भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 93
* अध्याय २१ *८३

| कालञ्जरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ २८ | कालञ्जर-पर्वतपर मृग-योनिमें और मानसरोवरमें सात चक्रवाकके रूपमें उत्पन्न हुए थे, वे ही (व्यक्ति अब) सिद्ध (होकर) यहाँ निवास कर रहे हैं'॥ २८॥ | | सूत उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्ताभ्यां स पपात शुचा ततः।<br>जातिस्मरत्वमगमत् तौ च मन्त्रिवरावुभौ॥ २९<br>कामशास्त्रप्रणेता च बाभ्रव्यस्तु सुबालकः।<br>पाञ्चाल इति लोकेषु विश्रुतः सर्वशास्त्रवित्॥ ३०<br>कण्डरीकोऽपि धर्मात्मा वेदशास्त्रप्रवर्तकः।<br>भूत्वा जातिस्मरौ शोकात् पतितावग्रतस्तदा॥ ३१<br>हा वयं योगविभ्रष्टाः कामतः कर्मबन्धनाः।<br>एवं विलप्य बहुशस्त्रयस्ते योगपारगाः॥ ३२<br>विस्मयाच्छाद्धमाहात्म्यमभिनन्द्य पुनः पुनः।<br>ततस्तस्मै धनं दत्त्वा प्रभूतग्रामसंयुतम्॥ ३३<br>विसृज्य ब्राह्मणं तं च वृद्धं धनमुदान्वितम्।<br>आत्मीयं नृपतिः पुत्रं नृपलक्षणसंयुतम्॥ ३४<br>विष्वक्सेनाभिधानं तु राजा राज्येऽभ्यषेचयत्।<br>मानसे मिलिताः सर्वे ततस्ते योगिनो वराः॥ ३५<br>ब्रह्मदत्तादयस्तस्मिन् पितृसक्ता विमत्सराः।<br>संनतिश्चाभवद् भ्रष्टा मयैतत् किल दर्शितम्॥ ३६<br>राज्यत्यागफलं सर्वं यदेतदभिलक्ष्यते।<br>तथेति प्राह राजा तु पुनस्तामभिनन्दयन्॥ ३७<br>त्वत्प्रसादादिदं सर्वं मयैतत् प्राप्यते फलम्।<br>ततस्ते योगमास्थाय सर्व एव वनौकसः॥ ३८<br>ब्रह्मरन्ध्रेण परमं पदमापुस्तपोबलात्।<br>एवमायुर्धनं विद्यां स्वर्गं मोक्षं सुखानि च॥ ३९<br>प्रयच्छन्ति सुतान् राज्यं नृणां प्रीताः पितामहाः।<br>य इदं पितृमाहात्म्यं ब्रह्मदत्तस्य च द्विजाः॥ ४०<br>द्विजेभ्यः श्रावयेद् यो वा शृणोत्यथ पठेत्तु वा।<br>कल्पकोटिशतं साग्रं ब्रह्मलोके महीयते॥ ४१ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ब्राह्मणकी ऐसी बात सुनकर राजा शोकाकुल हो अपने दोनों मन्त्रियोंके साथ भूतलपर गिर पड़े। उस समय उन्हें जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञातृत्व)-की प्राप्ति हो गयी। उन दोनों श्रेष्ठ मन्त्रियोंमें एक बाभ्रव्य सुबालक कामशास्त्रका प्रणेता और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता था। वह संसारमें पाञ्चाल नामसे विख्यात था। दूसरा कण्डरीक भी धर्मात्मा और वेद-शास्त्रका प्रवर्तक था। वे दोनों भी उस समय राजाके अग्रभागमें शोकाविष्ट हो धराशायी हो गये और उन्हें भी जातिस्मरत्वकी प्राप्ति हुई। (उस समय वे विलाप करते हुए कहने लगे—)'हाय! हमलोग लोलुप हो कर्मबन्धनमें फँसकर योगसे पूर्णतया भ्रष्ट हो गये।' इस तरह अनेकविध विलाप करके वे तीनों योगके पारदर्शी विद्वान् विस्मयाविष्ट हो बारंबार श्राद्धके माहात्म्यका अभिनन्दन करने लगे। तत्पश्चात् राजाने उस ब्राह्मणको अनेक गाँवोंसहित प्रचुर धन-सम्पत्ति प्रदान की। इस प्रकार धनकी प्राप्तिसे हर्षित हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको विदाकर राजा ब्रह्मदत्तने राजलक्षणोंसे युक्त अपने विष्वक्सेन नामक औरस पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया (और स्वयं जंगलकी राह ली)। तदनन्तर ब्रह्मदत्त आदि वे सभी श्रेष्ठ योगी मत्सररहित एवं पितृभक्त होकर उस मानसरोवरमें परस्पर आ मिले। संनतिका अमर्ष गल गया और वह राजासे कहने लगी—'राजन्! आप जो यह अभिलाषा कर रहे हैं, वह सब राज्य-त्यागका ही परिणाम है और निश्चय ही मेरे द्वारा घटित हुआ है।' राजाने 'तथेति'—ऐसा ही है कहकर उसकी बातको स्वीकार किया और पुनः उसका अभिनन्दन करते हुए कहा—'यह तुम्हारी ही कृपा है, जो मुझे यह सारा फल प्राप्त हो रहा है।' तदनन्तर वे सभी वनवासी योगका आश्रय लेकर अपने तपोबलके प्रभावसे ब्रह्मरन्ध्रद्वारा प्राणत्याग करके परमपदको प्राप्त हो गये। इस प्रकार प्रसन्न हुए पितामह—पितरलोग मनुष्योंको, आयु, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, पुत्र और राज्य प्रदान करते हैं। द्विजवरो! जो मनुष्य ब्रह्मदत्तके इस पितृमाहात्म्यको ब्राह्मणोंको सुनाता है या स्वयं श्रवण करता है अथवा पढ़ता है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक ब्रह्मलोकमें प्रशंसित होता है॥ २९—४१॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे पितृमाहात्म्यं नामैकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पमें पितृमाहात्म्य नामक इक्कीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २१॥