मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८२ * मत्स्यपुराण *
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वसत्त्वानुकम्पी च सर्वसत्त्वबलाधिकः ।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञश्च सर्वसत्त्वेश्वरेश्वरः ॥ १७ | चलकर सम्पूर्ण जीवोंपर दयालु, समस्त प्राणियोंमें अमित बलसम्पन्न, सम्पूर्ण प्राणियोंकी भाषाका ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके राजाधिराज-सम्राट् हुआ ॥ ११—१७ ॥ |
| अहसत् तेन योगात्मा स पिपीलिकरागतः ।<br>यत्र तत्कीटमिथुनं रममाणमवस्थितम् ॥ १८<br><br>ततः सा संनतिर्दृष्ट्वा तं हसन्तं सुविस्मिता ।<br>किमप्याशङ्क्य मनसा तमपृच्छन्नरेश्वरम् ॥ १९ | तत्पश्चात् जहाँ वे कीट-दम्पति (चींटे-चींटी) बातें करते हुए स्थित थे, वहाँ पहुँचनेपर चींटेकी कामचेष्टाको देखकर योगात्मा ब्रह्मदत्तको हँसी आ गयी। राजाको हँसते देखकर महारानी संनति आश्चर्यचकित हो उठी और मनमें किसी भावी अनर्थकी आशङ्का करके नरेश्वर ब्रह्मदत्तसे प्रश्न कर बैठी ॥ १८-१९ ॥ |
| संनतिरुवाच<br>अकस्मादतिहासस्ते किमर्थमभवन्नृप ।<br>हास्यहेतुं न जानामि यदकाले कृतं त्वया ॥ २० | संनतिने पूछा— राजन्! अकस्मात् आपका यह अट्टहास किसलिये हुआ है? असमयमें आपको जो यह हँसी आयी है, इस हास्यका कारण मैं नहीं समझ पा रही हूँ ॥ २० ॥ |
| सूत उवाच<br>अवदद् राजपुत्रोऽपि स पिपीलिकभाषितम् ।<br>रागवाग्भिः समुत्पन्नमेतद्धास्यं वरानने ॥ २१<br><br>न चान्यत्कारणं किंचिद्धास्यहेतौ शुचिस्मिते ।<br>न सामन्यत् तदा देवी प्राहालीकमिदं वचः ॥ २२<br><br>अहमेवाद्य हसिता न जीविष्ये त्वयाधुना ।<br>कथं पिपीलिकालापं मर्त्यो वेत्ति विना सुरान् ॥ २३<br><br>तस्मात् त्वयाहमेवेह हसिता किमतः परम् ।<br>ततो निरुत्तरो राजा जिज्ञासुस्तत्पुरो हरेः ॥ २४<br><br>आस्थाय नियमं तस्थौ समरात्रमकल्मषः ।<br>स्वप्ने प्राह हृषीकेशः प्रभाते पर्यटन् पुरम् ॥ २५<br><br>वृद्धद्विजो यस्तद्वाक्यात् सर्वं ज्ञास्यस्यशेषतः ।<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे विष्णुः प्रभातेऽथ नृपः पुरात् ॥ २६<br><br>निर्गच्छन्मन्त्रिसहितः सभार्यो वृद्धमग्रतः ।<br>गदन्तं विप्रमायान्तं तं वृद्धं संददर्श ह ॥ २७ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! तब राजकुमार ब्रह्मदत्तने (महारानी संनतिसे) चींटे-चींटीके उस सारे वार्तालापको सुनाते हुए कहा—'वरानने! इनके प्रेमालापपूर्ण वचनोंको सुननेसे मुझे ऐसी हँसी आ गयी है। शुचिस्मिते! मेरी हँसीके विषयमें कोई अन्य कारण नहीं है।' परंतु रानी संनतिने (राजाके उस कथनपर) विश्वास नहीं किया और कहा—'राजन्! आपका यह कथन सरासर असत्य है। अभी-अभी आपने मेरे ही किसी विषयको लेकर हास्य किया है, अतः अब मैं जीवन धारण नहीं करूँगी। भला, देवताओंके अतिरिक्त मृत्युलोकनिवासी प्राणी चींटे-चींटीके वार्तालापको कैसे जान सकता है! इसलिये यहाँ आपने मेरी ही हँसी उड़ायी है। इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता है?' रानीकी बात सुनकर निष्पाप राजा ब्रह्मदत्त कुछ उत्तर न दे सके। फिर इस रहस्यको जाननेकी इच्छासे वे श्रीहरिके समक्ष नियमपूर्वक आराधना करते हुए सात राततक बैठे रहे। अन्तमें भगवान् हृषीकेशने स्वप्नमें राजासे कहा—'राजन्! प्रातःकाल तुम्हारे नगरमें घूमता हुआ एक वृद्ध ब्राह्मण जो कुछ कहेगा, उसके उन वचनोंसे तुम्हें सारा रहस्य ज्ञात हो जायगा।' यों कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर प्रातःकाल जब राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी और दोनों मन्त्रियोंके साथ नगरसे निकल रहे थे, उसी समय उन्होंने अपने समक्ष आते हुए उस वृद्ध ब्राह्मणको देखा, जो इस प्रकार कह रहा था ॥ २१—२७ ॥ |
| ब्राह्मण उवाच<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च । | ब्राह्मण कह रहा था— 'जो (पहले) कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मणके रूपमें, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याधके रूपमें, |