भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१२२* मत्स्यपुराण *

| देवयान्युवाच<br>यद्येतदेवं शर्मिष्ठे न मन्युर्विद्यते मम।<br>अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छ्रेष्ठाच्च वै द्विजात्॥ ५<br>शोभनं भीरु सत्यं चेत् कथं स ज्ञायते द्विजः।<br>गोत्रनामाभिजनतः श्रोतुमिच्छामि तं द्विजम्॥ ६ | देवयानीने कहा—शर्मिष्ठे! यदि ऐसी बात है, तुमने यदि ज्येष्ठ और श्रेष्ठ द्विजसे संतान प्राप्त की है तो तुम्हारे ऊपर मेरा क्रोध नहीं रहा। भीरु! यदि ऐसी बात है तो बहुत अच्छा हुआ। क्या उन द्विजके गोत्र, नाम और कुलका कुछ परिचय मिला है? मैं उनको जानना चाहती हूँ॥ ५-६॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>ओजसा तेजसा चैव दीप्यमानं रविं यथा।<br>तं दृष्ट्वा मम सम्प्रष्टुं शक्तिर्नासीच्छुचिस्मिते॥ ७ | शर्मिष्ठा बोली—शुचिस्मिते! वे अपने तप और तेजसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहे थे। उन्हें देखकर मुझे कुछ पूछनेका साहस ही न हुआ॥ ७॥ | | शौनक उवाच<br>अन्योन्यमेवमुक्त्वा च सम्प्रहस्य च ते मिथः।<br>जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यभिजानती॥ ८<br>ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः।<br>यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ॥ ९<br>तस्मादेव तु राजर्षेः शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी।<br>द्रुह्युं चानुं च पूरुं च त्रीन् कुमारानजीजनत्॥ १०<br>ततःकाले च कस्मिंश्चिद् देवयानी शुचिस्मिता।<br>ययातिसहिता राजन्नगाम हरितं वनम्॥ ११<br>ददर्श च तदा तत्र कुमारान् देवरूपिणः।<br>क्रीडमानान् सुविस्रब्धान् विस्मिता चेदमब्रवीत्॥ १२ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! वे दोनों आपसमें इस प्रकार बातें करके हँस पड़ीं। देवयानीको प्रतीत हुआ कि शर्मिष्ठा ठीक कहती है, अतः वह चुपचाप महलमें चली गयी। राजा ययातिने देवयानीके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न किये, जिनके नाम थे—यदु और तुर्वसु। वे दोनों दूसरे इन्द्र और विष्णुकी भाँति प्रतीत होते थे। उन्हीं राजर्षिसे वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम थे—द्रुह्यु, अनु और पूरु। राजन्! तदनन्तर किसी समय पवित्र मुसकानवाली देवयानी ययातिके साथ एकान्त वनमें गयी। वहाँ उसने देवताओंके समान सुन्दर रूपवाले कुछ बालकोंको निर्भय होकर क्रीडा करते देखा। उन्हें देखकर वह आश्चर्यचकित हो इस प्रकार बोली॥ ८—१२॥ | | देवयान्युवाच<br>कस्यैते दारका राजन् देवपुत्रोपमाः शुभाः।<br>वर्चसा रूपतश्चैव दृश्यन्ते सदृशास्तव॥ १३<br>एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान् पर्यपृच्छत।<br>किं नामधेयगोत्रे वः पुत्रका ब्राह्मणः पिता॥ १४<br>विब्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुकामास्म्यतो ह्यहम्।<br>तेऽदर्शयन् प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम्॥ १५<br>शर्मिष्ठां मातरं चैव तस्या ऊचुः कुमारकाः। | देवयानीने पूछा—राजन्! ये देवबालकोंके तुल्य शुभ लक्षणसम्पन्न कुमार किसके हैं? तेज और रूपमें तो ये मुझे आपके ही समान जान पड़ते हैं। राजासे इस प्रकार पूछकर उसने फिर उन कुमारोंसे प्रश्न किया—'बच्चो! तुमलोग किस गोत्रमें उत्पन्न हुए हो? तुम्हारे ब्राह्मण पिताका क्या नाम है? यह मुझे ठीक-ठीक बताओ। मैं तुम्हारे पिताका नाम सुनना चाहती हूँ।' (देवयानीके इस प्रकार पूछनेपर) उन बालकोंने पिताका परिचय देते हुए तर्जनी अँगुलीसे उन्हीं नृपश्रेष्ठ ययातिको दिखा दिया और शर्मिष्ठाको अपनी माता बताया॥ १३—१५½॥ | | शौनक उवाच<br>इत्युक्त्वा सहितास्तेन राजानमुपचक्रमुः॥ १६<br>नाभ्यनन्दत तान् राजा देवयान्यास्तदान्तिके।<br>रुदन्तस्तेऽथ शर्मिष्ठामभ्ययुर्बालकास्तदा॥ १७<br>दृष्ट्वा तेषां तु बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति।<br>बुद्ध्वा च तत्त्वतो देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्॥ १८ | शौनकजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सब बालक एक साथ राजाके समीप आ गये, परंतु उस समय देवयानीके निकट राजाने उनका अभिनन्दन नहीं किया—इन्हें गोदमें नहीं उठाया। तब बालक रोते हुए शर्मिष्ठाके पास चले गये। (उनकी बातें सुनकर राजा ययाति लज्जित-से हो गये।) उन बालकोंका राजाके प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठासे इस प्रकार बोली—॥ १६—१८॥ |