भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

* अध्याय ३० * । ११७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवान्युवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्त्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह।<br>त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखे भर्ता च मे भव ॥ १७**देवयानीने कहा—**सखे! आपका कल्याण हो। मैं दो हजार कन्याओं तथा अपनी सेविका शर्मिष्ठाके साथ आपके अधीन होती हूँ। आप मेरे पति हो जायँ ॥ १७॥
ययातिरुवाच<br>विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वदर्होऽस्मि भामिनि।<br>अविवाह्याः स्म राजानो देवयानि पितुस्तव ॥ १८**ययाति बोले—**शुक्रनन्दिनी देवयानि! आपका भला हो। भामिनि! मैं आपके योग्य नहीं हूँ। क्षत्रियलोग आपके पितासे कन्यादान लेनेके अधिकारी नहीं हैं॥ १८ ॥
देवान्युवाच<br>सृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम्।<br>ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाद्य भजस्व माम् ॥ १९**देवयानीने कहा—**नहुषनन्दन! ब्राह्मणसे क्षत्रिय जाति और क्षत्रियसे ब्राह्मण जाति मिली हुई है। आप राजर्षिके पुत्र हैं और स्वयं भी राजर्षि हैं; अतः आज मुझसे विवाह कीजिये ॥ १९॥
ययातिरुवाच<br>एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपि वरानने।<br>पृथग्धर्माः पृथक्शौचास्तेषां वै ब्राह्मणो वरः ॥ २०**ययाति बोले—**वरानने! एक ही परमेश्वरके शरीरसे चारों वर्णोंकी उत्पत्ति हुई है, परंतु सबके धर्म और शौचाचार अलग-अलग हैं। ब्राह्मण उन सभी वर्णोंमें श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
देवान्युवाच<br>पाणिग्रहो नाहुषायं न पुम्भिः सेवितः पुरा।<br>त्वमेनमग्रहीरग्रे वृणोमि त्वामहं ततः ॥ २१<br>कथं तु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान् स्पृशेत्।<br>गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्युषिणा त्वया ॥ २२**देवयानीने कहा—**नहुषकुमार! नारीके लिये पाणिग्रहण एक धर्म है। पहले किसी भी पुरुषने मेरा हाथ नहीं पकड़ा था। सबसे पहले आपने ही मेरा हाथ पकड़ा था। इसलिये आपका ही मैं पतिरूपमें वरण करती हूँ। मैं मनको वशमें रखनेवाली स्त्री हूँ। आप-जैसे राजर्षिकुमार अथवा राजर्षिद्वारा पकड़े गये मेरे हाथका स्पर्श अब दूसरा कोई कैसे कर सकता है? ॥ २१-२२ ॥
ययातिरुवाच<br>क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विजानता ॥ २३**ययाति बोले—**देवि! विज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह ब्राह्मणको क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्प अथवा सब ओरसे प्रज्वलित अग्निसे भी अधिक दुर्धर्ष एवं भयंकर समझे ॥ २३ ॥
देवान्युवाच<br>कथमाशीविषात् सर्पाज्ज्वलनात् सर्वतोमुखात्।<br>दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ॥ २४**देवयानीने कहा—**पुरुषप्रवर! ब्राह्मण विषधर सर्प और सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाली अग्निसे भी दुर्धर्ष एवं भयंकर है, यह बात आपने कैसे कही? ॥ २४ ॥
ययातिरुवाच<br>दशेदाशीविषस्त्वेकं शस्त्रेणैकश्च वध्यते।<br>हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः ॥ २५<br>दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद् भीरु मतो मम।<br>अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम् ॥ २६**ययाति बोले—**भद्रे! सर्प एकको ही डँसता है, शस्त्रसे भी एक ही व्यक्तिका वध होता है; परंतु क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण समस्त राष्ट्र और नगरका भी नाश कर सकता है। भीरु! इसीलिये मैं ब्राह्मणको अधिक दुर्धर्ष मानता हूँ। अतः जबतक आपके पिता आपको मेरे हवाले न कर दें, तबतक मैं आपसे विवाह नहीं करूँगा॥ २५-२६॥
देवान्युवाच<br>दत्तां वहस्व पित्रा मां त्वं हि राजन् वृतो मया।<br>अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः ॥ २७**देवयानीने कहा—**राजन्! मैंने आपका वरण कर लिया है, अब आप मेरे पिताके देनेपर ही मुझसे विवाह करें। आप स्वयं तो उनसे याचना करते नहीं हैं, उनके देनेपर ही मुझे स्वीकार करेंगे; अतः आपको उनके कोपका भय नहीं है। (राजन्! दो घड़ी ठहर जाइये। मैं अभी पिताके पास संदेश भेजती हूँ। धाय! शीघ्र जाओ और मेरे ब्रह्मतुल्य पिताको यहाँ बुला ले आओ। उनसे यह भी कह देना कि देवयानीने स्वयंवरकी विधिसे नहुष-नन्दन राजा ययातिका पतिरूपमें वरण किया है।) ॥ २७ ॥