भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९८* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यतिः कुमारभावेऽपि योगी वैखानसोऽभवत्।<br>ययातिश्चाकरोद् राज्यं धर्मैकशरणः सदा॥ ५१<br>शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूद् दुहिता वृषपर्वणः।<br>भार्गवस्यात्मजा तद्वद्देवयानी च सुव्रता॥ ५२<br>ययातेः पञ्च दायादास्तान् प्रवक्ष्यामि नामतः।<br>देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत्॥ ५३<br>तथा द्रुह्युमनुं पूरुं शर्मिष्ठाजनयत् सुतान्।<br>यदुः पूरुश्चाभवतां तेषां वंशविवर्धनौ॥ ५४<br>ययातिर्नाहुषश्चासीद् राजा सत्यपराक्रमः।<br>पालयामास स महीमीजे च विधिवन्मखैः॥ ५५<br>अतिभक्त्या पितॄनर्च्च देवांश्च प्रयतः सदा।<br>अथाजयत् प्रजाः सर्वा ययातिरपराजितः॥ ५६<br>स शाश्वतीः समा राजा प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>जरामाच्छेन्महाघोरां नाहुषो रूपनाशिनीम्॥ ५७<br>जराभिभूतः पुत्रान् स राजा वचनमब्रवीत्।<br>यदुं पूरुं तुर्वसुं च द्रुह्युं चानुं च पार्थिवः॥ ५८<br>यौवनेन चलान् कामान् युवा युवतिभिः सह।<br>विहर्तुमहमिच्छामि सहायं कुरुतात्मजाः॥ ५९(इनमें सबसे) ज्येष्ठ यति जब अपनी कुमारावस्थामें ही वैखानसका रूप धारण करके योगी हो गये, तब दूसरे पुत्र ययाति सदा एकमात्र धर्मका ही आश्रय लेकर राज्यभार सँभालने लगे। उस समय दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा तथा शुक्राचार्यकी कन्या व्रतपरायणा देवयानी—ये दोनों ययातिकी पत्नियाँ हुईं। इनके गर्भसे राजा ययातिके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिनका मैं नाम-निर्देशानुसार वर्णन कर रहा हूँ। देवयानीने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया तथा शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु और पूरु नामक तीन पुत्रोंको पैदा किया। इनमें यदु और पूरु—ये दोनों वंशका विस्तार करनेवाले हुए। नहुषनन्दन राजा ययाति सत्यपराक्रमी एवं अजेय थे। उन्होंने (धर्मपूर्वक) पृथ्वीका पालन किया और विधिपूर्वक अनेकों यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा जितेन्द्रिय होकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक देवों और पितरोंकी अर्चना करके सारी प्रजाओंपर अधिकार जमा लिया। इस प्रकार नहुष-पुत्र राजा ययाति अनेकों वर्षोंतक धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते रहे। इसी बीच वे रूपको विकृत कर देनेवाली महान् भयंकर वृद्धावस्थासे ग्रस्त हो गये। बुढ़ापाके वशीभूत हुए राजा ययातिने अपने यदु, पूरु, तुर्वसु, द्रुह्यु और अनु नामक पुत्रोंसे ऐसी बात कही—'पुत्रो! यद्यपि युवावस्थाके साथ-साथ मेरी कामनाएँ भी चली गयीं, तथापि मैं पुनः युवा होकर युवतियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, इस विषयमें तुमलोग मेरी सहायता करो॥ ५१–५९॥
तं पुत्रो देवयानेयः पूर्वजो यदुरब्रवीत्।<br>साहाय्यं भवतः कार्यमस्माभिर्यौवनेन किम्॥ ६०यह सुनकर देवयानीके ज्येष्ठ पुत्र यदुने राजासे कहा—'पिताजी! हमलोगोंको अपनी युवावस्थाद्वारा आपकी कौन-सी सहायता करनी है।' तब ययातिने अपने पुत्रोंसे कहा—
ययातिरब्रवीत् पुत्रा जरा मे प्रतिगृह्यताम्।<br>यौवनेनाथ भवतां चरेयं विषयानहम्॥ ६१<br>यजतो दीर्घसत्रैर्मे शापाच्छोशनसो मुनेः।<br>कामार्थः परिहीनो मेऽतृप्तोऽहं तेन पुत्रकाः॥ ६२<br>स्वकीयेन शरीरेण जरामेनां प्रशास्तु वः।<br>अहं तन्वाभिनवया युवा कामानवाप्नुयाम्॥ ६३<br>न तेऽस्य प्रत्यगृह्णन्त यदुप्रभृतयो जराम्।<br>चतुरस्तान् स राजर्षिरशपच्चेति नः श्रुतम्॥ ६४<br>तमब्रवीत् ततः पूरुः कनीयान् सत्यविक्रमः।<br>जरां मां देहि नवया तन्वा मे यौवनात् सुखी॥ ६५'तुमलोग मेरा बुढ़ापा ले लेना, तत्पश्चात् मैं तुमलोगोंकी जवानीसे विषयोंका उपभोग करूँगा। पुत्रो! दीर्घकालव्यापी अनेकों यज्ञोंके अनुष्ठान तथा महर्षि शुक्राचार्यके शापसे मेरे काम और अर्थ नष्ट हो गये हैं, इसी कारण मैं उनसे तृप्त नहीं हो सका हूँ। इसलिये तुमलोगोंमेंसे कोई अपने शरीरद्वारा इस बुढ़ापेको स्वीकार करे और मैं उसके अभिनव शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर विषयोंका उपभोग करूँ।' परंतु जब यदु आदि चार पुत्रोंने पिताकी वृद्धावस्थाको ग्रहण करना स्वीकार नहीं किया, तब राजर्षि ययातिने उन्हें शाप दे दिया—ऐसा हमलोगोंने सुन रखा है। तत्पश्चात् सबसे कनिष्ठ पुत्र सत्यपराक्रमी पूरुने राजासे कहा—'पिताजी! आप अपना बुढ़ापा मुझे दे दीजिये और मेरे नूतन शरीरकी प्राप्तिसे युवा होकर सुखोंका उपभोग कीजिये।