भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

१९८ * मत्स्यपुराण * शौनक उवाच त्वरितं देवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः। सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥ २८ श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः। दृष्ट्वैवमागतं विप्रं ययातिः पृथिवीपतिः ॥ २९ ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः। तं चाप्यभ्यवदत् काव्यः साम्ना परमवल्गुना ॥ ३० देवयान्युवाच राजायं नहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत्। नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे ॥ ३१ शुक्र उवाच वृतोऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया। गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज ॥ ३२ ययातिरुवाच अधर्मो मां स्पृशेदेवं पापमस्याश्च भार्गव। वर्णसंकरतो ब्रह्मन्निति त्वां प्रवृणोम्यहम् ॥ ३३ शुक्र उवाच अधर्मात् त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम्। अस्मिन् विवाहे त्वं श्लाघ्यो रहःपापं नुदामि ते ॥ ३४ वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं शुचिस्मिताम्। अनया सह सम्प्रीतिमतुलां समवाप्नुहि ॥ ३५ इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। सम्पूज्या सततं राजन् न चैनां शयने ह्वय ॥ ३६ शौनक उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्। जगाम स्वपुरं हृष्टः सोऽनुज्ञातो महात्मना ॥ ३७ शौनकजी कहते हैं - राजन् ! इस प्रकार देवयानीने तुरन्त धायको भेजकर अपने पिताको संदेश दिया। धायने जाकर शुक्राचार्यसे सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। सब समाचार सुनते ही शुक्राचार्यने वहाँ आकर राजाको दर्शन दिया। विप्रवर शुक्राचार्यको आया देख राजा ययातिने उन्हें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर विनम्रभावसे खड़े हो गये। तब शुक्राचार्यने भी राजाको परम मधुर वाणीसे सान्त्वना प्रदान की ॥ २८-३० ॥ देवयानी बोली- तात ! आपको (हाथ जोड़कर) नमस्कार है। ये नहुषपुत्र राजा ययाति हैं। इन्होंने संकटके समय मेरा हाथ पकड़ा था। आप मुझे इन्हींकी सेवामें समर्पित कर दें। मैं इस जगत्में इनके सिवा दूसरे किसी पतिका वरण नहीं करूँगी ॥ ३१ ॥ शुक्राचार्यने कहा - वीर नहुषनन्दन ! मेरी इस लाड़ली पुत्रीने तुम्हें पतिरूपमें वरण किया है, अतः मेरी दी हुई इस कन्याको तुम अपनी पटरानीके रूपमें ग्रहण करो ॥ ३२ ॥ ययाति बोले- भार्गव ब्रह्मन् ! मैं आपसे यह वर माँगता हूँ कि इस विवाहमें यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला वर्णसंकरजनित महान् अधर्म मेरा स्पर्श न करे ॥ ३३ ॥ शुक्राचार्यने कहा - राजन् ! मैं तुम्हें अधर्मसे मुक्त करता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो। विवाहको लेकर तुम प्रशंसाके पात्र बन जाओगे। मैं तुम्हारे सारे पापको दूर करता हूँ। तुम सुन्दर मुसकानवाली देवयानीको धर्मपूर्वक अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ रहकर अतुल सुख एवं प्रसन्नता प्राप्त करो। महाराज ! वृषपर्वाकी पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हें समर्पित है। इसका सदा आदर करना, किंतु इसे अपनी सेजपर कभी न सुलाना ॥ ३४-३६ ॥ (तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे (देवयानीको) अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी।) शौनकजी कहते हैं - शतानीक ! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की (और शास्त्रोक्त विधिसे मङ्गलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया)। पुनः उन महात्माकी आज्ञा ले नृपश्रेष्ठ ययाति बड़े हर्षके साथ अपनी राजधानीको चले गये ॥ ३७ ॥ इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥