मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २५ * । १०१
| शीलदाक्षिण्यमाधुर्यैराचारेण दमेन च।<br>देवयान्यां तु तुष्टायां विद्यां तां प्राप्स्यसि ध्रुवम्॥ १९<br>तदा हि प्रेषितो देवैः समीपे वृषपर्वणः।<br>तथेत्युक्त्वा तु स प्रायाद् बृहस्पतिसुतः कचः॥ २०<br>स गत्वा त्वरितो राजन् देवैः सम्पूजितः कचः।<br>असुरेन्द्रपुरे शुक्रं प्रणम्येदमुवाच ह॥ २१<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्रं पुत्रं साक्षाद् बृहस्पतेः।<br>नाम्ना कचेति विख्यातं शिष्यं गृह्णातु मां भवान् ॥ २२<br>ब्रह्मचर्यं चरिष्यामि त्वय्यहं परमं गुरो।<br>अनुमन्यस्व मां ब्रह्मन् सहस्रपरिवत्सरान्॥ २३ | अपने शील-स्वभाव, उदारता, मधुर व्यवहार, सदाचार तथा इन्द्रियसंयमद्वारा देवयानीको संतुष्ट कर लेनेपर तुम निश्चय ही उस विद्याको प्राप्त कर लोगे।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर बृहस्पति-पुत्र कच देवताओंसे सम्मानित हो वहाँसे वृषपर्वाके समीप गया। राजन्! देवताओंद्वारा भेजा गया कच तुरंत दानवराज वृषपर्वाके नगरमें जाकर शुक्राचार्यसे मिला और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार बोला—'भगवन्! मैं अङ्गिरा ऋषिका पौत्र तथा साक्षात् बृहस्पतिका पुत्र हूँ। मेरा नाम कच है। आप मुझे अपने शिष्यके रूपमें ग्रहण करें। ब्रह्मन्! आप मेरे गुरु हैं। मैं आपके समीप रहकर एक हजार वर्षांतक उत्तम ब्रह्मचर्यका पालन करूँगा। इसके लिये आप मुझे अनुमति दें' ॥ १४-२३॥ |
| शुक्र उवाच<br>कच सुस्वागतं तेऽस्तु प्रतिगृह्णामि ते वचः।<br>अर्चयिष्येऽहमर्च्यं त्वामर्चितोऽस्तु बृहस्पतिः ॥ २४ | **शुक्राचार्यने कहा—**कच! तुम्हारा भलीभाँति स्वागत है, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करता हूँ। तुम मेरे लिये आदरके पात्र हो, अतः मैं तुम्हारा सम्मान एवं सत्कार करूँगा। तुम्हारे आदर-सत्कारसे मेरे द्वारा बृहस्पतिका (ही) आदर-सत्कार होगा॥ २४॥ |
| शौनक उवाच<br>कचस्तु तं तथेत्युक्त्वा प्रतिजग्राह तद् व्रतम्।<br>आदिष्टं कविपुत्रेण शुक्रेणोशनसा स्वयम् ॥ २५<br>व्रतं च व्रतकालं च यथोक्तं प्रत्यगृह्णत।<br>आराधयन्नुपाध्यायं देवयानीं च भारत ॥ २६<br>नित्यमाराधयिष्यंस्तां युवा यौवनगोचराम्।<br>गायन् नृत्यन् वादयँश्च देवयानीमतोषयत् ॥ २७<br>संशीलयन् देवयानीं कन्यां सम्प्राप्तयौवनाम्।<br>पुष्पैः फलैः प्रेषणैश्च तोषयामास भार्गवीम् ॥ २८<br>देवयान्यपि तं विप्रं नियमव्रतचारिणम्।<br>अनुगायन्ती ललना रहः पर्यचरत् तदा॥ २९<br>पञ्चवर्षशतान्येवं कचस्य चरतो भृशम्।<br>तत्तत्तीव्रं व्रतं बुद्ध्वा दानवास्तं ततः कचम् ॥ ३०<br>गा रक्षन्तं वने दृष्ट्वा रहस्येनममर्षिताः।<br>जघ्नुर्बृहस्पतेर्द्वेषात्संञ्जिंरक्षार्थमेव च॥ ३१<br>हत्वा सालावृकेभ्यश्च प्रायच्छंस्तिलशः कृतम्।<br>ततो गावो निवृत्तास्ता अगोपाः स्वनिवेशनम् ॥ ३२ | **शौनकजी कहते हैं—**तब कचने 'बहुत अच्छा' कहकर महाकान्तिमान् कविपुत्र शुक्राचार्यके आदेशके अनुसार स्वयं ब्रह्मचर्य-व्रत ग्रहण किया। राजन्! नियत समयतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेनेवाले कचको शुक्राचार्यने भलीभाँति अपना लिया। कच आचार्य शुक्र तथा उनकी पुत्री देवयानी—दोनोंकी नित्य आराधना करने लगा। वह नवयुवक था और जवानीमें प्रिय लगनेवाले कार्य—गायन और नृत्य करके भाँति-भाँतिके बाजे बजाकर देवयानीको संतुष्ट रखता था। आचार्यकन्या देवयानी भी युवावस्थामें पदार्पण कर चुकी थी। कच उसके लिये फूल और फल ले आता तथा उसकी आज्ञाके अनुसार कार्य करता। (इस प्रकार उसकी सेवामें संलग्न रहकर वह सदा उसे प्रसन्न रखता था।) देवयानी भी नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाले कचके ही समीप रहकर गाती और आमोद-प्रमोद करती हुई एकान्तमें उसकी सेवा करती थी। इस प्रकार वहाँ रहकर ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए कचके पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो गये। तब दानवोंको यह बात मालूम हुई। तदनन्तर कचको वनके एकान्त प्रदेशमें अकेले गौएँ चराते देख बृहस्पतिके द्वेषसे और संजीवनी-विद्याकी रक्षाके लिये क्रोधमें भरे हुए दानवोंने कचको मार डाला। उन्होंने मारनेके बाद उसके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर कुत्तों और सियारोंको बाँट दिया। उस दिन गौएँ बिना रक्षकके ही अपने स्थानपर लौटीं। जब |