मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०२ * मत्स्यपुराण *
| ता दृष्ट्वा रहिता गास्तु कचो नाभ्यागतो वनात्।<br>उवाच वचनं काले देवयान्यथ भार्गवम् ॥ ३३<br>हुतं चैवाग्निहोत्रं ते सूर्यश्चास्तं गतः प्रभो।<br>अगोपाश्चागता गावः कचस्तात न दृश्यते ॥ ३४<br>व्यक्तं हतो धृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३५ | देवयानीने देखा, गौएँ तो वनसे लौट आयीं, पर उनके साथ कच नहीं है, तब उसने उस समय अपने पितासे इस प्रकार कहा—'प्रभो! आपने अग्निहोत्र कर लिया और सूर्यदेव भी अस्ताचलको चले गये। गौएँ भी आज बिना रक्षकके ही लौट आयी हैं। तात! तो भी कच नहीं दिखायी देता। पिताजी! अवश्य ही कच या तो मारा गया है या पकड़ लिया गया है। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगी'॥ २५—३५॥ | | शुक्र उवाच<br>अथेह्येहीति शब्देन मृतं संजीवयाम्यहम्।<br>ततः संजीवनीं विद्यां प्रयुक्त्वा कचमाह्वयत् ॥ ३६<br>आहूतः प्राद्रवद् दूरात् कचः शुक्रं ननाम सः।<br>हतोऽहमिति चाचख्यौ राक्षसैर्धिषणात्मजः ॥ ३७<br>स पुनर्देवयान्योक्तः पुष्पाहारे यदृच्छया।<br>वनं ययौ कचो विप्रः पठन् ब्रह्म च शाश्वतम् ॥ ३८<br>वने पुष्पाणि चिन्वन्तं ददृशुर्दानवाश्च तम्।<br>ततो द्वितीये तं हत्वा दग्धं कृत्वा च चूर्णवत्।<br>प्रायच्छन् ब्राह्मणायैव सुरायामसुरास्तदा ॥ ३९<br>देवयान्यथ भूयोऽपि पितरं वाक्यमब्रवीत्।<br>पुष्पाहारप्रेषणकृत्कचस्तात न दृश्यते ॥ ४०<br>व्यक्तं हतो मृतो वापि कचस्तात भविष्यति।<br>तं विना नैव जीवामि वचः सत्यं ब्रवीमि ते ॥ ४१ | शुक्राचार्यने कहा—(बेटी! चिन्ता न करो।) मैं मरे हुए कचको अभी 'आओ, आओ'—इस प्रकार बुलाकर जीवित किये देता हूँ। ऐसा कहकर उन्होंने संजीवनी-विद्याका प्रयोग किया और कचको पुकारा। फिर तो गुरुके पुकारनेपर सरस्वतीन्दन कच दूरसे ही दौड़ पड़ा और शुक्राचार्यके निकट आकर उन्हें प्रणाम कर बोला—'गुरो! राक्षसोंने मुझे मार डाला था।' पुनः देवयानीने स्वेच्छानुसार वनसे पुष्प लानेके लिये कचको आज्ञा दी, तब ब्राह्मण कच सनातन ब्रह्म (वेद)-का पाठ करते हुए वनमें गया। दानवोंने वनमें उसे पुष्पोंका चयन करते हुए देख लिया। तत्पश्चात् असुरोंने दूसरी बार मारकर आगमें जलाया और उसकी जली हुई लाशका चूर्ण बनाकर मदिरामें मिला दिया तथा उसे शुक्राचार्यको ही पिला दिया। अब देवयानी पुनः अपने पितासे यह बात बोली—'पिताजी! आज मैंने उसे फूल लानेके लिये भेजा था, परंतु अभीतक वह दिखायी नहीं दिया। तात! जान पड़ता है कि वह मार दिया गया या मर गया। मैं आपसे सच कहती हूँ, मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकती'॥ ३६—४१॥ | | शुक्र उवाच<br>बृहस्पतेः सुतः पुत्रि कचः प्रेतगतिं गतः।<br>विद्यया जीवितोऽप्येवं हन्यते करवाणि किम् ॥ ४२<br>मैवं शुचो मा रुद देवयानि<br>न त्वादृशी मर्त्यमनु प्रशोचेत्।<br>यस्यास्तव ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च<br>सेन्द्रा देवा वसवोऽश्विनौ च ॥ ४३<br>सुरद्विषश्चैव जगच्च सर्व-<br>मुपस्थितं मत्तपसः प्रभावात्।<br>अशक्योऽयं जीवयितुं द्विजातिः<br>स जीवितो यो वध्यते चैव भूयः ॥ ४४ | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी! बृहस्पतिका पुत्र कच मर गया। मैंने विद्यासे उसे कई बार जिलाया तो भी वह इस प्रकार मार दिया जाता है, अब मैं क्या करूँ। देवयानि! तुम इस प्रकार शोक न करो, रोओ मत। तुम-जैसी शक्तिशालिनी स्त्री किसी मरनेवालेके लिये शोक नहीं करती। तुम्हें तो वेद, ब्राह्मण, इन्द्रसहित सब देवता, वसुगण, अश्विनीकुमार, दैत्य तथा सम्पूर्ण जगत्के प्राणी मेरे प्रभावसे तीनों संध्याओंके समय मस्तक झुकाकर प्रणाम करते हैं। अब उस ब्राह्मणको जिलाना असम्भव है। यदि जीवित हो जाय तो फिर दैत्योंद्वारा मार डाला जायगा (अतः उसे जिलानेसे कोई लाभ नहीं है।) ॥४२—४४॥ |
२८- शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| * अध्याय २५ * | १०३ |
|---|
| देवयान्युवाच<br>यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो<br>बृहस्पतिश्चापि पिता तपोनिधिः।<br>ऋषेः सुपुत्रं तमथापि पौत्रं<br>कथं न शोचे यमहं न रुद्याम्॥ ४५<br>स ब्रह्मचारी च तपोधनश्च<br>सदोत्थितः कर्मसु चैव दक्षः।<br>कचस्य मार्गं प्रतिपत्स्ये न भोक्ष्ये<br>प्रियो हि मे तात कचोऽभिरूपः॥ ४६ | देवयानी बोली— पिताजी! अत्यन्त वृद्ध महर्षि अङ्गिरा जिसके पितामह हैं, तपस्याके भण्डार बृहस्पति जिसके पिता हैं, जो ऋषिका पुत्र और ऋषिका ही पौत्र है, उस ब्रह्मचारी कचके लिये मैं कैसे शोक न करूँ और कैसे न रोऊँ? तात! वह ब्रह्मचर्यपालनमें रत था, तपस्या ही उसका धन था। वह सदा ही सजग रहनेवाला और कार्य करनेमें कुशल था। इसलिये कच मुझे बहुत प्रिय था। वह सदा मेरे मनके अनुरूप चलता था। अब मैं भोजनका त्याग कर दूँगी और कच जिस मार्गपर गया है, वहीं मैं भी चली जाऊँगी॥ ४५-४६॥ | | शौनक उवाच<br>स त्वेवमुक्तो देवयान्या महर्षिः<br>संरम्भेण व्याजहाराथ काव्यः।<br>असंशयं मामसुरा द्विषन्ति<br>ये मे शिष्यानागतान् सूदयन्ति॥ ४७<br>अब्राह्मणं कर्तुमिच्छन्ति रौद्रा<br>एभिर्व्यर्थं प्रस्तुतो दानवैर्हि।<br>तत्कर्मणाप्यस्य भवेदिहान्तः<br>कं ब्रह्महत्या न दहेदपीन्द्रम्॥ ४८<br>स तेनापृष्टो विद्यया चोपहूतो<br>शनैर्वाचं जठरे व्याजहार।<br>तमब्रवीत् केन चेहोपनीतो<br>ममोदरे तिष्ठसि ब्रूहि वत्स॥ ४९ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! देवयानीके कहनेसे उसके दुःखसे दुःखी महर्षि शुक्राचार्यने कचको पुकारा और दैत्योंके प्रति कुपित होकर बोले—'इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि असुरलोग मुझसे द्वेष करते हैं। तभी तो यहाँ आये हुए मेरे शिष्योंको ये लोग मार डालते हैं। ये भयंकर स्वभाववाले दैत्य मुझे ब्राह्मणत्वसे गिराना चाहते हैं। इसीलिये प्रतिदिन मेरे विरुद्ध आचरण कर रहे हैं। इस पापका परिणाम यहाँ अवश्य प्रकट होगा। ब्रह्महत्या किसे नहीं जला देगी, चाहे वह इन्द्र ही क्यों न हों?' जब गुरुने विद्याका प्रयोग करके बुलाया, तब उनके पेटमें बैठा हुआ कच भयभीत हो धीरेसे बोला। (उसकी आवाज सुनकर) शुक्राचार्यने पूछा—'वत्स! किस मार्गसे जाकर तुम मेरे उदरमें स्थित हो गये। ठीक-ठीक बताओ'॥ ४७-४९॥ | | कच उवाच<br>भवत्प्रसादान्न जहाति मां स्मृतिः<br>सर्वं स्मरेयं यच्च यथा च वृत्तम्।<br>न त्वेवं स्यात् तपसः क्षयो मे<br>ततः क्लेशं घोरतरं स्मरामि॥ ५०<br>असुरैः सुरायां भवतोऽस्मि दत्तो<br>हत्वा दग्ध्वा चूर्णयित्वा च काव्य।<br>ब्राह्मीं मायां त्वासुरीं त्वन्न माया<br>त्वयि स्थिते कथमेवाभिबाधते॥ ५१ | कचने कहा— गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरी स्मरणशक्तिने साथ नहीं छोड़ा है। जो बात जैसे हुई, वह सब मुझे स्मरण है। इस प्रकार पेट फाड़कर निकल जानेसे मेरी तपस्याका नाश होगा। वह न हो, इसलिये मैं यहाँ घोर क्लेश सहन करता हूँ। आचार्यपाद! असुरोंने मुझे मारकर मेरे शरीरको जलाया और चूर्ण बना दिया। फिर उसे मदिरामें मिलाकर आपको पिला दिया। विप्रवर! आप ब्राह्मी, आसुरी और दैवी—तीनों प्रकारकी मायाओंको जानते हैं। आपके होते हुए कोई इन मायाओंका उल्लङ्घन कैसे कर सकता है?॥ ५०-५१॥ | | शुक्र उवाच<br>किं ते प्रियं करवाण्यद्य वत्से<br>विनैव मे जीवितं स्यात् कचस्य।<br>नान्यत्र कुक्षेर्मम भेदनाच्च<br>दृश्येत् कचो मद्गतो देवयानि॥ ५२ | शुक्राचार्य बोले— बेटी देवयानि! अब तुम्हारे लिये कौन-सा प्रिय कार्य करूँ! मेरे वधसे ही कचका जीवित होना सम्भव है। मेरे उदरको विदीर्ण करनेके अतिरिक्त और कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मेरे शरीरमें बैठा हुआ कच बाहर दिखायी दे॥ ५२॥ |
२९- शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको सन्तुष्ट करना
| * अध्याय २६ * | १०५ |
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| शुक्र उवाच | |
|---|---|
| यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-<br>न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः।<br>अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-<br>दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६२ | शुक्राचार्यने कहा— आजसे (इस जगत्का) जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इहलोक और परलोक—दोनोंमें निन्दित होगा। धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें ॥ ६२-६३ ॥ |
| मया चेमां विप्रधर्मोक्तसीमां<br>मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।<br>सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां<br>देवा दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६३ | |
| शौनक उवाच | |
| इतीदमुक्त्वा स महाप्रभाव-<br>स्ततो निधीनां निधिरप्रमेयः।<br>तान् दानवांश्चैव निगूढबुद्धी-<br>निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६४ | शौनकजी कहते हैं— ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने, दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था, उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा ॥ ६४ ॥ |
| शुक्र उवाच | |
| आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ<br>शिष्यः कचो वत्स्यति मत्समीपे।<br>संजीवनीं प्राप्य विद्यां मयायं<br>तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ६५ | शुक्राचार्यने कहा— 'दानवो! तुम सब (बड़े) मूर्ख हो। मैं तुम्हें बताये देता हूँ—(महात्मा) कच मुझसे संजीवनी-विद्या पाकर सिद्ध हो गया है। इसका प्रभाव मेरे ही समान है। यह ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप है ॥ ६५ ॥ |
| शौनक उवाच | |
| गुरोरुष्य सकाशे च दशवर्षशतानि सः।<br>अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ६६ | शौनकजी कहते हैं— कचने (इस प्रकार) एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब (गुरुसे) घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर उसने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ६६ ॥ |
॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय देवयानीने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥ |
|---|---|
| समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा।<br>प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत् ॥ १ |
१०६ * मत्स्यपुराण *
| देवयान्युवाच<br>ऋषेरङ्गिरसः पौत्र वृत्तेनाभिजनेन च।<br>भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च॥ २<br>ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः।<br>तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः॥ ३<br>एवं ज्ञात्वा विजानीहि यद् ब्रवीमि तपोधन।<br>व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि॥ ४<br>स समापितविद्यो मां भक्तां न त्यक्तुमर्हसि।<br>गृहाण पाणिं विधिवन्मम मन्त्रपुरस्कृतम्॥ ५ | देवयानी बोली—महर्षि अङ्गिराके पौत्र! तुम सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी शोभा पा रहे हो। महायशस्वी महर्षि अङ्गिरा जिस प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार तुम्हारे पिता बृहस्पतिजी मेरे लिये आदरणीय तथा पूज्य हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ, उसपर विचार करो। तुम जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, (आशा है,) उसे तुम भूले नहीं होगे। अब तुम व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो; अतः वैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण करो॥ २–५॥ | | कच उवाच<br>पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव।<br>तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता॥ ६<br>आत्मप्राणैः प्रियतमा भार्गवस्य महात्मनः।<br>त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम॥ ७<br>यथा मम गुरुर्नित्यं मान्यः शुक्रः पिता तव।<br>देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमर्हसि॥ ८ | कचने कहा—निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे तुम्हारे पिता शुक्राचार्य मेरे लिये पूजनीय और माननीय हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे मेरी सदा पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये॥ ६–८॥ | | देवयान्युवाच<br>गुरुपुत्रस्य पुत्रो मे न तु त्वमसि मे पितुः।<br>तस्मान्मान्यश्च पूज्यश्च ममापि त्वं द्विजोत्तम॥ ९<br>असुरैर्हन्यमाने तु कच त्वयि पुनः पुनः।<br>तदाप्रभृति या प्रीतिस्तां त्वमेव स्मरस्व मे॥ १०<br>सौहार्दे चानुरागे च वेत्थ मे भक्तिमुत्तमाम्।<br>न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसाम्॥ ११ | देवयानी बोली—द्विजोत्तम! तुम मेरे गुरुके पुत्र हो, मेरे पिताके नहीं; (अतः मेरे भाई नहीं लगते, पर) मेरे पूजनीय और माननीय हो। कच! जब असुर तुम्हें बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक तुम्हारे प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे तुम्हीं स्मरण करो। तुम्हें मेरे सौहार्द और अनुराग तथा मेरी उत्तम भक्तिका परिचय मिल चुका है। तुम धर्मके ज्ञाता भी हो। मैं तुम्हारे प्रति भक्ति रखनेवाली निरपराध अबला हूँ। तुम्हें मेरा त्याग करना (कदापि) उचित नहीं है॥ ९–११॥ | | कच उवाच<br>अनियोज्ये नियोगे मां नियुनक्षि शुभव्रते।<br>प्रसीद सुभ्रु मह्यं त्वं गुरोर्गुरुतरा शुभे॥ १२<br>यत्रोषितं विशालाक्षि त्वया चन्द्रनिभानने।<br>तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि॥ १३<br>भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने।<br>सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम॥ १४ | कचने कहा—उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरि! तुम मुझे ऐसे कार्यमें प्रवृत्त कर रही हो, जो कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो। विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहन हो; अतः शुभानने! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणि! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है। |
३०- सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वन-विहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह
* अध्याय २६ * <p align="right">१०७</p>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आपृच्छे त्वां गमिष्यामि शिवमस्त्वथ मे पथि।<br>अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे ॥ १५<br><br>अप्रमत्तोद्यता नित्यमाराधय गुरुं मम। | अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ; आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेव (अपने पिता शुक्राचार्य) की सेवामें लगी रहना ॥ १२-१५ १/२ ॥ |
| देव्यान्युवाच<br>दैत्यैर्हतस्त्वं यद्भर्तृबुद्ध्या त्वं रक्षितो मया ॥ १६<br><br>यदि मां धर्मकामार्था प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः।<br>ततः कच न ते विद्या सिद्धिरेषा गमिष्यति ॥ १७ | देवयानी बोली— कच! दैत्योंद्वारा बार-बार तुम्हारे मारे जानेपर मैंने पति-बुद्धिसे ही तुम्हारी रक्षा की है (अर्थात् पिताद्वारा जीवनदान दिलाया है, इसीलिये) मैंने धर्मानुकूल कामके लिये तुमसे प्रार्थना की है। यदि तुम मुझे ठुकरा दोगे तो यह संजीवनी-विद्या तुम्हारे कोई काम न आयेगी ॥ १६-१७ ॥ |
| कच उवाच<br>गुरुपुत्रीति कृत्वाहं प्रत्याख्यास्ये न दोषतः।<br>गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेवं शपस्व माम् ॥ १८<br><br>आर्षं धर्मं ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया।<br>शप्तुं नार्होऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्य च धर्मतः ॥ १९<br><br>तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति।<br>ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति ॥ २०<br><br>फलिष्यति न मे विद्या त्वद्वचश्चेति तत् तथा।<br>अध्यापयिष्यामि च यं तस्य विद्या फलिष्यति ॥ २१ | कचने कहा— देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है, तुममें कोई दोष देखकर नहीं। गुरुजी भी इसे जानते-मानते हैं। स्वेच्छासे मुझे शाप भी दे दो। बहन! मैं आर्ष-धर्मकी बात कर रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही ॥ १८-२१ ॥ |
| शौनक उवाच<br>एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानीं कचस्तदा।<br>त्रिदशेशालयं शीघ्रं जगाम द्विजसत्तमः ॥ २२<br><br>तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>बृहस्पतिं सभाज्येदं कचमाहुर्मुदान्विताः ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— नृपश्रेष्ठ शतानीक! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चला गया। उसे आया देख इन्द्रादि देवता बृहस्पतिजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्हें साथ ले आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नतासे कचसे इस प्रकार बोले ॥ २२-२३ ॥ |
| देवा ऊचुः<br>त्वं कचास्मद्धितं कर्म कृतवान् महदद्भुतम्।<br>न ते यशः प्रणशिता भागभाक् च भविष्यसि ॥ २४ | देवता बोले— कच! तुमने हमारे हितके लिये यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे ॥ २४ ॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
१०८ * मत्स्यपुराण *
सत्ताईसवाँ अध्याय
देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शौनक उवाच<br>कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।<br>कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १<br>सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।<br>कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २<br>एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।<br>तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३<br>क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।<br>वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४<br>ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।<br>वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५<br>तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।<br>व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६<br>ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत।<br>देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७ | शौनकजी कहते हैं— भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीवनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा—दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥ १—७॥ |
| देवयान्युवाच<br>कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।<br>समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८ | देवयानी बोली— अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥ ८॥ |
| शर्मिष्ठोवाच<br>आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।<br>स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९<br>याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १० | शर्मिष्ठाने कहा— अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते। |
* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।
* अध्याय २७ * । १०९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।<br>लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥ ११ | अरी भिक्षुकि ! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥ ९—११ ॥ |
| शौनक उवाच<br><br>सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।<br>शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥ १२<br>हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।<br>अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥ १३<br>अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।<br>श्रान्तयुग्यः श्रन्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥ १४<br>नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।<br>ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥ १५<br>तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।<br>सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥ १६<br>का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।<br>दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥ १७<br>कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।<br>दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे॥ १८ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी—ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा—'सुमध्यमे ! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२–१८॥ |
| देवयान्युवाच<br><br>योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।<br>तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥ १९<br>एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।<br>समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥ २०<br>जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।<br>तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि॥ २१ | देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज ! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥ १९–२१॥ |
| शौनक उवाच<br><br>तामथ ब्राह्मणीं स्त्रीं च विज्ञाय नहुषात्मजः।<br>गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्॥ २२<br>उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।<br>आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने |
१९० * मत्स्यपुराण *
| गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।<br>उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः॥ २४ | नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली॥ २२—२४॥ |
|---|---|
| देवयानुवाच<br>त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः।<br>नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥ २५ | **देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी—उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी॥ २५॥ |
| शौनक उवाच<br>सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।<br>दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना॥ २६<br>आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।<br>शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥ २७<br>श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्।<br>त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने॥ २८<br>दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।<br>बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥ २९<br>आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।<br>मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३० | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा—‘महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।’ अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—‘बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है’॥ २६—३०॥ |
| देवयानुवाच<br>निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।<br>शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥ ३१<br>सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।<br>एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥ ३२<br>वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।<br>स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥ ३३<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।<br>इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।<br>क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥ ३४<br>यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।<br>प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥ ३५ | **देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। ‘देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१—३५॥ |
३१- ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
- अध्याय २८ * १११
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७ ॥ |
|---|---|
| स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।<br>अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥ ३६ | |
| वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।<br>अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ १—७ ॥ |
|---|---|
| यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ १ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।<br>स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥ २ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ ३ | |
| यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति।<br>यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४ | |
| यस्तु भावयते धर्मं योऽतिमात्रं तितिक्षति।<br>यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५ | |
| यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।<br>यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥ ६ | |
| ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युश्चेतसः।<br>नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७ |
१९२ * मत्स्यपुराण *
| देवयान्युवाच | |
|---|---|
| वेदाहं तात बालापि कार्याणां तु गतागतम्।<br>क्रोधे चैवातिवादे वा कार्यस्यापि बलाबले ॥ ८<br><br>शिष्यस्याशिष्यवृत्तं हि न क्षन्तव्यं बुभूषुणा।<br>असत्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते ॥ ९<br><br>पुंसो ये नाभिनन्दन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्धिषु ॥ १०<br><br>ये नैनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन च।<br>तेषु साधुषु वस्तव्यं स वासः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ११<br><br>तन्मे मथ्नाति हृदयमग्निकल्पमिवारणिम्।<br>वाग्दुरुक्तं महाघोरं दुहितुर्वृषपर्वणः ॥ १२<br><br>न ह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिषु।<br>यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते ॥ १३ | देवयानी बोली— पिताजी ! यद्यपि मैं अभी (नादान) बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है; परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिये। जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषोंमें ही निवास करना चाहिये और वही निवास श्रेष्ठ कहा जाता है। तात ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको ठीक उसी तरह मथ रहा है, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है। इससे बढ़कर महान् दुःखी बात मैं तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती, जो स्वयं श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई (सातिशय) लक्ष्मीकी उपासना करता है (उस दुःखी मनुष्यका तो मर जाना ही अच्छा है) ॥ ८—१३॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे ययातिचरितेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययातिचरितविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥
उनतीसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना
| शौनक उवाच | |
|---|---|
| ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह।<br>वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन् ॥ १<br><br>नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव।<br>शनैरावर्त्यमानस्तु मूलान्यपि निकृन्तति ॥ २<br><br>यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत् पश्यति नप्तृषु।<br>पापमाचरितं कर्म त्रिवर्गमतिवर्तते ॥ ३ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये। वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था। शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया—'राजन् ! जो (लोकमें) अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता। जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे-धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे जड़ काट देता है। यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम न अपने ऊपर दिखायी देता है, न पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर ही तो वह इस त्रिवर्गका अतिक्रमण करके आगेकी पीढ़ियोंपर अवश्य प्रकट होता है। |
३२- देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना
| * अध्याय २९ * | १९३ |
|---|---|
| फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे।<br>यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा॥ ४<br><br>अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्।<br>वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम॥ ५<br><br>वृषपर्वन् निबोध त्वं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।<br>स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्नोमि त्वया सह॥ ६<br><br>अद्यैवमभिजानामि दैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।<br>यतस्त्वमात्मनोदीर्णां दुहितां किमुपेक्षसे॥ ७ | जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें धकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी दैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १—७॥ |
| वृषपर्वावाच<br>नावहं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव।<br>त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्॥ ८<br>अद्यास्मानपहाय त्वमितो यास्यसि भार्गव।<br>समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामि नान्यदस्ति परायणम्॥ ९ | वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! आपने मेरे जानते कभी अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है॥ ८-९॥ |
| शुक्र उवाच<br>समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा व्रजतासुराः।<br>दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥ १०<br><br>प्रसाद्यतां देवयानीं जीवितं यत्र मे स्थितम्।<br>योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः॥ ११ | शुक्राचार्यने कहा— असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा॥ १०-११॥ |
| वृषपर्वावाच<br>यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव।<br>भुवि हस्तिरथाश्वं वा तस्य त्वं मम चेश्वरः॥ १२ | वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं॥ १२॥ |
| शुक्र उवाच<br>यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर।<br>तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥ १३ | शुक्राचार्यने कहा— महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो॥ १३॥ |
| १९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| शौनक उवाच<br>ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ।<br>उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥ १४॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री देवयानीके पास पहुँचे और उससे बोले—'सुभगे! तुम्हारी बात पूरी हो गयी'॥ १४॥ | | देवयान्युवाच<br>यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव।<br>नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥ १५॥ | तब देवयानीने कहा—तात भार्गव! 'आप राजाके धनके स्वामी हैं' मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा॥ १५॥ | | वृषपर्वोवाच<br>यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते।<br>तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥ १६॥ | वृषपर्वा बोले—पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूँगा (यह तुम विश्वास करो)॥ १६॥ | | देवयान्युवाच<br>दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये।<br>अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥ १७॥ | देवयानीने कहा—मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय॥ १७॥ | | वृषपर्वोवाच<br>उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।<br>यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥ १८॥ | यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—धात्रि! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण करे॥ १८॥ | | शौनक उवाच<br>ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्।<br>उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥ १९॥<br>यं सा कामयते कामं स कार्योऽत्र त्वयानघे।<br>दासी त्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने॥ २०॥<br>त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः। | शौनकजी कहते हैं—तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी! आज शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी बनायी गयी हो'॥ १९-२० १/२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।<br>मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥ २१॥ | शर्मिष्ठा बोली—यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न शुक्राचार्यजी कहीं जायें और न देवयानी ही। मेरे कारण ये अन्यत्र जानेका विचार न करें॥ २१॥ | | शौनक उवाच<br>ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा।<br>पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ हो तुरन्त राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी॥ २२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका।<br>ध्रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥ २३॥ | शर्मिष्ठा बोली—देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २३॥ |
* अध्याय ३० * १९५
| देवयान्युवाच<br>स्तुवतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृह्णतः।<br>स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि॥ २४ | **देवयानीने कहा—**अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ? ॥ २४ ॥ |
|---|---|
| शर्मिष्ठोवाच<br>येन केनचिदार्त्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।<br>अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता॥ २५ | **शर्मिष्ठा बोली—**जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २५॥ |
| शौनक उवाच<br>प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः।<br>देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ २६ | **शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २६॥ |
| देवयान्युवाच<br>प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम।<br>अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते॥ २७ | **देवयानी बोली—**पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है॥ २७॥ |
| शौनक उवाच<br>एवमुक्तो द्विजश्रेष्ठो दुहित्रा सुमहायशाः।<br>प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः॥ २८ | **शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया॥ २८॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९॥
तीसवाँ अध्याय
सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वनविहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह
| शौनक उवाच<br>अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नृपोत्तम।<br>वनं तदैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी॥ १<br>तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा।<br>तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा॥ २<br>ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम्।<br>क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम्॥ ३<br>खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् फलानि विविधानि च।<br>पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया॥ ४ | **शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी। उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनमें उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सब वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय दैवेच्छासे नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये |
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१९६ * मत्स्यपुराण *
| तमेव देशं सम्प्राप्तो जललिप्सुः प्रतर्षितः।<br>ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषितः ॥ ५<br>पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः ।<br>उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम् ॥ ६<br>रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।<br>शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ | उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंको भी देखा। वे सभी पीनेयोग्य रसका पान कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ परम सुन्दर आसनपर बैठी हुई देखा। उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा उसकी चरणसेवा कर रही थी॥ ५—७॥ | | ययातिरुवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते ।<br>गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यतो ह्यहम् ॥ ८ | ययातिने पूछा— दो हजार * कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें॥ ८॥ | | देवयान्युवाच<br>आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप ।<br>शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ॥ ९<br>इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी।<br>दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ॥ १० | देवयानी बोली— महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी साथ जायगी ॥ ९-१०॥ | | ययातिरुवाच<br>कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी।<br>असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ | ययाति बोले— सुन्दरि! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ११ ॥ | | देवयान्युवाच<br>सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते ।<br>विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः ॥ १२<br>राजवद् रूपवेशौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च ।<br>किं नामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ॥ १३ | देवयानी बोली— नरश्रेष्ठ! सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये। आपके रूप और वेश राजाके समान हैं और आप विशुद्ध संस्कृत भाषा बोल रहे हैं। मुझे बताइये, आपका क्या नाम है, आप कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ॥ १२-१३॥ | | ययातिरुवाच<br>ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः ।<br>राजांहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ॥ १४ | ययातिने कहा— मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ॥१४॥ | | देवयान्युवाच<br>केन चार्थेन नृपते ह्येनं देशं समागतः ।<br>जिघृक्षुर्वारि यत् किञ्चिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५ | देवयानीने कहा— महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं ? ॥ १५ ॥ | | ययातिरुवाच<br>मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमिहागतः ।<br>बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ | ययातिने कहा— भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः अब आप मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥ |
* यहाँ किन्हीं श्लोकोंमें देवयानीकी दो हजार और किन्हींमें एक हजार सखियोंका उल्लेख हुआ है। यथावसर दोनों ही ठीक हैं।
३३- ययातिका अपने यदु आदि पुत्रोंसे अपनी युवावस्था देकर वृद्धावस्था लेनेके लिये आग्रह और उनके अस्वीकार करनेपर उन्हें शाप देना, फिर पूरुको जरावस्था देकर उसकी युवावस्था लेना तथा उसे वर प्रदान करना
* अध्याय ३० * । ११७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवान्युवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्त्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह।<br>त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखे भर्ता च मे भव ॥ १७ | **देवयानीने कहा—**सखे! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे पति हो जायँ ॥ १७॥ |
| ययातिरुवाच<br>विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वदर्होऽस्मि भामिनि।<br>अविवाह्याः स्म राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८ | **ययाति बोले—**शुक्रनन्दिनी देवयानि! आपका भला हो। भामिनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं॥ १८ ॥ |
| देवान्युवाच<br>सृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम्।<br>ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाद्य भजस्व माम् ॥ १९ | **देवयानीने कहा—**नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं; अतः आज मुझसे विवाह कीजिये ॥ १९॥ |
| ययातिरुवाच<br>एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वरानने।<br>पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां वै ब्राह्मणो वरः ॥ २० | **ययाति बोले—**वरानने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है, परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सभी वर्णोंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥ |
| देवान्युवाच<br>पाणिग्रहो नाहुषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा।<br>त्वमेनमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१<br>कथं तु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत्।<br>गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्युषिणा त्वया ॥ २२ | **देवयानीने कहा—**नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपने ही मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपका ही मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ। मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा कोई कैसे कर सकता है? ॥ २१-२२ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विजानता ॥ २३ | **ययाति बोले—**देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प अथवा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ॥ २३ ॥ |
| देवान्युवाच<br>कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४ | **देवयानीने कहा—**पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>दशेदाशीविषस्त्वेकं शस्त्रेणैकश्च वध्यते।<br>हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५<br>दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम।<br>अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६ | **ययाति बोले—**भद्रे! सर्प एकको ही डँसता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर सकता है। भीरु! इसीलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा॥ २५-२६॥ |
| देवान्युवाच<br>दत्तां वहस्व पित्रा मां त्वं हि राजन् वृतो मया।<br>अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७ | **देवयानीने कहा—**राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं, उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे; अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। (राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ। धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुष-नन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है।) ॥ २७ ॥ |
१९८ * मत्स्यपुराण * शौनक उवाच त्वरितं देवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः। सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८ श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः। दृष्ट्वैवमागतं विप्रं ययातिः पृथिवीपतिः ॥ २९ ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः। तं चाप्यभ्यवदत् काव्यः साम्ना परमवल्गुना ॥ ३० देवयान्युवाच राजायं नहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत्। नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥ ३१ शुक्र उवाच वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया। गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ॥ ३२ ययातिरुवाच अधर्मो मां स्पृशेदेवं पापमस्याश्च भार्गव। वर्णसंकरतो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३३ शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम्। अस्मिन् विवाहे त्वं श्लाघ्यो रहःपापं नुदामि ते ॥ ३४ वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं शुचिस्मिताम्। अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ ३५ इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। सम्पूज्या सततं राजन् न चैनां शयने ह्वय ॥ ३६ शौनक उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्। जगाम स्वपुरं हृष्टः सोऽनुज्ञातो महात्मना ॥ ३७ शौनकजी कहते हैं - राजन् ! इस प्रकार देवयानीने तुरन्त धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये। तब शुक्राचार्यने भी राजाको परम मधुर वाणीसे सान्त्वना प्रदान की ॥ २८-३० ॥ देवयानी बोली- तात ! आपको (हाथ जोड़कर) नमस्कार है। ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ॥ ३१ ॥ शुक्राचार्यने कहा - वीर नहुषनन्दन ! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है, अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ३२ ॥ ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन् ! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ॥ ३३ ॥ शुक्राचार्यने कहा - राजन् ! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो। विवाहको लेकर तुम प्रशंसाके पात्र बन जाओगे। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ। तुम सुन्दर मुसकानवाली देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो। महाराज ! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न सुलाना ॥ ३४-३६ ॥ (तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे (देवयानीको) अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी।) शौनकजी कहते हैं - शतानीक ! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की (और शास्त्रोक्त विधिसे मङ्गलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया)। पुनः उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको चले गये ॥ ३७ ॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥
| * अध्याय ३१ * | १९९ |
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एकतीसवाँ अध्याय
ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— |
|---|---|
| ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्।<br>प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्॥ १<br><br>देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः।<br>अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्॥ २<br><br>वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुरायणीम्।<br>वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसंवृताम्॥ ३<br><br>देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः।<br>विजहार बहून्ब्दान् देववन्मुदितो भृशम्॥ ४<br><br>ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना।<br>लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत॥ ५<br><br>गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा॥ ६<br><br>चिन्तयामास धर्मज्ञा ऋतुप्राप्तौ च भामिनी।<br>ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न कश्चिन्मे पतिर्वृतः॥ ७<br><br>किं प्राप्तं किं च कर्तव्यं कथं कृत्वा सुखं भवेत्।<br>देवयानी प्रसूतासौ वृथाहं प्राप्तयौवना॥ ८<br><br>यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्।<br>राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः।<br>अपीदानीं स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत्॥ ९ | शतानीक! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी (अमरावती)-के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको अन्तःपुरमें स्थान दिया तथा उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग-अलग व्यवस्था कर दी। (देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही।) नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया। इधर एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री कमलनयनी शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो मन-ही-मन कहने लगी—'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया, किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया। यह कैसी परिस्थिति आ गयी। अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुख होगा। देवयानी तो पुत्रवती हो गयी, किंतु मुझे जो युवावस्था प्राप्त हुई है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ। मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे?॥ १—९॥ |
| शौनक उवाच<br><br>अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया।<br>अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विस्मितः॥ १०<br><br>तमेकं रहसि दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी।<br>प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत्॥ ११ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देखा। तब उसने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही— ॥ १०-११ ॥ |
३४- राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना
१२० * मत्स्यपुराण *
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, वायु, यम अथवा वरुण ही क्यों न हों, आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव मैं यहाँ सर्वथा सुरक्षित हूँ।) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये—मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये॥ १२-१३॥ |
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| सोमश्चेन्द्रश्च वायुश्च यमश्च वरुणश्च वा।<br>तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति॥ १२<br>रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।<br>सा त्वां याचे प्रसाद्येह रन्तुमेहि नराधिप॥ १३ | |
| ययातिरुवाच | ययातिने कहा—शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो; परंतु क्या करूँ, जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना'॥ १४-१५॥ |
| वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम्।<br>रूपं तु ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम्॥ १४<br>मामब्रवीत् तदा शुक्रो देवयानीं यदावहम्।<br>नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी॥ १५ | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियोंके प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं। महाराज! गवाही देते समय किसीके पूछनेपर जो अन्यथा (असत्य) भाषण करते हैं, वे मिथ्यावादी कहलाते हैं; परंतु जहाँ दो व्यक्तियोंके (जैसे देवयानीका तथा मेरा) कल्याणका प्रसङ्ग उपस्थित हो, वहाँ एकका (अर्थात् मेरा) कल्याण न करना असत्य भाषण है, जो वक्ताकी (अर्थात् आपकी) हानि कर सकता है॥ १६-१७॥ |
| न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति<br>न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले।<br>प्राणात्यये सर्वधनापहारे<br>पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६<br>पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा<br>भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते।<br>एकार्थतायां तु समाहितायां<br>मिथ्यावदन्नं ह्यनृतं हिनस्ति॥ १७ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले—देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। यदि वह झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है; अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं गलत काम नहीं कर सकता॥ १८॥ |
| राजा प्रमाणं भूतानां स विनश्येन्मृषा वदन्।<br>अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे॥ १८ | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! अपना पति और सखीका पति—दोनों बराबर माने गये हैं। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया॥ १९॥ |
| समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः।<br>समं विवाह इत्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्यतः॥ १९ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले—याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अतः बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ॥ २०॥ |
| दातव्यं याचमानस्य हीति मे व्रतमाहितम्।<br>त्वं च याचसि कामं मां ब्रूहि किं करवाणि तत्॥ २० | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं होते—पत्नी, दास और पुत्र। उनकी सम्पत्ति भी उसीकी होती है, जहाँ ये |
| अधर्मात् त्राहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय।<br>त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्॥ २१<br>त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।<br>यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्॥ २२* |
*यह श्लोक स्वल्पान्तरसे मनुस्मृति ८। ४१६, नारदस्मृति ५। ३९, महाभारत १। ८२। २२ आदिमें भी है। मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, राघवानन्द आदि मनुके सभी व्याख्याता इस श्लोकका तात्पर्य धनके व्ययमें अभिभावककी सहमति लेनेमें ही चरितार्थ मानते हैं। नीलकण्ठकी व्याख्या केवल प्रस्तुत प्रसङ्गसे ही सम्बद्ध है।
* अध्याय ३१ * १२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी।<br>सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम्॥ २३<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तस्तया राजा तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्।<br>पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रतिपादयन्॥ २४<br>स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च।<br>अन्योन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्॥ २५<br>तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्॥ २६<br>प्रजज्ञे च ततः काले राज्ञी राजीवलोचना।<br>कुमारं देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम्॥ २७ | जाते—जिसके अधिकारमें रहते हैं; अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है। मैं देवयानीकी सेविका हूँ और देवयानी आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं—दोनों ही आपके सेवन अपनाने योग्य हैं। इसलिये आप मुझे भी अङ्गीकार कीजिये॥ २१—२३॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठाके साथ सहवास करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये। सुन्दर भौंहोंवाली वृषपर्वा-कुमारी शर्मिष्ठाने उस सहवासमें नृपश्रेष्ठ ययातिसे प्रथम गर्भ धारण किया। शतानीक! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एवं सूर्यके समान तेजस्वी एक कुमारको उत्पन्न किया॥ २४—२७॥ |
॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित नामक एकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३१॥
बत्तीसवाँ अध्याय
देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शौनक उवाच<br>श्रुत्वा कुमारं जातं सा देवयानी शुचिस्मिता।<br>चिन्तयाविष्टदुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत॥ १<br>ततोऽभिगम्य शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>किमर्थं वृजिनं सुभ्रु कृतं ते कामलुब्धया॥ २<br><br>शर्मिष्ठोवाच<br>ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः।<br>स मया तु वरः कामं याचितो धर्मसंहतम्॥ ३<br>नाहमन्यायात् काममाचरामि शुचिस्मिते।<br>तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४ | शौनकजी कहते हैं— भारत! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है, तब वह दुःखसे पीड़ित हो शर्मिष्ठाके व्यवहारको लेकर बड़ी चिन्तामें पड़ गयी। वह शर्मिष्ठाके पास गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने काम-लोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला है?'॥ १-२॥<br><br>शर्मिष्ठा बोली— सखी! कोई धर्मात्मा ऋषि आये थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। मैंने उन वरदायक ऋषिसे धर्मानुसार कामकी याचना की। शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ॥ ३-४॥ |