मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २५ * | १०३ |
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| देवयान्युवाच<br>यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो<br>बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः।<br>ऋषेः सुपुत्रं तमथापि पौत्रं<br>कथं न शोचे यमहं न रुद्याम्॥ ४५<br>स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च<br>सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।<br>कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये<br>प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः॥ ४६ | देवयानी बोली— पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अङ्गिरा जिसके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिसके पिता हैं, जो ऋषिका पुत्र और ऋषिका ही पौत्र है, उस ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ? तात! वह ब्रह्मचर्यपालनमें रत था, तपस्या ही उसका धन था। वह सदा ही सजग रहनेवाला और कार्य करनेमें कुशल था। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय था। वह सदा मेरे मनके अनुरूप चलता था। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गया है, वहीं मैं भी चली जाऊँगी॥ ४५-४६॥ | | शौनक उवाच<br>स त्वेवमुक्तो देवयान्या महर्षिः<br>संरम्भेण व्याजहाराथ काव्यः।<br>असंशयं मामसुरा द्विषन्ति<br>ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति॥ ४७<br>अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा<br>एभिर्व्यर्थं प्रस्तुतो दानवैर्हि।<br>तत्कर्मणाप्यस्य भवेदिहान्तः<br>कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्॥ ४८<br>स तेनापृष्टो विद्यया चोपहूतो<br>शनैर्वाचं जठरे व्याजहार।<br>तमब्रवीत् केन चेहोपनीतो<br>ममोदरे तिष्ठसि ब्रूहि वत्स॥ ४९ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं। ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हों?' जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठा हुआ कच भयभीत हो धीरेसे बोला। (उसकी आवाज सुनकर) शुक्राचार्यने पूछा—'वत्स! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये। ठीक-ठीक बताओ'॥ ४७-४९॥ | | कच उवाच<br>भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः<br>सर्वं स्मरेयं यच्च यथा च वृत्तम्।<br>न त्वेवं स्यात् तपसः क्षयो मे<br>ततः क्लेशं घोरतरं स्मरामि॥ ५०<br>असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो<br>हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य।<br>ब्राह्मीं मायां त्वासुरीं त्वन्न माया<br>त्वयि स्थिते कथमेवाभिबाधते॥ ५१ | कचने कहा— गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई, वह सब मुझे स्मरण है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल जानेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया। विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी—तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लङ्घन कैसे कर सकता है?॥ ५०-५१॥ | | शुक्र उवाच<br>किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से<br>विनैव मे जीवितं स्यात् कचस्य।<br>नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनाच्च<br>दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि॥ ५२ | शुक्राचार्य बोले— बेटी देवयानि! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ! मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके अतिरिक्त और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे॥ ५२॥ |