मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१२० * मत्स्यपुराण *
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—नहुषनन्दन! चन्द्रमा, इन्द्र, वायु, यम अथवा वरुण ही क्यों न हों, आपके महलमें कौन किसी स्त्रीकी ओर दृष्टि डाल सकता है? (अतएव मैं यहाँ सर्वथा सुरक्षित हूँ।) महाराज! मेरे रूप, कुल और शील कैसे हैं, यह तो आप सदासे ही जानते हैं। मैं आज आपको प्रसन्न करके यह प्रार्थना करती हूँ कि मुझे ऋतुदान दीजिये—मेरे ऋतुकालको सफल बनाइये॥ १२-१३॥ |
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| सोमश्चेन्द्रश्च वायुश्च यमश्च वरुणश्च वा।<br>तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति॥ १२<br>रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन् वेत्थ मां सदा।<br>सा त्वां याचे प्रसाद्येह रन्तुमेहि नराधिप॥ १३ | |
| ययातिरुवाच | ययातिने कहा—शर्मिष्ठे! तुम दैत्यराजकी सुशील और निर्दोष कन्या हो। मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे शरीर अथवा रूपमें सूईकी नोक बराबर भी ऐसा स्थान नहीं है, जो निन्दाके योग्य हो; परंतु क्या करूँ, जब मैंने देवयानीके साथ विवाह किया था, उस समय शुक्राचार्यने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'वृषपर्वाकी पुत्री इस शर्मिष्ठाको अपनी सेजपर न बुलाना'॥ १४-१५॥ |
| वेद्मि त्वां शीलसम्पन्नां दैत्यकन्यामनिन्दिताम्।<br>रूपं तु ते न पश्यामि सूच्यग्रमपि निन्दितम्॥ १४<br>मामब्रवीत् तदा शुक्रो देवयानीं यदावहम्।<br>नेयमाह्वयितव्या ते शयने वार्षपर्वणी॥ १५ | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! परिहासयुक्त वचन असत्य हो तो भी वह हानिकारक नहीं होता। अपनी स्त्रियोंके प्रति, विवाहके समय, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय यदि कभी विवश होकर असत्य भाषण करना पड़े तो वह दोषकारक नहीं होता। ये पाँच प्रकारके असत्य पापशून्य बताये गये हैं। महाराज! गवाही देते समय किसीके पूछनेपर जो अन्यथा (असत्य) भाषण करते हैं, वे मिथ्यावादी कहलाते हैं; परंतु जहाँ दो व्यक्तियोंके (जैसे देवयानीका तथा मेरा) कल्याणका प्रसङ्ग उपस्थित हो, वहाँ एकका (अर्थात् मेरा) कल्याण न करना असत्य भाषण है, जो वक्ताकी (अर्थात् आपकी) हानि कर सकता है॥ १६-१७॥ |
| न नर्मयुक्तं वचनं हिनस्ति<br>न स्त्रीषु राजन् न विवाहकाले।<br>प्राणात्यये सर्वधनापहारे<br>पञ्चानृतान्याहुरपातकानि ॥ १६<br>पृष्टास्तु साक्ष्ये प्रवदन्ति चान्यथा<br>भवन्ति मिथ्यावचना नरेन्द्र ते।<br>एकार्थतायां तु समाहितायां<br>मिथ्यावदन्नं ह्यनृतं हिनस्ति॥ १७ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले—देवि! सब प्राणियोंके लिये राजा ही प्रमाण है। यदि वह झूठ बोलने लगे तो उसका नाश हो जाता है; अतः अर्थ-संकटमें पड़नेपर भी मैं गलत काम नहीं कर सकता॥ १८॥ |
| राजा प्रमाणं भूतानां स विनश्येन्मृषा वदन्।<br>अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे॥ १८ | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! अपना पति और सखीका पति—दोनों बराबर माने गये हैं। मेरी सखीने आपको अपना पति बनाया है, अतः मैंने भी बना लिया॥ १९॥ |
| समावेतौ मतौ राजन् पतिः सख्याश्च यः पतिः।<br>समं विवाह इत्याहुः सख्या मेऽसि पतिर्यतः॥ १९ | |
| ययातिरुवाच | ययाति बोले—याचकोंको उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दी जायँ, ऐसा मेरा व्रत है। तुम भी मुझसे अपने मनोरथकी याचना करती हो; अतः बताओ, मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ॥ २०॥ |
| दातव्यं याचमानस्य हीति मे व्रतमाहितम्।<br>त्वं च याचसि कामं मां ब्रूहि किं करवाणि तत्॥ २० | |
| शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठाने कहा—राजन्! मुझे अधर्मसे बचाइये और धर्मका पालन कराइये। मैं चाहती हूँ, आपसे संतानवती होकर इस लोकमें उत्तम धर्मका आचरण करूँ। महाराज! तीन व्यक्ति धनके अधिकारी नहीं होते—पत्नी, दास और पुत्र। उनकी सम्पत्ति भी उसीकी होती है, जहाँ ये |
| अधर्मात् त्राहि मां राजन् धर्मं च प्रतिपादय।<br>त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्॥ २१<br>त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।<br>यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम्॥ २२* |
*यह श्लोक स्वल्पान्तरसे मनुस्मृति ८। ४१६, नारदस्मृति ५। ३९, महाभारत १। ८२। २२ आदिमें भी है। मेधातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, राघवानन्द आदि मनुके सभी व्याख्याता इस श्लोकका तात्पर्य धनके व्ययमें अभिभावककी सहमति लेनेमें ही चरितार्थ मानते हैं। नीलकण्ठकी व्याख्या केवल प्रस्तुत प्रसङ्गसे ही सम्बद्ध है।