मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २३ * | ९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| धनुर्गृहीत्वाजगवं पुरारि-<br>र्जगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः।<br>युद्धाय सोमेन विशेषदीप्त-<br>स्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः॥ ३७॥ | साथ 'आजगव' नामक धनुष लेकर चन्द्रमाके साथ युद्ध करनेके लिये प्रस्थित हुए। उस समय उनका मुख विशेषरूपसे उद्दीप्त हुए तृतीय नेत्रकी अग्निसे बड़ा भयानक दीख रहा था॥ २९-३७॥ |
| सहैव जगमुश्च गणेशकाद्या<br>विंशच्चतुःषष्टिगणास्त्रयुक्ताः।<br>यक्षेश्वरः कोटिशतैरनेकै-<br>र्युतोऽन्वगात् स्पन्दनसंस्थितानाम्॥ ३८॥ | उनके साथ भूतेश्वरों और सिद्धोंका समुदाय भी था तथा शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित गणेश आदि चौरासी गण भी साथ ही रवाना हुए। उसी प्रकार यक्षराज कुबेरने भी अनेकों शतकोटि सेनाओंके साथ-साथ रथारूढ़ एक |
| वेतालरक्षोरगकिंनराणां<br>पद्मेन चैकेन तथार्बुदेन।<br>लक्षैस्त्रिभिर्द्वादशभी रथानां<br>सोमोऽप्यगात् तत्र विवृद्धमन्युः॥ ३९॥ | पद्म वेताल, एक अरब यक्ष, तीन लाख नाग और बारह लाख किन्नरोंको साथ लेकर शिवजीका अनुसरण किया। उधर चन्द्रमा भी क्रोधाविष्ट हो नक्षत्रों, दैत्यों |
| नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः<br>शनैश्चराङ्गारकवृद्धतेजाः।<br>जग्मुर्भयं सप्त तथैव लोका-<br>श्चचाल भूद्वीपसमुद्रगर्भा॥ ४०॥ | और असुरोंकी सेनाओंके साथ शनैश्चर और मंगलके सहयोगके कारण उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न हो रणभूमिमें आ डटे। उस समाहारको देखकर सातों लोक भयभीत हो उठे तथा द्वीपों एवं समुद्रोंसहित पृथ्वी काँपने लगी। |
| स सोममेवाभ्यगमत् पिनाकी<br>गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्निः।<br>अथाभवद् भीषणभीमसेन-<br>सैन्यद्वयस्यापि महाहवोऽसौ॥ ४१॥ | शिवजीने प्रकाशमान एवं विशाल आग्नेयास्त्रको लेकर चन्द्रमापर आक्रमण किया। फिर तो दोनों सेनाओंमें अत्यन्त भीषण युद्ध छिड़ गया। धीरे-धीरे उस युद्धने |
| अशेषसत्त्वक्षयकृत्प्रवृद्ध-<br>स्तीक्ष्णायुधास्त्रज्वलनेकरूपः।<br>शस्त्रैरथान्योन्यमशेषसैन्यं<br>द्वयोर्जगाम क्षयमुग्रतीक्ष्णैः॥ ४२॥ | उग्ररूप धारण कर लिया। उसमें सम्पूर्ण जीवोंका संहार हो रहा था तथा अग्निके समान प्रज्वलित हथियार चमक रहे थे। इस प्रकार एक-दूसरेके प्रति अत्यन्त तीखे शस्त्रोंके प्रहारसे दोनों सेनाएँ समग्ररूपसे नष्ट होने लगीं। |
| पतन्ति शस्त्राणि तथोज्ज्वलानि<br>स्वर्भूमिपातालमथो दहन्ति।<br>रुद्रः कोपाद् ब्रह्मशीर्षं मुमोच<br>सोमोऽपि सोमास्त्रममोघवीर्यम्॥ ४३॥ | उस समय ऐसे जाज्वल्यमान शस्त्रोंकी वर्षा हो रही थी, जो स्वर्गलोक, भूतल और पातालको भस्म कर डालते थे। यह देख रुद्रने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशीर्ष नामक अस्त्र चलाया, तब चन्द्रमाने भी अपने अचूक लक्ष्यवाले सोमास्त्रका प्रयोग किया। |
| तयोर्निपातेन समुद्रभूम्यो-<br>रथान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत्।<br>तदस्त्रयुग्मं जगतां क्षयाय<br>प्रवृद्धमालोक्य पितामहोऽपि॥ ४४॥ | उन दोनों अस्त्रोंके टकरानेसे समुद्र, भूमि और अन्तरिक्ष आदि सभी भयसे काँप उठे। इस प्रकार उन दोनों अस्त्रोंको जगत्का विनाश करनेके लिये बढ़ता हुआ देखकर |
| अन्तःप्रविश्याथ कथं कथंचि-<br>न्निवारयामास सुरैः सहैव।<br>अकारणं किं क्षयकृज्जनानां<br>सोम त्वयापीत्थमकारि कार्यम्॥ ४५॥ | देवताओंके साथ ब्रह्माने उनके भीतर प्रवेश करके किसी-किसी प्रकारसे उनका निवारण किया (और कहा-) 'सोम! तुमने अकारण ही ऐसा कार्य क्यों किया, यह तो लोगोंका विनाशक है। सोम! चूँकि तुमने |