भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१९० * मत्स्यपुराण *

गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता।<br>उवाच शोकसंतप्ता घूर्णिकामागतां पुनः॥ २४नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली॥ २२—२४॥
देवयानुवाच<br>त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः।<br>नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः॥ २५**देवयानीने कहा—**घूर्णिके! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी—उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी॥ २५॥
शौनक उवाच<br>सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्।<br>दृष्ट्वा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना॥ २६<br>आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता।<br>शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः॥ २७<br>श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्।<br>त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने॥ २८<br>दृष्ट्वा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो वने।<br>बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्॥ २९<br>आत्मदोषैर्नियच्छन्ति सर्वे दुःखसुखे जनाः।<br>मन्ये दुश्चरितं तस्मिंस्तस्येयं निष्कृतिः कृता॥ ३०**शौनकजी कहते हैं—**शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा—‘महाप्राज्ञ! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।’ अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य की गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दुःखी होकर उसे वनमें ढूँढ़ने लगे। तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्राचार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा—‘बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे—अशुभ या शुभ कर्मोंसे दुःख एवं सुखमें पड़ते हैं। मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपमें प्रायश्चित्त किया है’॥ २६—३०॥
देवयानुवाच<br>निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम।<br>शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः॥ ३१<br>सत्यं किलैतत् सा प्राह दैत्यानामस्मि गायना।<br>एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी॥ ३२<br>वचनं तीक्ष्णपरुषं क्रोधरक्तेक्षणा भृशम्।<br>स्तुवतो दुहितासि त्वं याचतः प्रतिगृह्णतः॥ ३३<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः।<br>इति मामाह शर्मिष्ठा दुहिता वृषपर्वणः।<br>क्रोधसंरक्तनयना दर्पपूर्णानना ततः॥ ३४<br>यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्णतः।<br>प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया॥ ३५**देवयानी बोली—**पिताजी! मुझे अपने कर्मोंके फलसे निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है—मैं भाटोंकी तरह दैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाड़िली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। ‘देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।’ वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है। कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी। यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठाने उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी)॥ ३१—३५॥