भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २४ *९५
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत् तदा।<br>पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयन्ती वराङ्गना॥ ६<br>सोमस्येति चिरादाह ततोऽगृह्लाद् विधुः सुतम्।<br>बुध इत्यकरोन्नाम्ना प्रादाद् राज्यं च भूतले॥ ७<br>अभिषेकं ततः कृत्वा प्रधानमकरोद् विभुः।<br>ग्रहसाम्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मर्षिसंयुतः॥ ८<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत्॥ ९<br>अश्वमेधशतं साग्रमकरोद् यः स्वतेजसा।<br>पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः॥ १०<br>हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य जनार्दनम्।<br>लोकैश्वर्यमगाद् राजा सप्तद्वीपपतिस्तदा॥ ११<br>केशिप्रभृतयो दैत्याः कोटिशो येन दारिताः।<br>उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद् रूपमोहिता॥ १२<br>सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना।<br>धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा॥ १३<br>चामरग्राहिणी कीर्तिः सदा चैवाङ्गवाहिका।<br>विष्णोः प्रसादाद् देवेन्द्रो ददार्धासनं तदा॥ १४कर लिया और उसका नाम 'बुध' रखा। तत्पश्चात् सर्वव्यापी ब्रह्मा ने ब्रह्मर्षियोंके साथ उसे भूतलके राज्यपर अभिषिक्त कर सर्वप्रधान बना दिया और ग्रहोंकी समता प्रदान की। फिर सभी देवताओंके देखते-देखते ब्रह्मा वहीं अन्तर्हित हो गये। बुधने इलाके गर्भसे एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न किया। वह पुरूरवा नामसे विख्यात हुआ। वह सम्पूर्ण लोगोंद्वारा वन्दित हुआ। उन्होंने अपने प्रभावसे एक सौसे भी अधिक अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया। उस राजा पुरूरवाने हिमवान् पर्वतके रमणीय शिखरपर भगवान् विष्णुकी आराधना करके लोकोंका ऐश्वर्य प्राप्त किया तथा वे सातों द्वीपोंके अधिपति हुए। उन्होंने केशि आदि करोड़ों दैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उनके रूपपर मुग्ध होकर उर्वशी उनकी पत्नी बन गयी। सम्पूर्ण लोकोंकी हित-कामनासे युक्त पुरूरवाने पर्वत, वन और काननोंसहित सातों द्वीपोंकी पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। कीर्ति तो (मानो) सदा उनकी चँवर धारण करनेवाली सेविका थी। भगवान् विष्णुकी कृपासे देवराज इन्द्रने उन्हें अपना अर्धासन प्रदान किया था॥ १-१४॥
धर्मार्थकामान् धर्मेण सममेवाभ्यपालयत्।<br>धर्मार्थकामाः संद्रष्टुमाजग्मुः कौतुकात् पुरा॥ १५<br>जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम्।<br>भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्घ्यपाद्यादिकं नृपः॥ १६<br>आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषितम्।<br>निवेश्याथाकरोत् पूजामीषद् धर्मेऽधिकां पुनः॥ १७<br>जग्मतुस्तेन कामार्थावतिक्षोपं नृपं प्रति।<br>अर्थः शापमदात् तस्मै लोभात् त्वं नाशमेष्यसि॥ १८<br>कामोऽप्याह तवोन्मादो भविता गन्धमादने।<br>कुमारवनमाश्रित्य वियोगादुर्वशीभवात्॥ १९<br>धर्मोऽप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि।<br>सन्ततिस्तव राजेन्द्र यावच्चन्द्रार्कतारकम्॥ २०<br>शतशो वृद्धिमायातु न नाशं भुवि यास्यति।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदन्वभूत्॥ २१पुरूरवा धर्म, अर्थ और कामका समानरूपसे ही पालन करते थे। पूर्वकालमें एक बार धर्म, अर्थ और काम कुतूहलवश यह देखनेके लिये राजाके निकट आये कि यह हमलोगोंको समानरूपसे कैसे देखता है। उनके मनमें राजाके चरित्रको जाननेकी अभिलाषा थी। राजाने उन्हें भक्तिपूर्वक अर्घ्य-पाद्य आदि प्रदान किया। तत्पश्चात् स्वर्णजटित तीन दिव्य आसन लाकर उनपर उन्हें बैठाया और उनकी पूजा की। इसके बाद उन्होंने पुनः धर्मकी थोड़ी अधिक पूजा कर दी। इस कारण अर्थ और काम राजापर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। अर्थने राजाको शाप देते हुए कहा—'तुम लोभके कारण नष्ट हो जाओगे।' कामने भी कहा—'राजेन्द्र! गन्धमादन पर्वतपर स्थित कुमारवनमें तुम्हें उर्वशीजन्य वियोगसे उन्माद हो जायगा।' धर्मने कहा—'राजेन्द्र! तुम दीर्घायु और धार्मिक होगे। तुम्हारी संतति करोड़ों प्रकारसे वृद्धिको प्राप्त होती रहेगी और जबतक सूर्य, चन्द्रमा तथा तारागणकी सत्ता विद्यमान है, तबतक उनका भूतलपर विनाश नहीं होगा।' यों कहकर वे सभी अन्तर्हित हो गये और राजा राज्यका उपभोग करने लगे ॥ १५-२१ ॥