भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 89

* अध्याय २० * ७९

| पितॄणां चैव माहात्म्याज्जाता जातिस्मरास्तु ते।<br>ते तु वैराग्ययोगेन आस्थायानशनं पुनः॥ १४<br>जातिस्मराः सप्त जाता मृगाः कालञ्जरे गिरौ।<br>नीलकण्ठस्य पुरतः पितृभावानुभाविताः ॥ १५<br>तत्रापि ज्ञानवैराग्यात् प्राणानुत्सृज्य धर्मतः।<br>लोकैरवेक्ष्यमाणास्ते तीर्थान्तेऽनशनेन तु॥ १६<br>मानसे चक्रवाकास्ते सञ्जाताः सप्त योगिनः।<br>नामतः कर्मतः सर्वाञ्छृणुध्वं द्विजसत्तमाः ॥ १७<br>सुमनाः कुमुदः शुद्धश्छिद्रदर्शी सुनेत्रकः।<br>सुनेत्रांशुमांश्चैव सप्तैते योगपारगाः ॥ १८<br>योगभ्रष्टास्त्रयस्तेषां बभ्रमुश्चाल्पचेतनाः।<br>दृष्ट्वा विभ्राजमानं तमुद्याने स्त्रीभिरन्वितम्॥ १९<br>क्रीडन्तं विविधैर्भावैर्महाबलपराक्रमम्।<br>पाञ्चालान्वयसम्भूतं प्रभूतबलवाहनम्॥ २०<br>राज्यकामोऽभवच्चैकस्तेषां मध्ये जलौकसाम्।<br>पितृवर्ती च यो विप्रः श्राद्धकृत् पितृवत्सलः॥ २१<br>अपरौ मन्त्रिणौ दृष्ट्वा प्रभूतबलवाहनौ।<br>मन्त्रित्वे चक्रतुश्चेच्छामस्मिन् मर्त्ये द्विजोत्तमाः॥ २२<br>तन्मध्ये ये तु निष्कामास्ते बभूवुर्द्विजोत्तमाः।<br>विभ्राजपुत्रस्त्वेकोऽभूद् ब्रह्मदत्त इति स्मृतः॥ २३<br>मन्त्रिपुत्रौ तथा चोभौ कण्डरीकसुबालकौ।<br>ब्रह्मदत्तोऽभिषिक्तः सन् पुरोहितविपश्चिता॥ २४<br>पाञ्चालराजो विक्रान्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>योगिवत् सर्वजन्तूनां रुतवेत्ताभवत् तदा॥ २५<br>तस्य राज्ञोऽभवद् भार्या देवलस्यात्मजा शुभा।<br>संनतिर्नाम विख्याता कपिला याभवत् पुरा॥ २६<br>पितृकार्ये नियुक्तत्वादभवद् ब्रह्मवादिनी।<br>तया चकार सहितः स राज्यं राजनन्दनः॥ २७<br>कदाचिदुद्यानगतस्तया सह स पार्थिवः।<br>ददर्श कीटमिथुनमनङ्गकलहाकुलम्॥ २८<br>पिपीलिकामनुनयन् परितः कीटकामुकः।<br>पञ्चबाणाभितप्ताङ्गः सगद्गदमुवाच ह॥ २९ | परंतु पितरोंके ही माहात्म्यसे वे सभी जातिस्मर (पूर्वजन्मके वृत्तान्तोंके ज्ञाता) बने ही रहे। पुनः श्राद्ध-कर्मके फलसे वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन सभीने अनशन करके अपने-अपने उस शरीरका त्याग कर दिया। तदनन्तर वे सातों कालञ्जर पर्वतपर भगवान् नीलकण्ठके समक्ष मृग-योनिमें उत्पन्न हुए। वहाँ भी पितरोंके स्नेहसे अनुभावित होनेके कारण वे जातिस्मर बने ही रहे। उस योनिमें भी ज्ञान और वैराग्य उत्पन्न हो जानेके कारण उन लोगोंने तीर्थ-स्थानमें अनशन करके लोगोंके देखते-देखते धर्मपूर्वक प्राणोंका उत्सर्ग कर दिया। तत्पश्चात् उन सातों योगाभ्यासी जनोंने मानसरोवरमें चक्रवाककी योनिमें जन्म धारण किया। द्विजवरो! अब आपलोग नाम एवं कर्मानुसार उन सभीका वृत्तान्त श्रवण कीजिये। इस योनिमें उनके नाम हैं—सुमना, कुमुद, शुद्ध, छिद्रदर्शी, सुनेत्रक, सुनेत्र और अंशुमान्। ये सातों योगके पारदर्शी थे। इनमेंसे अल्पबुद्धिवाले तीन तो योगसे भ्रष्ट हो गये और इधर-उधर भ्रमण करने लगे। उसी समय एक पाञ्चालवंशी नरेश, जो महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न था तथा जिसके पास अधिक-से-अधिक सेना और वाहन थे, अपने क्रीडोद्यानमें स्त्रियोंके साथ अनेकविध हाव-भावोंसे क्रीडा कर रहा था। उस शोभाशाली राजाको देखकर उन जलपक्षियोंमेंसे एकको, जो पितृभक्त श्राद्धकर्ता पितृवर्ती नामक ब्राह्मण था, राज्य-प्राप्तिकी आकाङ्क्षा उत्पन्न हो गयी। इसी प्रकार दूसरे दोनोंने राजाके दो मन्त्रियोंको प्रचुर सेना और वाहनोंसे युक्त देखकर इस मृत्युलोकमें मन्त्रि-पद प्राप्त करनेकी इच्छा व्यक्त की। द्विजवरो! उनमें जो चार निष्काम थे, वे सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणकुलमें पैदा हुए। उन तीनोंमेंसे पहला राजा विभ्राजके* पुत्ररूपमें ब्रह्मदत्त नामसे विख्यात हुआ तथा अन्य दो कण्डरीक और सुबालक नामसे मन्त्रीके पुत्र हुए। (राजा विभ्राजकी मृत्युके उपरान्त) विद्वान् पुरोहितने ब्रह्मदत्तको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह पाञ्चाल-नरेश ब्रह्मदत्त प्रबल पराक्रमी, सभी शास्त्रोंमें प्रवीण, योगज्ञ और सभी जन्तुओंकी बोलीका ज्ञाता था। देवलकी सुन्दरी कन्या, जो संनति नामसे विख्यात थी, राजा ब्रह्मदत्तकी पत्नी हुई। वह ब्रह्मवादिनी थी। उस पत्नीके साथ रहकर राजकुमार ब्रह्मदत्त राज्य-भार सँभालने लगा ॥ २—२७॥<br><br>एक बार राजा ब्रह्मदत्त अपनी पत्नी संनतिके साथ भ्रमण करनेके लिये उद्यानमें गया। वहाँ उसने काम-कलहसे व्याकुल एक कीट-दम्पति (चींटा-चींटी)-को देखा। वह कीट, जिसका शरीर कामदेवके बाणोंसे संतप्त हो उठा था, चारों ओरसे चींटीसे अनुनय-विनय करता हुआ गद्गद वाणीमें बोला— |


* इसका कहीं अणुह तथा कहीं नीप नाम भी आया है।