मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| शतानीक उवाच<br>ययातिः पूर्वजोऽस्माकं दशमो यः प्रजापतेः।<br>कथं स शुक्रतनयां लेभे परमदुर्लभाम्॥ ४<br>एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन।<br>आनुपूर्व्याच्च मे शंस पूरोर्वंशधरान् नृपान्॥ ५ | **शतानीकने पूछा—**तपोधन! हमारे पूर्वज महाराज ययातिने, जो प्रजापतिसे दसवीं पीढ़ीमें उत्पन्न हुए थे, शुक्राचार्यकी अत्यन्त दुर्लभ पुत्री देवयानीको पत्नीरूपमें कैसे प्राप्त किया? मैं इस वृत्तान्तको विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझसे पूरुके सभी वंश-प्रवर्तक राजाओंका क्रमशः पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये॥ ४-५॥ | | शौनक उवाच<br>ययातिरासीद् राजर्षिर्देवराजसमद्युतिः।<br>तं शुक्रवृषपर्वाणौ वव्राते वै यथा पुरा॥ ६<br>तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि पृच्छतो राजसत्तम।<br>देवयान्याश्च संयोगं ययातेर्नाहुषस्य च॥ ७<br>सुराणामसुराणां च समजायत वै मिथः।<br>ऐश्वर्यं प्रति सङ्घर्षस्त्रैलोक्ये सचराचरे॥ ८<br>जिगीषया ततो देवा वब्रुराङ्गिरसं मुनिम्।<br>पौरोहित्ये च यज्ञार्थे काव्यं तूर्शनसं परे॥ ९<br>ब्राह्मणौ तावुभौ नित्यमन्योन्यं स्पर्धिनौ भृशम्।<br>तत्र देवा निजघ्नुर्यान् दानवान् युधि संगतान्॥ १०<br>तान् पुनर्जीवयामास काव्यो विद्याबलाश्रयात्।<br>ततस्ते पुनरुत्थाय योधयाञ्चक्रिरे सुरान्॥ ११<br>असुरास्तु निजघ्नुर्यान् सुरान् समरमूर्धनि।<br>न तान् स जीवयामास बृहस्पतिरुदारधीः॥ १२<br>न हि वेद स तां विद्यां यां काव्यो वेद वीर्यवान्।<br>सञ्जीवनीं ततो देवा विषादमगमन् परम्॥ १३ | **शौनकजीने कहा—**राजसत्तम! राजर्षि ययाति देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। पूर्वकालमें शुक्राचार्य और वृषपर्वाने ययातिका अपनी-अपनी कन्याके पतिरूपमें जिस प्रकार वरण किया था, वह सब प्रसङ्ग तुम्हारे पूछनेपर मैं तुमसे कहूँगा। साथ ही यह भी बताऊँगा कि नहुषनन्दन ययाति तथा देवयानीका संयोग किस प्रकार हुआ। एक समय चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीके ऐश्वर्यके लिये देवताओं और असुरोंमें परस्पर बड़ा भारी संघर्ष हुआ, उसमें विजय पानेकी इच्छासे देवताओंने यज्ञ-कार्यके लिये अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पतिको पुरोहितके पदपर वरण किया और दैत्योंने शुक्राचार्यको पुरोहित बनाया। वे दोनों ब्राह्मण सदा आपसमें बहुत लाग-डाँट रखते थे। देवता उस युद्धमें आये हुए जिन दानवोंको मारते थे, उन्हें शुक्राचार्य अपनी संजीवनी-विद्याके बलसे पुनः जीवित कर देते थे। वे पुनः उठकर देवताओंसे युद्ध करने लगते; परंतु असुरगण युद्धके मुहानेपर जिन देवताओंको मारते, उन्हें उदारबुद्धि बृहस्पति जीवित नहीं कर पाते; क्योंकि शक्तिशाली शुक्राचार्य जिस संजीवनी-विद्याको जानते थे, उसका ज्ञान बृहस्पतिको न था। इससे देवताओंको बड़ा विषाद हुआ॥ ६-१३॥ | | अथ देवा भयोद्विग्नाः काव्यादुशनसस्तदा।<br>ऊचुः कचमुपागम्य ज्येष्ठं पुत्रं बृहस्पतेः॥ १४<br>भजमानान् भजस्वास्मान् कुरु साहाय्यमुत्तमम्।<br>यासौ विद्या निवसति ब्राह्मणेऽमिततेजसि॥ १५<br>शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागमग्र्यौ भविष्यसि।<br>वृषपर्वणः समीपेऽसौ शक्यो द्रष्टुं त्वया द्विजः॥ १६<br>रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान्।<br>तमाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चिदृते त्वया॥ १७<br>देवयानी च दयिता सुता तस्य महात्मनः।<br>तामाराधयितुं शक्तो नान्यः कश्चन विद्यते॥ १८ | देवता शुक्राचार्यके भयसे उद्विग्न हो गये। तब वे बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र कचके पास जाकर बोले—'ब्रह्मन्! हम तुम्हारी शरणमें हैं। तुम हमें अपनाओ और हमारी उत्तम सहायता करो। अमित तेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी-विद्या है, उसे तुम शीघ्र सीख लो, इससे तुम हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकोगे। राजा वृषपर्वाके समीप तुम्हें विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है। वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं; किंतु जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। उनकी आराधना करनेके लिये तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। उन महात्माकी प्यारी पुत्रीका नाम देवयानी है, उसे अपनी सेवाओंद्वारा तुम्हीं प्रसन्न कर सकते हो। दूसरा कोई इसमें समर्थ नहीं है। |