भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 125

* अध्याय ३० * १९५


देवयान्युवाच<br>स्तुवतो दुहिता चाहं याचतः प्रतिगृह्णतः।<br>स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि॥ २४**देवयानीने कहा—**अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ? ॥ २४ ॥
शर्मिष्ठोवाच<br>येन केनचिदार्त्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्।<br>अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता॥ २५**शर्मिष्ठा बोली—**जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपद्ग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिये। (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २५॥
शौनक उवाच<br>प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः।<br>देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्॥ २६**शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा॥ २६॥
देवयान्युवाच<br>प्रविशामि पुरं तात तुष्टास्मि द्विजसत्तम।<br>अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते॥ २७**देवयानी बोली—**पिताजी! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी। द्विजश्रेष्ठ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है॥ २७॥
शौनक उवाच<br>एवमुक्तो द्विजश्रेष्ठो दुहित्रा सुमहायशाः।<br>प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः॥ २८**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश किया॥ २८॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९॥


तीसवाँ अध्याय

सखियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वनविहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह

शौनक उवाच<br>अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नृपोत्तम।<br>वनं तदैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी॥ १<br>तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा।<br>तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा॥ २<br>ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम्।<br>क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम्॥ ३<br>खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् फलानि विविधानि च।<br>पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया॥ ४**शौनकजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी। उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनमें उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक इच्छानुसार विचरने लगी। वे सब वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्न हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेतीं और कभी फल खाती थीं। इसी समय दैवेच्छासे नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये