मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ३१ * | १९९ |
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एकतीसवाँ अध्याय
ययातिसे देवयानीको पुत्रप्राप्ति, ययाति और शर्मिष्ठाका एकान्त-मिलन और उनसे एक पुत्रका जन्म
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— |
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| ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्।<br>प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्॥ १<br><br>देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः।<br>अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्॥ २<br><br>वृतां दासीसहस्रेण शर्मिष्ठामासुरायणीम्।<br>वासोभिरन्नपानैश्च संविभज्य सुसंवृताम्॥ ३<br><br>देवयान्या तु सहितः स नृपो नहुषात्मजः।<br>विजहार बहून्ब्दान् देववन्मुदितो भृशम्॥ ४<br><br>ऋतुकाले तु सम्प्राप्ते देवयानी वराङ्गना।<br>लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारश्च व्यजायत॥ ५<br><br>गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा कमलेक्षणा॥ ६<br><br>चिन्तयामास धर्मज्ञा ऋतुप्राप्तौ च भामिनी।<br>ऋतुकालश्च सम्प्राप्तो न कश्चिन्मे पतिर्वृतः॥ ७<br><br>किं प्राप्तं किं च कर्तव्यं कथं कृत्वा सुखं भवेत्।<br>देवयानी प्रसूतासौ वृथाहं प्राप्तयौवना॥ ८<br><br>यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्।<br>राज्ञा पुत्रफलं देयमिति मे निश्चिता मतिः।<br>अपीदानीं स धर्मात्मा रहो मे दर्शनं व्रजेत्॥ ९ | शतानीक! ययातिकी राजधानी महेन्द्रपुरी (अमरावती)-के समान थी। उन्होंने वहाँ आकर देवयानीको अन्तःपुरमें स्थान दिया तथा उसीकी अनुमतिसे अशोकवाटिकाके समीप एक महल बनवाकर उसमें वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाको उसकी एक हजार दासियोंके साथ ठहराया और उन सबके लिये अन्न, वस्त्र तथा पेय आदिकी अलग-अलग व्यवस्था कर दी। (देवयानी ययातिके साथ परम रमणीय एवं मनोरम अशोकवाटिकामें आती और शर्मिष्ठाके साथ वन-विहार करके उसे वहीं छोड़कर स्वयं राजाके साथ महलमें चली जाती थी। इस तरह वह बहुत समयतक प्रसन्नतापूर्वक आनन्द भोगती रही।) नहुषकुमार राजा ययातिने देवयानीके साथ बहुत वर्षोंतक देवताओंकी भाँति विहार किया। वे उसके साथ बहुत प्रसन्न और सुखी थे। ऋतुकाल आनेपर सुन्दरी देवयानीने गर्भ धारण किया और समयानुसार प्रथम पुत्रको जन्म दिया। इधर एक हजार वर्ष व्यतीत हो जानेपर युवावस्थाको प्राप्त हुई वृषपर्वाकी पुत्री कमलनयनी शर्मिष्ठाने अपनेको रजस्वलावस्थामें देखा और चिन्तामग्न हो मन-ही-मन कहने लगी—'मुझे ऋतुकाल प्राप्त हो गया, किंतु अभीतक मैंने पतिका वरण नहीं किया। यह कैसी परिस्थिति आ गयी। अब क्या करना चाहिये अथवा क्या करनेसे सुख होगा। देवयानी तो पुत्रवती हो गयी, किंतु मुझे जो युवावस्था प्राप्त हुई है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ। मेरे याचना करनेपर राजा मुझे पुत्ररूप फल दे सकते हैं, इस बातका मुझे पूरा विश्वास है; परंतु क्या वे धर्मात्मा नरेश इस समय मुझे एकान्तमें दर्शन देंगे?॥ १—९॥ |
| शौनक उवाच<br><br>अथ निष्क्रम्य राजासौ तस्मिन् काले यदृच्छया।<br>अशोकवनिकाभ्याशे शर्मिष्ठां प्राप्य विस्मितः॥ १०<br><br>तमेकं रहसि दृष्ट्वा शर्मिष्ठा चारुहासिनी।<br>प्रत्युद्गम्याञ्जलिं कृत्वा राजानं वाक्यमब्रवीत्॥ ११ | शौनकजी कहते हैं— शतानीक! शर्मिष्ठा इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि राजा ययाति उसी समय दैववश महलसे बाहर निकले और अशोकवाटिकाके निकट शर्मिष्ठाको देखकर आश्चर्यचकित हो गये। मनोहर हासवाली शर्मिष्ठाने उन्हें एकान्तमें अकेला देखा। तब उसने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की तथा हाथ जोड़कर राजासे यह बात कही— ॥ १०-११ ॥ |