भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २२ *८७

| भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मला नदी।<br>नदी गोदावरी नाम त्रिसंध्या तीर्थमुत्तमम्॥ ४६<br>तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम्।<br>यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः॥ ४७<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत्।<br>स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजाः॥ ४८<br>श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम्।<br>तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च॥ ४९<br>भद्रतीर्थं च विख्यातं पम्पातीर्थं च शाश्वतम्।<br>पुण्यं रामेश्वरं तद्वदेलापुरमलंपुरम्॥ ५०<br>अङ्गारक च विख्यातमामर्दकमलम्बुषम्।<br>आम्रातकेश्वरं तद्वदेकाम्रकमतः परम्॥ ५१<br>गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं कृपुचन्द्रं पृथूदकम्।<br>सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी॥ ५२<br>रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसङ्गमः।<br>इन्द्रकीलं महानादं तथा च प्रियमेलकम्॥ ५३<br>एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु।<br>एतेषु सर्वदेवानां सांनिध्यं दृश्यते यतः॥ ५४<br>दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम्।<br>बाहुदा च नदी पुण्या तथा सिद्धवनं शुभम्॥ ५५<br>तीर्थं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा।<br>श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम्॥ ५६<br>तथैव पितृतीर्थं तु यत्र गोदावरी नदी।<br>युता लिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा॥ ५७<br>जामदग्न्यस्य तत् तीर्थं क्रमादायातमुत्तमम्।<br>प्रतीकस्य भयाद् भिन्नं यत्र गोदावरी नदी॥ ५८<br>तत् तीर्थं हव्यकव्यानामप्सरोयुगसंज्ञितम्।<br>श्राद्धाग्निकार्यदानेषु तथा कोटिशताधिकम्॥ ५९<br>तथा सहस्रलिङ्गं च राघवेश्वरमुत्तमम्।<br>सेन्द्रफेना नदी पुण्या यत्रेन्द्रः पतितः पुरा॥ ६०<br>निहत्य नमुचिं शक्रस्तपसा स्वर्गमाप्तवान्।<br>तत्र दत्तं नरैः श्राद्धमनन्तफलं भवेत्॥ ६१<br>तीर्थं तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च।<br>सोमपानं च विख्यातं यत्र वैश्वानरालयम्॥ ६२ | भीमेश्वर, कृष्णवेणा, कावेरी, कुड्मला नदी, गोदावरी नदी, त्रिसंध्या नामक उत्तम तीर्थ तथा समस्त तीर्थोंद्वारा नमस्कृत त्रैयम्बक नामक तीर्थ, जहाँ त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर स्वयं ही निवास करते हैं—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध करोड़ों-करोड़ों गुना फलदायक होता है। ब्राह्मणो ! इन तीर्थोंका स्मरणमात्र करनेसे पापसमूह सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर होकर नष्ट हो जाते हैं ॥४६—४८॥<br><br>इसी प्रकार श्रीपर्णी, ताम्रपर्णी, सर्वश्रेष्ठ जयातीर्थ, पुण्यतोया मत्स्य नदी, शिवधार, सुप्रसिद्ध भद्रतीर्थ, सनातन पम्पातीर्थ, पुण्यमय रामेश्वर, एलापुर, अलमपुर, अङ्गारक, प्रख्यात आमर्दक, अलम्बुष, (अलम्बुषा देवीका स्थान) आम्रातकेश्वर एवं एकाग्रक (भुवनेश्वर) हैं। इसके बाद गोवर्धन, हरिश्चन्द्र, कृपुचन्द्र, पृथूदक, सहस्राक्ष, हिरण्याक्ष, कदली नदी, रामाधिवास, उसमें भी सौमित्रिसंगम, इन्द्रकील, महानाद तथा प्रियमेलक—ये सभी श्राद्धमें सदा सर्वाधिक प्रशस्त माने गये हैं। चूँकि इन तीर्थोंमें सम्पूर्ण देवताओंका सांनिध्य देखा जाता है, इसलिये इन सभीमें दिया गया दान सैकड़ों कोटि गुनासे भी अधिक फलदायी होता है। पुण्यजला बाहुदा (धवला) नदी, मङ्गलमय सिद्धवन, पाशुपत नामक तीर्थ तथा शुभदायिनी पार्वतिका नदी—इन सभी तीर्थोंमें किया गया श्राद्ध सौ करोड़ गुनासे भी अधिक फलदाता होता है। उसी प्रकार यह भी एक पितृतीर्थ है, जहाँ सहस्रों शिवलिङ्गोंसे युक्त एवं अन्तरमें सभी नदियोंका जल प्रवाहित करनेवाली गोदावरी नदी बहती है। वहींपर जामदग्न्यका वह उत्तम तीर्थ क्रमशः आकर सम्मिलित हुआ है, जो प्रतीकके भयसे पृथक् हो गया था। गोदावरी नदीमें स्थित हव्य-कव्य-भोजी पितरोंका वह परम प्रियतीर्थ अप्सरोयुग नामसे प्रसिद्ध है। यह भी श्राद्ध, हवन और दान आदि कार्योंमें सैकड़ों कोटि गुनेसे अधिक फल देनेवाला है तथा सहस्रलिङ्ग, उत्तम राघवेश्वर और पुण्यतोया इन्द्रफेना नदी नामक तीर्थ है, जहाँ पूर्वकालमें इन्द्रका पतन हो गया था तथा पुनः उन्होंने अपने तपोबलसे नमुचिका वध करके स्वर्गलोकको प्राप्त किया था। वहाँ मनुष्योंद्वारा किया गया श्राद्ध अनन्त फलदायक होता है। पुष्कर नामक तीर्थ, शालग्राम और जहाँ वैश्वानरका निवासस्थान है, वह सुप्रसिद्ध सोमपानतीर्थ, |