भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109
* अध्याय २५ *९९
अहं जरां तवादाय राज्ये स्थास्यामि चाज्ञया।<br>एवमुक्तः स राजर्षिस्तपोवीर्यसमाश्रयात्॥ ६६<br>संस्थापयामास जरां तदा पुत्रे महात्मनि।<br>पौरवेणाथ वयसा राजा यौवनमास्थितः॥ ६७<br>ययातेश्चाथ वयसा राज्यं पूरुरकारयत्।<br>ततो वर्षसहस्रान्ते ययातिरपराजितः॥ ६८<br>अतृप्त इव कामानां पूरुं पुत्रमुवाच ह।<br>त्वया दायादवानस्मि त्वं मे वंशकरः सुतः॥ ६९<br>पौरवो वंश इत्येष ख्यातिं लोके गमिष्यति।<br>ततः स नृपशार्दूलः पूरुं राज्येऽभिषिच्य च॥ ७०<br>कालेन महता पश्चात् कालधर्ममुपेयिवान्।<br>पूरुवंशं प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः।<br>यत्र ते भारता जाता भरतान्वयवर्धनाः॥ ७१मैं आपकी वृद्धावस्था स्वीकार करके आपके आज्ञानुसार राजकार्य सँभालूँगा।' पूरुके यों कहनेपर राजर्षि ययातिने अपने तपोबलका आश्रय लेकर उस महात्मा पुत्र पूरुके शरीरमें अपने बुढ़ापेको स्थापित किया और वे स्वयं पूरुकी युवावस्थाको लेकर तरुण हो गये। तदनन्तर ययातिकी वृद्धावस्थासे युक्त हुए पूरु राजकाजका संचालन करने लगे। इस प्रकार एक सहस्र वर्ष व्यतीत होनेपर भी अजेय ययाति कामोपभोगसे अतृप्त-से ही बने रहे। तब उन्होंने अपने पुत्र पूरुसे कहा—'बेटा! अकेले तुम्हींसेमैं पुत्रवान् हूँ और तुम्हीं मेरे वंशविस्तारक पुत्र हो। आजसे यह वंश पूरुवंशके नामसे लोकमें विख्यात होगा।' तदनन्तर राजसिंह ययाति पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वयं उससे उपराम हो गये और बहुत समय बीतनेके पश्चात् कालधर्म—मृत्युको प्राप्त हो गये। श्रेष्ठ ऋषियो! अब मैं जिस वंशमें भरत-वंशकी वृद्धि करनेवाले भारत नामसे प्रसिद्ध नरेश हो चुके हैं, उस पूरुवंशका वर्णन करने जा रहा हूँ, आपलोग समाहितचित्त होकर श्रवण कीजिये॥ ६०—७१॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

कचका शिष्यभावसे शुक्राचार्य और देवयानीकी सेवामें संलग्न होना और अनेक कष्ट सहनेके पश्चात् मृतसंजीवनी-विद्या प्राप्त करना

ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं पौरवो वंशः श्रेष्ठत्वं प्राप भूतले।<br>ज्येष्ठस्यापि यदोर्वंशः किमर्थं हीयते श्रिया॥ १<br>अन्यद् ययातिचरितं सूत विस्तरतो वद।<br>यस्मात् तत्पुण्यमायुष्यमभिनन्द्यं सुरैरपि॥ २**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! (अनुज होकर भी) पूरुका वंश भूतलपर श्रेष्ठताको क्यों प्राप्त हुआ और ज्येष्ठ होते हुए भी यदुका वंश (राज्य-) लक्ष्मीसे हीन क्यों हो गया? इसका तथा ययातिके चरितका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये; क्योंकि यह पुण्यप्रद, आयुवर्धक और देवताओंद्वारा भी अभिनन्दनीय है॥ १-२॥
सूत उवाच<br>एतदेव पुरा पृष्टः शतानीकेन शौनकः।<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं ययातिचरितं महत्॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें शतानीकने (भी) महर्षि शौनकसे ययातिके इसी पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक एवं महत्त्वशाली चरितके विषयमें (इस प्रकार) प्रश्न किया था॥ ३॥
मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 109, कुल 1098 में से · BharatKosha