मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २८ * १११
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्वन्द्व अचिन्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है॥ ३६-३७ ॥ |
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| स्तुवतो दुहिता न त्वं भद्रे न प्रतिगृह्णतः।<br>अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि॥ ३६ | |
| वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।<br>अचिन्त्यं ब्रह्म निर्द्वन्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष
| शुक्र उवाच | **शुक्राचार्यने कहा—**बेटी देवयानी! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा की हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगत्पर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगत्को जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड़नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी-से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोंका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षोंतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिये; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके बलाबलको नहीं जानते ॥ १—७ ॥ |
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| यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ १ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधं निगृह्णाति हयं यथा।<br>स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्बते॥ २ | |
| यः समुत्पतितं क्रोधमक्रोधेन नियच्छति।<br>देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम्॥ ३ | |
| यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति।<br>यथोरगस्त्वचं जीर्णां स वै पुरुष उच्यते॥ ४ | |
| यस्तु भावयते धर्मं योऽतिमात्रं तितिक्षति।<br>यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम्॥ ५ | |
| यो यजेदश्वमेधेन मासि मासि शतं समाः।<br>यस्तु कुप्येन सर्वस्य तयोरक्रोधनो वरः॥ ६ | |
| ये कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युश्चेतसः।<br>नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७ |