मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९४ * मत्स्यपुराण *
| यस्मात् परस्त्रीहरणाय सोम<br>त्वया कृतं युद्धमतीव भीमम्।<br>पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु<br>शान्तोऽप्यलं नूनमथो सितान्ते॥<br>भार्यामिमामर्पय वाक्पतेस्त्वं<br>न चावमानोऽस्ति परस्वहारे॥ ४६ | दूसरेकी स्त्रीका अपहरण करनेके लिये इतना भयंकर युद्ध किया है, इसलिये शान्तस्वरूप होनेपर भी तुम शुक्लपक्षके अन्तमें अर्थात् कृष्णपक्षमें निश्चय ही जनतामें पापग्रहके रूपसे प्रसिद्ध होओगे। तुम बृहस्पतिकी इस भार्याको उन्हें समर्पित कर दो। दूसरेका धन लेकर उसे लौटा देनेमें अपमान नहीं होता'॥ ३८—४६॥ | | सूत उवाच<br>तथेति चोवाच हिमांशुमाली<br>युद्धादपाक्रामदतः प्रशान्तः।<br>बृहस्पतिः स्वामपगृह्य तारां<br>हृष्टो जगाम स्वगृहं सरुद्रः॥ ४७ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तब चन्द्रमाने 'तथेति—ऐसा ही हो' यों कहकर ब्रह्माकी आज्ञा स्वीकार कर ली और वे शान्त होकर युद्धसे हट गये। इधर बृहस्पति भी अपनी पत्नी ताराको ग्रहण करके शिवजीके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चले गये॥ ४७॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशाख्याने सोमापचारो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशाख्यानमें सोमापचार नामक तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
ताराके गर्भसे बुधकी उत्पत्ति, पुरूरवाका जन्म, पुरूरवा और उर्वशीकी कथा, नहुष-पुत्रोंके वर्णन-प्रसङ्गमें ययातिका वृत्तान्त
| सूत उवाच<br>ततः संवत्सरस्यान्ते द्वादशादित्यसंनिभः।<br>दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः॥ १<br>तारोदराद् विनिष्क्रान्तः कुमारश्चन्द्रसंनिभः।<br>सर्वार्थशास्त्रविद् धीमान् हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः॥ २<br>नाम यद्राजपुत्रीयं विश्रुतं गजवैद्यकम्।<br>राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद् राजपुत्रो बुधः स्मृतः॥ ३<br>जातमात्रः स तेजांसि सर्वाण्येवाजयद् बली।<br>ब्रह्माद्यास्तत्र चाजग्मुर्देवा देवर्षिभिः सह॥ ४<br>बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकर्मोत्सवे तदा।<br>अपृच्छंस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः॥ ५ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर ताराके उदरसे एक कुमार प्रकट हुआ। वह बारहों सूर्योंके समान तेजस्वी, दिव्य पीताम्बरधारी, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित तथा चन्द्रमाके सदृश कान्तिमान् था। वह सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका ज्ञाता, उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्न तथा हस्तिशास्त्र (हाथीके गुण-दोष तथा चिकित्सा आदि विवेचनापूर्ण शास्त्र)-का प्रवर्तक था। वही शास्त्र 'राजपुत्रीय' (या 'पालकाप्य'<sup>१</sup>)-नामसे विख्यात है, इसमें गज-चिकित्साका विशद वर्णन है।<sup>२</sup> सोम राजाका पुत्र होनेके कारण वह राजकुमार राजपुत्र तथा बुधके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस बलवान् राजकुमारने जन्म लेते ही सभी तेजस्वी पदार्थोंको अभिभूत कर दिया। उसके जातकर्म-संस्कारके उत्सवमें ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियोंके साथ बृहस्पतिके घर पधारे। चन्द्रमाने उस पुत्रको ग्रहण |
१. यह ग्रन्थ बहुत बड़ा है। अग्निपुराण २८७-९१, बृहत्संहिता ६६, ९३, आकाशभैरवकल्प, शिवतत्त्वरत्नाकर, मानसोल्लास १।१०००-१४०० आदिमें इसका वर्णन है। वाल्मी० रामा० १।६।२४-३० की तथा रघुवंश ५।५० की टीकाओंमें भी इसके कुछ अंश निर्दिष्ट हैं।
२. इन्हींसे 'राजपूत' शब्द भी प्रचलित हुआ।