भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 133
* अध्याय ३२ *१२३

| देवयान्युवाच | देवयानी बोली — शर्मिष्ठे ! तुमने मेरे अधीन होकर भी मुझे अप्रिय लगनेवाला बर्ताव क्यों किया ? तुम फिर उसी असुर-धर्मपर उतर आयी। क्या मुझसे नहीं डरती ? ॥ १९ ॥ | | मदधीना सती कस्मादकार्षीर्विप्रियं मम।<br>तमेवासुरधर्मं त्वमास्थिता न बिभेषि किम् ॥ १९ | | | शर्मिष्ठोवाच | शर्मिष्ठा बोली — मनोहर मुसकानवाली सखी ! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती। जब तुमने राजाका पतिरूपमें वरण किया था, उसी समय मैंने भी कर लिया। शोभने ! तुम ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ हो, ब्राह्मणपुत्री हो, अतः मेरे लिये माननीय एवं पूजनीय हो; परंतु ये राजर्षि मेरे लिये तुमसे भी अधिक पूजनीय हैं। क्या यह बात तुम नहीं जानती ? (शुभे ! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करने योग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं।) ॥ २०–२२ ॥ | | यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि।<br>न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते ॥ २०<br><br>यदा त्वया वृतो राजा वृत एव तदा मया।<br>सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने ॥ २१<br><br>पूज्यासि मम मान्या च श्रेष्ठा ज्येष्ठा च ब्राह्मणी।<br>त्वत्तो हि मे पूज्यतरो राजर्षिः किं न वेत्सि तत् ॥ २२ | | | शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं — शर्मिष्ठाका यह वचन सुनकर देवयानीने कहा—'राजन्! अब मैं यहाँ नहीं रहूँगी। आपने मेरा अत्यन्त अप्रिय किया है।' ऐसा कहकर तरुणी देवयानी आँखोंमें आँसू भरकर सहसा उठी और तुरन्त ही शुक्राचार्यजीके पास जानेके लिये वहाँसे चल दी। यह देख उस समय राजा ययाति व्यथित हो गये। वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह राजासे कुछ न बोलकर केवल नेत्रोंसे आँसू बहाये जाती थी। कुछ ही देरमें वह कवि-पुत्र शुक्राचार्यके पास पहुँची। पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की ॥ २३–२७ ॥ | | श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम्।<br>राजन् नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे त्वया कृतम् ॥ २३<br><br>सहसोत्पतितां श्यामां दृष्ट्वा तां साश्रुलोचनाम्।<br>तूर्णं सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा ॥ २४<br><br>अनुवव्राज सम्भ्रान्तः पृष्टतः सान्त्वयन् नृपः।<br>न्यवर्तत न सा चैव क्रोधसंरक्तलोचना ॥ २५<br><br>अविब्रुवन्ती किंचिच्च राजानं साश्रुलोचना।<br>अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसोऽन्तिकम् ॥ २६<br><br>सा तु दृष्ट्वैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता।<br>अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम् ॥ २७ | | | देवयान्युवाच | देवयानीने कहा — पिताजी ! अधर्मने धर्मको जीत लिया। नीचकी उन्नति हुई और उच्चकी अवनति। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मुझे लाँघकर आगे बढ़ गयी। इन महाराज ययातिसे ही उसके तीन पुत्र हुए हैं, किंतु तात ! मुझ भाग्यहीनाके दो ही पुत्र हुए हैं। यह मैं आपसे ठीक बता रही हूँ। भृगुश्रेष्ठ ! ये महाराज धर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध हैं, किंतु इन्होंने मर्यादाका उल्लङ्घन किया है। कवि-नन्दन ! यह मैं आपसे यथार्थ कह रही हूँ ॥ २८–३० ॥ | | अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम्।<br>शर्मिष्ठा यातिवृत्तास्ति दुहिता वृषपर्वणः ॥ २८<br><br>त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञानेन ययातिना।<br>दुर्भागाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते ॥ २९<br><br>धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह।<br>अतिक्रान्तश्च मर्यादां काव्यैतत् कथयामि ते ॥ ३० | |