भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३१ * १२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवयान्या भुजिष्यास्मि वश्या च तव भार्गवी।<br>सा चाहं च त्वया राजन् भजनीये भजस्व माम्॥ २३<br><br>शौनक उवाच<br>एवमुक्तस्तया राजा तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्।<br>पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रतिपादयन्॥ २४<br>स समागम्य शर्मिष्ठां यथाकाममवाप्य च।<br>अन्योन्यं चाभिसम्पूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्॥ २५<br>तस्मिन् समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्॥ २६<br>प्रजज्ञे च ततः काले राज्ञी राजीवलोचना।<br>कुमारं देवगर्भाभमादित्यसमतेजसम्॥ २७जाते—जिसके अधिकारमें रहते हैं; अर्थात् पत्नीके धनपर पतिका, सेवकके धनपर स्वामीका और पुत्रके धनपर पिताका अधिकार होता है। मैं देवयानीकी सेविका हूँ और देवयानी आपके अधीन है; अतः राजन्! वह और मैं—दोनों ही आपके सेवन अपनाने योग्य हैं। इसलिये आप मुझे भी अङ्गीकार कीजिये॥ २१—२३॥<br><br>शौनकजी कहते हैं—शर्मिष्ठाके ऐसा कहनेपर राजाने उसकी बातोंको ठीक समझा। उन्होंने शर्मिष्ठाका सत्कार किया और धर्मानुसार उसे अपनी भार्या बनाया। फिर शर्मिष्ठाके साथ सहवास करके एक-दूसरेका आदर-सत्कार करनेके पश्चात् दोनों जैसे आये थे, वैसे ही अपने-अपने स्थानपर चले गये। सुन्दर भौंहोंवाली वृषपर्वा-कुमारी शर्मिष्ठाने उस सहवासमें नृपश्रेष्ठ ययातिसे प्रथम गर्भ धारण किया। शतानीक! तदनन्तर समय आनेपर कमलके समान नेत्रोंवाली शर्मिष्ठाने देवबालक-जैसे सुन्दर एवं सूर्यके समान तेजस्वी एक कुमारको उत्पन्न किया॥ २४—२७॥

॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकत्रिंशोऽध्यायः॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित नामक एकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ३१॥


बत्तीसवाँ अध्याय

देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद, ययातिसे शर्मिष्ठाके पुत्र होनेकी बात जानकर देवयानीका रूठना और अपने पिताके पास जाना तथा शुक्राचार्यका ययातिको बूढ़े होनेका शाप देना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>श्रुत्वा कुमारं जातं सा देवयानी शुचिस्मिता।<br>चिन्तयाविष्टदुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत॥ १<br>ततोऽभिगम्य शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>किमर्थं वृजिनं सुभ्रु कृतं ते कामलुब्धया॥ २<br><br>शर्मिष्ठोवाच<br>ऋषिरभ्यागतः कश्चिद् धर्मात्मा वेदपारगः।<br>स मया तु वरः कामं याचितो धर्मसंहतम्॥ ३<br>नाहमन्यायात् काममाचरामि शुचिस्मिते।<br>तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते॥ ४शौनकजी कहते हैं— भारत! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है, तब वह दुःखसे पीड़ित हो शर्मिष्ठाके व्यवहारको लेकर बड़ी चिन्तामें पड़ गयी। वह शर्मिष्ठाके पास गयी और इस प्रकार बोली—'सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने काम-लोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला है?'॥ १-२॥<br><br>शर्मिष्ठा बोली— सखी! कोई धर्मात्मा ऋषि आये थे, जो वेदोंके पारंगत विद्वान् थे। मैंने उन वरदायक ऋषिसे धर्मानुसार कामकी याचना की। शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ॥ ३-४॥