भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २२ *

८९

एतत्तीर्थेषु यच्छ्राद्धं तत् कोटिगुणमिष्यते ।<br>यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन तीर्थे श्राद्धं समाचरेत् ॥ ७९<br>प्रातःकालो मुहूर्तास्त्रीन् सङ्गवस्तावदेव तु ।<br>मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्यादपराह्नस्ततः परम् ॥ ८२<br>सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच्छ्राद्धं तत्र न कारयेत् ।<br>राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु ॥ ८३<br>अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा ।<br>तत्राष्टमो मुहूर्त्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः ॥ ८४<br>मध्याह्ने सर्वदा यस्मान्मन्दो भवति भास्करः ।<br>तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भो भविष्यति ॥ ८५<br>मध्याह्नखड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः ।<br>रूप्यं दर्भांस्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः ॥ ८६<br>पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य संतापकारिणः ।<br>अष्टावेते यतस्तस्मात् कुतपा इति विश्रुताः ॥ ८७<br>ऊर्ध्वं मुहूर्त्तात् कुतपाद्यान्मुहूर्त्तचतुष्टयम् ।<br>मुहूर्त्तपञ्चकं चैतत् स्वधाभवनमिष्यते ॥ ८८<br>विष्णोर्देहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा ।<br>श्राद्धस्य रक्षणार्थालमेतत्प्राहूर्दिवौकसः ॥ ८९<br>तिलोदकाञ्जलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः ।<br>सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते ॥ ९०<br>श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनाैकेन दीयते ।<br>तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः ॥ ९१चूँकि इन तीर्थोंमें जो श्राद्ध किया जाता है, वह कोटिगुना फलदायक होता है, अतः प्रयत्नपूर्वक तीर्थोंमें श्राद्ध-कार्य सम्पन्न करना चाहिये। प्रातःकाल तीन मुहूर्ततकका काल संगव कहलाता है। उसके बाद तीन मुहूर्ततकका काल मध्याह्न और उसके बाद उतने ही समयतक अपराह्न है। फिर तीन मुहूर्ततक सायंकाल होता है, उसमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। सायंकालका समय राक्षसी वेला नामसे प्रसिद्ध है। यह सभी कार्योंमें निन्दित है। एक दिनमें पन्द्रह मुहूर्त होते हैं, यह तो सदासे विख्यात है। उनमें जो आठवाँ मुहूर्त है, वह कुतप नामसे प्रसिद्ध है। चूँकि मध्याह्नके समय सूर्य सदा मन्द हो जाते हैं, इसलिये उस समय अनन्त फलदायक उस (कुतप)-का आरम्भ होता है। मध्याह्नकाल, खड्गपात्र, नेपालकम्बल, चाँदी, कुश, तिल, गौ और आठवाँ दौहित्र (कन्याका पुत्र)—ये आठों चूँकि पापको, जिसे कुत्सित कहा जाता है, संतप्त करनेवाले हैं, इसलिये 'कुतप' नामसे विख्यात हैं। इस कुतप मुहूर्तके उपरान्त चार मुहूर्त अर्थात् कुल पाँच मुहूर्त स्वधावाचनके लिये उत्तम काल हैं। कुश तथा काला तिल—ये दोनों भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रादुर्भूत हुए हैं, अतः ये श्राद्धकी रक्षा करनेमें सर्वसमर्थ हैं—ऐसा देवगण कहते हैं। तीर्थवासियोंको जलमें प्रवेश करके एक हाथमें कुश लेकर तिलसहित जलाञ्जलि देनी चाहिये। ऐसा करनेसे श्राद्धकी विशेषता बढ़ जाती है। श्राद्ध करते समय (पिण्ड आदि तो) एक ही हाथसे दिया जाता है, परंतु तर्पण दोनों हाथोंसे किया जाता है—यह विधि सदासे प्रचलित है॥ ७९-९१॥
सूत उवाच<br>पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् ।<br>पुरा मत्स्येन कथितं तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम् ।<br>शृणोति यः पठेद् वापि श्रीमान् संजायते नरः ॥ ९२<br>श्राद्धकाले च वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः ।<br>सर्वपापोपशान्त्यर्थमलक्ष्मीनाशनं परम् ॥ ९३<br>इदं पवित्रं यशसो निधान-<br>मिदं महापापहरं च पुंसाम् ।<br>ब्रह्मार्कुरुद्रैरपि पूजितं च<br>श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः ॥ ९४**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! पूर्वकालमें मत्स्यभगवान्ने इस तीर्थ-श्राद्धका वर्णन किया था। यह पुण्यप्रद, परम पवित्र, आयुवर्धक तथा सम्पूर्ण पापोंका विनाशक है। जो मनुष्य इसे सुनता है अथवा स्वयं इसका पाठ करता है, वह श्रीसम्पन्न हो जाता है। तीर्थनिवासियाेंद्वारा समस्त पापोंकी शान्तिके निमित्त श्राद्धके समय इस परम श्रेष्ठ दरिद्रताविनाशक (श्राद्ध-माहात्म्यरूप) प्रसङ्गका पाठ करना चाहिये। यह श्राद्ध-माहात्म्य परम पवित्र, यशका आश्रयस्थान, पुरुषोंके महान्-से-महान् पापोंका विनाशक तथा ब्रह्मा, सूर्य और रुद्रद्वारा भी पूजित (सम्मानित) है॥ ९२-९४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें बाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२॥