मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९६ * मत्स्यपुराण *
| तमेव देशं सम्प्राप्तो जललिप्सुः प्रतर्षितः।<br>ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषितः ॥ ५<br>पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः ।<br>उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम् ॥ ६<br>रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् ।<br>शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः ॥ ७ | उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण अधिक थक गये थे और जल पीना चाहते थे। उन्होंने देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंको भी देखा। वे सभी पीनेयोग्य रसका पान कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ परम सुन्दर आसनपर बैठी हुई देखा। उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा उसकी चरणसेवा कर रही थी॥ ५—७॥ | | ययातिरुवाच<br>द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते ।<br>गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यतो ह्यहम् ॥ ८ | ययातिने पूछा— दो हजार * कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें॥ ८॥ | | देवयान्युवाच<br>आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप ।<br>शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् ॥ ९<br>इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी।<br>दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः ॥ १० | देवयानी बोली— महाराज! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें। असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी साथ जायगी ॥ ९-१०॥ | | ययातिरुवाच<br>कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी।<br>असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे ॥ ११ | ययाति बोले— सुन्दरि! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ११ ॥ | | देवयान्युवाच<br>सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते ।<br>विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः ॥ १२<br>राजवद् रूपवेशौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च ।<br>किं नामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे ॥ १३ | देवयानी बोली— नरश्रेष्ठ! सब लोग दैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये। आपके रूप और वेश राजाके समान हैं और आप विशुद्ध संस्कृत भाषा बोल रहे हैं। मुझे बताइये, आपका क्या नाम है, आप कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं? ॥ १२-१३॥ | | ययातिरुवाच<br>ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः ।<br>राजांहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः ॥ १४ | ययातिने कहा— मैंने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है ॥१४॥ | | देवयान्युवाच<br>केन चार्थेन नृपते ह्येनं देशं समागतः ।<br>जिघृक्षुर्वारि यत् किञ्चिदथवा मृगलिप्सया ॥ १५ | देवयानीने कहा— महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं ? ॥ १५ ॥ | | ययातिरुवाच<br>मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमिहागतः ।<br>बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥ १६ | ययातिने कहा— भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ, अतः अब आप मुझे आज्ञा दीजिये ॥ १६ ॥ |
* यहाँ किन्हीं श्लोकोंमें देवयानीकी दो हजार और किन्हींमें एक हजार सखियोंका उल्लेख हुआ है। यथावसर दोनों ही ठीक हैं।