भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 1098 में से

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१९४* मत्स्यपुराण *

| शौनक उवाच<br>ततस्तु त्वरितः शुक्रस्तेन राज्ञा समं ययौ।<br>उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥ १४॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री देवयानीके पास पहुँचे और उससे बोले—'सुभगे! तुम्हारी बात पूरी हो गयी'॥ १४॥ | | देवयान्युवाच<br>यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव।<br>नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥ १५॥ | तब देवयानीने कहा—तात भार्गव! 'आप राजाके धनके स्वामी हैं' मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा॥ १५॥ | | वृषपर्वोवाच<br>यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते।<br>तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥ १६॥ | वृषपर्वा बोले—पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूँगा (यह तुम विश्वास करो)॥ १६॥ | | देवयान्युवाच<br>दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये।<br>अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥ १७॥ | देवयानीने कहा—मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय॥ १७॥ | | वृषपर्वोवाच<br>उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठां शीघ्रमानय।<br>यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥ १८॥ | यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा—धात्रि! तुम उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण करे॥ १८॥ | | शौनक उवाच<br>ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्।<br>उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥ १९॥<br>यं सा कामयते कामं स कार्योऽत्र त्वयानघे।<br>दासी त्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने॥ २०॥<br>त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः। | शौनकजी कहते हैं—तब धायने शर्मिष्ठाके पास जाकर कहा—'भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाओ। पापरहित राजकुमारी! आज शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों—यजमानोंको त्याग रहे हैं। अतः देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हें पूर्ण करनी चाहिये। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी बनायी गयी हो'॥ १९-२० १/२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्।<br>मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥ २१॥ | शर्मिष्ठा बोली—यदि इस प्रकार देवयानीके लिये ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न शुक्राचार्यजी कहीं जायें और न देवयानी ही। मेरे कारण ये अन्यत्र जानेका विचार न करें॥ २१॥ | | शौनक उवाच<br>ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा।<br>पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२॥ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ हो तुरन्त राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र कन्याओंसे घिरी हुई थी॥ २२॥ | | शर्मिष्ठोवाच<br>अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका।<br>ध्रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥ २३॥ | शर्मिष्ठा बोली—देवयानी! मैं एक सहस्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ चलूँगी॥ २३॥ |

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