भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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८० * मत्स्यपुराण *

| न त्वया सदृशी लोके कामिनी विद्यते क्वचित्।<br>मध्यक्षामातिजघना बृहद्वक्षोऽभिगामिनी ॥ ३०<br><br>सुवर्णवर्णा सुश्रोणी मञ्जूक्ता चारुहासिनी।<br>सुलक्ष्यनेत्ररसना गुडशर्करवत्सला ॥ ३१<br><br>भोक्ष्यसे मयि भुङ्क्ते त्वं स्नासि स्नाते तथा मयि।<br>प्रोषिते सति दीना त्वं क्रुद्धेऽपि भयचञ्चला ॥ ३२<br><br>किमर्थं वद कल्याणि सरोषवदना स्थिता।<br>सा तमाह सकोपा तु किमालपसि मां शठ ॥ ३३<br><br>त्वया मोदकचूर्णं तु मां विहाय विनेष्यता।<br>प्रदत्तं समतिक्रान्ते दिनेऽन्यस्याः समन्मथ ॥ ३४<br><br>पिपीलिक उवाच<br>त्वत्सादृश्यान्मया दत्तमन्यस्यै वरवर्णिनि।<br>तदेकमपराधं मे क्षन्तुमर्हसि भामिनि ॥ ३५<br><br>नैतदेवं करिष्यामि पुनः क्वापीह सुव्रते।<br>स्पृशामि पादौ सत्येन प्रसीद प्रणतस्य मे ॥ ३६<br><br>सूत उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा सा प्रसन्नाभवत् ततः।<br>आत्मानमर्पयामास मोहनाय पिपीलिका ॥ ३७<br><br>ब्रह्मदत्तोऽप्यशेषं तं ज्ञात्वा विस्मयमागमत्।<br>सर्वसत्त्वरुतज्ञत्वात् प्रसादाच्चक्रपाणिनः ॥ ३८ | 'प्रिये! इस जगत्में तुम्हारे समान सुन्दरी स्त्री कहीं कोई भी नहीं है। तुम्हारा कटिप्रदेश पतला और जंघे मोटे हैं, तुम स्तनोंके भारी भारसे विनम्र होकर चलनेवाली, स्वर्णके समान गौरवर्णा, सुन्दर कमरवाली, मृदुभाषिणी, मनोहर हास्यसे युक्त, भलीभाँति लक्ष्यको भेदन करनेवाले नेत्रों और जीभसे समन्वित तथा गुड़ और शक्करकी प्रेमी हो। तुम मेरे भोजन कर लेनेके पश्चात् भोजन करती हो तथा मेरे स्नान कर लेनेपर स्नान करती हो। इसी प्रकार मेरे परदेश चले जानेपर तुम दीन हो जाती हो और क्रुद्ध होनेपर भयभीत हो उठती हो। कल्याणि! बतलाओ तो सही, तुम किस कारण क्रोधसे मुँह फुलाये बैठी हो।' तब क्रोधसे भरी हुई चींटी उस कीटसे बोली—'शठ! तुम क्या मुझसे व्यर्थ बकवाद कर रहे हो? अरे धूर्त! अभी कल ही तुमने मेरा परित्याग करके लड्डूका चूर्ण ले जाकर दूसरी चींटीको नहीं दिया है?'॥ २८—३४॥<br><br>चींटा बोला—वरवर्णिनि! तुम्हारे सदृश रूप-रंगवाली होनेके कारण मैंने भूलसे दूसरी चींटीको लड्डू दे दिया है, अतः भामिनि! तुम मेरे इस एक अपराधको क्षमा कर दो। सुव्रते! मैं पुनः कभी भी इस प्रकारका कार्य नहीं करूँगा। मैं सत्यकी दुहाई देकर तुम्हारे चरण छूता हूँ, तुम मुझ विनीतपर प्रसन्न हो जाओ॥ ३५-३६॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार उस चींटेका कथन सुनकर वह चींटी प्रसन्न हो गयी। इधर, चक्रपाणि भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त प्राणियोंकी बोलीका ज्ञाता होनेके कारण ब्रह्मदत्त भी उस सारे वृत्तान्तको जानकर विस्मयविमुग्ध हो गये॥ ३७-३८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे श्राद्धकल्पे श्राद्धमाहात्म्ये पिपीलिकावहासो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके श्राद्धकल्पके श्राद्धमाहात्म्यमें पिपीलिकावहास नामक बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

ब्रह्मदत्तका वृत्तान्त तथा चार चक्रवाकोंकी गतिका वर्णन

| ऋषय ऊचुः<br>कथं सत्त्वरुतज्ञोऽभूद् ब्रह्मदत्तो धरातले।<br>तच्चाभवत् कस्य कुले चक्रवाकचतुष्टयम् ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>तस्मिन्नेव पुरे जातास्ते च चक्राह्वयास्तदा।<br>वृद्धद्विजस्य दायादा विप्रा जातिस्मराः पुरा ॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! ब्रह्मदत्त इस भूतलपर जन्म लेकर समस्त प्राणियोंकी बोलीके ज्ञाता कैसे हो गये? तथा वे चारों चक्रवाक किसके कुलमें उत्पन्न हुए?॥ १॥<br><br>सूतजी कहते हैं—ऋषियो! वे चारों चक्रवाक उसी ब्रह्मदत्तके नगरमें एक वृद्ध ब्राह्मणके पुत्ररूपसे उत्पन्न हुए थे। उस जन्ममें भी वे ब्राह्मण पूर्ववत् जातिस्मर बने रहे। |