भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २७ * । १०९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अनायुधा सायुधायाः किं त्वं कुप्यसि भिक्षुकि।<br>लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम्॥ ११अरी भिक्षुकि ! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री तुझे मिल जायगी। मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥ ९—११ ॥
शौनक उवाच<br><br>सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि।<br>शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्॥ १२<br>हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया।<br>अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा॥ १३<br>अथ तं देशमध्यागाद् ययातिर्नहुषात्मजः।<br>श्रान्तयुग्यः श्रन्तरूपो मृगलिप्सुः पिपासितः॥ १४<br>नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके।<br>ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामग्निशिखामिव॥ १५<br>तामपृच्छत् स दृष्ट्वैव कन्याममरवर्णिनीम्।<br>सान्त्वयित्वा नृपश्रेष्ठः साम्ना परमवल्गुना॥ १६<br>का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला।<br>दीर्घं ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा॥ १७<br>कथं च पतिता ह्यस्मिन् कूपे वीरुत्तृणावृते।<br>दुहिता चैव कस्य त्वं वद सर्वं सुमध्यमे॥ १८शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी। यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी—ऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावटसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड़नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्निशिखाके समान तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी। उसपर दृष्टि पड़ते ही नृपश्रेष्ठ ययातिने पहले परम मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और पूछा—'सुमध्यमे ! तुम कौन हो? तुम्हारा मुख परम मनोहर है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो? तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ'॥ १२–१८॥
देवयान्युवाच<br><br>योऽसौ देवैर्हतान् दैत्यानुत्थापयति विद्यया।<br>तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे॥ १९<br>एष मे दक्षिणो राजन् पाणिस्ताम्रनखाङ्गुलिः।<br>समुद्धर गृहीत्वा मां कुलीनस्त्वं हि मे मतः॥ २०<br>जानामि त्वां च संशान्तं वीर्यवन्तं यशस्विनम्।<br>तस्मान्मां पतितामस्मात्कूपादुद्धर्तुमर्हसि॥ २१देवयानी बोली— जो देवताओंद्वारा मारे गये दैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज ! लाल नख और अङ्गुलियोंसे युक्त यह मेरा दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये॥ १९–२१॥
शौनक उवाच<br><br>तामथ ब्राह्मणीं स्त्रीं च विज्ञाय नहुषात्मजः।<br>गृहीत्वा दक्षिणे पाणावुज्जहार ततोऽवटात्॥ २२<br>उद्धृत्य चैनां तरसा तस्मात् कूपान्नराधिपः।<br>आमन्त्रयित्वा सुश्रोणीं ययातिः स्वपुरं ययौ॥ २३शौनकजी कहते हैं— शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला। इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने