मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०२ * मत्स्यपुराण *
| ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचो नाभ्यागतो वनात्।<br>उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम् ॥ ३३<br>हुतं चैवाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो।<br>अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३४<br>व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३५ | देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं है, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा—'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देता। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारा गया है या पकड़ लिया गया है। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी'॥ २५—३५॥ | | शुक्र उवाच<br>अथेह्येहीति शब्देन मृतं संजीवयाम्यहम्।<br>ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत् ॥ ३६<br>आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।<br>हतोऽहमिति चाचख्यौ राक्षसैर्धिषणात्मजः ॥ ३७<br>स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया।<br>वनं ययौ कचो विप्रः पठन् ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ ३८<br>वने पुष्पाणि चिन्वन्तं ददृशुर्दानवाश्च तम्।<br>ततो द्वितीये तं हत्वा दग्धं कृत्वा च चूर्णवत्।<br>प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ३९<br>देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।<br>पुष्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४०<br>व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४१ | शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं मरे हुए कचको अभी 'आओ, आओ'—इस प्रकार बुलाकर जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी-विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा। फिर तो गुरुके पुकारनेपर सरस्वतीन्दन कच दूरसे ही दौड़ पड़ा और शुक्राचार्यके निकट आकर उन्हें प्रणाम कर बोला—'गुरो! राक्षसोंने मुझे मार डाला था।' पुनः देवयानीने स्वेच्छानुसार वनसे पुष्प लानेके लिये कचको आज्ञा दी, तब ब्राह्मण कच सनातन ब्रह्म (वेद)-का पाठ करते हुए वनमें गया। दानवोंने वनमें उसे पुष्पोंका चयन करते हुए देख लिया। तत्पश्चात् असुरोंने दूसरी बार मारकर आगमें जलाया और उसकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे शुक्राचार्यको ही पिला दिया। अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—'पिताजी! आज मैंने उसे फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वह दिखायी नहीं दिया। तात! जान पड़ता है कि वह मार दिया गया या मर गया। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती'॥ ३६—४१॥ | | शुक्र उवाच<br>बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः।<br>विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४२<br>मैवं शुचो मा रुद देवयानि<br>न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।<br>यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च<br>सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च ॥ ४३<br>सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-<br>मुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।<br>अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः<br>स जीवितो यो वध्यते चैव भूयः ॥ ४४ | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी! बृहस्पतिका पुत्र कच मर गया। मैंने विद्यासे उसे कई बार जिलाया तो भी वह इस प्रकार मार दिया जाता है, अब मैं क्या करूँ। देवयानि! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है।) ॥४२—४४॥ |