मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २१ * ८१
| धृतिमांस्तत्त्वदर्शी च विद्याचण्डस्तपोत्सुकः।<br>नामतः कर्मतश्चैते सुदरिद्रस्य ते सुताः॥ ३<br>तपसे बुद्धिरभवत् तदा तेषां द्विजन्मनाम्।<br>यास्यामः परमां सिद्धिमित्यूचुस्ते द्विजोत्तमाः॥ ४<br>ततस्तद्वचनं श्रुत्वा सुदरिद्रो महातपाः।<br>उवाच दीनया वाचा किमेतदिति पुत्रकाः॥ ५<br>अधर्म एष इति वः पिता तानभ्यवारयत्।<br>वृद्धं पितरमुत्सृज्य दरिद्रं वनवासिनः॥ ६<br>को नु धर्मोऽत्र भविता मत्त्यागाद् गतिरेव वा।<br>ऊचुस्ते कल्पिता वृत्तिस्तव तात वदस्व तत्॥ ७<br>वित्तमेतत् पुरो राज्ञः स ते दास्यति पुष्कलम्।<br>धनं ग्रामसहस्राणि प्रभाते पठतस्तव॥ ८<br>ये विप्रमुख्याः कुरुजाङ्गलेषु<br>दाशास्तथा दाशपुरे मृगाश्च।<br>कालंजरे सप्त च चक्रवाका<br>ये मानसे तेऽत्र वसन्ति सिद्धाः॥ ९<br>इत्युक्त्वा पितरं जग्मुस्ते वनं तपसे पुनः।<br>वृद्धोऽपि राजभवनं जगामात्मार्थसिद्धये॥ १० | (उस समय उनके) धृतिमान्, तत्त्वदर्शी, विद्याचण्ड और तपोत्सुक—ये चार नाम थे। वे कर्मानुसार एक अत्यन्त सुदरिद्र (उस ब्राह्मणका नाम भी सुदरिद्र था) ब्राह्मणके पुत्र थे। बचपनमें ही इन ब्राह्मणोंकी बुद्धि तपस्याकी ओर प्रवृत्त हो गयी। तब ये द्विजश्रेष्ठ पितासे प्रार्थना करते हुए बोले—'पिताजी! हमलोग तपस्या करके परम सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं।' उनके इस कथनको सुनकर महातपस्वी सुदरिद्र दीन वाणीमें बोले—'पुत्रो! यह कैसी बात कह रहे हो? मुझ दरिद्र बूढ़े पिताको छोड़कर तुमलोग वनवासी होना चाहते हो, भला मेरा परित्याग कर देनेसे तुमलोगोंको कौन-सा धर्म प्राप्त होगा तथा तुम्हारी क्या गति होगी? यह तो महान् अधर्म है।' ऐसा कहकर पिताने उन्हें मना कर दिया। यह सुनकर उन पुत्रोंने कहा—'तात! हमलोगोंने आपके जीविकोपार्जनका प्रबन्ध कर लिया है। इसके अतिरिक्त आपको और क्या चाहिये, सो बतलाइये। यदि आप प्रातःकाल राजा ब्रह्मदत्तके समक्ष जाकर (आगे बताये जानेवाले श्लोकका) पाठ कीजियेगा तो वे आपको प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं सहस्रों ग्राम प्रदान करेंगे। (उस श्लोकका अर्थ यों है—)'जो कुरुक्षेत्रमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, दाशपुर (मंदसौर)-में व्याध, कालञ्जर पर्वतपर मृग और मानसरोवरमें सात चक्रवाक थे, वे सिद्ध (होकर) यहाँ निवास करते हैं।' पितासे ऐसा कहकर वे सभी तपस्या करनेके लिये वनमें चले गये। इधर वृद्ध सुदरिद्र भी अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये राजभवनकी ओर चल पड़े॥ २—१०॥ | | अणुहो नाम वैभ्राजः पाञ्चालाधिपतिः पुरा।<br>पुत्रार्थी देवदेवेशं हरिं नारायणं प्रभुम्॥ ११<br>आराधयामास विभुं तीव्रव्रतपरायणः।<br>ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य जनार्दनः॥ १२<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते हृदयेनेप्सितं नृप।<br>एवमुक्तस्तु देवेन वव्रे स वरमुत्तमम्॥ १३<br>पुत्रं मे देहि देवेश महाबलपराक्रमम्।<br>पारगं सर्वशास्त्राणां धार्मिकं योगिनां परम्॥ १४<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञं मे देहि योगिनमात्मजम्।<br>एवमस्त्विति विश्वात्मा तमाह परमेश्वरः॥ १५<br>पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत।<br>ततः स तस्य पुत्रोऽभूद् ब्रह्मदत्तः प्रतापवान्॥ १६ | (अब ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति-कथा बतलाते हैं—) पूर्वकालमें पञ्चाल देशके एक अणुह नामक नरेश हो गये हैं, जो विभ्राट्के पुत्र थे। वे पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे कठोर व्रतमें तत्पर होकर सामर्थ्यशाली एवं सर्वव्यापक देवदेवेश्वर नारायण श्रीहरिकी आराधना करने लगे। तत्पश्चात् अधिक काल व्यतीत होनेपर भगवान् जनार्दन उनकी आराधनासे प्रसन्न हुए (और उनके समक्ष प्रकट होकर बोले—) 'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम अपना मनोऽभिलषित वरदान माँग लो।' भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर राजाने उत्तम वरकी याचना करते हुए कहा—'देवेश! मुझे ऐसा पुत्र प्रदान कीजिये, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका पारगामी विद्वान्, धार्मिक, श्रेष्ठ योगी, सम्पूर्ण प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता और योगाभ्यासी हो। भगवन्! मुझे ऐसा ही औरस पुत्र दीजिये।' यह सुनकर विश्वात्मा परमेश्वर राजासे 'ऐसा ही हो'—यों कहकर समस्त देवताओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर समयानुसार वही प्रतापी ब्रह्मदत्त उस राजा अणुहका पुत्र हुआ, जो आगे |