मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 106, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 106
| ९६ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अहन्यहनि देवेन्द्रं द्रष्टुं याति स राजराट्।<br>कदाचिदारुह्य रथं दक्षिणाम्बरचारिणम्॥ २२<br>सार्धमर्केण सोऽपश्यन्नीयमानामथाम्बरे।<br>केशिना दानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम्॥ २३<br>तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपाणिना।<br>बुधपुत्रेण वायव्यमस्त्रं मुक्त्वा यशोऽर्थिना॥ २४<br>तथा शक्रोऽपि समरे येन चैवं विनिर्जितः।<br>मित्रत्वमगमद् देवैर्दाविन्द्राय चोर्वशीम्॥ २५<br>ततः प्रभृति मित्रत्वमगमत् पाकशासनः।<br>सर्वलोकातिशायित्वं बलमूर्जो यशः श्रियम्॥ २६<br>प्रादाद् वज्रीति संतुष्टो गेयतां भरतेन च।<br>सा पुरूरवसः प्रीत्या गायन्ती चरितं महत्॥ २७<br>लक्ष्मीस्वयंवरं नाम भरतेन प्रवर्तितम्।<br>मेनकामुर्वशीं रम्भां नृत्यतेति तदादिशत्॥ २८<br>ननर्त सलयं तत्र लक्ष्मीरूपेण चोर्वशी।<br>सा पुरूरवसं दृष्ट्वा नृत्यन्ती कामपीडिता॥ २९<br>विस्मृताभिनयं सर्वं यत् पुरा भरतोदितम्।<br>शशाप भरतः क्रोधाद् वियोगादस्य भूतले॥ ३०<br>पञ्चपञ्चाशदब्दानि लता सूक्ष्मा भविष्यसि।<br>पुरूरवाः पिशाचत्वं तत्रैवानुभविष्यति॥ ३१ | राजराजेश्वर पुरूरवा प्रतिदिन देवराज इन्द्रको देखनेके लिये (अमरावतीपुरी) जाया करते थे। एक बार वे सूर्यके साथ रथपर चढ़कर गगनतलके दक्षिण भागमें विचरण कर रहे थे, उसी समय उन्होंने दानवराज केशिद्वारा चित्रलेखा और उर्वशी नाम्नी अप्सराओंको आकाशमार्गसे ले जायी जाती हुई देखा।* तब विविधास्त्रधारी यशोऽभिलाषी बुध-नन्दन पुरूरवाने समरभूमिमें वायव्यास्त्रका प्रयोग करके उस दानवराज केशीको पराजित कर दिया, जिसने संग्राममें इन्द्रको भी परास्त कर दिया था। तत्पश्चात् राजाने उर्वशीको ले जाकर इन्द्रको समर्पित कर दिया, जिससे उनकी देवोंके साथ प्रगाढ़ मैत्री हो गयी। तभीसे इन्द्र भी राजाके मित्र हो गये। फिर इन्द्रने प्रसन्न होकर राजाको समस्त लोकोंमें श्रेष्ठता, अत्यधिक बल, पराक्रम, यश और सम्पत्ति प्रदान की। साथ ही भरत मुनिद्वारा उनके यशका गान भी कराया गया। उर्वशी पुरूरवाके प्रेमसे उनके महान् चरित्रका गान करती रहती थी। एक बार भरत मुनिद्वारा प्रवर्तित 'लक्ष्मीस्वयंवर' नाटकका अभिनय हुआ। उसमें इन्द्रने मेनका, उर्वशी और रम्भा—तीनोंको नाचनेका आदेश दिया। उनमें उर्वशी लक्ष्मीका रूप धारण करके लयपूर्वक नृत्य कर रही थी। (पर) नृत्यकालमें पुरूरवाको देखकर अनुरागसे सुधबुध खो जानेके कारण भरत मुनिने उसे पहले जो कुछ अभिनयका नियम बतलाया था, वह सारा-का-सारा उसे विस्मृत हो गया। तब भरत मुनिने क्रोधके वशीभूत हो उसे शाप देते हुए कहा—'तुम इसके वियोगसे भूतलपर पचपन वर्षतक सूक्ष्मलताके रूपमें उत्पन्न होकर रहोगी और पुरूरवा वहीं पिशाच-योनिका अनुभव करेगा॥ २२—३१॥ |
| ततस्तमुर्वशी गत्वा भर्तारमकरोच्चिरम्।<br>शापान्ते भरतस्याथ उर्वशी बुधसूनुतः॥ ३२<br>अजीजनत् सुतानष्टौ नामतस्तान् निबोधत।<br>आयुर्दृढायुरश्वायुर्धनायुर्धृतिमान् वसुः॥ ३३<br>शुचिविद्यः शतायुश्च सर्वे दिव्यबलौजसः।<br>आयुषो नहुषः पुत्रो वृद्धशर्मा तथैव च॥ ३४<br>रजिर्दम्भो विपाप्मा च वीराः पञ्च महारथाः।<br>रजेः पुत्रशतं जज्ञे राजेयमिति विश्रुतम्॥ ३५<br>रजिराराधयामास नारायणमकल्मषम्।<br>तपसा तोषितो विष्णुर्वरान् प्रादान्महीपतेः॥ ३६ | तत्पश्चात् उर्वशीने पुरूरवाके पास जाकर चिरकालके लिये उनका पतिरूपमें वरण कर लिया। भरत मुनिद्वारा दिये गये शापकी निवृत्तिके पश्चात् उर्वशीने बुधपुत्र पुरूरवाके संयोगसे आठ पुत्रोंको जन्म दिया। उनके नाम थे—आयु, दृढ़ायु, अश्वायु, धनायु, धृतिमान्, वसु, शुचिविद्य और शतायु। ये सभी दिव्य बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। इनमें आयुके नहुष, वृद्धशर्मा, रजि, दम्भ और विपाप्मा नामक पाँच महारथी वीर पुत्र उत्पन्न हुए। रजिके सौ पुत्र पैदा हुए, जो राजेय नामसे विख्यात हुए। रजिने पापरहित भगवान् नारायणकी आराधना की। उनकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान् विष्णुने राजाको अनेकों वर |
* कालिदासके विक्रमोर्वशीय नाटकका यही कथानक आधार है। यह पद्मपुराणमें भी है। वैसे पुरूरवावृत्त वेदोंसे लेकर प्रायः सभी पुराणोंमें चर्चित है, पर वह थोड़ा भिन्नरूपमें है।