसलिये उस समय अनन्त फलदायक उस (कुतप)-का आरम्भ होता है। मध्याह्नकाल, खड्गपात्र, नेपालकम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ और आठवाँ दौहित्र (कन्याका पुत्र)—ये आठों चूँकि पापको, जिसे कुत्सित कहा जाता है, संतप्त करनेवाले हैं, इसलिये 'कुतप' नामसे विख्यात हैं। इस कुतप मुहूर्तके उपरान्त चार मुहूर्त अर्थात् कुल पाँच मुहूर्त स्वधावाचनके लिये उत्तम काल हैं। कुश तथा काला तिल—ये दोनों भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रादुर्भूत हुए हैं, अतः ये श्राद्धकी रक्षा करनेमें सर्वसमर्थ हैं—ऐसा देवगण कहते हैं। तीर्थवासियोंको जलमें प्रवेश करके एक हाथमें कुश लेकर तिलसहित जलाञ्जलि देनी चाहिये। ऐसा करनेसे श्राद्धकी विशेषता बढ़ जाती है। श्राद्ध करते समय (पिण्ड आदि तो) एक ही हाथसे दिया जाता है, परंतु तर्पण दोनों हाथोंसे किया जाता है—यह विधि सदासे प्रचलित है॥ ७९-९१॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ।<br>पुरा मत्स्येन कथितं तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम् ।<br>शृणोति यः पठेद् वापि श्रीमान् संजायते नरः ॥ ९२<br>श्राद्धकाले च वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः ।<br>सर्वपापोपशान्त्यर्थमलक्ष्मीनाशनं परम् ॥ ९३<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br>मिदं महापापहरं च पुंसाम् ।<br>ब्रह्मार्कुरुद्रैरपि पूजितं च<br>श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः ॥ ९४ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें मत्स्यभगवान्ने इस तीर्थ-श्राद्धका वर्णन किया था। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। जो मनुष्य इसे सुनता है अथवा स्वयं इसका पाठ करता है, वह श्रीसम्पन्न हो जाता है। तीर्थनिवासियाेंद्वारा समस्त पापोंकी शान्तिके निमित्त श्राद्धके समय इस परम श्रेष्ठ दरिद्रताविनाशक (श्राद्ध-माहात्म्यरूप) प्रसङ्गका पाठ करना चाहिये। यह श्राद्ध-माहात्म्य परम पवित्र, यशका आश्रयस्थान, पुरुषोंके महान्-से-महान् पापोंका विनाशक तथा ब्रह्मा, सूर्य और रुद्रद्वारा भी पूजित (सम्मानित) है॥ ९२-९४॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२॥
९०
* मत्स्यपुराण *
तेईसवाँ अध्याय
चन्द्रमाकी उत्पत्ति, उनका दक्ष प्रजापतिकी कन्याओंके साथ विवाह, चन्द्रमाद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान, उनकी तारापर आसक्ति, उनका भगवान् शङ्करके साथ युद्ध तथा ब्रह्माजीका बीच-बचाव करके युद्ध शान्त करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br><br>सोमः पितॄणामधिपः कथं शास्त्रविशारद।<br>तद्वंश्या ये च राजानो बभूवुः कीर्तिवर्धनाः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**शास्त्रविशारद सूतजी! पितरोंके अधिपति चन्द्रमाकी उत्पत्ति कैसे हुई? आप यह सब हमें बताइये तथा चन्द्रवंशमें जो कीर्तिवर्धक राजा हो गये हैं, उनके विषयमें भी हमलोग सुनना चाहते हैं, कृपया वह सब भी विस्तारसे बतलायें॥ १॥ |
| सूत उवाच<br><br>आदिष्टो ब्रह्मणा पूर्वमत्रिः सर्गविधौ पुरा।<br>अनुत्तरं नाम तपः सृष्ट्यर्थं तप्तवान् प्रभुः॥ २<br>यदानन्दकरं ब्रह्म जगत्क्लेशविनाशनम्।<br>ब्रह्मविष्ण्वर्करुद्राणामभ्यन्तरमतीन्द्रियम् ॥ ३<br>शान्तिकृच्छान्तमनसस्तदन्तर्नयने स्थितम्।<br>माहात्म्यात्तपसा विप्राः परमानन्दकारकम्॥ ४<br>यस्मादुमापतिः सार्धमुमया तमधिष्ठितः।<br>तं दृष्ट्वा चाष्टमांशेन तस्मात् सोमोऽभवच्छिशुः॥ ५<br>अधः सुस्राव नेत्राभ्यां धाम तच्चाम्बुसम्भवम्।<br>दीपयद् विश्वमखिलं ज्योत्स्नया सचराचरम्॥ ६<br>तद्दिशो जगृहुर्धाम स्त्रीरूपेण सुतेच्छया।<br>गर्भोऽभूत् तदुदरे तासामास्थितोऽब्दशतत्रयम्॥ ७<br>आशास्तं मुमुचुर्गर्भमशक्ता धारणे ततः।<br>समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः॥ ८<br>युवानमकरोद् ब्रह्मा सर्वायुधधरं नरम्।<br>स्यन्दनेऽथ सहस्त्राश्वे वेदशक्तिमये प्रभुः॥ ९<br>आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः।<br>तत्र ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तमस्मत् स्वामी भवत्वयम्॥ १० | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें ब्रह्माने अपने मानसपुत्र अत्रिको सृष्टि-रचनाके लिये आज्ञा दी। उन सामर्थ्यशाली महर्षिने सृष्टि-रचनाके निमित्त अनुत्तर<sup>२</sup> नामक (भीषण) तप किया। उस तपके प्रभावसे जगत्के कष्टोंका विनाशक, शान्तिकर्ता, इन्द्रियोंसे परे जो परमानन्द है तथा जो ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्रके अन्तःप्रदेशमें निवास करनेवाला है, वही ब्रह्म उन प्रशान्त मनवाले<sup>३</sup> महर्षिके (मन एवं) नेत्रोंके भीतर स्थित हो गया। चूँकि उस समय उमासहित उमापति शंकरने भी अत्रिके मन-नेत्रोंको अधियम बनाया था, अतः उन्हें देखकर शिवके या उनके अष्टमांशसे शिशु (ललाटस्थ चन्द्रके) रूपमें चन्द्रमा प्रकट हो गये। उस समय महर्षि अत्रिके नेत्रोंसे जलसम्भूत धाम (तेज) नीचेकी ओर बह चला। उसने अपने प्रकाशसे अखिल चराचर विश्वको उद्दीप्त कर दिया। दिशाओंने उस तेजको स्त्री-रूपसे धारणकर पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे ग्रहण कर लिया। वह उनके उदरमें गर्भरूप होकर तीन सौ वर्षोंतक स्थित रहा। जब दिशाएँ उस गर्भको धारण करनेमें असमर्थ हो गयीं, तब उन्होंने उसका परित्याग कर दिया। तत्पश्चात् चतुर्मुख ब्रह्माने उस गर्भको उठाकर उसे एकत्र कर सर्वायुधधारी तरुण पुरुषके रूपमें परिणत कर दिया तथा वे शक्तिशाली पितामह सहस्र घोड़ोंसे जुते हुए वेदशक्तिमय रथपर उसे बैठाकर अपने लोकको ले गये। वहाँ (उस पुरुषको देखकर) ब्रह्मर्षियोंने कहा—'ये हम लोगोंके स्वामी हों।' |
१. यह अध्याय पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, १२ में भी यों ही है।
२. जिसके बाद किसीने वैसा या उससे कोई दूसरा बड़ा तप न किया हो, वह तपस्या ही 'अनुत्तर' तप है।
३. इसमें 'चन्द्रमा मनसो जातः' (पुरुषसूक्त १३०)-का उपबृंहण है।
२५- कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना
| * अध्याय २३ * | ९१ |
|---|---|
| पितृभिर्देवगन्धर्वैरोषधीभिस्तथैव च।<br>तुष्टुवुः सोमदेवत्यैर्ब्रह्माद्यैर्मन्त्रसंग्रहैः॥ ११<br>स्तूयमानस्य तस्याभूदधिको धामसम्भवः।<br>तेजोवितानादभवद् भुवि दिव्यौषधीगणः॥ १२<br>तद्धीमिरधिका तस्माद् रात्रौ भवति सर्वदा।<br>तेनौषधीशः सोमोऽभूद् द्विजेशश्चापि गद्यते॥ १३<br>वेदधामरसं चापि यदिदं चन्द्रमण्डलम्।<br>क्षीयते वर्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा॥ १४<br>विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।<br>रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः॥ १५<br>ततः समाससहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।<br>तपश्चचार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः॥ १६<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान्स्तस्मै नारायणो हरिः।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच परमात्मा जनार्दनः॥ १७<br>ततो वव्रे वरान् सोमः शक्रलोकं जयाम्यहम्।<br>प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवन्तु मम मन्दिरे॥ १८<br>राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्याः सन्तु मे द्विजाः।<br>रक्षःपालः शिवोऽस्माकमास्तां शूलधरो हरः॥ १९<br>तथेत्युक्तः स आजहे राजसूयं तु विष्णुना।<br>होतात्रिर्भृगुरध्वर्युुरुद्गाताभूच्चतुर्मुखः ॥ २०<br>ब्रह्मत्वमगमत् तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।<br>सदस्याः सनकाद्यास्तु राजसूयविधौ स्मृताः॥ २१<br>चमसाध्वर्यवस्तत्र विश्वेदेवा दशैव तु।<br>त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादितम्॥ २२<br>ततः समाप्तेऽवभृथे तद्रूपालोकनेच्छवः।<br>कामबाणाभितप्ताङ्ग्यो नव देव्यः सिषेविरे॥ २३<br>लक्ष्मीनारायणं त्यक्त्वा सिनीवाली च कर्दमम्।<br>द्युतिर्विभावसुं तद्वत् तुष्टिर्धातारमव्ययम्॥ २४<br>प्रभा प्रभाकरं त्यक्त्वा हविष्मन्तं कुहूः स्वयम्।<br>कीर्तिर्जयन्तं भर्तारं वसुर्मरीचकश्यपम्॥ २५ | उसी समय पितर, ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व और ओषधियोंने ‘सोमदैवत्य’* नामक वैदिक मन्त्रसमूहोंसे उनकी स्तुति की। इस प्रकार स्तुति किये जानेपर चन्द्रमाका तेज और अधिक बढ़ गया। तब उस तेजसमूहसे भूतलपर दिव्य ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी कारण रात्रिमें उन ओषधियोंकी कान्ति सर्वदा अधिक हो जाती है। इसी हेतु चन्द्रमा ओषधीश कहलाये तथा उन्हें द्विजेश भी कहा जाता है। वेदोंके तेजरूप रससे उत्पन्न हुआ जो यह चन्द्रमण्डल है, वह सर्वदा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें क्षीण होता रहता है॥ २-१४॥<br><br>तदनन्तर प्रचेता-नन्दन दक्षने चन्द्रमाको अपनी सत्ताईस कन्याएँ—जो रूप-लावण्यसे सम्पन्न तथा परम तेजस्विनी थीं, पत्नीरूपमें प्रदान कीं। तब शीत किरणोंवाले चन्द्रमाने एकमात्र भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर होकर १० लाख वर्षोतक तपस्या की। उससे प्रभावित होकर भगवान् (ऐश्वर्यशाली) जनार्दन (दुष्टविनाशक), परमात्मा (परम आत्मबलसे सम्पन्न), नारायण (जलशायी) हैं, वे श्रीहरि चन्द्रमापर प्रसन्न हो गये और (उनके समक्ष प्रकट होकर) बोले—‘वर माँगो!’ इस प्रकार कहे जानेपर चन्द्रमाने वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं इन्द्रलोकको जीत लेना चाहता हूँ, जिससे देवतालोग प्रत्यक्षरूपसे मेरे भवनमें आकर अपना-अपना भाग ग्रहण करें। मेरे राजसूय-यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवगण ब्राह्मण हों तथा त्रिशूलधारी मङ्गलमय भगवान् शंकर हम सभीके दिव्य रक्षःपाल (राक्षसोंसे रक्षा करनेवाले या सभी प्रकारके रक्षक) रूपमें उपस्थित रहें।’ भगवान् विष्णुके ‘तथेति’—‘ऐसा ही हो’—यों कहकर स्वीकार कर लेनेपर चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें महर्षि अत्रि होता (ऋग्वेदके पाठक), भृगु अध्वर्यु (यजुर्वेदके पाठक) और चतुर्मुख ब्रह्मा उद्गाता (सामवेदके गायक) थे। स्वयं श्रीहरिने उस यज्ञका उपद्रष्टा होकर ब्रह्मा (अथर्ववेदका पाठक)-का पद ग्रहण किया। उस राजसूय-यज्ञमें सनक आदि सदस्य और दसों विश्वेदेव चमसाध्वर्यु (यज्ञमें सोमरस पीनेवाले) बने—ऐसा सुना जाता है। उस समय चन्द्रमाने ऋत्विजोंको तीनों लोक दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिये थे। तत्पश्चात् अवभृथस्नान (यज्ञान्तमें होनेवाला स्नान)-की समाप्तिपर (चन्द्रमाके रूपपर मुग्ध होकर) उसके सौन्दर्यका अवलोकन करनेकी इच्छासे युक्त सिनीवाली आदि नौ देवियाँ उनकी सेवामें उपस्थित हुई। लक्ष्मी नारायणको, सिनीवाली कर्दमको, द्युति विभावसुको, तुष्टि अविनाशी ब्रह्माको, प्रभा प्रभाकरको, कुहू स्वयं हविष्मान्को, कीर्ति जयन्तको, वसु मरीचिनन्दन कश्यपको |
* ऋग्वेदके १। ९१ (मुख्यतम), ९। १-११४, १०। ८५ (जिसे विवाहसूक्त भी कहते हैं) आदि सूक्त सोमदैवत्य हैं।
९२ | मत्स्यपुराण |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धृतिस्त्यक्त्वा पतिं नन्दिं सोममेवाभजंस्तदा।<br>स्वकीया इव सोमोऽपि कामयामास तास्तदा॥ २६<br>एवं कृतापचारस्य तासां भर्तृगणस्तदा।<br>न शशाकापचाराय शापैः शस्त्रादिभिः पुनः॥ २७<br>तथाप्यराजत विधुर्दशधा भावयन् दिशः।<br>सोमः प्राप्याथ दुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसंस्कृतम्।<br>सप्तलोकैकनाथत्वमवाप तपसा तदा॥ २८ | और धृति अपने पति नन्दिको छोड़कर उस समय चन्द्रमाकी सेवामें नियुक्त हुई। चन्द्रमा उस समय दसों दिशाओंको उद्भासित करते हुए सुशोभित हो रहे थे तथा उन्होंने समस्त सृष्टिमें संस्कृत एवं दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्तकर सातों लोकोंका एकच्छत्र आधिपत्य प्राप्त किया'॥ १५–२८॥ |
| कदाचिदुद्यानगतामपश्य-<br>दनेकपुष्पाभरणैश्च शोभिताम्।<br>बृहन्नितम्बस्तनभारखेदात्-<br>पुष्पस्य भङ्गेऽप्यतिदुर्बलाङ्गीम्॥ २९<br>भार्यां च तां देवगुरोरनङ्ग-<br>बाणाभिरामायतचारुनेत्राम् ।<br>तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः<br>केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ॥ ३०<br>सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे<br>तद्रूपकान्त्या हृतमानसेन।<br>चिरं विहृत्याथ जगाम तारां<br>विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोऽपि॥ ३१ | इसके कुछ दिन बाद चन्द्रमा एक बार कभी ताराको साथ लेकर अपने घर चले गये। बृहस्पतिके कहनेपर भी उन्होंने ताराको उन्हें समर्पित नहीं किया। |
| न तृप्तिरासीच्च गृहेऽपि तस्य<br>तारानुरक्तस्य सुखागमेषु।<br>बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्ध-<br>स्तद्ध्याननिष्ठैकमना बभूव॥ ३२<br>शशाक शापं न च दातुमस्मै<br>न मन्त्रशस्त्राग्निविशेषरौषैः।<br>तस्यापकर्तुं विविधैरुपायै-<br>र्नैवाभिचारैरपि वागधीशः॥ ३३ | तत्पश्चात् महेश्वर, ब्रह्मा, साध्यगण तथा लोकपालोंसहित मरुद्गणके समझानेपर भी जब चन्द्रमाने ताराको किसी प्रकार नहीं लौटाया, तब भगवान् शिव, जो भूतलपर |
| स याचयामास ततस्तु दैन्यात्<br>सोमं स्वभार्यार्थमनङ्गतप्तः।<br>स याच्यमानोऽपि ददौ न तारां<br>बृहस्पतेस्तत्सुखपाशबद्धः॥ ३४<br>महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेण<br>साध्यैर्मरुद्भिः सह लोकपालैः।<br>ददौ यदा तां न कथंचिदिन्दु-<br>स्तदा शिवः क्रोधपरो बभूव॥ ३५ | वामदेव नामसे विख्यात हैं तथा अनेकों रुद्र जिनके चरणकमलोंकी अर्चना किया करते हैं, क्रुद्ध हो उठे। |
| यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्या-<br>मनेकरुद्रार्चितपादपद्मः ।<br>ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी<br>बृहस्पतिस्नेहवशानुबद्धः॥ ३६ | तदनन्तर त्रिपुरासुरके शत्रु एवं पिनाक धारण करनेवाले भगवान् शंकर बृहस्पतिके प्रति स्नेहके वशीभूत हो शिष्योंके |
| * अध्याय २३ * | ९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारि-<br>र्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।<br>युद्धाय सोमेन विशेषदीप्त-<br>स्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः॥ ३७॥ | साथ 'आजगव' नामक धनुष लेकर चन्द्रमाके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुए। उस समय उनका मुख विशेषरूपसे उद्दीप्त हुए तृतीय नेत्रकी अग्निसे बड़ा भयानक दीख रहा था॥ २९-३७॥ |
| सहैव जगमुश्च गणेशकाद्या<br>विंशच्चतुःषष्टिगणास्त्रयुक्ताः।<br>यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकै-<br>र्युतोऽन्वगात् स्पन्दनसंस्थितानाम्॥ ३८॥ | उनके साथ भूतेश्वरों और सिद्धोंका समुदाय भी था तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित गणेश आदि चौरासी गण भी साथ ही रवाना हुए। उसी प्रकार यक्षराज कुबेरने भी अनेकों शतकोटि सेनाओंके साथ-साथ रथारूढ़ एक |
| वेतालरक्षोरगकिंनराणां<br>पद्मेन चैकेन तथार्बुदेन।<br>लक्षैस्त्रिभिर्द्वादशभी रथानां<br>सोमोऽप्यगात् तत्र विवृद्धमन्युः॥ ३९॥ | पद्म वेताल, एक अरब यक्ष, तीन लाख नाग और बारह लाख किन्नरोंको साथ लेकर शिवजीका अनुसरण किया। उधर चन्द्रमा भी क्रोधाविष्ट हो नक्षत्रों, दैत्यों |
| नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः<br>शनैश्चराङ्गारकवृद्धतेजाः।<br>जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका-<br>श्चचाल भूद्वीपसमुद्रगर्भा॥ ४०॥ | और असुरोंकी सेनाओंके साथ शनैश्चर और मंगलके सहयोगके कारण उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न हो रणभूमिमें आ डटे। उस समाहारको देखकर सातों लोक भयभीत हो उठे तथा द्वीपों एवं समुद्रोंसहित पृथ्वी काँपने लगी। |
| स सोममेवाभ्यगमत् पिनाकी<br>गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।<br>अथाभवद् भीषणभीमसेन-<br>सैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ॥ ४१॥ | शिवजीने प्रकाशमान एवं विशाल आग्नेयास्त्रको लेकर चन्द्रमापर आक्रमण किया। फिर तो दोनों सेनाओंमें अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे उस युद्धने |
| अशेषसत्त्वक्षयकृत्प्रवृद्ध-<br>स्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनेकरूपः।<br>शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं<br>द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः॥ ४२॥ | उग्ररूप धारण कर लिया। उसमें सम्पूर्ण जीवोंका संहार हो रहा था तथा अग्निके समान प्रज्वलित हथियार चमक रहे थे। इस प्रकार एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त तीखे शस्त्रोंके प्रहारसे दोनों सेनाएँ समग्ररूपसे नष्ट होने लगीं। |
| पतन्ति शस्त्राणि तथोज्ज्वलानि<br>स्वर्भूमिपातालमथो दहन्ति।<br>रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीर्षं मुमोच<br>सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम्॥ ४३॥ | उस समय ऐसे जाज्वल्यमान शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी, जो स्वर्गलोक, भूतल और पातालको भस्म कर डालते थे। यह देख रुद्रने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशीर्ष नामक अस्त्र चलाया, तब चन्द्रमाने भी अपने अचूक लक्ष्यवाले सोमास्त्रका प्रयोग किया। |
| तयोर्निपातेन समुद्रभूम्यो-<br>रथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत्।<br>तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय<br>प्रवृद्धमालोक्य पितामहोऽपि॥ ४४॥ | उन दोनों अस्त्रोंके टकरानेसे समुद्र, भूमि और अन्तरिक्ष आदि सभी भयसे काँप उठे। इस प्रकार उन दोनों अस्त्रोंको जगत्का विनाश करनेके लिये बढ़ता हुआ देखकर |
| अन्तःप्रविश्याथ कथं कथंचि-<br>न्निवारयामास सुरैः सहैव।<br>अकारणं किं क्षयकृज्जनानां<br>सोम त्वयापीत्थमकारि कार्यम्॥ ४५॥ | देवताओंके साथ ब्रह्माने उनके भीतर प्रवेश करके किसी-किसी प्रकारसे उनका निवारण किया (और कहा-) 'सोम! तुमने अकारण ही ऐसा कार्य क्यों किया, यह तो लोगोंका विनाशक है। सोम! चूँकि तुमने |
९४ * मत्स्यपुराण *
| यस्मात् परस्त्रीहरणाय सोम<br>त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।<br>पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु<br>शान्तोऽप्यलं नूनमथो सितान्ते॥<br>भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं<br>न चावमानोऽस्ति परस्वहारे॥ ४६ | दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेके लिये इतना भयंकर युद्ध किया है, इसलिये शान्तस्वरूप होनेपर भी तुम शुक्लपक्षके अन्तमें अर्थात् कृष्णपक्षमें निश्चय ही जनतामें पापग्रहके रूपसे प्रसिद्ध होओगे। तुम बृहस्पतिकी इस भार्याको उन्हें समर्पित कर दो। दूसरेका धन लेकर उसे लौटा देनेमें अपमान नहीं होता'॥ ३८—४६॥ | | सूत उवाच<br>तथेति चोवाच हिमांशुमाली<br>युद्धादपाक्रामदतः प्रशान्तः।<br>बृहस्पतिः स्वामपगृह्य तारां<br>हृष्टो जगाम स्वगृहं सरुद्रः॥ ४७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तब चन्द्रमाने 'तथेति—ऐसा ही हो' यों कहकर ब्रह्माकी आज्ञा स्वीकार कर ली और वे शान्त होकर युद्धसे हट गये। इधर बृहस्पति भी अपनी पत्नी ताराको ग्रहण करके शिवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चले गये॥ ४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशाख्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशाख्यानमें सोमापचार नामक तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त
| सूत उवाच<br>ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।<br>दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥ १<br>तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।<br>सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥ २<br>नाम यद्राजपुत्रीयं विश्रुतं गजवैद्यकम्।<br>राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥ ३<br>जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।<br>ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥ ४<br>बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।<br>अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ। वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिमान् था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आदि विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्रीय' (या 'पालकाप्य'<sup>१</sup>)-नामसे विख्यात है, इसमें गज-चिकित्साका विशद वर्णन है।<sup>२</sup> सोम राजाका पुत्र होनेके कारण वह राजकुमार राजपुत्र तथा बुधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकर्म-संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियोंके साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण |
१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्लास १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६।२४-३० की तथा रघुवंश ५।५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।
२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।
| * अध्याय २४ * | ९५ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
| ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।<br>पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६<br>सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्लाद् विधुः सुतम्।<br>बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७<br>अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः।<br>ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९<br>अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।<br>पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥ १०<br>हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।<br>लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥ ११<br>केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।<br>उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता॥ १२<br>सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।<br>धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥ १३<br>चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।<br>विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददार्धासनं तदा॥ १४ | कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥ १-१४॥ |
| धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।<br>धर्मार्थकामाः संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५<br>जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।<br>भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥ १६<br>आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।<br>निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद् धर्मेऽधिकां पुनः॥ १७<br>जग्मतुस्तेन कामार्थावतिक्षोपं नृपं प्रति।<br>अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥ १८<br>कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।<br>कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥ १९<br>धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।<br>सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०<br>शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥ २१ | पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा—'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा—'राजेन्द्र! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा—'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे ॥ १५-२१ ॥ |
| ९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।<br>कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२<br>सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।<br>केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३<br>तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।<br>बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना॥ २४<br>तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।<br>मित्रत्वमगमद् देवैर्दाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५<br>ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।<br>सर्वलोकातिशायित्वं बलमूर्जो यशः श्रियम्॥ २६<br>प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।<br>सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥ २७<br>लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।<br>मेनकामुर्वशीं रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८<br>ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।<br>सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥ २९<br>विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।<br>शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥ ३०<br>पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।<br>पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति॥ ३१ | राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशीको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा—तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा—'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा॥ २२—३१॥ |
| ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।<br>शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२<br>अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।<br>आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुर्धृतिमान् वसुः॥ ३३<br>शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।<br>आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥ ३४<br>रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।<br>रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५<br>रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।<br>तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥ ३६ | तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे—आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर |
* कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।
२६- देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
* अध्याय २४ * ९७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| देवासुरमनुष्याणामभूत् स विजयी तदा।<br>अथ देवासुरं युद्धमभूद् वर्षशतत्रयम्॥ ३७<br>प्रह्लादशक्रयोर्भीमं न कश्चिद् विजयी तयोः।<br>ततो देवासुरैः पृष्टः प्राह देवश्चतुर्मुखः॥ ३८<br>अनयोर्विजयी कः स्याद् रजियंत्रैति सोऽब्रवीत्।<br>जयाय प्रार्थितो राजा सहायस्त्वं भवस्व नः॥ ३९<br>दैत्यैः प्राह यदि स्वामी वो भवामि ततस्त्वलम्।<br>नासूरैः प्रतिपन्नं तत् प्रतिपन्नं सुरैस्तथा॥ ४०<br>स्वामी भव त्वमस्माकं संग्रामे नाशय द्विषः।<br>ततो विनाशिताः सर्वे येऽवध्या वज्रपाणिना॥ ४१<br>पुत्रत्वमगमत् तुष्टस्तस्येन्द्रः कर्मणा विभुः।<br>दत्त्वेन्द्राय तदा राज्यं जगाम तपसे रजिः॥ ४२ | प्रदान किये, जिससे वे उस समय देवों, असुरों और मनुष्योंके विजेता हो गये। तदनन्तर प्रह्लाद और इन्द्रका भयंकर देवासुर-संग्राम छिड़ गया, जो तीन सौ वर्षोंतक चलता रहा; परंतु उन दोनोंमें कोई किसीपर विजय नहीं पा रहा था। तब देवताओं और असुरोंने मिलकर देवाधिदेव ब्रह्मासे पूछा—'ब्रह्मन्! इन दोनोंमें कौन (पक्ष) विजयी होगा?' यह सुनकर ब्रह्माने उत्तर दिया—'जिस पक्षमें राजा रजि रहेंगे (वही विजयी होगा)।' तब दैत्योंने राजाके पास जाकर अपनी विजयके लिये उनसे प्रार्थना की कि 'आप हमारे सहायक हो जायें।' उनकी प्रार्थना सुनकर रजिने कहा—'यदि मैं आप लोगोंका स्वामी हो जाऊँ तभी उपयुक्त सहायता हो सकेगी।' परंतु असुरोंने उस प्रस्तावको स्वीकार नहीं किया, किंतु देवताओंने उसे स्वीकार करते हुए कहा—'राजन् ! आप हमलोगोंके स्वामी हो जायें और संग्राममें शत्रुओंका संहार करें।' तदनन्तर राजा रजिने उन सभी असुरोंको मौतके घाट उतार दिया, जो इन्द्रद्वारा अवध्य थे। इस कर्मसे प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र राजाके पुत्र बन गये। तब राजा रजि इन्द्रको राज्य समर्पित कर स्वयं तपस्या करनेके लिये चले गये॥ ३२—४२ ॥ |
| रजिपुत्रैस्तदाच्छिन्नं बलादिन्द्रस्य वैभवम्।<br>यज्ञभागं च राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः॥ ४३<br>राज्याद् भ्रष्टस्तदा शक्रो रजिपुत्रैर्निपीडितः।<br>प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः॥ ४४<br>न यज्ञभागो राज्यं मे निर्जितश्च बृहस्पते।<br>राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप॥ ४५<br>ततो बृहस्पतिः शक्रमकरोद् बलदर्पितम्।<br>ग्रहशान्तिविधानेन पौष्टिकेन च कर्मणा॥ ४६<br>गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान् बृहस्पतिः।<br>जिनधर्मे समास्थाय वेदबाह्यं स वेदवित्॥ ४७<br>वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः।<br>वेदबाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान्॥ ४८<br>जघान शक्रो वज्रेण सर्वान् धर्मबहिष्कृतान्।<br>नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान् सप्तैव धार्मिकान्॥ ४९<br>यतिर्ययातिः संयातिरुद्भवः पचिरेव च।<br>शर्यातिर्मेघजातिश्च सप्तैते वंशवर्धनाः॥ ५० | तत्पश्चात् तपस्या, बल और गुणोंसे सम्पन्न रजिपुत्रोंने इन्द्रके वैभव, यज्ञभाग और राज्यको बलपूर्वक छीन लिया। इस प्रकार रजि-पुत्रोंद्वारा सताये गये एवं राज्यसे भ्रष्ट हुए दीन-दुःखी इन्द्र बृहस्पतिके पास जाकर बोले—'गुरुदेव ! मैं रजिके पुत्रोंद्वारा सताया जा रहा हूँ, मुझे अब यज्ञमें भाग नहीं मिलता तथा मेरा राज्य जीत लिया गया, अतः धिषणाधिप! (बृहस्पते) पुनः मेरी राज्य-प्राप्तिके लिये किसी उपायका विधान कीजिये।' तब बृहस्पतिने ग्रह-शान्तिके विधानसे तथा पौष्टिक कर्मद्वारा इन्द्रको बलसम्पन्न बना दिया और रजि-पुत्रोंके पास जाकर उन्हें मोहमें डाल दिया। उन वेदज्ञ बृहस्पतिने वेदोंद्वारा बहिष्कृत जिनधर्मका आश्रय लेकर उन्हें वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद)-से परिभ्रष्ट कर दिया। तदुपरान्त इन्द्रने उन्हें हेतुवाद (तर्कवाद-नास्तिक्य)-से समन्वित और वेदबाह्य जानकर अपने वज्रसे उन सभी धर्मबहिष्कृत रजि-पुत्रोंका संहार कर डाला। अब मैं नहुषके सात धार्मिक पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम हैं—यति, ययाति, संयाति, उद्भव, पाचि, शर्याति और मेघजाति। ये सातों वंश-विस्तारक थे॥ ४३—५०॥ |
| ९८ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यतिः कुमारभावेऽपि योगी वैखानसोऽभवत्।<br>ययातिश्चाकरोद् राज्यं धर्मैकशरणः सदा॥ ५१<br>शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद् दुहिता वृषपर्वणः।<br>भार्गवस्यात्मजा तद्वद्देवयानी च सुव्रता॥ ५२<br>ययातेः पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः।<br>देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्॥ ५३<br>तथा द्रुह्युमनुं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत् सुतान्।<br>यदुः पूरुश्चाभवतां तेषां वंशविवर्धनौ॥ ५४<br>ययातिर्नाहुषश्चासीद् राजा सत्यपराक्रमः।<br>पालयामास स महीमीजे च विधिवन्मखैः॥ ५५<br>अतिभक्त्या पितॄनर्च्च देवांश्च प्रयतः सदा।<br>अथाजयत् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः॥ ५६<br>स शाश्वतीः समा राजा प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>जरामाच्छेन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्॥ ५७<br>जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत्।<br>यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च पार्थिवः॥ ५८<br>यौवनेन चलान् कामान् युवा युवतिभिः सह।<br>विहर्तुमहमिच्छामि सहायं कुरुतात्मजाः॥ ५९ | (इनमें सबसे) ज्येष्ठ यति जब अपनी कुमारावस्थामें ही वैखानसका रूप धारण करके योगी हो गये, तब दूसरे पुत्र ययाति सदा एकमात्र धर्मका ही आश्रय लेकर राज्यभार सँभालने लगे। उस समय दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा तथा शुक्राचार्यकी कन्या व्रतपरायणा देवयानी—ये दोनों ययातिकी पत्नियाँ हुईं। इनके गर्भसे राजा ययातिके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका मैं नाम-निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको पैदा किया। इनमें यदु और पूरु—ये दोनों वंशका विस्तार करनेवाले हुए। नहुषनन्दन राजा ययाति सत्यपराक्रमी एवं अजेय थे। उन्होंने (धर्मपूर्वक) पृथ्वीका पालन किया और विधिपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा जितेन्द्रिय होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवों और पितरोंकी अर्चना करके सारी प्रजाओंपर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार नहुष-पुत्र राजा ययाति अनेकों वर्षोंतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे। इसी बीच वे रूपको विकृत कर देनेवाली महान् भयंकर वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। बुढ़ापाके वशीभूत हुए राजा ययातिने अपने यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक पुत्रोंसे ऐसी बात कही—'पुत्रो! यद्यपि युवावस्थाके साथ-साथ मेरी कामनाएँ भी चली गयीं, तथापि मैं पुनः युवा होकर युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, इस विषयमें तुमलोग मेरी सहायता करो॥ ५१–५९॥ |
| तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरब्रवीत्।<br>साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभिर्यौवनेन किम्॥ ६० | यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने राजासे कहा—'पिताजी! हमलोगोंको अपनी युवावस्थाद्वारा आपकी कौन-सी सहायता करनी है।' तब ययातिने अपने पुत्रोंसे कहा— |
| ययातिरब्रवीत् पुत्रा जरा मे प्रतिगृह्यताम्।<br>यौवनेनाथ भवतां चरेयं विषयानहम्॥ ६१<br>यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्छोशनसो मुनेः।<br>कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहं तेन पुत्रकाः॥ ६२<br>स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः।<br>अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम्॥ ६३<br>न तेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम्।<br>चतुरस्तान् स राजर्षिरशपच्चेति नः श्रुतम्॥ ६४<br>तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः।<br>जरां मां देहि नवया तन्वा मे यौवनात् सुखी॥ ६५ | 'तुमलोग मेरा बुढ़ापा ले लेना, तत्पश्चात् मैं तुमलोगोंकी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। पुत्रो! दीर्घकालव्यापी अनेकों यज्ञोंके अनुष्ठान तथा महर्षि शुक्राचार्यके शापसे मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गये हैं, इसी कारण मैं उनसे तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसलिये तुमलोगोंमेंसे कोई अपने शरीरद्वारा इस बुढ़ापेको स्वीकार करे और मैं उसके अभिनव शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर विषयोंका उपभोग करूँ।' परंतु जब यदु आदि चार पुत्रोंने पिताकी वृद्धावस्थाको ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तब राजर्षि ययातिने उन्हें शाप दे दिया—ऐसा हमलोगोंने सुन रखा है। तत्पश्चात् सबसे कनिष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने राजासे कहा—'पिताजी! आप अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिये और मेरे नूतन शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर सुखोंका उपभोग कीजिये। |
| * अध्याय २५ * | ९९ |
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| अहं जरां तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया।<br>एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्॥ ६६<br>संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।<br>पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः॥ ६७<br>ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः॥ ६८<br>अतृप्त इव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।<br>त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः॥ ६९<br>पौरवो वंश इत्येष ख्यातिं लोके गमिष्यति।<br>ततः स नृपशार्दूलः पूरुं राज्येऽभिषिच्य च॥ ७०<br>कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान्।<br>पूरुवंशं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः।<br>यत्र ते भारता जाता भरतान्वयवर्धनाः॥ ७१ | मैं आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करके आपके आज्ञानुसार राजकार्य सँभालूँगा।' पूरुके यों कहनेपर राजर्षि ययातिने अपने तपोबलका आश्रय लेकर उस महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपने बुढ़ापेको स्थापित किया और वे स्वयं पूरुकी युवावस्थाको लेकर तरुण हो गये। तदनन्तर ययातिकी वृद्धावस्थासे युक्त हुए पूरु राजकाजका संचालन करने लगे। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भी अजेय ययाति कामोपभोगसे अतृप्त-से ही बने रहे। तब उन्होंने अपने पुत्र पूरुसे कहा—'बेटा! अकेले तुम्हींसेमैं पुत्रवान् हूँ और तुम्हीं मेरे वंशविस्तारक पुत्र हो। आजसे यह वंश पूरुवंशके नामसे लोकमें विख्यात होगा।' तदनन्तर राजसिंह ययाति पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं उससे उपराम हो गये और बहुत समय बीतनेके पश्चात् कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हो गये। श्रेष्ठ ऋषियो! अब मैं जिस वंशमें भरत-वंशकी वृद्धि करनेवाले भारत नामसे प्रसिद्ध नरेश हो चुके हैं, उस पूरुवंशका वर्णन करने जा रहा हूँ, आपलोग समाहितचित्त होकर श्रवण कीजिये॥ ६०—७१॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय
कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना
| ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं पौरवो वंशः श्रेष्ठत्वं प्राप भूतले।<br>ज्येष्ठस्यापि यदोर्वंशः किमर्थं हीयते श्रिया॥ १<br>अन्यद् ययातिचरितं सूत विस्तरतो वद।<br>यस्मात् तत्पुण्यमायुष्यमभिनन्द्यं सुरैरपि॥ २ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (अनुज होकर भी) पूरुका वंश भूतलपर श्रेष्ठताको क्यों प्राप्त हुआ और ज्येष्ठ होते हुए भी यदुका वंश (राज्य-) लक्ष्मीसे हीन क्यों हो गया? इसका तथा ययातिके चरितका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि यह पुण्यप्रद, आयुवर्धक और देवताओंद्वारा भी अभिनन्दनीय है॥ १-२॥ |
| सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः शतानीकेन शौनकः।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं ययातिचरितं महत्॥ ३ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें शतानीकने (भी) महर्षि शौनकसे ययातिके इसी पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक एवं महत्त्वशाली चरितके विषयमें (इस प्रकार) प्रश्न किया था॥ ३॥ |
२७- देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| १०० | * मत्स्यपुराण * |
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| शतानीक उवाच<br>ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः।<br>कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्॥ ४<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन।<br>आनुपूर्व्याच्च मे शंस पूरोर्वंशधरान् नृपान्॥ ५ | **शतानीकने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे पूरुके सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये॥ ४-५॥ | | शौनक उवाच<br>ययातिरासीद् राजर्षिर्देवराजसमद्युतिः।<br>तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा॥ ६<br>तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो राजसत्तम।<br>देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च॥ ७<br>सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः।<br>ऐश्वर्यं प्रति सङ्घर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे॥ ८<br>जिगीषया ततो देवा वब्रुराङ्गिरसं मुनिम्।<br>पौरोहित्ये च यज्ञार्थे काव्यं तूर्शनसं परे॥ ९<br>ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यं स्पर्धिनौ भृशम्।<br>तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान्॥ १०<br>तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात्।<br>ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाञ्चक्रिरे सुरान्॥ ११<br>असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि।<br>न तान् स जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः॥ १२<br>न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्यवान्।<br>सञ्जीवनीं ततो देवा विषादमगमन् परम्॥ १३ | **शौनकजीने कहा—**राजसत्तम! राजर्षि ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिरूपमें जिस प्रकार वरण किया था, वह सब प्रसङ्ग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ। एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ, उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने यज्ञ-कार्यके लिये अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिको पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाँट रखते थे। देवता उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारते थे, उन्हें शुक्राचार्य अपनी संजीवनी-विद्याके बलसे पुनः जीवित कर देते थे। वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगते; परंतु असुरगण युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारते, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते; क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीवनी-विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको न था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ॥ ६-१३॥ | | अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा।<br>ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः॥ १४<br>भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम्।<br>यासौ विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि॥ १५<br>शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागमग्र्यौ भविष्यसि।<br>वृषपर्वणः समीपेऽसौ शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः॥ १६<br>रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान्।<br>तमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चिदृते त्वया॥ १७<br>देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः।<br>तामाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते॥ १८ | देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो गये। तब वे बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले—'ब्रह्मन्! हम तुम्हारी शरणमें हैं। तुम हमें अपनाओ और हमारी उत्तम सहायता करो। अमित तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी-विद्या है, उसे तुम शीघ्र सीख लो, इससे तुम हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकोगे। राजा वृषपर्वाके समीप तुम्हें विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है। वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं; किंतु जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। उनकी आराधना करनेके लिये तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा तुम्हीं प्रसन्न कर सकते हो। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है। |
- अध्याय २५ * । १०१
| शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।<br>देवयान्यां तु तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥ १९<br>तदा हि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।<br>तथेत्युक्त्वा तु स प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः॥ २०<br>स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्पूजितः कचः।<br>असुरेन्द्रपुरे शुक्रं प्रणम्येदमुवाच ह॥ २१<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः।<br>नाम्ना कचेति विख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ २२<br>ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो।<br>अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रपरिवत्सरान्॥ २३ | अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर तुम निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लोगे।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पति-पुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गया। राजन्! देवताओंद्वारा भेजा गया कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिला और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'भगवन्! मैं अङ्गिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें। ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षांतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ १४-२३॥ |
| शुक्र उवाच<br>कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः।<br>अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २४ | **शुक्राचार्यने कहा—**कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका (ही) आदर-सत्कार होगा॥ २४॥ |
| शौनक उवाच<br>कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम्।<br>आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २५<br>व्रतं च व्रतकालं च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत।<br>आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २६<br>नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगोचराम्।<br>गायन् नृत्यन् वादयँश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २७<br>संशीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम्।<br>पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भार्गवीम् ॥ २८<br>देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतचारिणम्।<br>अनुगायन्ती ललना रहः पर्यचरत् तदा॥ २९<br>पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो भृशम्।<br>तत्तत्तीव्रं व्रतं बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ ३०<br>गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येनममर्षिताः।<br>जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषात्संञ्जिंरक्षार्थमेव च॥ ३१<br>हत्वा सालावृकेभ्यश्च प्रायच्छंस्तिलशः कृतम्।<br>ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वनिवेशनम् ॥ ३२ | **शौनकजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण किया। राजन्! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी—दोनोंकी नित्य आराधना करने लगा। वह नवयुवक था और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखता था। आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आता तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करता। (इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वह सदा उसे प्रसन्न रखता था।) देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उसकी सेवा करती थी। इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी-विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला। उन्होंने मारनेके बाद उसके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं। जब |
१०२ * मत्स्यपुराण *
| ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचो नाभ्यागतो वनात्।<br>उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम् ॥ ३३<br>हुतं चैवाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो।<br>अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३४<br>व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३५ | देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं है, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा—'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देता। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारा गया है या पकड़ लिया गया है। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी'॥ २५—३५॥ | | शुक्र उवाच<br>अथेह्येहीति शब्देन मृतं संजीवयाम्यहम्।<br>ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत् ॥ ३६<br>आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।<br>हतोऽहमिति चाचख्यौ राक्षसैर्धिषणात्मजः ॥ ३७<br>स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया।<br>वनं ययौ कचो विप्रः पठन् ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ ३८<br>वने पुष्पाणि चिन्वन्तं ददृशुर्दानवाश्च तम्।<br>ततो द्वितीये तं हत्वा दग्धं कृत्वा च चूर्णवत्।<br>प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ३९<br>देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।<br>पुष्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४०<br>व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४१ | शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं मरे हुए कचको अभी 'आओ, आओ'—इस प्रकार बुलाकर जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी-विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा। फिर तो गुरुके पुकारनेपर सरस्वतीन्दन कच दूरसे ही दौड़ पड़ा और शुक्राचार्यके निकट आकर उन्हें प्रणाम कर बोला—'गुरो! राक्षसोंने मुझे मार डाला था।' पुनः देवयानीने स्वेच्छानुसार वनसे पुष्प लानेके लिये कचको आज्ञा दी, तब ब्राह्मण कच सनातन ब्रह्म (वेद)-का पाठ करते हुए वनमें गया। दानवोंने वनमें उसे पुष्पोंका चयन करते हुए देख लिया। तत्पश्चात् असुरोंने दूसरी बार मारकर आगमें जलाया और उसकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे शुक्राचार्यको ही पिला दिया। अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—'पिताजी! आज मैंने उसे फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वह दिखायी नहीं दिया। तात! जान पड़ता है कि वह मार दिया गया या मर गया। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती'॥ ३६—४१॥ | | शुक्र उवाच<br>बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः।<br>विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४२<br>मैवं शुचो मा रुद देवयानि<br>न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।<br>यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च<br>सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च ॥ ४३<br>सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-<br>मुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।<br>अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः<br>स जीवितो यो वध्यते चैव भूयः ॥ ४४ | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी! बृहस्पतिका पुत्र कच मर गया। मैंने विद्यासे उसे कई बार जिलाया तो भी वह इस प्रकार मार दिया जाता है, अब मैं क्या करूँ। देवयानि! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है।) ॥४२—४४॥ |
२८- शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| * अध्याय २५ * | १०३ |
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| देवयान्युवाच<br>यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो<br>बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः।<br>ऋषेः सुपुत्रं तमथापि पौत्रं<br>कथं न शोचे यमहं न रुद्याम्॥ ४५<br>स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च<br>सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।<br>कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये<br>प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः॥ ४६ | देवयानी बोली— पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अङ्गिरा जिसके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिसके पिता हैं, जो ऋषिका पुत्र और ऋषिका ही पौत्र है, उस ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ? तात! वह ब्रह्मचर्यपालनमें रत था, तपस्या ही उसका धन था। वह सदा ही सजग रहनेवाला और कार्य करनेमें कुशल था। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय था। वह सदा मेरे मनके अनुरूप चलता था। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गया है, वहीं मैं भी चली जाऊँगी॥ ४५-४६॥ | | शौनक उवाच<br>स त्वेवमुक्तो देवयान्या महर्षिः<br>संरम्भेण व्याजहाराथ काव्यः।<br>असंशयं मामसुरा द्विषन्ति<br>ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति॥ ४७<br>अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा<br>एभिर्व्यर्थं प्रस्तुतो दानवैर्हि।<br>तत्कर्मणाप्यस्य भवेदिहान्तः<br>कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्॥ ४८<br>स तेनापृष्टो विद्यया चोपहूतो<br>शनैर्वाचं जठरे व्याजहार।<br>तमब्रवीत् केन चेहोपनीतो<br>ममोदरे तिष्ठसि ब्रूहि वत्स॥ ४९ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं। ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हों?' जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठा हुआ कच भयभीत हो धीरेसे बोला। (उसकी आवाज सुनकर) शुक्राचार्यने पूछा—'वत्स! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये। ठीक-ठीक बताओ'॥ ४७-४९॥ | | कच उवाच<br>भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः<br>सर्वं स्मरेयं यच्च यथा च वृत्तम्।<br>न त्वेवं स्यात् तपसः क्षयो मे<br>ततः क्लेशं घोरतरं स्मरामि॥ ५०<br>असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो<br>हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य।<br>ब्राह्मीं मायां त्वासुरीं त्वन्न माया<br>त्वयि स्थिते कथमेवाभिबाधते॥ ५१ | कचने कहा— गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई, वह सब मुझे स्मरण है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल जानेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया। विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी—तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लङ्घन कैसे कर सकता है?॥ ५०-५१॥ | | शुक्र उवाच<br>किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से<br>विनैव मे जीवितं स्यात् कचस्य।<br>नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनाच्च<br>दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि॥ ५२ | शुक्राचार्य बोले— बेटी देवयानि! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ! मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके अतिरिक्त और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे॥ ५२॥ |