भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 123
* अध्याय २९ *१९३
फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे।<br>यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा॥ ४<br><br>अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्।<br>वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम॥ ५<br><br>वृषपर्वन् निबोध त्वं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्।<br>स्थातुं त्वद्विषये राजन् न शक्नोमि त्वया सह॥ ६<br><br>अद्यैवमभिजानामि दैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।<br>यतस्त्वमात्मनोदीर्णां दुहितां किमुपेक्षसे॥ ७जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्राह्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें धकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन्! तुम्हारे राज्यमें और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। दैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी दैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १—७॥
वृषपर्वावाच<br>नावहं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव।<br>त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्॥ ८<br>अद्यास्मानपहाय त्वमितो यास्यसि भार्गव।<br>समुद्रं सम्प्रवेक्ष्यामि नान्यदस्ति परायणम्॥ ९वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! आपने मेरे जानते कभी अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है॥ ८-९॥
शुक्र उवाच<br>समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा व्रजतासुराः।<br>दुहितुर्नाप्रियं सोढुं शक्तोऽहं दयिता हि मे॥ १०<br><br>प्रसाद्यतां देवयानीं जीवितं यत्र मे स्थितम्।<br>योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः॥ ११शुक्राचार्यने कहा— असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा॥ १०-११॥
वृषपर्वावाच<br>यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव।<br>भुवि हस्तिरथाश्वं वा तस्य त्वं मम चेश्वरः॥ १२वृषपर्वा बोले— भृगुनन्दन! असुरेश्वरोंके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हैं॥ १२॥
शुक्र उवाच<br>यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर।<br>तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥ १३शुक्राचार्यने कहा— महान् असुर! दैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो॥ १३॥